29 Sep मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण पर पुनर्विचार का समय: अर्थव्यवस्था के लिए नया दृष्टिकोण
✎ मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण एक मौद्रिक नीति ढाँचा है जहाँ केंद्रीय बैंक मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए मुद्रास्फीति के एक विशिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता है, लेकिन हालिया वैश्विक झटकों ने इसकी प्रभावशीलता पर…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय। सरकारी बजट। | GS Paper III — समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय।
- Prelims: मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting), मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC), भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), मुद्रा आपूर्ति (Money Supply), राजकोषीय नीति (Fiscal Policy), वैश्विक वित्तीय संकट (Global Financial Crisis), अपस्फीति (Deflation), नव-कीनेसियन मॉडल (Neo-Keynesian Models)
- Essay: आर्थिक स्थिरता और विकास में केंद्रीय बैंकों की भूमिका, बदलते वैश्विक परिदृश्य में मौद्रिक नीति की चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण एक मौद्रिक नीति ढाँचा है जहाँ केंद्रीय बैंक मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए मुद्रास्फीति के एक विशिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता है, लेकिन हालिया वैश्विक झटकों ने इसकी प्रभावशीलता पर पुनर्विचार की आवश्यकता को उजागर किया है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों द्वारा अपनाई गई मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting) नीति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पर बहस तेज हो गई है। 2021 से शुरू हुई दोहरे अंकों की मुद्रास्फीति दरों ने केंद्रीय बैंकों को आश्चर्यचकित कर दिया है, जिससे उनकी पूर्वानुमान विधियों और मौद्रिक नीति रणनीतियों की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक मॉडल, विशेषकर नव-कीनेसियन मॉडल, जनसांख्यिकीय, पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक झटकों को समझने में विफल रहे हैं, जिसके कारण नीतिगत चूक हुई है।
पृष्ठभूमि
- 2007-08 के वैश्विक वित्तीय संकट (Global Financial Crisis) के बाद, दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंक एक दशक से अधिक समय तक मुद्रास्फीति के प्रति चिंतित नहीं थे। उनका ध्यान अपस्फीति (Deflationary) दबावों से निपटने पर केंद्रित था।
- 2021 के बाद से, स्थिति अचानक बदल गई और दोहरे अंकों की मुद्रास्फीति दरें आम हो गईं, जिससे केंद्रीय बैंक आश्चर्यचकित रह गए।
- केंद्रीय बैंकों ने मुद्रास्फीति के लिए COVID-19 संकट जैसे अप्रत्याशित कारकों को जिम्मेदार ठहराया, यह सुझाव देते हुए कि मौद्रिक नीति को सख्त करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।
- यह एक गंभीर गलत निदान साबित हुआ, जो पारंपरिक मुद्रास्फीति पूर्वानुमान विधियों, मुख्य रूप से नव-कीनेसियन मॉडल की विफलता से उत्पन्न हुआ।
- मुद्रा आपूर्ति (Money Supply) की तीव्र वृद्धि, जो बड़े पैमाने पर सार्वजनिक ऋण जारी करने और केंद्रीय बैंक के बॉन्ड खरीद से प्रेरित थी, को अधिकांश केंद्रीय बैंकों द्वारा अनदेखा किया गया।
- नोबेल पुरस्कार विजेता रॉबर्ट लुकास की आलोचना के अनुसार, महत्वपूर्ण व्यवधान प्रमुख आर्थिक चर के बीच संबंधों को बदल सकते हैं, जिससे मॉडल अपनी पूर्वानुमान शक्ति खो देते हैं।
- भारत में, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचे के तहत कार्य करती है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है।
मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting) क्या है?
- मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण एक मौद्रिक नीति ढाँचा है जिसमें एक केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति के एक विशिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध होता है।
- इस नीति का मुख्य उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है।
- भारत में, RBI अधिनियम, 1934 में संशोधन के बाद, मौद्रिक नीति समिति (MPC) को 4 प्रतिशत (± 2 प्रतिशत) के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index – CPI) आधारित मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने का कार्य सौंपा गया है।
- MPC में छह सदस्य होते हैं: तीन RBI से और तीन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त। RBI गवर्नर MPC के पदेन अध्यक्ष होते हैं।
- मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के समर्थकों का तर्क है कि यह नीति पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाती है, जिससे जनता और बाजारों को केंद्रीय बैंक की नीतियों को समझने में मदद मिलती है।
- हालांकि, आलोचकों का मानना है कि यह ढाँचा मुद्रा आपूर्ति, बैंकिंग प्रणाली और वित्तीय बाजारों से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को एकीकृत करने वाले मॉडल की कमी के कारण आर्थिक झटकों के प्रति लचीला नहीं है।
- यह नीति अक्सर केवल मांग-पक्ष के कारकों पर ध्यान केंद्रित करती है और आपूर्ति-पक्ष के झटकों (जैसे तेल की कीमतों में वृद्धि या फसल खराब होना) को प्रभावी ढंग से संबोधित करने में विफल रहती है।
- हालिया अनुभव ने दिखाया है कि यह नीति वित्तीय अस्थिरता और अप्रत्याशित वैश्विक घटनाओं के सामने विफल हो सकती है, जिससे एक अधिक व्यापक विश्लेषणात्मक ढांचे की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting) | यह एक मौद्रिक नीति ढाँचा है जहाँ केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को एक विशिष्ट लक्ष्य सीमा के भीतर रखने का प्रयास करता है। इसका उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना और आर्थिक अनिश्चितता को कम करना है। |
| मुद्रा आपूर्ति (Money Supply) | अर्थव्यवस्था में प्रचलन में कुल धन की मात्रा। यह मुद्रास्फीति को प्रभावित करने वाले एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में देखा जाता है, विशेषकर जब इसकी वृद्धि दर अत्यधिक हो। |
| नव-कीनेसियन मॉडल (Neo-Keynesian Models) | ये आर्थिक मॉडल मुद्रास्फीति पूर्वानुमान के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन हाल की घटनाओं ने इनकी भविष्य कहनेवाला शक्ति पर सवाल उठाए हैं, खासकर बड़े झटकों के दौरान। |
| वित्तीय स्थिरता (Financial Stability) | यह सुनिश्चित करना कि वित्तीय प्रणाली झटकों का सामना कर सके और बिना किसी बड़े व्यवधान के अपने कार्यों को पूरा कर सके। मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण में अक्सर इस पहलू की उपेक्षा की जाती है। |
| रॉबर्ट लुकास की आलोचना (Robert Lucas’ Critique) | यह बताता है कि महत्वपूर्ण व्यवधान (जैसे महामारी) प्रमुख आर्थिक चरों के बीच संबंधों को बदल सकते हैं, जिससे पारंपरिक मॉडलों की भविष्य कहनेवाला शक्ति कम हो जाती है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की प्रभावशीलता पर पुनर्विचार से केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीति रणनीतियों में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकते हैं, जिससे मूल्य स्थिरता और आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा।
- मुद्रा आपूर्ति की भूमिका को फिर से मान्यता देने से मौद्रिक नीति के संचालन में एक नया दृष्टिकोण आ सकता है, जो केवल ब्याज दरों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय व्यापक मौद्रिक संकेतकों को भी ध्यान में रखेगा।
नीतिगत निहितार्थ
- केंद्रीय बैंकों को अपने पूर्वानुमान मॉडल और नीतिगत ढाँचों को अद्यतन करने की आवश्यकता होगी ताकि जनसांख्यिकीय, पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक झटकों के प्रभावों को बेहतर ढंग से शामिल किया जा सके।
- वित्तीय प्रणाली से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को मौद्रिक नीति रणनीति में एकीकृत करने से भविष्य के वित्तीय संकटों को रोकने में मदद मिल सकती है।
शासन और जवाबदेही
- केंद्रीय बैंकों को अपनी विफलताओं को स्वीकार करने और अपनी नीतियों का पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता है, जिससे उनकी विश्वसनीयता और सार्वजनिक जवाबदेही (Public Accountability) बढ़ेगी।
- यह चर्चा केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता और उनके जनादेश की सीमा पर भी बहस छेड़ सकती है।
चुनौतियाँ
1. मुद्रास्फीति पूर्वानुमान मॉडलों की विफलता
- पारंपरिक नव-कीनेसियन मॉडल बड़े आर्थिक झटकों के दौरान मुद्रास्फीति का सही अनुमान लगाने में विफल रहे हैं।
- ये मॉडल आपूर्ति-पक्ष के झटकों और गैर-चक्रीय मंदी (Non-Cyclical Recession) के प्रभावों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं करते हैं।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मौद्रिक नीति, मुद्रास्फीति
2. मुद्रा आपूर्ति की उपेक्षा
- अधिकांश केंद्रीय बैंकों ने मुद्रा आपूर्ति की तीव्र वृद्धि को नजरअंदाज कर दिया, जिससे मुद्रास्फीति का गलत निदान हुआ।
- मुद्रा की मांग की अस्थिरता के कारण मुद्रावादी (Monetarist) दृष्टिकोण को पुराना मान लिया गया था, जिससे इस महत्वपूर्ण कारक की अनदेखी हुई।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मौद्रिक नीति के उपकरण
3. वित्तीय प्रणाली के जोखिमों का एकीकरण
- वर्तमान मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा बैंकिंग प्रणाली और वित्तीय बाजारों से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को पर्याप्त रूप से एकीकृत नहीं करता है।
- वित्तीय अस्थिरता (Financial Instability) के कारण मौद्रिक नीति की प्रभावशीलता कम हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: वित्तीय बाजार, बैंकिंग प्रणाली
4. आर्थिक अनिश्चितता का सामना
- जनसांख्यिकीय, पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक झटकों ने आर्थिक अनिश्चितता को बढ़ाया है, जिससे एक मजबूत मौद्रिक नीति रणनीति की आवश्यकता है।
- नीति निर्माताओं को ऐसे ढाँचे की आवश्यकता है जो सभी प्रासंगिक कारकों को एक सुसंगत समग्र चित्र में एकीकृत करे।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मुद्रास्फीति पूर्वानुमान की सटीकता | महामारी जैसे बड़े झटकों के दौरान पारंपरिक मॉडल विफल रहे, जिससे नीतिगत प्रतिक्रियाएँ गलत हुईं। |
| मुद्रा आपूर्ति की भूमिका | केंद्रीय बैंकों द्वारा मुद्रा आपूर्ति की तीव्र वृद्धि की उपेक्षा ने उच्च मुद्रास्फीति में योगदान दिया। |
| वित्तीय जोखिमों का एकीकरण | मौजूदा मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा वित्तीय बाजारों से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करता है। |
| नीतिगत लचीलापन | बढ़ती आर्थिक अनिश्चितता और विभिन्न झटकों के सामने मौद्रिक नीति को अधिक लचीला और व्यापक होने की आवश्यकता है। |
| केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता | गलत पूर्वानुमान और नीतिगत विफलताओं ने केंद्रीय बैंकों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। |
आगे की राह
- मौद्रिक नीति ढाँचे का पुनर्मूल्यांकन करें, जिसमें मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की प्रभावशीलता और सीमाओं की गहन समीक्षा शामिल हो।
- मुद्रा आपूर्ति जैसे व्यापक मौद्रिक संकेतकों को मौद्रिक नीति निर्धारण में फिर से शामिल करें और उनकी भूमिका का विश्लेषण करें।
- नवीन पूर्वानुमान मॉडल विकसित करें जो जनसांख्यिकीय, पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक झटकों सहित गैर-चक्रीय कारकों को बेहतर ढंग से शामिल कर सकें।
- वित्तीय स्थिरता को मौद्रिक नीति रणनीति का एक अभिन्न अंग बनाएँ, जिसमें बैंकिंग प्रणाली और वित्तीय बाजारों से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को एकीकृत किया जाए।
- केंद्रीय बैंकों को अपनी विफलताओं को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना चाहिए और अपनी नीतियों के पुनर्मूल्यांकन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।
- एक मजबूत विश्लेषणात्मक ढाँचा विकसित करें जो सभी प्रासंगिक आर्थिक कारकों को एक सुसंगत समग्र चित्र में एकीकृत करे, ताकि आर्थिक अनिश्चितता के प्रति लचीलापन बढ़ाया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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अवधारणा प्रवाह
वैश्विक वित्तीय संकट के बाद केंद्रीय बैंकों ने अपस्फीति पर ध्यान केंद्रित किया। → 2021 से उच्च मुद्रास्फीति दरें देखी गईं, केंद्रीय बैंक आश्चर्यचकित हुए। → पारंपरिक नव-कीनेसियन पूर्वानुमान मॉडल विफल रहे, मुद्रा आपूर्ति की उपेक्षा हुई। → जनसांख्यिकीय, पर्यावरणीय, भू-राजनीतिक झटकों ने आर्थिक संबंधों को बदल दिया। → मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचे में वित्तीय जोखिमों को शामिल करने की कमी। → केंद्रीय बैंकों को अपनी मौद्रिक नीति रणनीतियों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting) का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है।
2. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अधिनियम, 1934 के तहत, सरकार RBI के परामर्श से मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारित करती है।
3. मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचा केवल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित है, न कि थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीनों
- कोई भी नहीं
उत्तर: सभी तीनों — कथन 1 सही है। भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण का मुख्य उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जो आर्थिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है। कथन 2 सही है। भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 में संशोधन के बाद, केंद्र सरकार भारतीय रिज़र्व बैंक के परामर्श से हर पाँच साल में मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारित करती है। कथन 3 सही है। भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (संयुक्त) को आधार बनाया गया है, क्योंकि यह आम जनता के उपभोग पैटर्न को अधिक सटीक रूप से दर्शाता है।
Q2. मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सबसे उपयुक्त है?
- यह केवल मुद्रा आपूर्ति (Money Supply) की वृद्धि दर को नियंत्रित करने पर केंद्रित है।
- यह केंद्रीय बैंक को केवल राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) के माध्यम से हस्तक्षेप करने की अनुमति देता है।
- यह एक मौद्रिक नीति ढाँचा है जहाँ केंद्रीय बैंक मूल्य स्थिरता प्राप्त करने के लिए एक विशिष्ट मुद्रास्फीति दर को लक्षित करता है।
- यह वित्तीय बाजारों में अस्थिरता को पूरी तरह से समाप्त करने की गारंटी देता है।
उत्तर: यह एक मौद्रिक नीति ढाँचा है जहाँ केंद्रीय बैंक मूल्य स्थिरता प्राप्त करने के लिए एक विशिष्ट मुद्रास्फीति दर को लक्षित करता है। — मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण एक मौद्रिक नीति ढाँचा है जहाँ केंद्रीय बैंक मूल्य स्थिरता प्राप्त करने के लिए एक विशिष्ट मुद्रास्फीति दर को सार्वजनिक रूप से लक्षित करता है। यह केवल मुद्रा आपूर्ति या राजकोषीय नीति पर केंद्रित नहीं है, बल्कि ब्याज दरों और अन्य मौद्रिक उपकरणों का उपयोग करता है। यह वित्तीय बाजारों में अस्थिरता को पूरी तरह से समाप्त करने की गारंटी नहीं देता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting) क्या है? हाल के वैश्विक अनुभवों के आलोक में, भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचे के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की परिभाषा और भारत में इसके कार्यान्वयन (RBI अधिनियम, 1934 में संशोधन, 2-6% CPI लक्ष्य) का संक्षिप्त उल्लेख।
मुख्य भाग:
1. मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के लाभ: मूल्य स्थिरता, पारदर्शिता, जवाबदेही, आर्थिक अनिश्चितता में कमी।
2. हाल के वैश्विक अनुभव: COVID-19 महामारी, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति-श्रृंखला व्यवधानों के कारण उत्पन्न उच्च मुद्रास्फीति।
3. मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की चुनौतियाँ/कमियाँ:
क. आपूर्ति-पक्ष के झटके (Supply-side Shocks): मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण मुख्य रूप से मांग-पक्ष के कारकों पर केंद्रित होता है, लेकिन हाल की मुद्रास्फीति आपूर्ति-पक्ष के झटकों से प्रेरित थी, जिन पर मौद्रिक नीति का सीमित प्रभाव होता है।
ख. मुद्रा आपूर्ति की उपेक्षा: कुछ अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि केंद्रीय बैंकों ने मुद्रा आपूर्ति की तीव्र वृद्धि को नजरअंदाज किया, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ी।
ग. वित्तीय स्थिरता के जोखिम: मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा बैंकिंग प्रणाली और वित्तीय बाजारों से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को पूरी तरह से एकीकृत नहीं करता है।
घ. पूर्वानुमान मॉडल की विफलता: नव-कीनेसियन मॉडल जैसे पारंपरिक पूर्वानुमान मॉडल बड़े व्यवधानों के दौरान अपनी भविष्य कहनेवाला शक्ति खो सकते हैं।
4. भारत के संदर्भ में पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता: भारत में भी आपूर्ति-पक्ष के झटके (जैसे खाद्य और ईंधन की कीमतें) मुद्रास्फीति के प्रमुख चालक रहे हैं। वित्तीय स्थिरता और व्यापक आर्थिक कारकों को मौद्रिक नीति में अधिक महत्व देने की आवश्यकता।
निष्कर्ष: एक अधिक लचीले और व्यापक मौद्रिक नीति ढाँचे की आवश्यकता पर बल दें, जो केवल मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण से परे जाकर वित्तीय स्थिरता, मुद्रा आपूर्ति और आपूर्ति-पक्ष के झटकों जैसे विभिन्न कारकों को एकीकृत करे।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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