झारखंड HC: भाइयों की खरीदी जमीन में बहन का हिस्सा नहीं

झारखंड HC: भाइयों की खरीदी जमीन में बहन का हिस्सा नहीं

झारखंड HC: भाइयों की खरीदी जमीन में बहन का हिस्सा नहीं

झारखंड उच्च न्यायालय का संपत्ति विवाद पर फैसलाभाइयों द्वारा खरीदी गई जमीनमां की स्व-अर्जित संपत्तिअर्जन का तरीकाभाइयों द्वारा संयुक्त खरीदमां की अपनी कमाई से अर्जितबहन का हिस्साकोई हिस्सा नहींएक-तिहाई हिस्साभाइयों का हिस्साआधा-आधा (50-50%)एक-तिहाई हिस्सान्यायालय का संदेशअर्जन का स्वरूप महत्वपूर्णलैंगिक समानता को बढ़ावा
झारखंड उच्च न्यायालय का संपत्ति विवाद पर फैसला

✎ पैतृक या सहदायिकी संपत्ति में बेटी को 2005 के संशोधन से जन्म से समान अधिकार है, जबकि भाइयों द्वारा संयुक्त रूप से खरीदी गई स्व-अर्जित जमीन में बहन का स्वतः हिस्सा नहीं बनता; अर्जन का स्वरूप ही निर्णायक है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था और शासन (न्यायपालिका, संविधान और न्यायिक निर्णय)  |  GS Paper II — सामाजिक न्याय (महिलाओं से संबंधित कानूनी अधिकार)
  • Prelims: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act, 1956) की धारा 6 और 2005 का संशोधन, सहदायिकी (Coparcenary) और मिताक्षरा संयुक्त परिवार, स्व-अर्जित संपत्ति बनाम पैतृक संपत्ति, प्रथम अपील (First Appeal) — सिविल प्रक्रिया संहिता (Civil Procedure Code), 1908 की धारा 96, अनुच्छेद 300A — संपत्ति का अधिकार (विधिक अधिकार, मूल अधिकार नहीं), विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) — सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय, अनुच्छेद 214 — राज्य के लिए उच्च न्यायालय
  • Essay: संपत्ति में महिलाओं का समान अधिकार: कानूनी प्रावधान और सामाजिक यथार्थ, न्यायिक व्याख्या सामाजिक परिवर्तन का माध्यम: कानून के शब्द और उनका अर्थ

त्वरित पुनरावृत्ति: पैतृक या सहदायिकी संपत्ति में बेटी को 2005 के संशोधन से जन्म से समान अधिकार है, जबकि भाइयों द्वारा संयुक्त रूप से खरीदी गई स्व-अर्जित जमीन में बहन का स्वतः हिस्सा नहीं बनता; अर्जन का स्वरूप ही निर्णायक है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) ने बोकारो जिले के भोजूडीह गांव के एक संपत्ति विवाद में निचली अदालत के फैसले में संशोधन किया। न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की एकल पीठ ने प्रथम अपील की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि दो भाइयों द्वारा संयुक्त रूप से खरीदी गई जमीन में बहन का हिस्सा नहीं बनता, और इस जमीन का बंटवारा दोनों भाइयों के बीच आधा-आधा होगा। वहीं, मां की अपनी कमाई से अर्जित संपत्ति में बेटे और बेटियां समान रूप से हकदार होंगे, जिसमें तीनों भाई-बहनों का एक-एक तिहाई हिस्सा रखा गया है। अदालत का मुख्य संदेश यह है कि संपत्ति पर अधिकार तय करते समय उसके अर्जन का स्वरूप और तरीका देखना आवश्यक है।

पृष्ठभूमि

  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 ने हिंदुओं के बीच निर्वसीयत (intestate) उत्तराधिकार के नियम तय किए। इसकी धारा 8 के अंतर्गत पुरुष की संपत्ति का बंटवारा प्रथम श्रेणी के वारिसों में होता है, जिनमें पुत्री भी शामिल है।
  • वर्ष 2005 के संशोधन द्वारा धारा 6 में बदलाव कर पुत्रियों को भी मिताक्षरा संयुक्त परिवार की सहदायिकी में जन्म से पुत्र के समान अधिकार दिए गए।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) में स्पष्ट किया कि यह अधिकार 9 सितंबर 2005 को जीवित पुत्रियों पर भी लागू होता है, भले ही पिता का निधन उससे पहले हो चुका हो।
  • संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300A के अंतर्गत एक संवैधानिक विधिक अधिकार है। इसके लिए विधि के अधिकार के बिना किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
  • इस मामले में निचली अदालत के फैसले के विरुद्ध अपीलकर्ता ने झारखंड उच्च न्यायालय में प्रथम अपील दायर की थी। प्रथम अपील में अपीलीय न्यायालय तथ्य और विधि, दोनों पर पुनर्विचार कर सकता है।

हिंदू संपत्ति बंटवारे में अर्जन के स्वरूप का सिद्धांत क्या है?

  • संपत्ति को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जाता है: पैतृक संपत्ति, जो चार पीढ़ियों तक सहदायिकी में चलती है, और स्व-अर्जित संपत्ति, जिसे व्यक्ति अपनी आय या खरीद से अर्जित करता है।
  • स्व-अर्जित संपत्ति का स्वामी उसे अपनी इच्छा से वसीयत द्वारा किसी को भी दे सकता है। वसीयत के अभाव में यह निर्वसीयत उत्तराधिकार के नियमों के अनुसार बंटती है।
  • भाइयों द्वारा संयुक्त रूप से खरीदी गई जमीन उनकी अपनी अर्जित संपत्ति मानी जाती है। ऐसी जमीन में बहन का स्वतः कोई हिस्सा नहीं बनता, क्योंकि उसके अधिकार का आधार उत्तराधिकार है और यह संपत्ति उस समय उत्तराधिकार की स्थिति में नहीं थी।
  • मां की स्व-अर्जित संपत्ति पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत महिला का पूर्ण स्वामित्व माना जाता है। उसके निधन के बाद उसकी संपत्ति का बंटवारा धारा 15 के नियमों से तय होता है, जिसमें संतानों के साथ अन्य वारिसों के अधिकार भी शामिल हो सकते हैं।
  • इस निर्णय से स्पष्ट होता है कि एक ही परिवार में अलग-अलग संपत्तियों पर अलग-अलग नियम लागू हो सकते हैं। इसलिए हर संपत्ति का अर्जन-इतिहास, दस्तावेज़ और स्वामित्व की प्रकृति जांचना आवश्यक है।
  • संपत्ति विवाद में सिविल न्यायालय की भूमिका मुख्य है। निचली अदालत का निर्णय चुनौती दिए जाने पर उच्च न्यायालय प्रथम अपील में उसमें संशोधन या परिवर्तन कर सकता है।
  • परीक्षा की दृष्टि से यह निर्णय यह दिखाता है कि कानून के सामान्य प्रावधान (धारा 6, धारा 8, धारा 14, धारा 15) और न्यायिक व्याख्या मिलकर व्यावहारिक अधिकार तय करते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
संयुक्त रूप से खरीदी गई जमीन (सह-स्वामित्व) दो भाइयों की संयुक्त खरीद में बहन का कोई स्वतः हिस्सा नहीं माना गया; दोनों भाइयों को 50-50 प्रतिशत हिस्सा मिला। यह स्वामित्व के स्रोत (खरीद का तरीका) पर आधारित है।
मां की स्व-अर्जित संपत्ति मां की अपनी कमाई से अर्जित संपत्ति में बेटे और बेटी दोनों को समान अधिकार माना गया। फैसले के अनुसार भाई-बहन में से प्रत्येक को एक-एक तिहाई हिस्सा मिला।
संपत्ति का स्रोत-आधारित विश्लेषण अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिकार तय करते समय यह देखना आवश्यक है कि संपत्ति किसने और किस प्रकार अर्जित की है। एक ही परिवार की दो संपत्तियों पर अलग-अलग नियम लागू हुए।
प्रथम अपील में संशोधन बोकारो के भोजूडीह गांव के मामले में निचली अदालत के आदेश को झारखंड उच्च न्यायालय ने प्रथम अपील (First Appeal) की सुनवाई में संशोधित किया। इससे निचली अदालत के निर्णय की समीक्षा का मार्ग स्पष्ट हुआ।
न्यायाधीश और न्यायिक पीठ न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की एकल पीठ ने यह निर्णय दिया। इससे यह संकेत मिलता है कि संपत्ति विवादों में उच्च न्यायालय की अपीलीय शक्ति निचली अदालत के तथ्यात्मक और विधिक निष्कर्षों की पुनर्समीक्षा कर सकती है।

महत्व

कानूनी और न्यायिक महत्व

  • यह फैसला इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि संपत्ति पर अधिकार का निर्धारण उसके अर्जन के स्रोत और तरीके से होता है, केवल पारिवारिक संबंध से नहीं।
  • सह-स्वामित्व और स्व-अर्जित संपत्ति के बीच स्पष्ट भेद से भविष्य के समान प्रकार के विवादों में मार्गदर्शन मिलता है।
  • प्रथम अपील में निचली अदालत के आदेश का संशोधन न्यायिक पुनर्विचार की व्यवस्था का व्यावहारिक उदाहरण है।

सामाजिक और लैंगिक महत्व

  • मां की स्व-अर्जित संपत्ति में बेटी को बेटे के समान हिस्सा मिलना पैतृक और मातृक संपत्ति में लैंगिक समानता के विचार को मजबूत करता है।
  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act, 1956) द्वारा बेटियों को दिए गए अधिकारों के व्यवहार में लागू होने की दिशा में यह निर्णय उपयोगी संदर्भ है।
  • परिवार के भीतर संपत्ति संबंधी जागरूकता बढ़ने से बहनों के अधिकारों के दावे अधिक सुरक्षित होते हैं।

संपत्ति अधिकार और आर्थिक पक्ष

  • संपत्ति का सही बंटवारा भूमि के स्वामित्व को स्पष्ट करता है, जिससे लेन-देन, बंधक और उत्तराधिकार की प्रक्रिया सुगम होती है।
  • भूमि-विवाद कम होने से ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादक परिसंपत्ति (जैसे कृषि भूमि) का उपयोग बेहतर हो सकता है।

चुनौतियाँ

1. सह-स्वामित्व बनाम पारिवारिक अपेक्षा

  • संयुक्त खरीद में बहन का हिस्सा न होने का नियम कई परिवारों में अनुचित या अन्यायपूर्ण माना जा सकता है, जिससे पारिवारिक तनाव बढ़ता है।
  • ऐसे मामलों में सामाजिक दबाव के कारण बहनें अपने वैधानिक दावे से पीछे हट जाती हैं।

2. दस्तावेज़ी स्पष्टता का अभाव

  • खरीद-विलेख, रजिस्ट्री और राजस्व अभिलेखों में स्वामित्व का स्पष्ट उल्लेख न होने से विवाद की स्थिति बनती है।
  • खतियान और दाखिल-खारिज जैसी राजस्व प्रक्रियाओं में विलंब से संपत्ति का वास्तविक स्वामी तय करना कठिन हो जाता है।

3. न्यायिक लंबितता और अपील की लंबी प्रक्रिया

  • संपत्ति विवाद दीवानी न्यायालयों में वर्षों तक लंबित रहते हैं, जिससे उत्तराधिकारियों का वास्तविक अधिकार देर से मिलता है।
  • निचली अदालत से उच्च न्यायालय तक अपील की श्रृंखला से लागत और समय दोनों बढ़ते हैं।

4. व्यक्तिगत कानून और उत्तराधिकार की विविधता

  • भारत में उत्तराधिकार विभिन्न धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों से शासित होता है, जिससे एक जैसे मामलों में अलग परिणाम संभव हैं।
  • समान नागरिक संहिता पर चर्चा के संदर्भ में इन कानूनों में एकरूपता और समानता का प्रश्न बना रहता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
पारिवारिक सहमति बनाम कानूनी अधिकार कानूनी हक होने के बावजूद बहनों को व्यावहारिक रूप से हिस्सा पाने में सामाजिक और पारिवारिक दबाव का सामना करना पड़ता है।
भूमि अभिलेखों की अस्पष्टता खरीद के स्रोत और स्वामित्व के दस्तावेज़ों में असंगति से यह तय करना कठिन होता है कि कौन सी संपत्ति स्व-अर्जित है और कौन सी संयुक्त।
अपील-आधारित लंबी प्रक्रिया निचली अदालत से उच्च न्यायालय तक मामलों के लंबित रहने से पीड़ित पक्ष को न्याय देर से मिलता है।
कानूनी जागरूकता का अभाव ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं अपने उत्तराधिकार और संपत्ति अधिकारों से पूरी तरह अवगत नहीं होतीं, जिससे वे समय पर दावा नहीं कर पातीं।
व्यक्तिगत कानूनों में एकरूपता का प्रश्न विभिन्न समुदायों के उत्तराधिकार नियमों में अंतर से समान स्थितियों में भिन्न परिणाम निकलते हैं।

आगे की राह

  • भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण और खतियान-दाखिल-खारिज प्रक्रिया को पारदर्शी बनाकर स्वामित्व-संबंधी विवाद कम किए जाएं।
  • खरीद-विलेख में क्रेताओं के हिस्से का स्पष्ट उल्लेख अनिवार्य करने पर विचार किया जाए, ताकि भविष्य के विवाद घटें।
  • संपत्ति संबंधी विवादों के निपटारे के लिए विशेष पीठों और मध्यस्थता तंत्र को मजबूत किया जाए।
  • बेटियों और महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों के बारे में व्यापक कानूनी साक्षरता अभियान चलाए जाएं।
  • उत्तराधिकार के नियमों के बारे में ग्रामीण और कम साक्षर समुदायों तक सरल भाषा में जानकारी पहुंचाई जाए।
  • उत्तराधिकार कानूनों की समीक्षा में समानता के सिद्धांत और सामाजिक यथार्थ दोनों को ध्यान में रखा जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act, 1956) · हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 · सहदायिकी (Coparcenary) · स्व-अर्जित संपत्ति (Self-acquired Property) · पैतृक संपत्ति (Ancestral Property) · निर्वसीयत उत्तराधिकार (Intestate Succession) · संपत्ति का अधिकार (Right to Property) और अनुच्छेद 300A · विभाजन अधिनियम, 1893 (Partition Act, 1893) · लैंगिक न्याय और महिला संपत्ति अधिकार · न्यायिक निर्णयों द्वारा विधि का विकास

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 300A: संपत्ति का अधिकार, विधि द्वारा ही वंचित होने का प्रावधान
  • अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता, उत्तराधिकार में लैंगिक समानता

अवधारणा प्रवाह

संपत्ति का अर्जन: भाइयों द्वारा संयुक्त खरीद और मां द्वारा स्व-अर्जित संपत्ति का निर्माण  →  स्वामित्व का स्रोत तय होना: संयुक्त स्वामित्व और स्व-अर्जित संपत्ति के अलग नियम  →  बंटवारे का विवाद: बोकारो के भोजूडीह गांव में निचली अदालत का आदेश  →  प्रथम अपील: उच्च न्यायालय में गंगाधर राजवार की अपील पर सुनवाई  →  न्यायिक संशोधन: संयुक्त जमीन में भाइयों को 50-50 प्रतिशत और मां की संपत्ति में भाई-बहन को एक-एक तिहाई हिस्सा

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अंतर्गत निर्वसीयत मरने वाली हिंदू महिला की स्व-अर्जित संपत्ति का उत्तराधिकार पहले वर्ग-I के वारिसों को मिलता है, जिनमें पुत्र और पुत्री दोनों सम्मिलित हैं।
2. हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के बाद मिताक्षरा संयुक्त परिवार की पुत्री जन्म से ही सहदायिक (Coparcener) मानी जाती है।
3. दो भाइयों द्वारा अपने स्वयं के धन से संयुक्त रूप से खरीदी गई भूमि पर, भाइयों के जीवित रहते, बहन को केवल बहन होने के आधार पर स्वतः कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता, क्योंकि उत्तराधिकार का प्रश्न स्वामी की मृत्यु पर खुलता है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. उपर्युक्त में से कोई नहीं

उत्तर: उपर्युक्त में से कोई नहीं — कथन 1 सही है: धारा 15 के अंतर्गत निर्वसीयत हिंदू महिला की संपत्ति का क्रम वर्ग-I वारिसों से शुरू होता है, जिसमें पुत्र और पुत्री दोनों आते हैं। कथन 2 सही है: 2005 के संशोधन ने धारा 6 के माध्यम से पुत्री को संयुक्त परिवार की संपत्ति में पुत्र के समान सहदायिक अधिकार दिए। कथन 3 सही है: उत्तराधिकार की प्रक्रिया स्वामी की मृत्यु पर आरंभ होती है, इसलिए जीवित भाइयों की संयुक्त खरीद में बहन का स्वतः हिस्सा नहीं बनता। अतः तीनों कथन सही हैं।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए, जिनमें एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है:

अभिकथन (A): भारत में संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार न होते हुए भी संवैधानिक अधिकार है और अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संरक्षित है।
कारण (R): संविधान के 44वें संशोधन, 1978 द्वारा संपत्ति के अधिकार को अनुच्छेद 19(1)(च) और अनुच्छेद 31 से हटाकर अनुच्छेद 300A में रखा गया।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
(a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
(b) A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
(c) A सही है, किंतु R गलत है।
(d) A गलत है, किंतु R सही है।

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, किंतु R गलत है।
  4. A गलत है, किंतु R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — 44वें संविधान संशोधन (1978) ने संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाया और अनुच्छेद 300A जोड़ा, जिसके अनुसार विधि के प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। इसलिए कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है।

Q3. भारत में सह-स्वामियों के बीच अचल संपत्ति के विभाजन से संबंधित वह विधि कौन-सी है, जो न्यायालय के माध्यम से ऐसे विभाजन या बिक्री का उपबंध करती है?

(a) भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925
(b) विभाजन अधिनियम, 1893
(c) संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882
(d) भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

  1. भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925
  2. विभाजन अधिनियम, 1893
  3. संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882
  4. भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

उत्तर: विभाजन अधिनियम, 1893 — विभाजन अधिनियम, 1893 सह-स्वामियों के बीच अचल संपत्ति के विभाजन या बिक्री द्वारा विभाजन के लिए वाद का उपबंध करता है। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 मुख्यतः गैर-हिंदुओं और कुछ अन्य मामलों के उत्तराधिकार से संबंधित है, जबकि संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 अंतरण के सामान्य नियम देता है और संविदा अधिनियम का विषय संविदा है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में संपत्ति के उत्तराधिकार और बंटवारे में बेटियों के अधिकार का विकास विधायी संशोधनों और न्यायिक निर्णयों दोनों से हुआ है। हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के बाद भी स्व-अर्जित संपत्ति, संयुक्त रूप से खरीदी गई संपत्ति और पैतृक संपत्ति के अधिकार अलग-अलग कानूनी कसौटियों पर तय होते हैं। इस कथन के आलोक में विवेचना कीजिए कि क्या संपत्ति के अर्जन का स्वरूप ही उत्तराधिकार के अधिकार का निर्धारण करता है। साथ ही बताइए कि हाल के न्यायिक निर्णयों ने बेटियों की सहदायिकी स्थिति को किस प्रकार स्पष्ट किया है। (15 Marks)

रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:

1. भूमिका: मिताक्षरा संयुक्त परिवार में पारंपरिक रूप से केवल पुरुष सदस्य सहदायिक थे; 2005 के संशोधन ने इसे बदला। इस प्रश्न में दो प्रश्न हैं: (क) अर्जन का स्वरूप अधिकार तय करता है या नहीं, (ख) न्यायिक निर्णयों ने बेटियों की स्थिति कैसे स्पष्ट की।

2. विधिक ढाँचा:
– हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956: धारा 8 (पुरुष की निर्वसीयत मृत्यु), धारा 14 (महिला की सीमित संपत्ति का पूर्ण स्वामित्व में परिवर्तन), धारा 15 (निर्वसीयत महिला के वारिसों का क्रम)।
– धारा 6 का 2005 संशोधन: पुत्री को जन्म से सहदायिक का दर्जा, पुत्र के समान दायित्व और अधिकार।
– विभाजन अधिनियम, 1893: सह-स्वामियों के बीच अचल संपत्ति का विभाजन।
– अनुच्छेद 300A: संपत्ति का संवैधानिक अधिकार; अनुच्छेद 14 के आलोक में समानता का तर्क।

3. न्यायिक निर्णय:
– Vineeta Sharma v. Rakesh Sharma (2020): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 2005 संशोधन के अंतर्गत पुत्री को सहदायिक अधिकार पिता की जीवित स्थिति पर निर्भर नहीं करते।
– Prakash v. Phulavati (2016): सर्वोच्च न्यायालय ने संशोधन के लागू होने की तिथि और जीवित सहदायिकों से जुड़े प्रश्नों पर विचार किया।
– संबंधित निर्णयों में अर्जन की प्रकृति (स्व-अर्जित बनाम पैतृक) पर विचार का तर्क; प्रस्तुत समाचार में झारखंड उच्च न्यायालय के निर्णय के मूल पाठ से तर्क का मिलान अनिवार्य।

4. विवेचना के बिंदु:
– पक्ष: अर्जन का स्वरूप (स्व-अर्जित, पैतृक, संयुक्त क्रय) अधिकार की प्रकृति तय करता है; क्रय में योगदान और स्वामित्व का अभिलेख निर्णायक होता है।
– विपक्ष/सीमा: महिला की संपत्ति के मामलों में बेटी-बेटे की बराबरी अधिनियम से सुनिश्चित है, किंतु व्यवहार में वसीयत, पंजीकरण और परिवारिक दबाव के कारण बेटियाँ अक्सर वंचित रह जाती हैं; इसलिए कानून और व्यवहार में अंतर का उल्लेख करें।
– संतुलन: उत्तराधिकार का मूल सिद्धांत मृत्यु के समय का अधिकार है, जीवित व्यक्ति के संयुक्त क्रय पर स्वतः अधिकार नहीं बनता; यह अंतर स्पष्ट करें।

5. निष्कर्ष: विधि और न्यायिक व्याख्या के समन्वय से लैंगिक समानता बढ़ी है, परंतु अर्जन के स्वरूप, दस्तावेज़ीकरण और प्रक्रियागत बाधाएँ अब भी निर्णायक बनी हुई हैं। राष्ट्रीय विधि आयोग और महिला अधिकारों पर विमर्श के सुधार सुझाव, जैसे भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण, उल्लेखनीय हैं।

स्रोत: prabhatkhabar.com

Jharkhand PCS (JPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: झारखण्ड उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के संदर्भ में, भाइयों द्वारा खरीदी गई पैतृक संपत्ति में बहन के हिस्से के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?

  1. यदि संपत्ति पिता द्वारा अर्जित की गई थी, तो बहन का उस पर अधिकार होता है।
  2. यदि भाइयों ने संपत्ति स्वयं के धन से खरीदी है, तो बहन का उसमें कोई हिस्सा नहीं होगा।
  3. यह निर्णय केवल अनुसूचित जनजाति समुदायों पर लागू होता है।
  4. यह निर्णय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के प्रावधानों को निरस्त करता है।

उत्तर: यदि भाइयों ने संपत्ति स्वयं के धन से खरीदी है, तो बहन का उसमें कोई हिस्सा नहीं होगा। — झारखण्ड उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि भाइयों ने अपने स्वयं के धन से संपत्ति खरीदी है, तो वह पैतृक संपत्ति नहीं मानी जाएगी और बहन का उसमें कोई हिस्सा नहीं होगा।

Mains: झारखण्ड उच्च न्यायालय के ‘भाइयों की खरीदी जमीन में बहन का हिस्सा नहीं’ संबंधी हालिया निर्णय का विश्लेषण करें। यह निर्णय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित करता है, विशेषकर झारखण्ड के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में?


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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