01 Oct कर्नाटक में 1971 के बाद सबसे खराब मानसून: 35% बारिश की कमी, जानें पूरा मामला
✎ कर्नाटक में 1971 के बाद सबसे खराब मानसून के कारण व्यापक सूखा घोषित किया गया है, जिससे जल संकट और कृषि संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारतीय भूगोल, जलवायु विज्ञान) | GS Paper III — आपदा प्रबंधन, कृषि
- Prelims: दक्षिण-पश्चिम मानसून, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), सूखा, वर्षा की कमी, जल संकट, जलवायु परिवर्तन
- Essay: भारत में कृषि संकट और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, जल सुरक्षा: चुनौतियाँ और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: कर्नाटक में 1971 के बाद सबसे खराब मानसून के कारण व्यापक सूखा घोषित किया गया है, जिससे जल संकट और कृषि संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कर्नाटक राज्य में इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से 35 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है, जो 1971 के बाद सबसे खराब स्थिति है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अक्टूबर और नवंबर में भी राज्य में सामान्य से कम वर्षा का अनुमान लगाया है। इस गंभीर वर्षा की कमी के कारण राज्य के 240 तालुकों में से 177 में सूखा घोषित कर दिया गया है, जिससे व्यापक जल संकट और कृषि संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न हो गई हैं।
पृष्ठभूमि
- कर्नाटक में 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम में सभी चार महीनों (जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर) में वर्षा की कमी दर्ज की गई।
- सितंबर में वर्षा की कमी 54 प्रतिशत रही, जबकि मालनाड, तटीय और उत्तरी कर्नाटक जिलों में यह क्रमशः 69 प्रतिशत, 65 प्रतिशत और 61 प्रतिशत थी।
- राज्य में पिछली सबसे बड़ी मानसूनी वर्षा की कमी 2002 में दर्ज की गई थी, जब सामान्य से 33 प्रतिशत कम वर्षा हुई थी।
- राज्य सरकार ने अधिकारियों को आगामी महीनों में पर्याप्त पेयजल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कार्य योजना तैयार करने का निर्देश दिया है।
- ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री ने सभी 5,927 पंचायतों के भूजल डेटा संकलित करने और अगले मानसून तक जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कार्य योजना बनाने का निर्देश दिया है।
सूखा और इसके प्रभाव
- सूखा (Drought) एक ऐसी स्थिति है जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक औसत से कम वर्षा होती है, जिससे जल की कमी हो जाती है।
- भारत में सूखा मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून की अनियमितता और कमी के कारण होता है, जो देश की कुल वर्षा का लगभग 75 प्रतिशत प्रदान करता है।
- सूखे के कारण कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आती है, जिससे खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका प्रभावित होती है।
- यह पेयजल संकट, भूजल स्तर में कमी, जलाशयों में जल स्तर में गिरावट और नदियों के प्रवाह में कमी का कारण बनता है।
- सूखे से पशुधन और वन्यजीवों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि चारे और पानी की कमी हो जाती है।
- आर्थिक रूप से, सूखा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर करता है, मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ाता है और सरकारी राहत उपायों पर खर्च बढ़ाता है।
- दीर्घकालिक सूखे से मरुस्थलीकरण (Desertification) और मिट्टी का क्षरण (Soil Erosion) जैसी पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| वर्षा में 35% की कमी | कर्नाटक में 1971 के बाद से सबसे खराब मानसून, व्यापक सूखे का कारण। |
| अक्टूबर और नवंबर में भी सामान्य से कम वर्षा का पूर्वानुमान | सूखे की स्थिति के और बिगड़ने की आशंका, जल संकट गहरा सकता है। |
| मानसून के सभी चार महीनों में वर्षा की कमी | जून में 40%, जुलाई में 29%, अगस्त में 23% और सितंबर में 54% की कमी, जो निरंतर सूखे का संकेत है। |
| मालनाड, तटीय और उत्तरी कर्नाटक में सितंबर में भारी कमी | इन क्षेत्रों में क्रमशः 69%, 65% और 61% की कमी, कृषि और आजीविका पर गंभीर प्रभाव। |
| 240 तालुकों में से 177 में सूखा घोषित | राज्य के बड़े हिस्से में गंभीर जल और कृषि संकट, राहत उपायों की तत्काल आवश्यकता। |
महत्व
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- लंबे समय तक सूखे से मिट्टी की नमी में कमी, भूजल स्तर में गिरावट और जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- नदियों और जलाशयों में पानी की कमी से जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystem) प्रभावित होगा।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
- कृषि उत्पादन में भारी गिरावट से किसानों की आय प्रभावित होगी, जिससे ग्रामीण संकट बढ़ सकता है।
- पेयजल की कमी से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं और लोगों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है।
- सूखे के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन बढ़ सकता है, जिससे शहरी बुनियादी ढाँचे पर दबाव पड़ेगा।
शासन और नीति
- राज्य सरकार को सूखा राहत और जल प्रबंधन के लिए तत्काल कार्य योजनाएँ बनानी होंगी।
- दीर्घकालिक जल संरक्षण और प्रबंधन नीतियों की आवश्यकता पर बल दिया गया है ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियों से निपटा जा सके।
चुनौतियाँ
1. जल सुरक्षा
- पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है, विशेषकर उन तालुकों में जहाँ सूखा घोषित किया गया है।
- भूजल स्तर की निगरानी और उसके विवेकपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना आवश्यक है ताकि भविष्य के लिए जल संसाधन बचे रहें।
यूपीएससी लिंक: सामान्य अध्ययन-III: आपदा प्रबंधन, जल संसाधन
2. कृषि संकट
- कम वर्षा के कारण फसलें खराब हो गई हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान हुआ है और उनकी आजीविका खतरे में है।
- फसल बीमा और अन्य सहायता योजनाओं के माध्यम से किसानों को राहत प्रदान करना एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: सामान्य अध्ययन-III: कृषि, भारतीय अर्थव्यवस्था
3. आर्थिक प्रभाव
- कृषि उत्पादन में कमी से राज्य की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जिससे खाद्य सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है।
- सूखा राहत कार्यों पर सरकारी व्यय में वृद्धि से राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: सामान्य अध्ययन-III: भारतीय अर्थव्यवस्था, सरकारी बजट
4. दीर्घकालिक समाधान
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के प्रभावों को देखते हुए जल संरक्षण और प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक रणनीतियों को लागू करना आवश्यक है।
- वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting), भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) और कुशल सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: सामान्य अध्ययन-III: पर्यावरण और पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पेयजल की कमी | आगामी महीनों में पर्याप्त पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना। |
| कृषि उत्पादन में गिरावट | किसानों की आजीविका पर गंभीर प्रभाव और खाद्य सुरक्षा का खतरा। |
| भूजल स्तर में कमी | भूजल संसाधनों पर बढ़ता दबाव और भविष्य के लिए जल उपलब्धता की चिंता। |
| ग्रामीण पलायन | सूखे के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर लोगों का पलायन। |
| राज्य के वित्त पर दबाव | सूखा राहत और पुनर्वास कार्यों पर बढ़ते खर्च से राजकोषीय बोझ। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana)
आगे की राह
- पेयजल की कमी वाले क्षेत्रों में टैंकरों के माध्यम से पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करना और जल स्रोतों का संरक्षण करना।
- किसानों को फसल बीमा और अन्य वित्तीय सहायता प्रदान करना ताकि वे सूखे के कारण हुए नुकसान से उबर सकें।
- वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) संरचनाओं के निर्माण को बढ़ावा देना।
- सूखा प्रतिरोधी फसलों (Drought-Resistant Crops) की खेती को प्रोत्साहित करना और किसानों को आधुनिक सिंचाई तकनीकों (जैसे ड्रिप सिंचाई) का प्रशिक्षण देना।
- जल प्रबंधन के लिए स्थानीय समुदायों को शामिल करना और उन्हें जल संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक करना।
- मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों (Weather Forecasting Systems) को मजबूत करना और किसानों को समय पर जानकारी प्रदान करना।
- दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों (Inter-State River Water Disputes) का समाधान करना और जल बँटवारे के उचित तंत्र विकसित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मानसून वर्षा · वर्षा की कमी · सूखा · जलवायु परिवर्तन · कृषि पर प्रभाव · जल प्रबंधन · राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष · राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष · मौसम विज्ञान विभाग · खाद्य सुरक्षा · ग्रामीण अर्थव्यवस्था · आपदा न्यूनीकरण
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 243G: पंचायतों की शक्तियाँ, अधिकार और उत्तरदायित्व (जल प्रबंधन)
- अनुच्छेद 262: अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों से संबंधित जल विवादों का न्यायनिर्णयन
अवधारणा प्रवाह
कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून → वर्षा में भारी कमी (35% deficit) → व्यापक सूखा और जल संकट → कृषि उत्पादन में गिरावट और किसानों को नुकसान → पेयजल की कमी और ग्रामीण पलायन
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है।
2. अल नीनो घटना का संबंध भारत में सामान्य से अधिक मानसून वर्षा से है।
3. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में अधिकांश वर्षा लाता है और सामान्यतः जून से सितंबर तक रहता है। कथन 2 गलत है। अल नीनो घटना का संबंध प्रशांत महासागर में सतही जल के गर्म होने से है और यह अक्सर भारत में कमजोर या कम मानसून वर्षा से जुड़ा होता है। कथन 3 सही है। IMD भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन एक प्रमुख एजेंसी है।
Q2. भारत में सूखे की स्थिति से निपटने के लिए, केंद्र सरकार द्वारा निम्नलिखित में से कौन-सी योजना/कार्यक्रम लागू किए गए हैं?
1. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA)
2. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY)
3. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF)
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — MGNREGA ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार प्रदान करके सूखे के प्रभाव को कम करने में मदद करता है। PMKSY सिंचाई सुविधाओं में सुधार करके सूखे से निपटने में सहायक है। NDRF आपदाओं, जिसमें सूखा भी शामिल है, से प्रभावित राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में मानसून की वर्षा में कमी के कारणों और परिणामों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। सूखे से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय में मानसून और उसके महत्व का संक्षिप्त उल्लेख करें। मुख्य भाग में, मानसून की वर्षा में कमी के कारणों (जैसे जलवायु परिवर्तन, अल नीनो, ला नीना, हिंद महासागर द्विध्रुव) और इसके बहुआयामी परिणामों (कृषि, अर्थव्यवस्था, जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका पर प्रभाव) का विश्लेषण करें। इसके बाद, सूखे से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों (जैसे राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF), राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY), महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), जल शक्ति अभियान, फसल बीमा योजनाएं) का विस्तार से वर्णन करें। निष्कर्ष में, दीर्घकालिक समाधानों और सतत जल प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: The Indian Express
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: वर्ष 2023 में कर्नाटक में मानसून की स्थिति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. वर्ष 2023 में कर्नाटक में मानसून में 35% वर्षा की कमी दर्ज की गई है। 2. यह वर्ष 1971 के बाद से सबसे खराब मानसून रहा है। 3. राज्य में कृषि उत्पादन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — वर्ष 2023 में कर्नाटक में 35% वर्षा की कमी दर्ज की गई, जो 1971 के बाद सबसे खराब मानसून रहा। इससे राज्य में कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
Mains: वर्ष 2023 में कर्नाटक में मानसून की कमी के कारणों एवं इसके राज्य की अर्थव्यवस्था, कृषि एवं जल संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
Related guides on our sites
- Best geography optional coaching
- Best geography optional coaching
- Best geography optional teacher
- Best geography optional teacher

No Comments