14 Oct केरल में वरिष्ठ नागरिक विधेयक: घर पर बुढ़ापा, लिविंग विल और देखभालकर्ता पंजीकरण

✎ केरलम वरिष्ठ नागरिक (अधिकारों की देखभाल एवं संरक्षण) विधेयक, 2026 = देखभाल केंद्रों और देखभालकर्ताओं का अनिवार्य पंजीकरण + घर में वृद्धावस्था-यापन (संस्थागत देखभाल अंतिम विकल्प) + ज़िला-स्तरीय फोरम/इकाई के समक्ष जीवित वसीयत…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — सामाजिक न्याय: कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ, विधि और संस्थागत तंत्र (वरिष्ठ नागरिक) | GS Paper II — राज्य विधायिका, राज्य के नीति निदेशक तत्त्व और संघ-राज्य संबंध | GS Paper I — जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे: जनांकिकीय संक्रमण और वृद्ध होती आबादी | GS Paper IV — नीतिशास्त्र: गरिमामय जीवन, पारिवारिक दायित्व और जीवन के अंतिम चरण की देखभाल
- Prelims: केरलम वरिष्ठ नागरिक (अधिकारों की देखभाल एवं संरक्षण) विधेयक, 2026, घर में वृद्धावस्था-यापन (Ageing in Place), जीवित वसीयत (Living Will) / अग्रिम चिकित्सा निदेश, Common Cause बनाम भारत संघ (2018), माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007, अनुच्छेद 41 (वृद्धावस्था में लोक सहायता) और अनुच्छेद 21, जनांकिकीय संक्रमण (Demographic Transition), राज्य वरिष्ठ नागरिक आयोग (केरल, 2025), ज़िला-स्तरीय वरिष्ठ नागरिक संरक्षण फोरम/इकाई, हॉस्पिस देखभाल (Hospice Care)
- Essay: वृद्ध होता समाज: जनांकिकीय लाभांश से जनांकिकीय दायित्व तक की चुनौती, गरिमा के साथ जीना और गरिमा के साथ विदा होना: वृद्धावस्था में अधिकार, परिवार और राज्य की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: केरलम वरिष्ठ नागरिक (अधिकारों की देखभाल एवं संरक्षण) विधेयक, 2026 = देखभाल केंद्रों और देखभालकर्ताओं का अनिवार्य पंजीकरण + घर में वृद्धावस्था-यापन (संस्थागत देखभाल अंतिम विकल्प) + ज़िला-स्तरीय फोरम/इकाई के समक्ष जीवित वसीयत; आधार: अनुच्छेद 41 व 21, Common Cause (2018) और 2007 का केंद्रीय अधिनियम।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरलम सरकार ने 13 अक्टूबर को विधानसभा में केरलम वरिष्ठ नागरिक (अधिकारों की देखभाल एवं संरक्षण) विधेयक, 2026 प्रस्तुत किया। पारित होने पर यह वृद्धजन-देखभाल केंद्रों और देखभालकर्ताओं (Caregivers) के अनिवार्य पंजीकरण, मानक निर्धारण और उल्लंघन पर दंड का ढाँचा स्थापित करेगा। विधेयक में घर में वृद्धावस्था-यापन (Ageing in Place) को प्राथमिकता, जीवित वसीयत को मान्यता तथा दुर्व्यवहार एवं शोषण से सुरक्षा के प्रावधान हैं। राज्य में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी 2011 के 12.7% से बढ़कर 2021 में 15% हो गई है और 2051 तक 30% होने का अनुमान है, इसलिए यह विधेयक चर्चा में है।
पृष्ठभूमि
- केरलम देश के सबसे तेज़ जनांकिकीय संक्रमण से गुज़र रहा राज्य है। जन्म-दर और मृत्यु-दर घटने से वृद्धों का अनुपात बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2030 तक वृद्धों की संख्या बच्चों से अधिक हो जाएगी।
- केरलम उन पहले राज्यों में था जिन्होंने 2006 में वृद्धजन-नीति बनाई। इसे 2013 में अद्यतन किया गया और अगस्त 2025 में ‘वृद्धजनों के लिए राज्य नीति’ का नया मसौदा जारी हुआ।
- राज्य ने केरल राज्य वरिष्ठ नागरिक आयोग अधिनियम, 2025 पारित किया है और वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए अलग विभाग भी है।
- राष्ट्रीय स्तर पर माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 मुख्यतः भरण-पोषण, संपत्ति की सुरक्षा और वृद्धाश्रमों की स्थापना पर केंद्रित है। नया विधेयक देखभाल सेवाओं के विनियमन तक दायरा बढ़ाता है।
- संविधान का अनुच्छेद 41 राज्य को वृद्धावस्था में लोक सहायता का अधिकार दिलाने के लिए प्रभावी उपाय करने का निदेश देता है। यह नीति निदेशक तत्त्व है, न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं है, पर राज्य की नीति और विधान का मार्गदर्शन करता है।
- Common Cause बनाम भारत संघ (2018) में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने गरिमा के साथ मरने के अधिकार को अनुच्छेद 21 का अंग माना और जीवित वसीयत/अग्रिम चिकित्सा निदेश को वैधता दी। 2023 में इसकी प्रक्रिया सरल की गई।
केरलम वरिष्ठ नागरिक (अधिकारों की देखभाल एवं संरक्षण) विधेयक, 2026 क्या है?
- उद्देश्य: वृद्धजन-देखभाल केंद्रों और सेवाओं का विनियमन करना, वरिष्ठ नागरिकों को दुर्व्यवहार एवं शोषण से बचाना और उन्हें स्वतंत्र जीवन जीने में सक्षम बनाना।
- विनियमन: देखभाल केंद्रों और देखभालकर्ताओं का अनिवार्य पंजीकरण, निर्धारित मानक और उल्लंघन पर दंड का प्रावधान।
- घर में वृद्धावस्था-यापन (Ageing in Place): आय या क्षमता का भेद किए बिना वरिष्ठ नागरिक के अपने घर या चुने हुए समुदाय में सुरक्षित और स्वतंत्र रहने की क्षमता को मान्यता। परिवार के सदस्यों या विधिक उत्तराधिकारियों से अपेक्षा है कि वे आवश्यक देखभाल करें। संस्थागत देखभाल अंतिम विकल्प मानी गई है।
- जीवित वसीयत की मान्यता: इसमें वरिष्ठ नागरिक यह पहले से दर्ज करता है कि अपनी इच्छा व्यक्त करने में असमर्थ होने पर वह कैसा चिकित्सा उपचार चाहता है, जैसे गहन चिकित्सा इकाई (ICU) में भर्ती, आक्रामक नलियाँ और जीवन-रक्षक हस्तक्षेप।
- जीवित वसीयत की प्रक्रिया: इसे ज़िला-स्तरीय वरिष्ठ नागरिक संरक्षण फोरम या ज़िला-स्तरीय वरिष्ठ नागरिक संरक्षण इकाई के अध्यक्ष की उपस्थिति में निष्पादित किया जा सकता है। निष्पादन में सहायता की ज़िम्मेदारी देखभाल केंद्र, विधिक उत्तराधिकारी या संबंधी की होगी। वसीयत देखभाल केंद्र, संबंधी या परिवार के सदस्य के सुरक्षित संरक्षण में रहेगी और उसकी प्रति संबंधित ज़िला-स्तरीय प्राधिकारी तथा स्थानीय निकाय को दी जाएगी।
- अधिकारों का विस्तार: देखभाल और कल्याण की अवधारणा को भोजन, वस्त्र, आवास और चिकित्सा से आगे सामाजिक सेवाओं, मनोरंजन तथा आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी तक बढ़ाया गया है। अशक्त और दिव्यांग वरिष्ठ नागरिकों के लिए गरिमामय जीवन पर विशेष बल है।
- सेवाएँ: गृह-देखभाल, दिवा-देखभाल, सहायता-प्राप्त आवास, हॉस्पिस देखभाल और आपातकालीन चिकित्सा सहायता को सुलभ, वहनीय और भेदभाव-रहित बनाने का लक्ष्य है। विधवाओं और परित्यक्त महिलाओं सहित असुरक्षित वृद्ध महिलाओं को प्राथमिकता दी गई है।
- परीक्षा-दृष्टि: विधेयक अभी विधानसभा में प्रस्तुत हुआ है, अधिनियम नहीं बना है। इसके कुछ प्रावधानों की तुलना 2007 के केंद्रीय अधिनियम से की जा सकती है। ‘सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा’ समवर्ती सूची की प्रविष्टि 23 में आता है, इसलिए राज्य इस क्षेत्र में कानून बना सकते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| अपने घर/समुदाय में वृद्धावस्था (Ageing in Place) की अवधारणा | वरिष्ठ नागरिक की आय या क्षमता का भेद किए बिना उसे अपने घर या चुने हुए समुदाय में सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन का अधिकार मिलता है। देखभाल का प्राथमिक दायित्व परिवार या वैध उत्तराधिकारियों पर रहता है और संस्थागत देखभाल अंतिम विकल्प मानी गई है। |
| जीवन-इच्छापत्र (Living Will) की मान्यता | वरिष्ठ नागरिक अपनी असमर्थता की स्थिति के लिए पहले से लिख सकता है कि गहन चिकित्सा इकाई (ICU) में भर्ती, आक्रामक नलियाँ और जीवन-रक्षक उपचार चाहिए या नहीं। इससे चिकित्सा-निर्णयों में उसकी स्वायत्तता और गरिमा सुरक्षित रहती है। |
| जीवन-इच्छापत्र के निष्पादन और अभिरक्षा की प्रक्रिया | इसका निष्पादन ज़िला स्तरीय वरिष्ठ नागरिक संरक्षण फ़ोरम या ज़िला स्तरीय वरिष्ठ नागरिक संरक्षण इकाई के अध्यक्ष की उपस्थिति में होता है। मूल प्रति देखभाल केंद्र, रिश्तेदार या परिजन के पास रहती है। एक प्रति ज़िला स्तरीय प्राधिकारी और स्थानीय निकाय को दी जाती है, जिससे दस्तावेज़ की प्रामाणिकता और उपलब्धता बनी रहती है। |
| देखभाल केंद्रों और देखभालकर्ताओं का अनिवार्य पंजीकरण | विधेयक के अनुसार केंद्रों और देखभालकर्ताओं का पंजीकरण अनिवार्य होगा। मानक निर्धारित होंगे और उल्लंघन पर दंड का प्रावधान होगा। इससे अब तक अनियमित रहे निजी देखभाल क्षेत्र में जवाबदेही आती है और दुर्व्यवहार तथा शोषण पर रोक लगती है। |
| कल्याण की व्यापक परिभाषा | भोजन, वस्त्र, आवास और चिकित्सा के साथ सामाजिक सेवाएँ, मनोरंजन तथा आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी भी शामिल हैं। इस प्रकार देखभाल को केवल जीवित रहने तक सीमित न रखकर गरिमामय जीवन के अधिकार से जोड़ा गया है। |
| सेवाओं की सुलभता और कमज़ोर वर्गों को प्राथमिकता | गृह देखभाल, दिवा देखभाल, सहायता-प्राप्त आवास, उपशामक (हॉस्पिस) देखभाल और आपातकालीन चिकित्सा सहायता को सस्ता, सुलभ और भेदभाव-रहित बनाने का लक्ष्य है। विधवाओं, परित्यक्त और दिव्यांग वृद्ध महिलाओं जैसे असुरक्षित समूहों को प्राथमिकता दी गई है। |
महत्व
सामाजिक एवं जनांकिकीय
- IIMAD के अनुसार केरलम में 60 वर्ष से अधिक आयु की जनसंख्या 2011 में 12.7% थी और 2021 में 15% हो गई। 2051 तक इसके 30% होने का अनुमान है और 2030 तक वृद्धजन बच्चों से अधिक होने की संभावना है। यह विधेयक इस जनांकिकीय परिवर्तन की पूर्व-तैयारी है।
- अपने घर/समुदाय में वृद्धावस्था का मॉडल परिवार और समुदाय को देखभाल की मूल इकाई मानता है, जिससे अकेलेपन और संस्थागत अलगाव में कमी आ सकती है।
- विधवाओं और परित्यक्त वृद्धजनों को प्राथमिकता देने से वृद्धावस्था की लैंगिक असमानता पर ध्यान जाता है।
संवैधानिक एवं विधिक
- गरिमा के साथ जीवन अनुच्छेद 21 का अंग है। जीवन-इच्छापत्र व्यक्ति की चिकित्सा-संबंधी स्वायत्तता को मान्यता देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने Common Cause बनाम भारत संघ (2018) में गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मान्य किया था और अग्रिम चिकित्सा निदेश (Advance Medical Directive) की प्रक्रिया तय की थी। 2023 में उसने इस प्रक्रिया को सरल किया।
- अनुच्छेद 41 के नीति-निदेशक तत्त्व में वृद्धावस्था में सार्वजनिक सहायता का उल्लेख है। विधेयक इस तत्त्व को राज्य स्तर पर विधिक रूप देता है।
- केंद्रीय माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 मुख्यतः भरण-पोषण और वृद्धाश्रमों पर केंद्रित है। यह विधेयक सेवा-प्रदाताओं के विनियमन का अंतर भरता है।
शासन एवं संस्थागत
- केरलम 2006 में वृद्धजन नीति लाने वाले पहले राज्यों में था। इसने 2013 में नीति को अद्यतन किया और अगस्त 2025 में राज्य वृद्धजन नीति का नया प्रारूप जारी किया। केरल राज्य वरिष्ठ नागरिक आयोग अधिनियम, 2025 और अलग विभाग इस विधेयक को संस्थागत आधार देते हैं।
- ज़िला स्तर के फ़ोरम/इकाई और स्थानीय निकायों की भूमिका विकेंद्रीकृत शासन के अनुरूप है।
आर्थिक एवं स्वास्थ्य
- पंजीकरण और मानक निर्धारण से देखभाल-सेवा क्षेत्र (Care Economy) औपचारिक बनता है। इससे प्रशिक्षित देखभालकर्ताओं के लिए रोज़गार और कौशल के अवसर बढ़ते हैं।
- गृह और दिवा देखभाल अस्पताल या संस्थागत व्यय की तुलना में प्रायः कम खर्चीली होती है। हॉस्पिस देखभाल और जीवन-इच्छापत्र जीवन के अंतिम चरण में अनावश्यक एवं महँगे उपचार को घटा सकते हैं।
चुनौतियाँ
1. परिवार पर निर्भरता और बदलती पारिवारिक संरचना
- विधेयक में देखभाल का प्राथमिक दायित्व परिवार या वैध उत्तराधिकारियों पर है। पर केरलम में प्रवासन, विशेषकर खाड़ी देशों और विदेश में रोज़गार के लिए, के कारण अनेक वृद्धजन अकेले रहते हैं।
- एकल परिवारों के बढ़ने से घर पर देखभाल का बोझ प्रायः महिलाओं पर पड़ता है, जिससे लैंगिक असमानता बढ़ने का जोखिम रहता है।
यूपीएससी लिंक: GS-1: जनसंख्या, परिवार और प्रवासन; GS-2: कमज़ोर वर्गों के कल्याण की योजनाएँ
2. वित्तीय संसाधन और क्षमता की कमी
- गृह देखभाल, दिवा देखभाल, सहायता-प्राप्त आवास और हॉस्पिस जैसी सेवाओं के लिए बड़े अवसंरचनात्मक और मानव-संसाधन निवेश की आवश्यकता होती है। इन्हें सस्ता और सुलभ बनाने का लक्ष्य राज्य के राजकोषीय संसाधनों पर दबाव डाल सकता है।
- स्थानीय निकायों और ज़िला इकाइयों में कर्मचारियों और प्रशिक्षण की कमी से कार्यान्वयन कमज़ोर हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन; GS-3: राज्य का राजकोषीय प्रबंधन और सामाजिक अवसंरचना
3. विनियमन और अनुपालन की कठिनाइयाँ
- अनिवार्य पंजीकरण से छोटे और असंगठित देखभाल केंद्रों तथा अनौपचारिक देखभालकर्ताओं पर अनुपालन-लागत बढ़ती है। इससे कुछ सेवाएँ अनौपचारिक क्षेत्र में चली जा सकती हैं।
- निरीक्षण में भ्रष्टाचार या ढिलाई की स्थिति में दंड-प्रावधान प्रभावहीन रह सकते हैं। दुर्व्यवहार की शिकायत के लिए सुगम और गोपनीय तंत्र भी आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: नियामक संस्थाएँ, सेवा-प्रदाय और जवाबदेही
4. जीवन-इच्छापत्र की विधिक और नैतिक जटिलताएँ
- सर्वोच्च न्यायालय के 2018 और 2023 के निर्देशों में निष्पादन, साक्षी, चिकित्सा बोर्ड और अभिरक्षा की प्रक्रिया पहले से निर्धारित है। राज्य की अलग प्रक्रिया से इन निर्देशों के साथ सामंजस्य का प्रश्न उठ सकता है।
- वृद्धजनों में जागरूकता की कमी है। इसके अतिरिक्त परिजन के दबाव या प्रभाव में निर्णय लिए जाने का जोखिम रहता है, इसलिए स्वैच्छिकता सुनिश्चित करना ज़रूरी है।
- चिकित्सकों में विधिक अस्पष्टता का भय हो सकता है, जिससे इच्छापत्र का पालन प्रभावित होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: न्यायपालिका; GS-4: चिकित्सा नैतिकता, स्वायत्तता और गरिमा
5. संघीय समन्वय और विधायी अतिव्यापन
- वृद्धजनों से जुड़े विषय राज्य और समवर्ती सूची की प्रविष्टियों में आते हैं। केंद्रीय अधिनियम 2007 और राज्य के नए विधान के बीच टकराव या दोहराव से बचना होगा।
- स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और स्थानीय स्वशासन के विभागों के बीच समन्वय का अभाव सेवा-प्रदाय को बाधित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| परिवार-आधारित देखभाल | प्रवासन और एकल परिवारों के कारण दायित्व निभाने की क्षमता घट रही है और देखभाल का बोझ महिलाओं पर बढ़ रहा है। |
| वित्त पोषण | गृह देखभाल, दिवा देखभाल और हॉस्पिस जैसी सेवाओं को सस्ता बनाने के लिए निरंतर बजटीय प्रावधान चाहिए। |
| पंजीकरण और निरीक्षण | अनौपचारिक केंद्रों का अनुपालन, निरीक्षण की गुणवत्ता और शिकायत-निवारण की प्रभावशीलता। |
| जीवन-इच्छापत्र | सर्वोच्च न्यायालय की प्रक्रिया से सामंजस्य, जागरूकता और दबाव-मुक्त स्वैच्छिक निर्णय। |
| विधिक अतिव्यापन | केंद्रीय अधिनियम 2007, राज्य आयोग अधिनियम 2025 और नए विधेयक के बीच भूमिकाओं की स्पष्टता। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) — भरण-पोषण अधिकरण, वृद्धाश्रम और संपत्ति-अंतरण की सुरक्षा का केंद्रीय विधिक ढाँचा
- वृद्धजनों के लिए राष्ट्रीय नीति, 1999 (National Policy on Older Persons) — वृद्धजन कल्याण की केंद्रीय नीतिगत रूपरेखा
- राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम (National Programme for Health Care of Elderly) — वृद्धजनों की स्वास्थ्य सेवाएँ
- राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (Indira Gandhi National Old Age Pension Scheme) — निर्धन वृद्धजनों को पेंशन
- आयुष्मान वय वंदना (Ayushman Vay Vandana) — आयुष्मान भारत PM-JAY के अंतर्गत 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के नागरिकों के लिए स्वास्थ्य बीमा
- अटल वयो अभ्युदय योजना (Atal Vayo Abhyuday Yojana, AVYAY) — वरिष्ठ नागरिकों के लिए केंद्र की समेकित योजना, जिसमें दिवा देखभाल और वृद्धाश्रम सहायता शामिल हैं
आगे की राह
- विधेयक के नियमों में देखभाल केंद्रों और देखभालकर्ताओं के लिए स्पष्ट गुणवत्ता-मानक, प्रशिक्षण-अर्हता और निरीक्षण की समय-सारणी निर्धारित की जाए।
- जीवन-इच्छापत्र की प्रक्रिया को सर्वोच्च न्यायालय के 2018 और 2023 के निर्देशों के अनुरूप रखा जाए। साथ ही चिकित्सकों के प्रशिक्षण और वृद्धजनों की परामर्श-सुविधा पर बल दिया जाए।
- स्थानीय निकायों, पंचायतों और ज़िला इकाइयों को पर्याप्त वित्त, कर्मचारी और डिजिटल रजिस्टर उपलब्ध कराए जाएँ, ताकि पंजीकरण और अभिरक्षा का अभिलेख सुरक्षित रहे।
- परिवार-आधारित देखभाल को देखभालकर्ता-प्रशिक्षण, विश्राम-देखभाल (Respite Care) और सामुदायिक सहायता से सुदृढ़ किया जाए, ताकि बोझ महिलाओं पर न पड़े।
- प्रवासी परिवारों के वृद्धजनों के लिए दिवा केंद्र, सामुदायिक स्वयंसेवक और गृह-भ्रमण सेवा जैसे विकल्प बढ़ाए जाएँ।
- दुर्व्यवहार की शिकायत के लिए गोपनीय हेल्पलाइन और त्वरित निवारण प्रणाली बनाई जाए। साथ ही केरल राज्य वरिष्ठ नागरिक आयोग की निगरानी-भूमिका स्पष्ट की जाए।
- राज्य के विधान और केंद्रीय अधिनियम 2007 तथा स्वास्थ्य योजनाओं के बीच समन्वय रखा जाए, ताकि दोहराव न हो और केंद्र-राज्य निधि का समुचित उपयोग हो।
- वृद्धावस्था-संबंधी आँकड़ों का नियमित संग्रह और मूल्यांकन किया जाए, ताकि नीति में साक्ष्य-आधारित सुधार हो सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जनांकिकीय संक्रमण (Demographic Transition) · घर में वृद्धावस्था (Ageing in Place) · जीवित वसीयत (Living Will) · अग्रिम चिकित्सा निर्देश (Advance Medical Directive) · गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21) · राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व (अनुच्छेद 41) · माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 · देखभाल केंद्रों और देखभालकर्ताओं का अनिवार्य पंजीकरण · वृद्धजन दुर्व्यवहार (Elder Abuse) · संस्थागत देखभाल अंतिम विकल्प के रूप में · निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) · सहकारी संघवाद और सामाजिक सुरक्षा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21 — गरिमा और चिकित्सा-स्वायत्तता का अधिकार
- अनुच्छेद 41 — वृद्धावस्था में सार्वजनिक सहायता का निदेश
- अनुच्छेद 47 — पोषण, जीवन-स्तर और जन-स्वास्थ्य का दायित्व
- अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची — राज्य की विधायी क्षमता का आधार
अवधारणा प्रवाह
प्रजनन और मृत्यु-दर में गिरावट के कारण केरलम में तीव्र जनांकिकीय संक्रमण → 60+ आयु वर्ग की हिस्सेदारी का 2011 में 12.7% से 2021 में 15% तक बढ़ना और 2051 तक 30% का अनुमान → देखभाल, स्वास्थ्य और गरिमा की माँग बढ़ना, जबकि निजी देखभाल सेवाएँ अनियमित रहीं → राज्य द्वारा केरलम वरिष्ठ नागरिक (अधिकारों की देखभाल एवं संरक्षण) विधेयक, 2026 का प्रस्तुत किया जाना → अपने घर/समुदाय में वृद्धावस्था, जीवन-इच्छापत्र और केंद्रों व देखभालकर्ताओं का अनिवार्य पंजीकरण → मानक, दंड और ज़िला स्तरीय तंत्र के माध्यम से दुर्व्यवहार में कमी और गरिमामय वृद्धावस्था की ओर अग्रसर होना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 41 राज्य को अपनी आर्थिक सामर्थ्य की सीमा के भीतर वृद्धावस्था में लोक सहायता का अधिकार दिलाने का प्रयास करने का निदेश देता है।
2. माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के अंतर्गत भरण-पोषण के दावों के निपटारे के लिए भरण-पोषण अधिकरण (Maintenance Tribunal) का प्रावधान है।
3. Common Cause बनाम भारत संघ (2018) में उच्चतम न्यायालय ने अग्रिम चिकित्सा निर्देश (जीवित वसीयत) को अवैध ठहराया था।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 41 राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों में आता है और वृद्धावस्था में लोक सहायता का उल्लेख करता है। कथन 2 सही है: 2007 के अधिनियम में भरण-पोषण अधिकरण और अपीलीय अधिकरण की व्यवस्था है। कथन 3 गलत है: न्यायालय ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु और अग्रिम चिकित्सा निर्देश को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार का अंग माना और दिशानिर्देश जारी किए।
Q2. अभिकथन (A): भारत में किसी वरिष्ठ नागरिक की जीवित वसीयत को संसद द्वारा इस विषय पर अलग क़ानून बनाए बिना भी विधिक मान्यता प्राप्त है।
कारण (R): उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के अंतर्गत प्राप्त शक्ति का प्रयोग करते हुए अग्रिम चिकित्सा निर्देशों के लिए दिशानिर्देश जारी किए, जो विधायन बनने तक प्रभावी रहेंगे।
निम्नलिखित में से कौन-सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है किंतु R गलत है
- A गलत है किंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — Common Cause (2018) में संविधान पीठ ने गरिमापूर्ण मृत्यु को अनुच्छेद 21 का अंग माना। न्यायालय ने संसद के कानून बनने तक की अवधि के लिए अनुच्छेद 142 के अंतर्गत दिशानिर्देश जारी किए। इन्हीं दिशानिर्देशों के कारण जीवित वसीयत को विधिक मान्यता मिली, इसलिए R, A की सही व्याख्या है।
Q3. केरलम वरिष्ठ नागरिक (देखभाल और अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2026 में वर्णित ‘घर में वृद्धावस्था (Ageing in Place)’ की अवधारणा के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सबसे उपयुक्त है?
- वरिष्ठ नागरिकों को आय के आधार पर केवल वृद्धाश्रमों में रखने की व्यवस्था
- वरिष्ठ नागरिक को अपने घर या चुने हुए समुदाय में सुरक्षित और स्वतंत्र रूप से रहने में सक्षम बनाना, जिसमें परिवार या विधिक उत्तराधिकारियों से देखभाल की अपेक्षा हो और संस्थागत देखभाल अंतिम विकल्प हो
- केवल अस्पताल में दी जाने वाली दीर्घकालिक चिकित्सा देखभाल
- केवल सरकारी पेंशन का नकद हस्तांतरण
उत्तर: वरिष्ठ नागरिक को अपने घर या चुने हुए समुदाय में सुरक्षित और स्वतंत्र रूप से रहने में सक्षम बनाना, जिसमें परिवार या विधिक उत्तराधिकारियों से देखभाल की अपेक्षा हो और संस्थागत देखभाल अंतिम विकल्प हो — समाचार के अनुसार विधेयक आय या क्षमता से निरपेक्ष, घर या चुने हुए समुदाय में सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन को मान्यता देता है। परिवार या विधिक उत्तराधिकारियों से देखभाल अपेक्षित है और संस्थागत देखभाल अंतिम विकल्प मानी गई है। शेष विकल्प इस अवधारणा से मेल नहीं खाते।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ केरलम सरकार द्वारा प्रस्तुत वरिष्ठ नागरिक (देखभाल और अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2026 के प्रावधानों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि भारत में वृद्धजनों की गरिमापूर्ण देखभाल सुनिश्चित करने में संवैधानिक और विधायी ढाँचे के साथ मिलकर ऐसे राज्य-स्तरीय विनियमन कहाँ तक प्रभावी हो सकते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: प्रस्तावना (2-3 पंक्तियाँ): केरलम में 60 वर्ष से अधिक आयु की जनसंख्या 2011 में 12.7% और 2021 में 15% थी, और 2051 तक 30% होने का अनुमान है। 2030 तक वृद्धजनों की संख्या बच्चों से अधिक हो सकती है। यह तीव्र जनांकिकीय संक्रमण का संकेत है।
विधेयक के मुख्य प्रावधान: (i) घर में वृद्धावस्था, जिसमें परिवार या विधिक उत्तराधिकारी देखभाल करें और संस्थागत देखभाल अंतिम विकल्प हो। (ii) जीवित वसीयत की मान्यता: जिला-स्तरीय वरिष्ठ नागरिक संरक्षण मंच या इकाई के अध्यक्ष की उपस्थिति में निष्पादन, देखभाल केंद्र या परिजन के पास सुरक्षित अभिरक्षा, तथा जिला प्राधिकारी और स्थानीय निकाय को प्रति देना। (iii) देखभाल केंद्रों और देखभालकर्ताओं का अनिवार्य पंजीकरण, मानक और उल्लंघन पर दंड। (iv) देखभाल की व्यापक परिभाषा, जिसमें सामाजिक सेवाएँ, मनोरंजन और सांस्कृतिक भागीदारी शामिल हैं। (v) गृह-देखभाल, दिवस-देखभाल, सहायता-प्राप्त आवास, धर्मशाला-देखभाल (Hospice Care) और आपातकालीन सहायता को सुलभ, वहनीय और भेदभाव-रहित बनाना। (vi) विधवाओं और परित्यक्त महिलाओं जैसी वृद्ध महिलाओं को प्राथमिकता।
संवैधानिक और विधायी आधार: अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन), अनुच्छेद 41 (वृद्धावस्था में लोक सहायता, निदेशक तत्त्व) और समवर्ती सूची की प्रविष्टि 23 (सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा)। 2007 का अधिनियम: बच्चों और संबंधियों का भरण-पोषण दायित्व, भरण-पोषण अधिकरण, प्रत्येक ज़िले में कम-से-कम एक वृद्धाश्रम का प्रावधान, परित्याग पर दंड। राष्ट्रीय वृद्धजन नीति, 1999। Common Cause (2018) में जीवित वसीयत को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मान्यता और बाद में प्रक्रिया का सरलीकरण। केरलम की 2006 और 2013 की नीतियाँ, अगस्त 2025 का नया प्रारूप और केरल राज्य वरिष्ठ नागरिक आयोग अधिनियम, 2025।
सकारात्मक पक्ष: अधिकार-आधारित और गरिमा-केंद्रित दृष्टिकोण, देखभाल के बाज़ार में विनियमन और दुर्व्यवहार से सुरक्षा, जीवन के अंतिम चरण में स्वायत्तता, तथा समुदाय-आधारित देखभाल का आर्थिक और सामाजिक लाभ।
आलोचनात्मक पक्ष: (i) परिवार पर निर्भरता से प्रवासन, एकल परिवार और अकेले रहने वाले वृद्धजनों के लिए व्यावहारिक कठिनाई, तथा वृद्ध महिलाओं पर देखभाल का बोझ। (ii) पंजीकरण और निरीक्षण के लिए प्रशासनिक क्षमता और वित्तीय संसाधनों की कमी, और अनौपचारिक देखभालकर्ताओं के अनुपालन की लागत। (iii) जीवित वसीयत की चिकित्सा-नैतिक और व्यावहारिक जटिलताएँ: चिकित्सकों में जागरूकता की कमी, परिजनों से मतभेद, दुरुपयोग की आशंका, और राष्ट्रीय दिशानिर्देशों से सामंजस्य। (iv) 2007 के केंद्रीय अधिनियम और राज्य कानून के बीच अतिव्यापन तथा भरण-पोषण अधिकरणों के लंबित मामले। (v) अकेले रहने वाले और निर्धन वृद्धजनों के लिए वित्तीय सहायता का स्पष्ट प्रावधान आवश्यक।
आगे की राह: प्रशिक्षित देखभालकर्ताओं का कैडर और मान्यता, गृह-आधारित स्वास्थ्य सेवाएँ, पंचायतों और स्थानीय निकायों की भूमिका, सामाजिक अंकेक्षण, जीवित वसीयत के लिए चिकित्सकों का प्रशिक्षण और डिजिटल पंजीकरण, तथा केंद्र-राज्य समन्वय। निष्कर्ष: विधेयक केरलम को सहकारी संघवाद के अंतर्गत वृद्धजन-नीति में प्रयोगशाला के रूप में स्थापित कर सकता है, परंतु सफलता कार्यान्वयन-क्षमता और वित्तीय सहायता पर निर्भर करेगी।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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