लोकसभा अध्यक्ष का आह्वान: लोकतंत्र में असहमति की शक्ति

लोकसभा अध्यक्ष का आह्वान: लोकतंत्र में असहमति की शक्ति

लोकसभा अध्यक्ष का आह्वान: लोकतंत्र में असहमति की शक्ति

लोकतंत्र में असहमति की भूमिकाअसहमति व्यक्तसंवैधानिक ढाँचे मेंसार्थक चर्चाअध्यक्ष के मार्गदर्शन मेंसुधार व जवाबदेहीकानूनों व नीतियों मेंजनविश्वास वृद्धिलोकतंत्र सुदृढ़
लोकतंत्र में असहमति की भूमिका

✎ असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, परंतु वह संविधान और संसदीय नियमों की मर्यादा के भीतर ही वैध रहती है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था और शासन (Polity and Governance): संसद की संरचना, कार्य और संचालन; संसदीय विशेषाधिकार; अध्यक्ष की भूमिका  |  GS Paper II — राजव्यवस्था और शासन (Polity and Governance): मौलिक अधिकार, विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता; लोकतांत्रिक संस्थाएँ
  • Prelims: लोक सभा अध्यक्ष (Speaker of Lok Sabha) — अनुच्छेद 93 के अंतर्गत सदन द्वारा चुनाव, अनुच्छेद 100 — सदन में मतदान और बराबरी की स्थिति में अध्यक्ष का निर्णायक मत, अनुच्छेद 105 — संसद के सदस्यों के वाक्-स्वातंत्र्य और विशेषाधिकार, अनुच्छेद 19(1)(a) — वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) — धारा 66क को निरस्त करना, दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) — दल-बदल विरोधी कानून, विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) की मान्यता और भूमिका, संसदीय स्थायी समितियाँ (Parliamentary Standing Committees) और प्रश्नकाल
  • Essay: असहमति लोकतंत्र की जीवन-शक्ति है: विचार-विमर्श से सुशासन तक, संसद में बहस की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता

त्वरित पुनरावृत्ति: असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, परंतु वह संविधान और संसदीय नियमों की मर्यादा के भीतर ही वैध रहती है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

लोक सभा अध्यक्ष ने सांसदों से आग्रह किया है कि वे असहमति को लोकतंत्र की शक्ति के रूप में स्वीकार करें और उसका संरक्षण करें। यह संदेश ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब संसदीय कार्यवाही में बहस, विरोध और सदन के कामकाज को लेकर सार्वजनिक चर्चा होती रहती है। परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु यह है कि असहमति को संवैधानिक ढाँचे के भीतर, संसदीय नियमों और मर्यादा के साथ व्यक्त करना लोकतंत्र के स्वस्थ संचालन के लिए आवश्यक माना जाता है। (स्रोत में दिए गए वक्तव्य के आगे के विवरण उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए यहाँ केवल सामान्य संवैधानिक संदर्भ पर बल दिया गया है।)

पृष्ठभूमि

  • भारत ने वेस्टमिंस्टर मॉडल पर आधारित संसदीय शासन प्रणाली अपनाई है, जिसमें कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है (अनुच्छेद 75(3) और अनुच्छेद 164)। ऐसी व्यवस्था में विरोधी मत और विपक्ष की भूमिका प्रणाली का अभिन्न अंग है।
  • संविधान सभा में संसदीय बहस और प्रश्न पूछने के अधिकार को लोकतांत्रिक जवाबदेही के मुख्य साधन के रूप में देखा गया था।
  • लोक सभा के अध्यक्ष सदन के संरक्षक होते हैं। वे सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं, व्यवस्था बनाए रखते हैं और सदस्यों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। उनकी निष्पक्षता को संसदीय परंपरा में विशेष महत्व दिया जाता है।
  • श्रेया सिंघल मामले (2015) में सर्वोच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यापक रूप में सुरक्षित रखा और इसे लोकतंत्र की आधारभूत आवश्यकता माना।

असहमति (Dissent) और संसदीय लोकतंत्र में उसका स्थान क्या है?

  • असहमति का अर्थ है किसी नीति, विधेयक या निर्णय से भिन्न मत रखना। संसदीय लोकतंत्र में यह विरोध, संशोधन, प्रश्न, स्थगन प्रस्ताव और मतविभाजन जैसे संवैधानिक तथा नियमगत माध्यमों से व्यक्त होता है।
  • अनुच्छेद 105 संसद के सदस्यों को सदन के भीतर बोलने की स्वतंत्रता और विशेषाधिकार देता है, ताकि वे बिना भय के अपना मत रख सकें।
  • अध्यक्ष का दायित्व है कि वे सदन में सभी दलों और मतों को बोलने का अवसर दें, परंतु साथ ही सदन की गरिमा और नियमों का पालन सुनिश्चित करें। इन दोनों के बीच संतुलन लोकतांत्रिक संचालन की कुंजी है।
  • असहमति का वैध रूप नियमों के भीतर रहता है; सदन की कार्यवाही में बाधा डालना या अमर्यादित भाषा का प्रयोग संसदीय नियमों के दायरे से बाहर माना जाता है और इस पर अध्यक्ष कार्रवाई कर सकते हैं।
  • दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून, 1985) दल के अनुशासन से जुड़ा है, इसलिए सदस्य की व्यक्तिगत असहमति और दल-बदल में अंतर समझना आवश्यक है।
  • संसदीय स्थायी समितियाँ और प्रश्नकाल जैसे उपकरण असहमति को तथ्यों, जाँच और नीतिगत सुधार की दिशा में ले जाने का काम करते हैं।
  • लोकतंत्र में असहमति को सहन करना और उसका सम्मान करना ही बहुमत की सरकार को वैधता देता है; इसी कारण असहमति को लोकतंत्र की शक्ति माना जाता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
संवैधानिक आधार अनुच्छेद 19(1)(क) नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जिसमें सरकार की नीतियों से असहमति रखने का अधिकार भी शामिल है। संसद के भीतर यह संरक्षण अनुच्छेद 105 से मिलता है।
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका अध्यक्ष सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं, सदस्यों को अपनी बात रखने का अवसर देते हैं और सदन की गरिमा बनाए रखते हैं। इस पद से निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है।
विपक्ष की संस्थागत भूमिका संसदीय शासन प्रणाली में विपक्ष सरकार की नीतियों की जाँच करता है और वैकल्पिक दृष्टिकोण सामने रखता है। इससे नीति-निर्माण में संतुलन और जवाबदेही बनी रहती है।
प्रक्रियात्मक माध्यम लोकसभा की प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियम सदस्यों की असहमति को व्यक्त करने के औपचारिक साधन देते हैं, जैसे प्रश्नकाल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव और स्थगन प्रस्ताव। इनसे असहमति सदन की व्यवस्था के भीतर रहती है।
लोकतांत्रिक मूल्य असहमति को लोकतंत्र की शक्ति मानना बहुलवाद, सहिष्णुता और सार्वजनिक विमर्श की परंपरा को मज़बूत करता है, जो संविधान की मूल भावना से जुड़ा है।

महत्व

संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक

  • असहमति की स्वीकृति अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यवहार में सार्थक बनाती है।
  • संसद में खुली चर्चा से विधायी प्रक्रिया की वैधता और जनविश्वास बढ़ता है।
  • बहुमत और अल्पमत दोनों के विचारों को स्थान मिलने से संसदीय लोकतंत्र की समावेशी प्रकृति सुदृढ़ होती है।

शासन और नीति-निर्माण

  • विधेयकों पर विस्तृत बहस से कानूनों की कमियाँ पहले चरण में पकड़ में आती हैं।
  • सरकार की नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा से प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता आती है।
  • स्थायी समितियों और सदन की चर्चा के माध्यम से नीतिगत विकल्पों का मूल्यांकन संभव होता है।

नागरिक और सामाजिक दृष्टि

  • संसद में असहमति का सम्मानपूर्वक प्रकट होना नागरिकों में लोकतांत्रिक नागरिकता के मूल्य विकसित करता है।
  • विविध हितों और क्षेत्रीय दृष्टिकोणों की अभिव्यक्ति से राष्ट्रीय एकता के भीतर विविधता का सम्मान होता है।

चुनौतियाँ

1. असहमति और व्यवधान के बीच अंतर

  • असहमति का उद्देश्य चर्चा को आगे बढ़ाना है, जबकि बार-बार की नारेबाज़ी या कार्यवाही रोकने से सदन का कामकाज बाधित होता है।
  • दोनों के बीच स्पष्ट मर्यादा तय न होने से सदन के संचालन में विवाद की स्थिति बनती है।

2. दल-अनुशासन और दल-बदल विरोधी प्रावधान

  • दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल पर रोक से दल के भीतर खुली असहमति का स्थान सीमित हो जाता है।
  • दल के व्हिप (Whip) के कारण सांसद अपने निजी विचार सदन में पूरी तरह नहीं रख पाते।

3. चर्चा के समय और गुणवत्ता में गिरावट

  • बार-बार स्थगन और सीमित कार्य-दिवसों से विस्तृत बहस के लिए समय कम पड़ता है।
  • बहस के स्थान पर औपचारिक भाषण बढ़ने से असहमति का गंभीर विमर्श कमज़ोर होता है।

4. असहमति की अभिव्यक्ति पर विधिक सीमाएँ

  • अनुच्छेद 19(2) के तहत राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और मानहानि जैसे आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
  • सदन के भीतर के विशेषाधिकार और सार्वजनिक मंच पर अभिव्यक्ति के नियमों के बीच अंतर समझना आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
असहमति बनाम व्यवधान असहमति की मर्यादा स्पष्ट न होने से चर्चा की जगह कार्यवाही का बाधित होना बढ़ सकता है।
दल-अनुशासन व्हिप और दल-बदल विरोधी प्रावधान सांसदों की स्वतंत्र राय को सीमित कर सकते हैं।
समय और संसाधन सीमित बैठकों के कारण विधेयकों और नीतियों पर गहन चर्चा के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता।
विधिक सीमाएँ अभिव्यक्ति पर उचित निर्बंधन और विशेषाधिकार के बीच संतुलन बनाना कठिन है।
सार्वजनिक विमर्श सदन की कार्यवाही का सरलीकृत प्रसारण असहमति को गलत अर्थ में प्रस्तुत करने का जोखिम रखता है।

आगे की राह

  • लोकसभा की प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमों में असहमति की मर्यादा से जुड़े स्पष्ट मानदंड सदस्यों के बीच व्यापक रूप से साझा किए जाएँ।
  • विधेयकों को स्थायी समितियों (Standing Committees) में भेजने की प्रथा को और सुदृढ़ किया जाए, ताकि तकनीकी विषयों पर दलगत सीमाओं से ऊपर विचार हो सके।
  • सदन में प्रश्नकाल और शून्यकाल को नियमित रूप से चलने देने के लिए सभी दलों की सहमति से कार्य-संचालन की परंपराएँ विकसित की जाएँ।
  • अध्यक्ष की निष्पक्ष भूमिका को संस्थागत परंपराओं और आचार-संहिता से और मज़बूत किया जाए।
  • दल-बदल विरोधी कानून के प्रभाव का समय-समय पर संसदीय और विधिक स्तर पर पुनरावलोकन हो, ताकि दल-अनुशासन और सांसदों की स्वतंत्र राय में संतुलन बना रहे।
  • विधायी बहस की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए विशेषज्ञों और नागरिक समाज के साथ परामर्श की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया जाए।
  • स्कूल और उच्च शिक्षा स्तर पर संसदीय प्रक्रिया, नागरिक अधिकार और लोकतांत्रिक संवाद की शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।
  • मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में सदन की कार्यवाही का संदर्भ सहित और तथ्यपरक प्रसारण सुनिश्चित किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

संसदीय लोकतंत्र (Parliamentary Democracy) · असहमति (Dissent) · विपक्ष की भूमिका (Role of Opposition) · अध्यक्ष की निष्पक्षता (Impartiality of the Speaker) · संसदीय विशेषाधिकार (Parliamentary Privileges) · अनुच्छेद 105 (Article 105) · प्रक्रिया नियम (Rules of Procedure) · दल-बदल विरोधी कानून (Anti-defection Law) · बहुमत का अत्याचार (Tyranny of the Majority) · संसदीय समितियां (Parliamentary Committees) · वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech and Expression) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 19(1)(क) — वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आधार
  • अनुच्छेद 19(2) — अभिव्यक्ति पर युक्तियुक्त निर्बंधन
  • अनुच्छेद 105 — संसद में वाक् स्वतंत्रता और विशेषाधिकार
  • अनुच्छेद 93 — लोकसभा अध्यक्ष का संवैधानिक पद

अवधारणा प्रवाह

संसदीय लोकतंत्र में सदस्य सरकार की नीतियों और विधेयकों पर अलग राय व्यक्त करते हैं।  →  अनुच्छेद 19(1)(क) और अनुच्छेद 105 इस असहमति को अभिव्यक्ति का वैधानिक आधार देते हैं।  →  लोकसभा के प्रक्रिया नियम प्रश्नकाल, शून्यकाल और स्थगन प्रस्ताव जैसे औपचारिक माध्यम उपलब्ध कराते हैं।  →  अध्यक्ष इन माध्यमों के संचालन और मर्यादा की रक्षा करते हैं, ताकि असहमति चर्चा में बदले, व्यवधान में नहीं।  →  सार्थक चर्चा से विधेयकों में सुधार और नीतियों में जवाबदेही आती है।  →  इससे सरकार और विपक्ष दोनों के प्रति जनविश्वास बढ़ता है और संसदीय लोकतंत्र सुदृढ़ होता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लोकसभा का अध्यक्ष लोकसभा के सदस्यों द्वारा अपने में से चुना जाता है।
2. लोकसभा के अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव तभी पारित हो सकता है जब उसे लोकसभा के समस्त सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित किया जाए।
3. अध्यक्ष निर्वाचित होते ही अपने दल की सदस्यता से त्यागपत्र देता है और प्रत्येक मतदान में मत दे सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 93 के अनुसार लोकसभा अपने दो सदस्यों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनती है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 94(ग) के अनुसार अध्यक्ष को सदन के समस्त तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है। कथन 3 गलत है: अध्यक्ष सामान्यतः मत नहीं देता; अनुच्छेद 100(1) के अनुसार वह केवल बराबरी की स्थिति में निर्णायक मत (Casting Vote) देता है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): संसद के सदस्यों को संसद में बोलने की स्वतंत्रता प्राप्त है और संसद में कही गई किसी बात के लिए उन पर किसी न्यायालय में कार्यवाही नहीं की जा सकती।
कारण (R): अनुच्छेद 105(2) के अनुसार संसद का कोई सदस्य संसद में दिए गए किसी मत या कही गई किसी बात के संबंध में किसी न्यायालय में उत्तरदायी नहीं होगा।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 105(1) संसद में बोलने की स्वतंत्रता की व्यवस्था करता है और 105(2) सदस्यों को संसद में कही गई बात या दिए गए मत के लिए न्यायिक कार्यवाही से संरक्षण देता है। यह संरक्षण अनुच्छेद 19(1)(क) से भिन्न, संसदीय कार्यप्रणाली की स्वतंत्रता का स्रोत है, इसलिए (R) (A) की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:

सूची-I (संवैधानिक प्रावधान) — सूची-II (विषय)
A. दसवीं अनुसूची — 1. दल-बदल के आधार पर अयोग्यता
B. अनुच्छेद 118 — 2. सदन की प्रक्रिया और कार्य-संचालन के नियम
C. अनुच्छेद 122 — 3. संसदीय कार्यवाही की जांच न्यायालयों द्वारा न किया जाना
D. अनुच्छेद 121 — 4. उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण पर संसद में चर्चा पर प्रतिबंध

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-2, B-1, C-3, D-4
  2. A-1, B-2, C-3, D-4
  3. A-3, B-2, C-1, D-4
  4. A-1, B-3, C-2, D-4

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — दसवीं अनुसूची दल-बदल विरोधी प्रावधान है (A-1)। अनुच्छेद 118 संसद को अपनी प्रक्रिया और कार्य-संचालन के नियम बनाने की शक्ति देता है (B-2)। अनुच्छेद 122 के अंतर्गत संसदीय कार्यवाही की वैधता को न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता (C-3)। अनुच्छेद 121 न्यायाधीश के आचरण पर संसद में चर्चा को केवल पदच्युति के प्रस्ताव तक सीमित करता है (D-4)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों से असहमति (Dissent) को लोकतंत्र की शक्ति के रूप में बनाए रखने का आग्रह किया है। संसदीय लोकतंत्र में असहमति की संवैधानिक और प्रक्रियात्मक सीमाओं की समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए। साथ ही बताइए कि सदन में व्यवस्था बनाए रखने के लिए अध्यक्ष के पास कौन-से उपाय हैं और वे असहमति के अधिकार के साथ किस प्रकार संतुलित होने चाहिए? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल उत्तर के बिंदु: (1) भूमिका: लोकसभा अध्यक्ष का आग्रह, संसदीय लोकतंत्र में असहमति का महत्व; जे.एस. मिल की पुस्तक ऑन लिबर्टी (1859) में मुक्त विचार-विमर्श का तर्क और टॉकविल की डेमोक्रेसी इन अमेरिका (1835/1840) में बहुमत के अत्याचार (Tyranny of the Majority) की चेतावनी। (2) संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 105(1) और 105(2) के अंतर्गत सदन में बोलने और मत देने का संरक्षण; अनुच्छेद 118 के अंतर्गत प्रक्रिया नियम; अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(2) का सदन के बाहर लागू होने वाला दायरा; अनुच्छेद 105(3) द्वारा विशेषाधिकारों की व्यवस्था। (3) अध्यक्ष की भूमिका: अनुच्छेद 93 और 94(ग) के अंतर्गत पद और निष्कासन; अनुच्छेद 100 में निर्णायक मत; लोकसभा प्रक्रिया नियमावली के नियम 374 के अंतर्गत सदस्यों को नाम लेकर निलंबित करने का अधिकार; व्यवस्था बनाए रखना बनाम विरोध का अवसर देना। (4) विपक्ष की संस्थागत भूमिका: नेता प्रतिपक्ष की मान्यता का आधार नेता प्रतिपक्ष (वेतन और भत्ते) अधिनियम, 1977; संसदीय स्थायी समितियों में विपक्ष की भागीदारी; वॉकआउट, स्थगन प्रस्ताव और चर्चा के अवसर। (5) न्यायिक दृष्टि: किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू (1992) में दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता और अध्यक्ष के निर्णय की सीमित न्यायिक समीक्षा; अनुच्छेद 122 के अंतर्गत कार्यवाही पर न्यायालय की सीमा। (6) संतुलित मत: असहमति को प्रक्रिया के भीतर रखना आवश्यक है, पर अनुचित रूप से सीमित करने से संसदीय विमर्श कमजोर होता है; अध्यक्ष की निष्पक्षता, नियमों का समान प्रयोग और पारदर्शी कार्यवाही सबसे प्रभावी उपाय हैं। (7) निष्कर्ष: असहमति को लोकतांत्रिक शक्ति तभी माना जा सकता है जब वह नियमों के भीतर, तर्क और साक्ष्य के आधार पर व्यक्त हो।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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