लोकसभा अध्यक्ष ने लोकतंत्र में मतभेदों के बीच सम्मान की आवश्यकता पर जोर दिया

लोकसभा अध्यक्ष ने लोकतंत्र में मतभेदों के बीच सम्मान की आवश्यकता पर जोर दिया

लोकसभा अध्यक्ष ने लोकतंत्र में मतभेदों के बीच सम्मान की आवश्यकता पर जोर दिया

संसदीय लोकतंत्र में विचार-विमर्श प्रक्रियाविचारों में भिन्नतास्वाभाविकअसहमति अभिव्यक्तिसंवैधानिक अधिकारपरस्पर सम्मानसार्थक विचार-विमर्शअध्यक्ष द्वारा मर्यादानियम-पालनविधायी गुणवत्तानीति-निर्माण
संसदीय लोकतंत्र में विचार-विमर्श प्रक्रिया

✎ मतभेद संसदीय लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है, और लोकसभा अध्यक्ष निष्पक्ष संचालन तथा परस्पर सम्मान के माध्यम से सदन की गरिमा सुनिश्चित करता है (अनुच्छेद 93)।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): संसद की संरचना, लोकसभा अध्यक्ष की शक्तियाँ और कार्य, संसदीय विशेषाधिकार, दसवीं अनुसूची  |  GS Paper II — राजव्यवस्था: संसदीय लोकतंत्र और संघवाद के संचालन में संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका
  • Prelims: अनुच्छेद 93 (लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का निर्वाचन), अनुच्छेद 94 (अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद त्याग और पदच्युति), अनुच्छेद 100 (सदन में मतदान और निर्णायक मत), अनुच्छेद 105 (संसद के सदस्यों के विशेषाधिकार), दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून), लोकसभा की प्रक्रिया एवं कार्य-संचालन नियम (Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha), किहोतो होलोहन मामला (1992) और अध्यक्ष के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा
  • Essay: लोकतंत्र में असहमति का महत्व और संसदीय संवाद की गुणवत्ता, मतभेद के बीच परस्पर सम्मान: सहमति निर्माण और संस्थागत गरिमा

त्वरित पुनरावृत्ति: मतभेद संसदीय लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है, और लोकसभा अध्यक्ष निष्पक्ष संचालन तथा परस्पर सम्मान के माध्यम से सदन की गरिमा सुनिश्चित करता है (अनुच्छेद 93)।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

लोकसभा अध्यक्ष ने लोकतंत्र में विचारों की भिन्नता के बावजूद आपसी सम्मान बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया है। यह वक्तव्य संसदीय लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत को रेखांकित करता है कि सदन में मतभेद एक सामान्य और वांछनीय स्थिति है, और उसका समाधान तर्क, नियम-पालन और परस्पर शिष्टता के माध्यम से होना चाहिए। लोकसभा अध्यक्ष सदन के संरक्षक और संचालक के रूप में कार्य-संचालन की मर्यादा सुनिश्चित करते हैं, इसलिए उनका यह संदेश संसदीय गरिमा और रचनात्मक संवाद की संवैधानिक अपेक्षा से सीधे जुड़ता है। यह समाचार किसी विशेष दल या घटना पर केंद्रित नहीं है, बल्कि संसदीय आचरण के सामान्य सिद्धांत पर प्रकाश डालता है।

पृष्ठभूमि

  • भारत का संविधान संसदीय शासन प्रणाली अपनाता है, जिसमें लोक सभा जनता की प्रत्यक्ष प्रतिनिधि सभा है और उसकी कार्यवाही का संचालन लोकसभा अध्यक्ष करते हैं।
  • अनुच्छेद 93 के अनुसार लोक सभा अपने दो सदस्यों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में यथाशीघ्र चुनेगी। अध्यक्ष सदन की कार्यवाही में व्यवस्था और मर्यादा बनाए रखता है।
  • सदन में विचार-विमर्श के दौरान नियमों की व्याख्या, बोलने का क्रम, प्रस्तावों की स्वीकार्यता और सदस्यों के आचरण से संबंधित निर्णय अध्यक्ष करते हैं। इन्हीं निर्णयों से संसदीय परंपराएँ विकसित होती हैं।
  • संसदीय विशेषाधिकार अनुच्छेद 105 में वर्णित हैं, जो सदन में वाक्-स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं। यह स्वतंत्रता इसलिए दी गई है ताकि सदस्य बिना भय के अपनी राय रख सकें, परंतु इसके साथ सदन की गरिमा के पालन की अपेक्षा भी जुड़ी है।
  • दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दल-बदल से संबंधित अयोग्यता के प्रश्नों पर निर्णय लोकसभा अध्यक्ष करते हैं। किहोतो होलोहन मामले (1992) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसे निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं।

लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका क्या है?

  • लोकसभा अध्यक्ष लोक सभा का सर्वोच्च पदाधिकारी होता है और सदन की कार्यवाही का संचालन करता है। वह सदन का प्रतिनिधि और उसकी स्वायत्तता का संरक्षक माना जाता है।
  • अध्यक्ष निष्पक्षता का सिद्धांत मानकर कार्य करता है। संसदीय परंपरा में अध्यक्ष अपने दल की सदस्यता त्याग देता है, ताकि सभी सदस्यों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित हो।
  • सदन में समान मत होने की स्थिति में अध्यक्ष निर्णायक मत (Casting Vote) का प्रयोग करता है, जैसा अनुच्छेद 100 में उल्लिखित है।
  • लोकसभा की प्रक्रिया एवं कार्य-संचालन नियमों के अंतर्गत अध्यक्ष प्रस्तावों की स्वीकार्यता, कार्यस्थगन और सदस्यों के आचरण से जुड़े मामलों में निर्णय लेता है।
  • संसदीय गरिमा का अर्थ है सदन में शिष्ट भाषा, नियमों का पालन और विपक्ष तथा सत्ता पक्ष दोनों के अधिकारों का सम्मान। इसका उद्देश्य विचार-विमर्श को सार्थक बनाना है।
  • लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक है, क्योंकि विभिन्न हित, विचारधाराएँ और जनमत सदन में प्रतिनिधित्व पाते हैं। संसदीय संस्थाएँ इन मतभेदों को संवाद और नियमों के दायरे में व्यक्त करने का माध्यम हैं।
  • दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अध्यक्ष का निर्णय संवैधानिक दायित्व है, किंतु उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है, जिससे संस्थागत संतुलन बना रहता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
मूल संदेश मतभेद को लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग मानते हुए परस्पर सम्मान बनाए रखने पर बल
संवैधानिक संदर्भ लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही के संचालन का दायित्व निभाते हैं, और यह पद अनुच्छेद 93 के अंतर्गत स्थापित है
वाद-विवाद की गुणवत्ता मर्यादित और तर्कपूर्ण बहस से नीति-निर्माण की गुणवत्ता और विधायी विचार-विमर्श का स्तर सुधरता है
संसदीय मर्यादा सदन की गरिमा और कार्य-संचालन की निरंतरता बनाए रखने का नैतिक और प्रक्रियात्मक आधार
लोकतांत्रिक सहिष्णुता विरोधी विचारों के प्रति सहिष्णुता संसदीय लोकतंत्र और बहुदलीय व्यवस्था की मूल भावना है

महत्व

संवैधानिक और संस्थागत महत्त्व

  • संसदीय लोकतंत्र में सदन का संचालन निष्पक्षता और मर्यादा पर टिका होता है, और अध्यक्ष इसके केंद्र में रहते हैं
  • अनुच्छेद 105 सदन में वाक्-स्वातंत्र्य की गारंटी देता है, परंतु इस स्वतंत्रता का प्रयोग सदन की मर्यादा और नियमों के भीतर ही अपेक्षित है
  • अनुच्छेद 118 के अंतर्गत बनाए गए प्रक्रिया नियम सदन की कार्य-पद्धति को व्यवस्थित रखते हैं

लोकतांत्रिक शासन के लिए महत्त्व

  • सरकार और विपक्ष के बीच संवाद की संभावना बनी रहती है, जिससे उत्तरदायी शासन को बल मिलता है
  • असहमति को संवाद में बदलने से विधायी प्रक्रिया में सर्वसम्मति और सहमति-निर्माण की गुंजाइश बढ़ती है
  • सदन की कार्यवाही में निरंतरता रहने से विधायी कार्यों, जैसे विधेयकों की चर्चा और समिति-जाँच, का समय पर निपटारा संभव होता है

नागरिक शिक्षा और सामाजिक महत्त्व

  • सार्वजनिक जीवन में मर्यादित असहमति का उदाहरण नागरिकों में लोकतांत्रिक आचरण को प्रोत्साहित करता है
  • बहुलवादी समाज में भिन्न मतों के सह-अस्तित्व की भावना लोकतंत्र की सामाजिक नींव को मज़बूत करती है

चुनौतियाँ

1. सदन में कार्य-बाधा और व्यवधान

  • बार-बार स्थगन और व्यवधान से प्रश्नकाल, शून्यकाल और विधायी कार्य प्रभावित होते हैं
  • सदन का समय सीमित संसाधन है, इसलिए व्यवधान का प्रभाव सार्वजनिक धन और विधायी उत्पादकता पर भी पड़ता है

2. असहमति और मर्यादा के बीच संतुलन

  • असहमति का अधिकार लोकतंत्र का मूल तत्त्व है, परंतु उसकी अभिव्यक्ति की सीमा के निर्धारण में व्याख्या-भेद उत्पन्न हो सकता है
  • अध्यक्ष की निष्पक्षता बनाए रखना और सभी पक्षों को समान अवसर देना एक संवेदनशील प्रशासनिक-संवैधानिक कार्य है

3. सार्वजनिक विमर्श का ध्रुवीकरण

  • सूचना के तीव्र प्रसार के दौर में सदन की बहस का अंश चुनिंदा रूप में प्रस्तुत होने से गलतफहमी बढ़ सकती है
  • मीडिया और सोशल मीडिया पर असहमति का स्वर अक्सर कटुता में बदल जाता है, जिससे संवाद की गुंजाइश घटती है

4. प्रक्रियात्मक नियमों की व्याख्या

  • प्रक्रिया नियमों और परंपराओं की व्याख्या समय के साथ विकसित होती है, जिससे स्पष्टता की आवश्यकता बनी रहती है
  • नियमों के प्रयोग में एकरूपता और पारदर्शिता बनाए रखना सदन में विश्वास के लिए आवश्यक है

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

समस्या चिंता
कार्य-बाधा विधायी समय और सार्वजनिक संसाधनों की हानि
असहमति की सीमा वाक्-स्वातंत्र्य और सदन की मर्यादा के बीच संतुलन की कठिनाई
सूचना का चुनिंदा प्रसार संदर्भ से कटी बहस से भ्रम और अविश्वास का खतरा
संवाद में कटुता सार्वजनिक विमर्श में सहिष्णुता का क्षरण
नियमों में अस्पष्टता प्रक्रियात्मक विवादों से अध्यक्ष की निष्पक्षता पर प्रश्न उठने का जोखिम

आगे की राह

  • सदन के प्रक्रिया नियमों और आचार-संहिता के प्रति सांसदों में नियमित जागरूकता और प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए
  • सदन की कार्यवाही का संदर्भ-सहित और संतुलित प्रसारण सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत पारदर्शिता बढ़ाई जाए
  • सरकार और विपक्ष के बीच नियमित अनौपचारिक संवाद के मंच विकसित किए जाएँ, ताकि सदन के बाहर भी सहमति-निर्माण हो
  • संसदीय समितियों में विषय-आधारित और दलगत सीमाओं से ऊपर विचार-विमर्श को प्रोत्साहित किया जाए
  • अध्यक्ष की निष्पक्षता और निर्णयों की पारदर्शिता बनाए रखने हेतु स्पष्ट व सार्वजनिक रूप से ज्ञात प्रक्रियात्मक दिशा-निर्देश हों
  • विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर संवैधानिक मूल्यों और संसदीय शिष्टाचार की शिक्षा को सुदृढ़ किया जाए
  • सार्वजनिक विमर्श में असहमति को शालीनता से व्यक्त करने की संस्कृति को मीडिया और नागरिक समाज के सहयोग से बढ़ावा दिया जाए

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

संसदीय गरिमा (Parliamentary Decorum) · लोकसभा अध्यक्ष (Speaker of Lok Sabha) · संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) · अनुच्छेद 100 (Article 100) और निर्णायक मत · दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) और दल-बदल · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · किहोतो होलोहन वाद (Kihoto Hollohan Case, 1992) · संसदीय विशेषाधिकार (Parliamentary Privileges) · प्रक्रिया नियम व कार्य संचालन नियम (Rules of Procedure and Conduct of Business) · विधायी बहस की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक असहमति

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 93: अध्यक्ष पद की स्थापना और सदन द्वारा चुनाव
  • अनुच्छेद 105: सदन में वाक्-स्वातंत्र्य और विशेषाधिकार
  • अनुच्छेद 118: सदन की प्रक्रिया और कार्य-संचालन के नियम

अवधारणा प्रवाह

विचारों में भिन्नता लोकतंत्र की स्वाभाविक विशेषता है  →  सदन में असहमति का अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार के भीतर प्रयोग होता है  →  अध्यक्ष द्वारा मर्यादा और प्रक्रिया नियमों के पालन पर बल दिया जाता है  →  परस्पर सम्मान से सदन में मर्यादित बहस और सार्थक विचार-विमर्श संभव होता है  →  सार्थक विचार-विमर्श से विधायी कार्य की गुणवत्ता और नीति-निर्माण की वैधता बढ़ती है  →  अंततः संसदीय लोकतंत्र में जन-विश्वास और संस्थागत विश्वसनीयता सुदृढ़ होती है

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लोकसभा अध्यक्ष का निर्वाचन लोकसभा के सदस्य अपने में से करते हैं।
2. लोकसभा अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव लोकसभा के समस्त सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित होना आवश्यक है।
3. लोकसभा में मत बराबर होने की स्थिति में अध्यक्ष निर्णायक मत का प्रयोग कर सकता है।
4. दसवीं अनुसूची के अंतर्गत लोकसभा अध्यक्ष द्वारा दिए गए दल-बदल संबंधी निर्णय किसी भी न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी चार

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 93 के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का निर्वाचन सदन के सदस्य स्वयं करते हैं। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 94(ग) के अंतर्गत हटाने का संकल्प सदन के समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित होना चाहिए। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 100(1) के अनुसार मत बराबर होने पर पीठासीन व्यक्ति निर्णायक मत देता है। कथन 4 गलत है, क्योंकि किहोतो होलोहन वाद (1992) में उच्चतम न्यायालय ने अध्यक्ष के निर्णयों को न्यायिक समीक्षा के अधीन माना है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): लोकसभा अध्यक्ष सामान्यतः पहले मत नहीं देता, किंतु मत बराबर होने पर वह निर्णायक मत का प्रयोग कर सकता है।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 100(1) पीठासीन व्यक्ति को प्रथमतः मत देने से रोकता है और केवल मत बराबर होने की स्थिति में निर्णायक मत का अधिकार देता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — अनुच्छेद 100(1) स्पष्ट करता है कि पीठासीन व्यक्ति प्रथमतः मत नहीं देता और केवल समानता की स्थिति में निर्णायक मत देता है। अतः कारण (R) अभिकथन (A) की संवैधानिक आधारशिला है और उसकी सही व्याख्या करता है।

Q3. निम्नलिखित में से किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी प्रावधान) की संवैधानिक वैधता को बनाए रखा, किंतु यह भी स्पष्ट किया कि सदन के अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा से पूर्णतः मुक्त नहीं है?

  1. केशवानंद भारती वाद (1973)
  2. किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू वाद (1992)
  3. राजा राम पाल वाद (2007)
  4. एस. आर. बोम्मई वाद (1994)

उत्तर: किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू वाद (1992) — किहोतो होलोहन वाद (1992) में उच्चतम न्यायालय ने दसवीं अनुसूची को वैध माना और अध्यक्ष के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा को सीमित, परंतु विद्यमान रखा। केशवानंद भारती वाद मूल संरचना सिद्धांत से, राजा राम पाल वाद संसदीय विशेषाधिकार से और एस. आर. बोम्मई वाद अनुच्छेद 356 से संबंधित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ संसदीय लोकतंत्र में सदन के भीतर परस्पर सम्मान को लोकतांत्रिक विमर्श की पूर्वशर्त माना जाता है, न कि केवल शिष्टाचार का विषय। इस कथन का समीक्षात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी बताइए कि यदि सदन में असहमति का स्वरूप व्यवधान और निलंबन तक पहुँच जाए, तो संवैधानिक व्यवस्था में अध्यक्ष की भूमिका और न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ किस प्रकार प्रभावित होती हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
(1) भूमिका: संसदीय लोकतंत्र में विचार-विमर्श, विरोध और सहमति का संस्थागत मंच सदन है; लोकसभा अध्यक्ष द्वारा मतभेद के बावजूद परस्पर सम्मान पर बल देना इसी संवैधानिक नैतिकता की याद दिलाता है।
(2) संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 93 (अध्यक्ष का निर्वाचन), अनुच्छेद 94 (पद रिक्त होना और हटाना; हटाने का संकल्प सदन के समस्त सदस्यों के बहुमत से), अनुच्छेद 100 (मतदान और निर्णायक मत), अनुच्छेद 105 (संसदीय विशेषाधिकार), अनुच्छेद 118 (प्रक्रिया नियम), अनुच्छेद 122 (न्यायालयों द्वारा कार्यवाही की जाँच पर सीमा)।
(3) प्रक्रियात्मक साधन: लोकसभा के प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियम, विशेषकर नियम 373 (सदस्य द्वारा शब्द वापसी) और नियम 374 (नाम लेकर सदस्य को निलंबित करना); व्यवस्था का प्रश्न, स्थगन प्रस्ताव और सत्र में व्यवधान का प्रबंधन।
(4) संवैधानिक नैतिकता पर डॉ. बी. आर. अंबेडकर का 4 नवंबर 1948 का संविधान सभा भाषण: संवैधानिक नैतिकता को केवल संविधान के अक्षरशः पालन नहीं, बल्कि उसकी भावना के सम्मान के रूप में समझना।
(5) परंपरा बनाम विधि: ब्रिटिश वेस्टमिंस्टर परंपरा में अध्यक्ष दलीय सदस्यता छोड़ता है; भारत में यह परंपरा है, विधिक बाध्यता नहीं। ग्रैनविल ऑस्टिन के ‘Working a Democratic Constitution’ के विश्लेषण से संस्थागत आदतों के महत्व को जोड़ें।
(6) न्यायिक समीक्षा की सीमा: किहोतो होलोहन वाद (1992) में दल-बदल पर अध्यक्ष के निर्णय की न्यायिक समीक्षा सीमित रूप में मान्य; राजा राम पाल वाद (2007) में विशेषाधिकार और सदस्य के मूल अधिकारों के बीच संतुलन; अनुच्छेद 122 के कारण प्रक्रियात्मक अनियमितताओं पर न्यायालय का सीमित हस्तक्षेप।
(7) संतुलित दृष्टिकोण: एक ओर अनुशासन और सदन की गरिमा की रक्षा आवश्यक है; दूसरी ओर अत्यधिक निलंबन या एकतरफा प्रक्रिया विपक्ष और जनप्रतिनिधित्व के सिद्धांत को कमजोर कर सकती है। निष्कर्ष में सुझाव: स्पष्ट आचार-संहिता, पारदर्शी प्रक्रिया और समिति-आधारित समाधान (आचार समिति, विशेषाधिकार समिति) द्वारा संतुलन।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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