मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को बरकरार रखा: छह एआईएडीएमके विधायकों के इस्तीफे स्वीकार किए गए

मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को बरकरार रखा: छह एआईएडीएमके विधायकों के इस्तीफे स्वीकार किए गए

मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को बरकरार रखा: छह एआईएडीएमके विधायकों के इस्तीफे स्वीकार किए गए

त्यागपत्र स्वीकृति बनाम निरर्हता कार्यवाहीत्यागपत्र स्वीकृतिनिरर्हता कार्यवाहीउद्देश्यत्यागपत्र की स्वेच्छा व वास्तविकतादल-बदल कानून का उल्लंघनआधारअनुच्छेद 190(3)(b)दसवीं अनुसूची (अनुच्छेद 191(2))न्यायिक समीक्षासीमित (केवल स्वेच्छा व वास्तविकता)अर्द्ध-न्यायिक (न्यायिक समीक्षा के अधीअध्यक्ष की भूमिकात्यागपत्र स्वीकार/अस्वीकारनिरर्हता याचिका का निपटारानिष्कर्षत्यागपत्र स्वीकार होने से निरर्हता कारनिरर्हता कार्यवाही जारी रह सकती है
त्यागपत्र स्वीकृति बनाम निरर्हता कार्यवाही

✎ त्यागपत्र की स्वीकृति (अनुच्छेद 190(3)(b)) और निरर्हता की कार्यवाही (दसवीं अनुसूची) अलग प्रक्रियाएँ हैं; अध्यक्ष केवल त्यागपत्र के स्वैच्छिक और वास्तविक होने की सीमित जाँच करते हैं, और निरर्हता पर समयबद्ध निर्णय के लिए अनुच्छेद…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: दसवीं अनुसूची, विधानमंडल के पीठासीन अधिकारी की भूमिका  |  GS Paper II — न्यायपालिका: अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट अधिकारिता और न्यायिक समीक्षा  |  GS Paper II — शक्तियों का पृथक्करण तथा विधायिका-न्यायपालिका संबंध  |  GS Paper II — चुनाव सुधार: उपचुनाव और त्यागपत्र देकर पुनः चुनाव लड़ने की प्रवृत्ति
  • Prelims: दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule), अनुच्छेद 190(3)(b) — त्यागपत्र, अनुच्छेद 191(2), अनुच्छेद 226 और परमादेश (Mandamus), सचेतक (Whip) की अवज्ञा, किहोतो होलोहन बनाम ज़चिल्हु (1992), केशम मेघचंद्र सिंह बनाम अध्यक्ष, मणिपुर विधानसभा (2020), श्रीमंत बालासाहेब पाटिल बनाम अध्यक्ष, कर्नाटक विधानसभा (2019), 91वाँ संविधान संशोधन, 2003, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151A
  • Essay: दल-बदल विरोधी कानून: स्थिर सरकार और विधायक की अंतरात्मा के बीच संतुलन, विधायिका की स्वायत्तता और न्यायिक समीक्षा: संवैधानिक संस्थाओं के बीच शक्ति-संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: त्यागपत्र की स्वीकृति (अनुच्छेद 190(3)(b)) और निरर्हता की कार्यवाही (दसवीं अनुसूची) अलग प्रक्रियाएँ हैं; अध्यक्ष केवल त्यागपत्र के स्वैच्छिक और वास्तविक होने की सीमित जाँच करते हैं, और निरर्हता पर समयबद्ध निर्णय के लिए अनुच्छेद 226 के तहत परमादेश जारी हो सकता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

मद्रास उच्च न्यायालय की प्रथम खंडपीठ (मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन) ने तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष के उस निर्णय को वैध ठहराया, जिसमें उन्होंने 26 मई 2026 से 29 जून 2026 के बीच AIADMK के छह विधायकों द्वारा दिए गए त्यागपत्र स्वीकार किए थे। ये विधायक बाद में सत्तारूढ़ TVK में शामिल हो गए। न्यायालय ने माना कि त्यागपत्र वास्तविक और स्वैच्छिक थे। साथ ही उसने कहा कि त्यागपत्र की स्वीकृति और निरर्हता की कार्यवाही दो अलग संवैधानिक प्रक्रियाएँ हैं। इसलिए छह में से चार विधायकों के विरुद्ध लंबित निरर्हता कार्यवाही त्यागपत्र स्वीकार होने से निष्प्रभावी नहीं होती। न्यायालय ने परमादेश (Mandamus) जारी कर अध्यक्ष को दो माह में यह कार्यवाही पूरी करने का निर्देश दिया। यह कार्यवाही मई 2026 में मुख्यमंत्री द्वारा रखे गए विश्वास प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान करने के सचेतक (Whip) के निर्देश के कथित उल्लंघन से संबंधित है।

पृष्ठभूमि

  • संविधान के अनुच्छेद 190(3)(b) के अनुसार राज्य विधानमंडल का सदस्य अध्यक्ष को संबोधित लिखित त्यागपत्र देकर अपना स्थान त्याग सकता है। इसके परंतुक के अनुसार यदि अध्यक्ष को लगे कि त्यागपत्र स्वैच्छिक या वास्तविक नहीं है, तो वह उसे स्वीकार नहीं करेगा।
  • 1985 के 52वें संविधान संशोधन से जोड़ी गई दसवीं अनुसूची दल-बदल के आधार पर निरर्हता का प्रावधान करती है। इसके अनुच्छेद 191(2) से राज्य विधानमंडल के सदस्यों पर यह लागू होती है। इसका उद्देश्य राजनीतिक दल-बदल की बुराई रोककर शासन में स्थिरता लाना है।
  • किहोतो होलोहन बनाम ज़चिल्हु (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने दसवीं अनुसूची की वैधता बरकरार रखी। उसने कहा कि निरर्हता पर अध्यक्ष का निर्णय अर्द्ध-न्यायिक (न्यायाधिकरण के रूप में) है और न्यायिक समीक्षा के अधीन है, पर यह समीक्षा सीमित है।
  • केशम मेघचंद्र सिंह (2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अध्यक्ष को निरर्हता याचिकाओं का निपटारा सामान्यतः तीन माह के भीतर करना चाहिए। उसने संसद से यह भी कहा कि वह निरर्हता के निर्णय का दायित्व किसी स्वतंत्र प्राधिकरण को सौंपने पर विचार करे।
  • श्रीमंत बालासाहेब पाटिल (2019) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि त्यागपत्र पर अध्यक्ष की जाँच केवल इस बात तक सीमित है कि वह स्वैच्छिक और वास्तविक है या नहीं। निरर्हित सदस्य शेष कार्यकाल के लिए चुनाव लड़ने से वंचित नहीं होते, जब तक कानून में ऐसा प्रावधान न हो।
  • त्यागपत्र देकर उसी या दूसरे दल से उपचुनाव लड़ने की प्रवृत्ति दल-बदल कानून को दरकिनार करने का एक मार्ग मानी जाती है। इसे रोकने के लिए अलग कानून बनाना संसद का विषय है, जैसा इस मामले में न्यायालय ने भी संकेत दिया।

दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) क्या है?

  • दसवीं अनुसूची 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ी गई। यह संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की निरर्हता के लिए आधार और प्रक्रिया निर्धारित करती है।
  • निरर्हता के मुख्य आधार: (क) पैराग्राफ 2(1)(क) के अनुसार सदस्य द्वारा स्वेच्छा से अपने दल की सदस्यता छोड़ना; (ख) पैराग्राफ 2(1)(ख) के अनुसार दल के सचेतक (Whip) के निर्देश के विरुद्ध मतदान करना या मतदान से अनुपस्थित रहना, जब तक दल ने 15 दिन के भीतर उसे क्षमा न कर दिया हो।
  • निर्दलीय सदस्य चुनाव के बाद किसी दल में शामिल होने पर और मनोनीत सदस्य सदन में स्थान ग्रहण करने के 6 माह बाद किसी दल में शामिल होने पर निरर्हित हो जाते हैं।
  • अपवाद के रूप में पैराग्राफ 4 के तहत किसी दल का दूसरे दल में विलय तब मान्य है, जब मूल दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य विलय के लिए सहमत हों। 91वें संशोधन (2003) ने एक-तिहाई सदस्यों के विभाजन वाला अपवाद समाप्त कर दिया।
  • पैराग्राफ 6 के अनुसार निरर्हता का निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) करते हैं। किहोतो होलोहन (1992) में पैराग्राफ 7 को, जो न्यायालयों का क्षेत्राधिकार बाधित करता था, अमान्य घोषित किया गया। अतः अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
  • इस मामले में न्यायालय का मुख्य निष्कर्ष यह है कि त्यागपत्र की स्वीकृति (अनुच्छेद 190) और निरर्हता की कार्यवाही (दसवीं अनुसूची) अलग प्रक्रियाएँ हैं। त्यागपत्र के बाद भी अध्यक्ष निरर्हता पर निर्णय दे सकते हैं और उसके परिणाम दसवीं अनुसूची के अनुसार लागू होंगे।
  • अनुच्छेद 164(1ख) के अनुसार दल-बदल के आधार पर निरर्हित सदस्य मंत्री पद के लिए तब तक अयोग्य रहता है, जब तक उसका कार्यकाल पूरा न हो या वह पुनः निर्वाचित न हो जाए। इसी कारण निरर्हता की कार्यवाही का निपटारा आवश्यक रहता है।
  • अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय अध्यक्ष द्वारा अनुचित विलंब की स्थिति में परमादेश जारी कर समयबद्ध निर्णय का निर्देश दे सकता है। यह निर्णय सुधार की न्यायिक पहल के साथ विधायिका की स्वायत्तता के सम्मान का उदाहरण भी है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
त्यागपत्र और निरर्हता की कार्यवाही अलग-अलग संवैधानिक प्रक्रियाएँ न्यायालय ने कहा कि त्यागपत्र स्वीकार करना (अनुच्छेद 190(3)(b)) और दसवीं अनुसूची के अंतर्गत निरर्हता (Disqualification) तय करना भिन्न प्रक्रियाएँ हैं। इसलिए लंबित निरर्हता याचिका के बावजूद अध्यक्ष त्यागपत्र स्वीकार करने में सक्षम है।
अध्यक्ष की सीमित जाँच त्यागपत्र के पीछे के उद्देश्य की विस्तृत या खोजपरक जाँच आवश्यक नहीं है। अध्यक्ष को केवल यह देखना है कि त्यागपत्र स्वैच्छिक और वास्तविक है या नहीं।
निरर्हता कार्यवाही निष्प्रभावी नहीं होगी त्यागपत्र स्वीकार होने के बाद भी अध्यक्ष व्हिप-उल्लंघन के आधार पर निरर्हता का निर्णय कर सकता है। उसके परिणाम दसवीं अनुसूची के अनुसार लागू होंगे, जैसे अनुच्छेद 361B के अंतर्गत लाभ के राजनीतिक पद पर रोक।
अनुच्छेद 226 के अंतर्गत न्यायिक हस्तक्षेप अध्यक्ष यदि उचित समय में निरर्हता का निर्णय नहीं करता, तो उच्च न्यायालय रिट अधिकारिता का प्रयोग कर सकता है। इससे अध्यक्ष के विलंब पर न्यायिक नियंत्रण की पुष्टि होती है।
समयबद्ध परमादेश (Mandamus) चार विधायकों के विरुद्ध लंबित निरर्हता कार्यवाही 2 माह में पूरी करने का निर्देश दिया गया। यह कीहोतो होलोहन (1992) और केशम मेघचंद्र सिंह (2020) के निर्णयों की श्रृंखला में आता है।
विधायिका के लिए संकेत समाचार के अनुसार न्यायालय ने कहा कि त्यागपत्र देकर उपचुनाव में पुनः लड़ने वाले विधायकों के विरुद्ध कानून बनाना संसद का कार्य है। यह न्यायपालिका और विधायिका के बीच कार्य-विभाजन को दर्शाता है।

महत्व

संवैधानिक एवं विधिक महत्त्व

  • निर्णय स्पष्ट करता है कि अनुच्छेद 190(3)(b) के अंतर्गत त्यागपत्र की जाँच का दायरा सीमित है। अध्यक्ष केवल स्वैच्छिकता और वास्तविकता देखता है।
  • यह शक्तियों के पृथक्करण का संतुलन दर्शाता है। अध्यक्ष के निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं, पर विधायिका का क्षेत्र न्यायालय द्वारा अनावश्यक रूप से नहीं लिया गया।
  • निरर्हता कार्यवाही को जीवित रखकर न्यायालय ने दसवीं अनुसूची के प्रभाव को त्यागपत्र के रास्ते से कमज़ोर होने से बचाया।

लोकतांत्रिक एवं शासन संबंधी महत्त्व

  • समयबद्ध निर्देश से अध्यक्ष के न्यायाधिकरण-रूप में लंबे विलंब की प्रवृत्ति पर अंकुश लगता है।
  • विधायकों के निर्णय की स्वतंत्रता और दल-अनुशासन के बीच संतुलन का प्रश्न सामने आता है।
  • मतदाताओं को अपने प्रतिनिधि की स्थिति पर शीघ्र स्पष्टता मिलती है, जिससे प्रतिनिधित्व की निरंतरता बनी रहती है।

संघीय एवं संस्थागत महत्त्व

  • विधान सभा अध्यक्ष का पद दलगत संबद्धता के बावजूद निष्पक्ष न्यायनिर्णायक की अपेक्षा रखता है। न्यायालय का आदेश इस जवाबदेही को रेखांकित करता है।
  • उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता राज्य स्तर पर संवैधानिक नियंत्रण का प्रभावी साधन सिद्ध होती है।
  • भारत निर्वाचन आयोग के उपचुनाव संबंधी दायित्व और लंबित वाद के बीच तालमेल की आवश्यकता उभरती है।

चुनौतियाँ

1. अध्यक्ष की निष्पक्षता पर प्रश्न

  • अध्यक्ष सामान्यतः किसी राजनीतिक दल से निर्वाचित होता है, इसलिए निरर्हता तय करते समय हितों के टकराव की आशंका रहती है।
  • निर्णयों के समय और स्वरूप से दलगत पक्षपात की धारणा बन सकती है।

2. निरर्हता निर्णय में विलंब

  • दसवीं अनुसूची में निर्णय की कोई समय-सीमा नहीं है। अनेक मामलों में विधानसभा का कार्यकाल बीत जाने तक निर्णय लंबित रहता है।
  • केशम मेघचंद्र सिंह (2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने सामान्यतः 3 माह में निर्णय की अपेक्षा की थी, फिर भी विलंब बना रहता है।

3. त्यागपत्र के माध्यम से दल-बदल कानून को निष्प्रभावी करने की संभावना

  • विधायक निरर्हता से बचने के लिए त्यागपत्र देकर नए दल से उपचुनाव लड़ सकते हैं, जिससे दसवीं अनुसूची की भावना कमज़ोर पड़ती है।
  • स्वैच्छिकता की सीमित जाँच के कारण दबाव या प्रलोभन का पता लगाना कठिन होता है।

4. विधायी कार्यवाही में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा

  • अनुच्छेद 212 विधायी कार्यवाही की न्यायालय में जाँच से सुरक्षा देता है, पर कीहोतो होलोहन के अनुसार अध्यक्ष का निरर्हता निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
  • अत्यधिक हस्तक्षेप से शक्तियों के पृथक्करण पर आँच आ सकती है, जबकि अपर्याप्त हस्तक्षेप से अध्यक्ष की मनमानी बढ़ सकती है।

5. उपचुनाव का व्यय एवं प्रतिनिधित्व में रिक्तता

  • त्यागपत्र से रिक्त हुए निर्वाचन क्षेत्रों में उपचुनाव कराने पर सार्वजनिक धन का व्यय होता है।
  • रिक्ति के दौरान संबंधित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व अधूरा रहता है।

6. दसवीं अनुसूची के प्रावधानों की अस्पष्टता

  • ‘स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना’ जैसे पदों की व्याख्या अलग-अलग मामलों में भिन्न होती रही है।
  • व्हिप-उल्लंघन और त्यागपत्र की परस्पर क्रिया पर स्पष्ट विधिक ढाँचा नहीं है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
अध्यक्ष की दोहरी भूमिका दलीय पृष्ठभूमि वाला पदाधिकारी अर्ध-न्यायिक निर्णय करता है, जिससे निष्पक्षता पर संदेह उठता है।
निर्णय में विलंब समय-सीमा न होने से निर्णय का प्रभाव कार्यकाल बीतने के बाद शून्य हो सकता है।
त्यागपत्र और पुनः चुनाव निरर्हता के परिणामों से बचने का वैकल्पिक मार्ग बनने की आशंका है।
स्वैच्छिकता की जाँच सीमित जाँच से दबाव या प्रलोभन का पता नहीं चलता।
न्यायिक समीक्षा की सीमा हस्तक्षेप की मात्रा पर विधायिका की स्वायत्तता और जवाबदेही के बीच तनाव रहता है।
उपचुनाव का बोझ बार-बार रिक्तियों से चुनावी व्यय और प्रशासनिक भार बढ़ता है।

आगे की राह

  • दसवीं अनुसूची के अंतर्गत निरर्हता याचिकाओं के निर्णय के लिए विधिक रूप से निश्चित समय-सीमा (जैसे 3 माह) निर्धारित की जाए।
  • निरर्हता का निर्णय अध्यक्ष के स्थान पर किसी स्वतंत्र न्यायाधिकरण या भारत निर्वाचन आयोग को सौंपने पर विचार हो, जैसा दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट ने सुझाया था।
  • त्यागपत्र देकर उसी कार्यकाल में पुनः चुनाव लड़ने वाले सदस्यों के लिए संसद कानून बनाकर उचित प्रतिबंध या शर्तें तय करे।
  • अनुच्छेद 190(3)(b) के अंतर्गत स्वैच्छिकता की जाँच के लिए पारदर्शी लिखित प्रक्रिया और कारण दर्ज करने की व्यवस्था हो।
  • अध्यक्ष के पद की निष्पक्षता के लिए ब्रिटेन की संसदीय परंपरा के अनुरूप दलगत गतिविधियों से दूरी की स्वस्थ परिपाटी विकसित की जाए।
  • व्हिप का प्रयोग केवल सरकार के अस्तित्व से जुड़े मतों (अविश्वास/विश्वास प्रस्ताव, धन विधेयक) तक सीमित करने के सुझाव पर विचार हो।
  • उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत विलंब के मामलों में समयबद्ध निर्देश देने की परिपाटी बनाए रखें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) और दल-परिवर्तन विरोधी कानून · अनुच्छेद 190(3)(ख): त्यागपत्र का स्वैच्छिक और वास्तविक होना · अध्यक्ष की अर्ध-न्यायिक भूमिका और निष्पक्षता · न्यायिक समीक्षा (किहोटो होलोहान, 1992) · अनुच्छेद 226 के अंतर्गत परमादेश (Mandamus) रिट · निर्णय में युक्तियुक्त समय (केशम मेघचंद्र सिंह, 2020) · त्यागपत्र और अयोग्यता की पृथक संवैधानिक प्रक्रियाएँ · त्यागपत्र देकर उपचुनाव लड़ने की प्रवृत्ति · स्वतंत्र अधिकरण/निर्वाचन आयोग द्वारा अयोग्यता-निर्णय का सुधार-प्रस्ताव · जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151क (उपचुनाव) · विधायिका की कार्यवाही में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा (अनुच्छेद 212) · 91वाँ संविधान संशोधन, 2003

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 190(3)(b) — विधायक का त्यागपत्र और अध्यक्ष की संतुष्टि
  • अनुच्छेद 191(2) — दसवीं अनुसूची के आधार पर निरर्हता
  • दसवीं अनुसूची — दल-बदल विरोधी प्रावधान, व्हिप-उल्लंघन
  • अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता
  • अनुच्छेद 212 — विधायी कार्यवाही में न्यायालय का सीमित हस्तक्षेप
  • अनुच्छेद 361B — निरर्ह सदस्य पर लाभ के राजनीतिक पद की रोक
  • अनुच्छेद 178 — विधान सभा अध्यक्ष का पद

अवधारणा प्रवाह

सदन में विश्वास प्रस्ताव पर दल द्वारा व्हिप जारी किया गया  →  कुछ विधायकों पर व्हिप-उल्लंघन के आधार पर निरर्हता याचिका दायर हुई  →  इसी बीच छह विधायकों ने त्यागपत्र दिए और अध्यक्ष ने सीमित जाँच कर उन्हें स्वीकार किया  →  याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 226 के अंतर्गत स्वीकृति की अधिसूचनाओं को चुनौती दी  →  उच्च न्यायालय ने त्यागपत्र को स्वैच्छिक और वास्तविक मानकर स्वीकृति वैध ठहराया  →  निरर्हता कार्यवाही को निष्प्रभावी न मानते हुए चार विधायकों के मामले में 2 माह की समय-सीमा तय की  →  अब अध्यक्ष के अंतिम निर्णय से दसवीं अनुसूची के परिणाम तय होंगे

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. दल-परिवर्तन विरोधी कानून और विधायकों के त्यागपत्र के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 190(3)(ख) के अनुसार, यदि विधानमंडल के सदस्य का त्यागपत्र स्वैच्छिक या वास्तविक नहीं है, तो अध्यक्ष को उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
2. दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अध्यक्ष के अयोग्यता-संबंधी निर्णय न्यायिक समीक्षा से पूर्णतः मुक्त हैं।
3. दसवीं अनुसूची के अनुसार, दल के सचेतक (व्हिप) के विपरीत मतदान करने वाले सदस्य को अयोग्य नहीं ठहराया जाता, यदि दल ने उस कार्य को 15 दिन के भीतर क्षमा कर दिया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 190(3) का परंतुक अध्यक्ष को अस्वैच्छिक या अवास्तविक त्यागपत्र अस्वीकार करने का निर्देश देता है। कथन 2 गलत है: किहोटो होलोहान (1992) में पैराग्राफ 7 का अपवर्जन-खंड रद्द हुआ और अध्यक्ष का निर्णय सीमित आधारों पर न्यायिक समीक्षा के अधीन माना गया। कथन 3 सही है: पैराग्राफ 2(1)(ख) के अनुसार पूर्व अनुमति के बिना सचेतक के विरुद्ध मतदान अयोग्यता का आधार है, पर 15 दिन में क्षमा कर देने पर अयोग्यता नहीं होती।

Q2. अभिकथन (A): दसवीं अनुसूची के अंतर्गत विधानसभा अध्यक्ष द्वारा दिया गया अयोग्यता-संबंधी निर्णय उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय की न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
कारण (R): किहोटो होलोहान बनाम ज़चिल्हू (1992) में उच्चतम न्यायालय ने अध्यक्ष को इस कार्य में अधिकरण के रूप में कार्य करने वाला माना और पैराग्राफ 7 को अनुसमर्थन के अभाव में अमान्य घोषित किया।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, परंतु R गलत है
  4. A गलत है, परंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — किहोटो होलोहान (1992) में पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने दसवीं अनुसूची को वैध ठहराया, पर पैराग्राफ 7 को अनुच्छेद 368(2) के अंतर्गत आधे राज्यों के अनुसमर्थन के अभाव में अमान्य घोषित किया। अध्यक्ष अधिकरण के रूप में कार्य करता है, इसलिए उसका निर्णय क्षेत्राधिकार-त्रुटि, दुर्भावना, विकृति और संवैधानिक आदेश के उल्लंघन जैसे आधारों पर समीक्षा योग्य है। इसलिए R, A की सही व्याख्या है।

Q3. किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अध्यक्ष को अयोग्यता-याचिकाओं का निर्णय सामान्यतः तीन माह के भीतर करना चाहिए और संसद से अयोग्यता-निर्णय हेतु स्वतंत्र स्थायी अधिकरण पर विचार करने का आग्रह किया?

  1. किहोटो होलोहान बनाम ज़चिल्हू (1992)
  2. केशम मेघचंद्र सिंह बनाम अध्यक्ष, मणिपुर विधानसभा (2020)
  3. एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)
  4. रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994)

उत्तर: केशम मेघचंद्र सिंह बनाम अध्यक्ष, मणिपुर विधानसभा (2020) — केशम मेघचंद्र सिंह (2020) में न्यायालय ने अध्यक्ष के निर्णय में विलंब को लोकतंत्र के लिए हानिकारक माना और सामान्यतः तीन माह की सीमा बताई। साथ ही संसद से सेवानिवृत्त उच्चतम/उच्च न्यायालय न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले स्थायी अधिकरण पर विचार करने का आग्रह किया। किहोटो में अध्यक्ष की अधिकरण-भूमिका और समीक्षा का प्रश्न था; बोम्मई अनुच्छेद 356 से संबंधित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ “त्यागपत्र का मार्ग दल-परिवर्तन विरोधी कानून को निष्प्रभावी करने का साधन बनता जा रहा है और अध्यक्ष की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।” हाल की न्यायिक व्याख्याओं के संदर्भ में अनुच्छेद 190(3)(ख), दसवीं अनुसूची और न्यायिक समीक्षा के पारस्परिक संबंध का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि अध्यक्ष द्वारा अयोग्यता-याचिकाओं के निपटारे में विलंब होने पर न्यायालय क्या उपाय कर सकता है। (15 Marks)

रूपरेखा: भूमिका (about 30 शब्द): मद्रास उच्च न्यायालय का निर्णय। न्यायालय ने 6 विधायकों के त्यागपत्र की स्वीकृति को वैध माना, क्योंकि वे स्वैच्छिक और वास्तविक थे। साथ ही अध्यक्ष को चार विधायकों की लंबित अयोग्यता-कार्यवाही दो माह में पूरी करने का परमादेश दिया।

खंड 1, संवैधानिक ढाँचा: (i) अनुच्छेद 190(3)(ख) के अनुसार त्यागपत्र लिखित हो और अध्यक्ष स्वैच्छिकता व वास्तविकता से संतुष्ट हो; (ii) अनुच्छेद 191(2) और दसवीं अनुसूची (52वाँ संशोधन, 1985) में पैराग्राफ 2(1)(क) ‘स्वेच्छा से सदस्यता त्यागना’ और 2(1)(ख) सचेतक का उल्लंघन; (iii) 91वाँ संशोधन, 2003 ने विभाजन-अपवाद हटाया और मंत्रिपरिषद का आकार 15 प्रतिशत तक सीमित किया; (iv) जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151क के तहत उपचुनाव।

खंड 2, न्यायिक व्याख्या: (i) किहोटो होलोहान (1992): अध्यक्ष अधिकरण के रूप में कार्य करता है, पैराग्राफ 7 अमान्य, समीक्षा सीमित आधारों पर; (ii) श्रीमंत बालासाहेब पाटिल (2019): अध्यक्ष की जाँच त्यागपत्र की स्वैच्छिकता और वास्तविकता तक सीमित, अयोग्य ठहराए गए सदस्य पर उपचुनाव लड़ने की रोक नहीं; (iii) मद्रास उच्च न्यायालय: त्यागपत्र की स्वीकृति और अयोग्यता पृथक प्रक्रियाएँ हैं, इसलिए त्यागपत्र से अयोग्यता-कार्यवाही निरर्थक नहीं होती, और अध्यक्ष को व्यापक जाँच की आवश्यकता नहीं; (iv) अनुच्छेद 212 की सीमा के बावजूद समीक्षा संभव।

खंड 3, आलोचनात्मक विश्लेषण: पक्ष में, सीमित जाँच से अध्यक्ष का अधिकार क्षेत्र स्पष्ट रहता है और अध्यक्ष किसी की इच्छा के विरुद्ध उसे सदस्य बने रहने को बाध्य नहीं करता। आलोचना में, त्यागपत्र देकर दूसरे दल से पुनः चुनाव लड़ना कानून की भावना को क्षीण करता है, उपचुनाव का सार्वजनिक व्यय बढ़ता है, और अध्यक्ष दलीय पृष्ठभूमि से आने के कारण निष्पक्षता पर संदेह रहता है।

खंड 4, विलंब पर न्यायालय के उपाय: अनुच्छेद 226 या 32 के अंतर्गत परमादेश; केशम मेघचंद्र (2020) के अनुसार सामान्यतः तीन माह, असाधारण स्थिति में ही अधिक; निर्णय अनंत काल तक लंबित रखने पर न्यायालय समय-सीमा तय कर सकता है। निर्णय के बाद सीमित समीक्षा हो सकती है।

खंड 5, सुधार: दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999) की अयोग्यता-निर्णय निर्वाचन आयोग की सलाह पर राष्ट्रपति/राज्यपाल को देने की सिफारिश; स्थायी स्वतंत्र अधिकरण (केशम मेघचंद्र); अध्यक्ष के लिए समयबद्ध नियम; त्यागपत्र देकर पुनः लड़ने वालों पर विधायी प्रतिबंध पर संसद का विचार। निष्कर्ष: संतुलित सुधार जो विधायी स्थिरता, सदस्य की स्वतंत्रता और संसदीय निष्पक्षता तीनों की रक्षा करे।

स्रोत: The Hindu

Tamil Nadu PCS (TNPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष द्वारा 6 एआईएडीएमके विधायकों के इस्तीफे स्वीकार करने के फैसले को किस उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा है?

  1. मद्रास उच्च न्यायालय
  2. सुप्रीम कोर्ट
  3. मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ
  4. तमिलनाडु राज्य मानवाधिकार आयोग

उत्तर: मद्रास उच्च न्यायालय — तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को मद्रास उच्च न्यायालय ने कानूनी रूप से वैध ठहराया है।

Mains: तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष द्वारा 6 एआईएडीएमके विधायकों के इस्तीफे स्वीकार करने के संबंध में मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय के राजनीतिक और संवैधानिक निहितार्थों पर चर्चा कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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