30 Sep महाराष्ट्र मराठवाडा: सूखे से जूझता किसानों का जल संकट, टैंकरों पर निर्भरता बढ़ी

✎ सूखा एक जटिल प्राकृतिक आपदा है जो कम वर्षा के कारण जल की कमी से उत्पन्न होती है, जिसका कृषि, अर्थव्यवस्था और समाज पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, और इसके प्रबंधन के लिए एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन तथा आपदा तैयारी आवश्यक है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत एवं विश्व का भौतिक, सामाजिक, आर्थिक भूगोल) | GS Paper III — आपदा प्रबंधन, कृषि, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
- Prelims: सूखा, मराठवाड़ा क्षेत्र, जल संकट, मानसून, फसल विफलता, जयकवाड़ी बांध, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF), मनरेगा, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY)
- Essay: भारत में जल संकट: एक बहुआयामी चुनौती और स्थायी समाधान, जलवायु परिवर्तन और कृषि पर इसके प्रभाव: भारत के लिए आगे की राह
त्वरित पुनरावृत्ति: सूखा एक जटिल प्राकृतिक आपदा है जो कम वर्षा के कारण जल की कमी से उत्पन्न होती है, जिसका कृषि, अर्थव्यवस्था और समाज पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, और इसके प्रबंधन के लिए एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन तथा आपदा तैयारी आवश्यक है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में मानसून की समाप्ति से पहले ही गंभीर सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गई है। क्षेत्र के 76 तालुकों में से 74 को सूखा प्रभावित घोषित किया गया है, और स्थानीय जल स्रोत सूखने के कारण कई गाँव पानी के टैंकरों पर निर्भर हो गए हैं। किसान अपनी फसलों और पशुधन को बचाने के लिए हजारों रुपये प्रतिदिन खर्च कर रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और खराब हो रही है।
पृष्ठभूमि
- महाराष्ट्र में इस वर्ष सामान्य से 18 प्रतिशत कम वर्षा हुई है, जबकि मराठवाड़ा क्षेत्र में 38 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। लातूर में 48 प्रतिशत और परभणी में 43 प्रतिशत की अधिक कमी देखी गई है।
- मराठवाड़ा के 76 तालुकों में से 74 को सूखा प्रभावित घोषित किया गया है, जिससे क्षेत्र में जल संकट की गंभीरता स्पष्ट होती है।
- वर्तमान में, 277 टैंकर 160 गाँवों में पानी की आपूर्ति कर रहे हैं, और अधिक गाँव टैंकरों से पानी की आपूर्ति की मांग कर रहे हैं क्योंकि स्थानीय कुएँ और जल स्रोत सूख गए हैं।
- किसानों को अपनी फसलों (जैसे अदरक, कपास, मक्का, अरहर) और पशुधन को बचाने के लिए प्रतिदिन हजारों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे उन पर भारी वित्तीय बोझ पड़ रहा है।
- राज्य प्रशासन का दावा है कि जयकवाड़ी बांध सहित प्रमुख जलाशयों में संग्रहित पानी पीने और अन्य घरेलू आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त होगा, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अलग है।
- राज्य के 358 तालुकों में से 265 में सूखा घोषित होने के बाद राहत उपायों में से एक आवश्यकतानुसार पीने के पानी के लिए टैंकरों की तैनाती है।
सूखा (Drought) क्या है?
- सूखा एक ऐसी स्थिति है जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक (आमतौर पर एक मौसम या उससे अधिक) औसत से कम वर्षा होती है, जिससे जल की कमी हो जाती है।
- यह प्राकृतिक आपदा कृषि, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और समाज पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
- सूखे को मुख्य रूप से चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है: मौसम संबंधी सूखा (Meteorological Drought), कृषि संबंधी सूखा (Agricultural Drought), जल विज्ञान संबंधी सूखा (Hydrological Drought) और सामाजिक-आर्थिक सूखा (Socio-economic Drought)।
- मौसम संबंधी सूखा तब होता है जब वर्षा सामान्य से काफी कम होती है।
- कृषि संबंधी सूखा तब होता है जब मिट्टी में नमी की कमी के कारण फसलें प्रभावित होती हैं।
- जल विज्ञान संबंधी सूखा तब होता है जब नदियों, झीलों और जलाशयों में पानी का स्तर गिर जाता है।
- सामाजिक-आर्थिक सूखा तब होता है जब जल की कमी के कारण लोगों की आजीविका और कल्याण प्रभावित होता है।
- सूखे के प्रभावों में फसल विफलता, पशुधन की हानि, पेयजल की कमी, खाद्य असुरक्षा, ग्रामीण पलायन और आर्थिक मंदी शामिल हैं।
- सूखा प्रबंधन में वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting), जल संरक्षण, कुशल सिंचाई पद्धतियाँ (जैसे ड्रिप सिंचाई), सूखा प्रतिरोधी फसलों का विकास और आपदा तैयारी योजनाएँ शामिल हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मराठवाड़ा में सूखे की स्थिति | महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के 76 में से 74 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया है, जो गंभीर जल संकट को दर्शाता है। |
| टैंकरों पर निर्भरता | मानसून समाप्त होने से पहले ही कई गाँव पानी के टैंकरों पर निर्भर हो गए हैं, जिससे स्थानीय जल स्रोतों के सूखने की समस्या उजागर होती है। |
| फसलों और पशुधन पर प्रभाव | किसान अपनी फसलों और पशुधन को बचाने के लिए प्रतिदिन हजारों रुपये खर्च कर रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर भारी दबाव पड़ रहा है। |
| कम वर्षा | महाराष्ट्र में सामान्य से 18 प्रतिशत कम और मराठवाड़ा में 38 प्रतिशत कम वर्षा हुई है, जिससे जल संकट गहरा गया है। |
| जलाशयों में जल स्तर | प्रशासन का दावा है कि प्रमुख जलाशयों में पानी पर्याप्त है, लेकिन जमीनी स्तर पर कुएँ और स्थानीय स्रोत सूख रहे हैं। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- सूखे के कारण फसलों का नुकसान किसानों की आय को सीधे प्रभावित करता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- पानी के टैंकरों पर निर्भरता किसानों के लिए अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालती है, जिससे उनकी ऋणग्रस्तता बढ़ सकती है।
- कृषि उत्पादन में कमी खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है और कृषि-आधारित उद्योगों को भी नुकसान पहुँचा सकती है।
सामाजिक महत्व
- पेयजल की कमी से ग्रामीण समुदायों के स्वास्थ्य और स्वच्छता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- महिलाओं और बच्चों को पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है, जिससे उनकी शिक्षा और अन्य गतिविधियों में बाधा आती है।
- जल संकट ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर प्रवासन को बढ़ावा दे सकता है।
पर्यावरणीय महत्व
- कम वर्षा और सूखे की स्थिति भूजल स्तर को कम करती है, जिससे दीर्घकालिक जल सुरक्षा खतरे में पड़ती है।
- पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की आवृत्ति बढ़ सकती है।
शासन और नीति महत्व
- सूखे से निपटने के लिए सरकार की आपदा प्रबंधन रणनीतियों और जल संरक्षण नीतियों की प्रभावशीलता का परीक्षण होता है।
- स्थानीय निकायों, जैसे ग्राम सभाओं, की भूमिका जल वितरण और प्रबंधन में महत्वपूर्ण हो जाती है।
- दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया जाता है।
चुनौतियाँ
1. जल संसाधनों का कुप्रबंधन
- अवैज्ञानिक तरीके से भूजल का अत्यधिक दोहन।
- सिंचाई के लिए पानी का अक्षम उपयोग और पारंपरिक जल संरक्षण विधियों की उपेक्षा।
यूपीएससी लिंक: भूगोल: जल संसाधन; शासन: आपदा प्रबंधन
2. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
- वर्षा पैटर्न में अनिश्चितता और अनियमितता, जिससे सूखे की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है।
- तापमान में वृद्धि से वाष्पीकरण दर में वृद्धि और जल उपलब्धता में कमी।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण: जलवायु परिवर्तन; भूगोल: भारतीय जलवायु
3. कृषि क्षेत्र पर दबाव
- जल-गहन फसलों की खेती और सिंचाई के लिए अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा।
- किसानों की आर्थिक भेद्यता और सूखे से निपटने के लिए सीमित संसाधन।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: कृषि; शासन: कृषि नीतियाँ
4. बुनियादी ढाँचे की कमी
- कुशल जल भंडारण और वितरण प्रणालियों का अभाव।
- सूखा-प्रवण क्षेत्रों में पर्याप्त सिंचाई सुविधाओं का विकास न होना।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: बुनियादी ढाँचा; शासन: ग्रामीण विकास
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मानसून की कमी | महाराष्ट्र में सामान्य से 18% और मराठवाड़ा में 38% कम वर्षा, जिससे जल स्रोतों में कमी। |
| स्थानीय जल स्रोतों का सूखना | कुएँ और अन्य स्थानीय जल स्रोत सूख रहे हैं, जिससे पेयजल और कृषि के लिए पानी की कमी। |
| टैंकरों पर बढ़ती निर्भरता | मानसून के दौरान भी बड़ी संख्या में गाँवों को पानी के टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। |
| किसानों पर आर्थिक बोझ | फसलों और पशुधन को बचाने के लिए किसानों को प्रतिदिन हजारों रुपये पानी के टैंकरों पर खर्च करने पड़ रहे हैं। |
| फसल का नुकसान | कपास, मक्का, अरहर और अदरक जैसी फसलें पानी की कमी के कारण खराब हो रही हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान हो रहा है। |
| जलाशयों में पानी का प्रबंधन | प्रशासन द्वारा जलाशयों में पर्याप्त पानी होने का दावा, लेकिन जमीनी स्तर पर वितरण और पहुँच की समस्या। |
आगे की राह
- जल संचयन और संरक्षण को बढ़ावा देना: वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) संरचनाओं का निर्माण और पारंपरिक जल निकायों का पुनरुद्धार।
- सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) प्रणालियों को अपनाना: ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देना ताकि पानी का कुशल उपयोग हो सके।
- फसल विविधीकरण (Crop Diversification): कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित करना।
- भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge): भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए कृत्रिम पुनर्भरण तकनीकों का उपयोग।
- जल प्रबंधन नीतियों का सुदृढ़ीकरण: एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (Integrated Water Resource Management) योजनाएँ बनाना और उनका प्रभावी क्रियान्वयन।
- जलवायु-स्मार्ट कृषि (Climate-smart Agriculture) पद्धतियों को अपनाना: किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल बनाने वाली तकनीकों का प्रशिक्षण देना।
- समुदाय आधारित जल प्रबंधन: स्थानीय समुदायों और ग्राम सभाओं को जल संसाधनों के प्रबंधन में सशक्त बनाना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सूखा प्रबंधन · जल संकट · मानसून की कमी · कृषि पर प्रभाव · ग्रामीण आजीविका · जल संरक्षण · सूखा राहत उपाय · जलवायु परिवर्तन · जल सुरक्षा · स्थानीय जल स्रोत · मराठवाड़ा क्षेत्र · टैंकर द्वारा जलापूर्ति
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार (स्वच्छ पानी तक पहुँच जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग है)।
- अनुच्छेद 47: पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊपर उठाना तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करना (स्वच्छ जल की उपलब्धता लोक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है)।
- अनुच्छेद 243G: पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व (पंचायतों को जल प्रबंधन में भूमिका निभाने का अधिकार)।
- अनुच्छेद 243W: नगरपालिकाओं की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व (शहरी क्षेत्रों में जल आपूर्ति और स्वच्छता सुनिश्चित करना)।
अवधारणा प्रवाह
कम वर्षा → भूजल स्तर में गिरावट → स्थानीय जल स्रोतों का सूखना → कृषि और पेयजल संकट → किसानों पर आर्थिक बोझ → सूखे की घोषणा और टैंकरों पर निर्भरता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में सूखे की घोषणा केवल भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा की जाती है।
2. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) सूखा प्रबंधन के लिए दिशानिर्देश जारी करता है।
3. सूखा प्रभावित क्षेत्रों में किसानों को फसल बीमा योजना का लाभ मिल सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि सूखे की घोषणा राज्य सरकारें करती हैं, हालांकि IMD डेटा महत्वपूर्ण होता है। कथन 2 सही है, NDMA आपदा प्रबंधन के लिए दिशानिर्देश जारी करता है जिसमें सूखा भी शामिल है। कथन 3 सही है, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) जैसी योजनाएं सूखा प्रभावित किसानों को लाभ प्रदान करती हैं।
Q2. भारत में ‘सूखा’ (Drought) शब्द को परिभाषित करने के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा मानदंड आमतौर पर उपयोग किया जाता है?
- किसी क्षेत्र में लगातार तीन वर्षों तक सामान्य से कम वर्षा होना।
- किसी क्षेत्र में सामान्य से 25% या अधिक वर्षा की कमी।
- किसी क्षेत्र में भूजल स्तर का 50% से अधिक गिर जाना।
- किसी क्षेत्र में कृषि उत्पादन में 75% से अधिक की गिरावट।
उत्तर: किसी क्षेत्र में सामान्य से 25% या अधिक वर्षा की कमी। — भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में सामान्य से 25% या अधिक वर्षा की कमी होती है, तो उसे सूखे की स्थिति माना जा सकता है। यह एक प्रमुख मानदंड है, हालांकि अन्य सामाजिक-आर्थिक कारक भी देखे जाते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में सूखा एक आवर्ती समस्या है, जिसके सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय परिणाम गंभीर होते हैं। सूखे के कारणों और प्रभावों का विश्लेषण कीजिए। साथ ही, इसके शमन और प्रबंधन के लिए सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदमों पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: सूखे की संक्षिप्त परिभाषा और भारत में इसकी आवर्ती प्रकृति का उल्लेख।
2. सूखे के कारण:
– प्राकृतिक कारण: मानसून की अनिश्चितता, वर्षा में क्षेत्रीय और सामयिक भिन्नता, अल नीनो (El Niño) जैसी वैश्विक जलवायु घटनाएँ, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव।
– मानवजनित कारण: वनों की कटाई, अत्यधिक भूजल दोहन, जल निकायों का अतिक्रमण, अनुपयुक्त कृषि पद्धतियाँ।
3. सूखे के प्रभाव:
– कृषि पर: फसल बर्बादी, आय में कमी, खाद्य असुरक्षा, पशुधन हानि।
– सामाजिक-आर्थिक: ग्रामीण आजीविका का नुकसान, पलायन, जलजनित रोग, गरीबी में वृद्धि।
– पर्यावरणीय: भूजल स्तर में गिरावट, मृदा अपरदन, जैव विविधता का नुकसान, मरुस्थलीकरण।
4. सूखे के शमन और प्रबंधन के लिए सरकारी कदम:
– जल संरक्षण: मनरेगा (MGNREGA) के तहत जल संचयन संरचनाएँ, अटल भूजल योजना, जल शक्ति अभियान।
– कृषि सहायता: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), सूखा राहत पैकेज।
– जल आपूर्ति: टैंकरों द्वारा जलापूर्ति, पेयजल परियोजनाओं का क्रियान्वयन।
– दीर्घकालिक उपाय: नदी जोड़ो परियोजना, सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर), वर्षा जल संचयन को बढ़ावा।
– संस्थागत ढाँचा: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA)।
5. निष्कर्ष: सूखे के स्थायी समाधान के लिए एकीकृत दृष्टिकोण, सामुदायिक भागीदारी और जलवायु अनुकूलन रणनीतियों के महत्व पर बल।
स्रोत: The Indian Express
Maharashtra PCS (MPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: महाराष्ट्रातील मराठवाडा विभागातील सध्याच्या दुष्काळाच्या पार्श्वभूमीवर, खालीलपैकी कोणते कारण सर्वात प्रमुख आहे ज्यामुळे पाणी टँकरवर अवलंबून राहावे लागत आहे?
- अ. अपुरे पर्जन्यमान आणि भूजल पातळीत झालेली मोठी घट
- ब. राज्यातील नद्यांमध्ये वाढलेले प्रदूषण
- क. शेतीसाठी पाण्याचा अतिवापर आणि औद्योगिक क्षेत्राला प्राधान्य
- ड. राज्य सरकारने पाणी वापरावर कठोर नियम लागू केले आहेत
उत्तर: अ. अपुरे पर्जन्यमान आणि भूजल पातळीत झालेली मोठी घट — मराठवाड्यातील भूजल पातळीत मोठी घट झाल्याने आणि अपुरे पर्जन्यमानामुळे जलस्रोत कोरडे पडले आहेत, परिणामी टँकरवर अवलंबून राहावे लागत आहे.
Mains: महाराष्ट्रातील मराठवाडा विभागातील सध्याच्या दुष्काळाच्या परिस्थितीचे विश्लेषण करा. या परिस्थितीमध्ये जलस्रोतांचे व्यवस्थापन आणि शाश्वत पाणीपुरवठा सुनिश्चित करण्यासाठी राज्य सरकारने कोणत्या उपाययोजना राबवाव्यात? तुमचे उत्तर महाराष्ट्राच्या संदर्भात द्या.
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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