महाराष्ट्र में मानसून की असामयिक वापसी: 21 जिलों में बारिश की कमी

महाराष्ट्र में मानसून की असामयिक वापसी: 21 जिलों में बारिश की कमी

महाराष्ट्र में मानसून की असामयिक वापसी: 21 जिलों में बारिश की कमी

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महाराष्ट्र मानसून वापसी प्रक्रिया

✎ अल नीनो के प्रभाव में महाराष्ट्र से मानसून की समय से पहले वापसी हुई है, जिससे राज्य के कई जिलों में वर्षा की कमी दर्ज की गई है, हालांकि IMD की परिभाषा के अनुसार कुल वर्षा 'सामान्य' श्रेणी में है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (भारत एवं विश्व का भौतिक, सामाजिक, आर्थिक भूगोल)  |  GS Paper III — पर्यावरण एवं आपदा प्रबंधन
  • Prelims: अल नीनो, ला नीना, भारतीय मानसून, IMD, मानसून की वापसी, वर्षा की कमी, जलवायु परिवर्तन, सूखा
  • Essay: जलवायु परिवर्तन के भारत पर प्रभाव, कृषि और जल सुरक्षा: चुनौतियाँ और समाधान

त्वरित पुनरावृत्ति: अल नीनो के प्रभाव में महाराष्ट्र से मानसून की समय से पहले वापसी हुई है, जिससे राज्य के कई जिलों में वर्षा की कमी दर्ज की गई है, हालांकि IMD की परिभाषा के अनुसार कुल वर्षा ‘सामान्य’ श्रेणी में है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने महाराष्ट्र से दक्षिण-पश्चिम मानसून की समय से पहले वापसी की घोषणा की है। इस वर्ष, 21 जिलों में वर्षा की कमी दर्ज की गई है, जबकि राज्य में कुल वर्षा मौसमी औसत से 19 प्रतिशत कम रही। यह स्थिति अल नीनो (El-Niño) जलवायु पैटर्न के तीव्र होने के बीच आई है, जिसने राज्य भर में अपर्याप्त वर्षा में योगदान दिया है।

पृष्ठभूमि

  • भारतीय मानसून की वापसी सामान्यतः 7 से 10 अक्टूबर के बीच होती है, लेकिन इस वर्ष यह पिछले चार वर्षों में सबसे पहले हुई है।
  • IMD के अनुसार, 1 जून से 30 सितंबर के बीच महाराष्ट्र में वास्तविक औसत वर्षा 804.4 मिमी दर्ज की गई, जबकि मौसमी औसत 994.5 मिमी है, जो 19 प्रतिशत की कमी दर्शाता है।
  • IMD की परिभाषा के अनुसार, वर्षा ऋतु को ‘घाटे वाली’ (deficit) तभी घोषित किया जाता है जब कमी 20 प्रतिशत या उससे अधिक हो। इस कारण, 19 प्रतिशत की कमी के बावजूद इसे ‘सामान्य’ वर्षा माना गया है।
  • राज्य भर में वर्षा का वितरण असमान रहा है; जहाँ नासिक और पालघर में अधिक वर्षा हुई, वहीं अहमदनगर और सोलापुर जैसे पड़ोसी जिलों में कमी दर्ज की गई।
  • मुंबई में भी वर्षा का पैटर्न असंगत रहा, जुलाई में अत्यधिक वर्षा ने कुल मौसमी औसत को बढ़ा दिया, जबकि अन्य महीनों में कमी रही।
  • अल नीनो एक आवधिक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि से जुड़ी है और अक्सर भारत में कमजोर मानसून का कारण बनती है।

अल नीनो और भारतीय मानसून

  • अल नीनो एक जटिल मौसम पैटर्न है जो पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से चिह्नित होता है।
  • यह घटना ‘अल नीनो-दक्षिणी दोलन’ (ENSO) चक्र का गर्म चरण है, जबकि ला नीना (La Niña) इसका ठंडा चरण है।
  • अल नीनो आमतौर पर हर 2 से 7 साल में होता है और 9 से 12 महीने तक रहता है, लेकिन कभी-कभी यह कई वर्षों तक भी चल सकता है।
  • भारत में, अल नीनो का प्रभाव अक्सर दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करता है, जिससे कम वर्षा और सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
  • यह समुद्री सतह के तापमान और वायुमंडलीय दबाव पैटर्न को प्रभावित करके मानसून परिसंचरण को बाधित करता है।
  • कम वर्षा कृषि उत्पादन, जल सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जो मानसून पर अत्यधिक निर्भर हैं।
  • IMD अल नीनो की निगरानी करता है और इसके संभावित प्रभावों के आधार पर मानसून के पूर्वानुमान जारी करता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
मानसून की शीघ्र वापसी महाराष्ट्र में सामान्य से पहले मानसून की वापसी, जो कृषि गतिविधियों और जल उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है।
21 जिलों में वर्षा की कमी राज्य के बड़े हिस्से में औसत से कम वर्षा, जिससे इन क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न होने का खतरा है।
एल-नीनो प्रभाव एल-नीनो (El-Niño) जलवायु पैटर्न का तीव्र होना, जो भारत में मानसूनी वर्षा को कमजोर करने के लिए जाना जाता है।
IMD की ‘सामान्य वर्षा’ परिभाषा भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, 19 प्रतिशत की कमी को ‘वर्षा की कमी’ नहीं माना जाता है, क्योंकि इसके लिए 20 प्रतिशत या उससे अधिक की कमी आवश्यक है।
राज्य भर में असमान वर्षा कुछ जिलों में अत्यधिक वर्षा (जैसे नासिक, पालघर) जबकि पड़ोसी जिलों में कमी (जैसे अहमदनगर, सोलापुर)।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव: महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर करता है। कम वर्षा से खरीफ फसलों (Kharif crops) जैसे धान, बाजरा, मक्का और सोयाबीन की पैदावार प्रभावित हो सकती है, जिससे किसानों की आय में कमी आएगी।
  • ग्रामीण आय और रोजगार पर असर: कृषि उत्पादन में कमी से ग्रामीण क्षेत्रों में आय और रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा।
  • खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति (Inflation): फसल उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ेगा और आम जनता की खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी।

पर्यावरण और जल संसाधन महत्व

  • भूजल स्तर में गिरावट: कम वर्षा के कारण भूजल (Groundwater) का पुनर्भरण (Recharge) कम होगा, जिससे भूजल स्तर में गिरावट आएगी और पेयजल तथा सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी।
  • जलाशयों में पानी की कमी: नदियों और जलाशयों में पानी का स्तर कम होने से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट उत्पन्न हो सकता है, साथ ही जलविद्युत उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है।
  • पारिस्थितिक संतुलन पर प्रभाव: सूखे जैसी स्थिति से जैव विविधता (Biodiversity) और स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे वन्यजीवों और वनस्पतियों के लिए चुनौतियाँ बढ़ेंगी।

सामाजिक महत्व

  • पेयजल संकट: कई जिलों में वर्षा की कमी से पेयजल की उपलब्धता एक गंभीर समस्या बन सकती है, जिससे विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को लंबी दूरी से पानी लाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
  • स्वास्थ्य और स्वच्छता पर प्रभाव: पानी की कमी से स्वच्छता संबंधी समस्याएँ बढ़ सकती हैं और जल-जनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
  • प्रवासन में वृद्धि: कृषि संकट और पानी की कमी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर लोगों का प्रवासन (Migration) बढ़ सकता है, जिससे शहरी बुनियादी ढाँचे पर दबाव पड़ेगा।

चुनौतियाँ

1. कृषि क्षेत्र पर दबाव

  • फसल उत्पादन में गिरावट: कम वर्षा के कारण खरीफ फसलों की बुवाई और वृद्धि प्रभावित होगी, जिससे उत्पादन में कमी आएगी।
  • किसानों की आय में कमी: फसल खराब होने से किसानों की आय पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जिससे वे ऋणग्रस्तता (Indebtedness) के जाल में फँस सकते हैं।

2. जल संकट

  • पेयजल की कमी: कई जिलों में पेयजल की उपलब्धता एक गंभीर चुनौती बन जाएगी, खासकर गर्मी के महीनों में।
  • सिंचाई के लिए पानी का अभाव: कृषि के लिए पर्याप्त पानी न मिलने से रबी फसलों (Rabi crops) की बुवाई और सिंचाई भी प्रभावित होगी।

3. एल-नीनो के प्रभाव का प्रबंधन

  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटना: एल-नीनो जैसी जलवायु घटनाएँ भविष्य में अधिक बारंबार और तीव्र हो सकती हैं, जिससे दीर्घकालिक अनुकूलन रणनीतियों की आवश्यकता है।
  • मौसम पूर्वानुमान की सटीकता: IMD के पूर्वानुमानों के आधार पर कृषि और जल प्रबंधन योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना।

4. क्षेत्रीय असमानताएँ

  • वर्षा वितरण में असंतुलन: राज्य के भीतर कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और अन्य में गंभीर कमी, जिससे प्रभावी जल प्रबंधन योजना बनाना मुश्किल होता है।
  • संसाधनों का असमान वितरण: वर्षा की कमी वाले क्षेत्रों में संसाधनों और सहायता का प्रभावी वितरण सुनिश्चित करना।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
मानसून की शीघ्र वापसी कृषि चक्र में व्यवधान और रबी फसलों की बुवाई के लिए अपर्याप्त नमी।
21 जिलों में वर्षा की कमी इन क्षेत्रों में सूखे की स्थिति, कृषि उत्पादन में गिरावट और ग्रामीण संकट का खतरा।
एल-नीनो का प्रभाव भविष्य में भी मानसूनी वर्षा में कमी की संभावना, जिससे दीर्घकालिक जल सुरक्षा पर खतरा।
IMD की ‘सामान्य वर्षा’ की परिभाषा तकनीकी रूप से ‘सामान्य’ होने के बावजूद, वास्तविक वर्षा की कमी से उत्पन्न होने वाली समस्याओं की अनदेखी का जोखिम।
राज्य भर में असमान वर्षा जल प्रबंधन और आपदा राहत प्रयासों को लक्षित करने में कठिनाई, जिससे कुछ क्षेत्रों को अधिक नुकसान।

आगे की राह

  • सूखा-प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देना और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को प्रोत्साहित करना।
  • सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) प्रणालियों जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को व्यापक रूप से अपनाना।
  • जल संचयन (Water Harvesting) संरचनाओं का निर्माण और मौजूदा जलाशयों का रखरखाव तथा गाद निकालना।
  • मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों को और अधिक सटीक बनाना तथा किसानों तक समय पर जानकारी पहुँचाना।
  • एल-नीनो जैसे जलवायु पैटर्न के प्रभावों को कम करने के लिए दीर्घकालिक जलवायु अनुकूलन रणनीतियों को विकसित करना।
  • किसानों के लिए फसल बीमा योजनाओं (Crop Insurance Schemes) को मजबूत करना और त्वरित मुआवजा सुनिश्चित करना।
  • भूजल पुनर्भरण कार्यक्रमों को प्राथमिकता देना और भूजल के अत्यधिक दोहन को नियंत्रित करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मानसून की वापसी · अल नीनो · वर्षा की कमी · भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) · कृषि पर प्रभाव · जल प्रबंधन · जलवायु परिवर्तन · आपदा प्रबंधन · खाद्य सुरक्षा · मौसम संबंधी पूर्वानुमान · सूखा · ग्रामीण अर्थव्यवस्था

अवधारणा प्रवाह

एल-नीनो का तीव्र होना  →  मानसून की शीघ्र वापसी  →  महाराष्ट्र के 21 जिलों में वर्षा की कमी  →  कृषि उत्पादन और जल उपलब्धता पर नकारात्मक प्रभाव  →  ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर दबाव  →  सरकार द्वारा सूखा प्रबंधन और राहत उपायों की आवश्यकता

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अल नीनो (El Niño) प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है, जो वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है।
2. भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी सामान्यतः अक्टूबर के मध्य तक होती है।
3. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, किसी क्षेत्र में वर्षा की कमी को ‘वर्षा-घाटा’ तभी घोषित किया जाता है जब वास्तविक वर्षा मौसमी औसत से 20 प्रतिशत या उससे अधिक कम हो।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अल नीनो एक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में सतही जल के गर्म होने से जुड़ी है और इसका वैश्विक मौसम पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। कथन 2 सही है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी सामान्यतः अक्टूबर के पहले या दूसरे सप्ताह में शुरू होती है। कथन 3 सही है। IMD के मानदंडों के अनुसार, 20 प्रतिशत या उससे अधिक की कमी को वर्षा-घाटा माना जाता है, जबकि 19 प्रतिशत की कमी को सामान्य श्रेणी में रखा जाता है।

Q2. अभिकथन (A): महाराष्ट्र में इस वर्ष मानसून की वापसी सामान्य से पहले हुई है।
कारण (R): अल नीनो (El Niño) की तीव्रता के कारण राज्य में अपर्याप्त वर्षा हुई है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सत्य है, क्योंकि महाराष्ट्र में इस वर्ष मानसून की वापसी सामान्य से पहले हुई है। कारण (R) भी सत्य है, क्योंकि अल नीनो की तीव्रता को अपर्याप्त वर्षा और मानसून की शीघ्र वापसी का एक प्रमुख कारण माना गया है। अतः, R, A की सही व्याख्या है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में मानसून की समय से पहले वापसी के कारणों और इसके संभावित सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** मानसून की वापसी का संक्षिप्त परिचय और इस वर्ष महाराष्ट्र में समय से पहले वापसी की घटना का उल्लेख।
2. **समय से पहले वापसी के कारण:**
* **अल नीनो (El Niño) प्रभाव:** प्रशांत महासागर में सतही जल का गर्म होना और भारतीय मानसून पर इसका नकारात्मक प्रभाव।
* **वैश्विक जलवायु परिवर्तन:** वैश्विक तापमान वृद्धि और मौसम पैटर्न में बदलाव।
* **क्षेत्रीय कारक:** स्थानीय वायुमंडलीय दबाव प्रणाली और हवा के पैटर्न में परिवर्तन।
* **IMD के मानदंड:** 20% से कम वर्षा की कमी को ‘सामान्य’ मानने की व्याख्या और इसके निहितार्थ।
3. **संभावित सामाजिक-आर्थिक प्रभाव:**
* **कृषि पर प्रभाव:** फसल उत्पादन में कमी, किसानों की आय पर नकारात्मक असर, ग्रामीण संकट।
* **जल संकट:** पीने के पानी की कमी, भूजल स्तर में गिरावट, सिंचाई के लिए पानी की अनुपलब्धता।
* **खाद्य सुरक्षा:** अनाज और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों में वृद्धि, मुद्रास्फीति (Inflation)।
* **ग्रामीण अर्थव्यवस्था:** कृषि आधारित उद्योगों और रोजगार पर नकारात्मक प्रभाव।
* **स्वास्थ्य और पर्यावरण:** जल जनित बीमारियों का खतरा, सूखे की स्थिति।
* **ऊर्जा उत्पादन:** जलविद्युत उत्पादन पर प्रभाव।
4. **आगे की राह/समाधान:**
* **बेहतर मौसम पूर्वानुमान:** IMD की क्षमताओं का विस्तार।
* **जल प्रबंधन:** वर्षा जल संचयन, कुशल सिंचाई तकनीकें (ड्रिप, स्प्रिंकलर), जल संरक्षण।
* **फसल विविधीकरण:** कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना।
* **जलवायु अनुकूल कृषि:** सूखे प्रतिरोधी किस्मों का विकास।
* **आपदा प्रबंधन:** सूखा राहत उपायों की तैयारी।
* **नीतिगत हस्तक्षेप:** किसानों को बीमा और वित्तीय सहायता।
5. **निष्कर्ष:** मानसून की अनिश्चितता को स्वीकार करते हुए, दीर्घकालिक रणनीतियों और अनुकूलन उपायों की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: The Indian Express

Maharashtra PCS (MPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: महाराष्ट्रातील मान्सूनचे लवकर माघार घेणे आणि 21 जिल्ह्यांमध्ये पर्जन्याअभावाची स्थिती निर्माण होणे याचे प्रमुख कारण कोणते आहे?

  1. A. अरबी समुद्रातील कमी दाबाचे क्षेत्र निर्माण न होणे
  2. B. पश्चिमी विक्षोभांची संख्या वाढणे
  3. C. अल निनोच्या प्रभावामुळे मान्सूनचा कालावधी कमी होणे
  4. D. महाराष्ट्रातील भू-आकारामुळे पर्जन्याचे असमान वितरण

उत्तर: A. अरबी समुद्रातील कमी दाबाचे क्षेत्र निर्माण न होणे — अरबी समुद्रात कमी दाबाचे क्षेत्र निर्माण न झाल्याने मान्सूनचे लवकर माघार घेणे आणि पर्जन्याअभावाची स्थिती निर्माण होते.

Mains: महाराष्ट्रातील 21 जिल्ह्यांमध्ये पर्जन्याअभावाची स्थिती निर्माण होण्याच्या कारणांचे विश्लेषण करा. या परिस्थितीमुळे राज्याच्या कृषी अर्थव्यवस्थेवर होणाऱ्या परिणामांचे मूल्यांकन करा आणि अशा आपत्तींच्या निवारणासाठी राज्य सरकारने राबवावयाच्या उपाययोजनांचे सुचनापत्र तयार करा.


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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