19 Oct केरल में लापता प्रवासी मजदूर: एनएचआरसी ने पुलिस से रिपोर्ट मांगी
✎ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक सांविधिक निकाय है जो मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 18 के अंतर्गत जाँच के दौरान सूचना और रिपोर्ट माँग सकता है, किंतु उसकी सिफारिशें सामान्यतः सलाहकारी होती हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — Polity (सांविधिक निकाय, मूल अधिकार और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका) | GS Paper II — Social Justice (असुरक्षित वर्गों के लिए संरक्षण; प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा और कल्याण) | GS Paper II — Governance (पुलिस की जवाबदेही और शिकायत निवारण तंत्र)
- Prelims: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) — सांविधिक निकाय, संवैधानिक निकाय नहीं, मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 — धारा 17 (स्वप्रेरणा से जाँच) और धारा 18 (जाँच के दौरान सूचना या रिपोर्ट माँगना), मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 — धारा 13 (सिविल न्यायालय की कुछ शक्तियाँ), अनुच्छेद 21 — प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार; न्यायालयीय व्याख्या में गरिमा के साथ जीने का अधिकार, अनुच्छेद 19(1)(घ) और 19(1)(ङ) — देश के राज्यक्षेत्र में आवागमन और निवास की स्वतंत्रता, अंतर्राज्यीय प्रवासी कर्मकार (विनियमन और सेवा शर्तें) अधिनियम, 1979 और उसके स्थान पर लागू व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020, ई-श्रम पोर्टल (e-Shram) — असंगठित श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस, राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) और उसका राष्ट्रीय आयोग से संबंध
- Essay: प्रवासी श्रमिक: आर्थिक योगदान और अदृश्य मानवाधिकार संकट, लापता व्यक्तियों के मामलों में राज्य की जवाबदेही और संस्थागत विश्वास
त्वरित पुनरावृत्ति: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक सांविधिक निकाय है जो मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 18 के अंतर्गत जाँच के दौरान सूचना और रिपोर्ट माँग सकता है, किंतु उसकी सिफारिशें सामान्यतः सलाहकारी होती हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने केरल के एर्नाकुलम ज़िले के पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर ओडिशा के कालाहांडी ज़िले के 22 वर्षीय प्रवासी श्रमिक के लापता होने के मामले में कार्रवाई रिपोर्ट माँगी है। बताया गया है कि यह युवक थुआमुल रामपुर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले थुआमुल ग्राम पंचायत के रानीदुमेर गाँव का निवासी है और काम के लिए केरल गया था, परंतु 4 अक्टूबर से उसका कोई पता नहीं है। शिकायत मानवाधिकार कार्यकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई थी, जिसे आयोग ने प्रकरण संख्या 273/11/3/2026 के रूप में पंजीकृत किया। आयोग ने 15 अक्टूबर को मामले की सुनवाई की और पुलिस की प्रतिक्रिया तथा कथित निष्क्रियता पर चिंता व्यक्त की। आयोग ने पुलिस आयुक्त को गहन जाँच करने और चार सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। यह प्रकरण अंतर्राज्यीय प्रवास के दौरान श्रमिकों की सुरक्षा और लापता व्यक्तियों की जाँच में पुलिस की भूमिका से जुड़ा है।
पृष्ठभूमि
- भारत में प्रवासी श्रमिकों की बड़ी संख्या निर्माण, कृषि, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में कार्यरत है। ओडिशा जैसे राज्यों से श्रमिक केरल जैसे अधिक औद्योगिक और सेवा-प्रधान राज्यों में जाते हैं, इसलिए राज्यों के बीच श्रमिक प्रवाह आर्थिक संवृद्धि से सीधे जुड़ा है।
- अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिकों के लिए 1979 का अधिनियम बना था। अब यह विषय व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 के अंतर्गत आ गया है, जिसे श्रम संहिताओं के एकीकरण के रूप में देखा जाता है।
- असंगठित श्रमिकों की गणना और पंजीकरण के लिए ई-श्रम पोर्टल शुरू किया गया, ताकि नीति निर्माण और कल्याण योजनाओं के लिए प्रवासी श्रमिकों के आँकड़े उपलब्ध हो सकें।
- लापता व्यक्तियों के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करना और तुरंत जाँच शुरू करना पुलिस का वैधानिक दायित्व है। भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के अंतर्गत भी ऐसी शिकायतों पर कार्रवाई की प्रक्रिया निर्धारित है।
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत हुई। आयोग राज्य प्रशासन और पुलिस से सूचना और रिपोर्ट माँग सकता है, किंतु उसकी सिफारिशें सामान्यतः बाध्यकारी नहीं होतीं, और न्यायिक शक्तियाँ सीमित हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग क्या है?
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) की स्थापना 1993 में मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत एक सांविधिक निकाय के रूप में हुई।
- आयोग का कार्य संविधान में प्रदत्त तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदाओं में मान्य मानवाधिकारों की रक्षा और संवर्धन करना है। यह संवैधानिक निकाय नहीं है।
- धारा 17 के अंतर्गत आयोग किसी शिकायत के बिना भी, स्वप्रेरणा से (suo motu) जाँच कर सकता है, और धारा 18 के अंतर्गत जाँच के दौरान किसी सरकार या प्राधिकारी से सूचना या रिपोर्ट माँग सकता है।
- धारा 13 के अंतर्गत आयोग को सिविल न्यायालय की कुछ शक्तियाँ प्राप्त हैं, जैसे गवाहों को बुलाना, दस्तावेज़ माँगना और शपथ पर साक्ष्य लेना।
- आयोग की सिफारिशें सामान्यतः सलाहकारी प्रकृति की होती हैं। आयोग अपनी वार्षिक या विशेष रिपोर्ट केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकार को भेजता है।
- राज्य स्तर पर राज्य मानवाधिकार आयोग (State Human Rights Commission) कार्य करते हैं। राज्य के मामलों में राष्ट्रीय आयोग सामान्यतः सीधे पुलिस से रिपोर्ट माँगता है, जैसा इस मामले में अंतर्राज्यीय संदर्भ में हुआ।
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार है, जिसकी न्यायिक व्याख्या में गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी सम्मिलित है। इस अधिकार की रक्षा राज्य का दायित्व माना गया है।
- लापता व्यक्तियों के मामलों में पुलिस की निष्क्रियता को मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में देखा जाता है, क्योंकि इसमें शिकायतकर्ता और पीड़ित परिवार को न्याय और सूचना का अधिकार प्रभावित होता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| मामला क्रमांक (Case No.) | राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission, NHRC) ने 273/11/3/2026 क्रमांक से शिकायत दर्ज की। शिकायत मानवाधिकार कार्यकर्ता दिलीप कुमार दास ने दी थी। |
| आयोग का निर्देश | एर्नाकुलम ज़िला पुलिस आयुक्त को लापता प्रवासी श्रमिक की गहन जाँच करने और चार सप्ताह के भीतर कार्रवाई-रिपोर्ट प्रस्तुत करने का नोटिस जारी हुआ। |
| पीड़ित और पृष्ठभूमि | कालाहांडी (ओडिशा) के थुआमुल रामपुर ब्लॉक के रानीदुमेर गाँव का 22 वर्षीय राथ गौड़ा काम के लिए केरल गया था और 4 अक्टूबर 2025 से लापता है। |
| अधिकार-क्षेत्र का प्रश्न | पुलिस और लोक व्यवस्था राज्य सूची के विषय हैं। इसलिए जाँच की प्राथमिक जिम्मेदारी केरल पुलिस की है, जबकि शिकायत का मूल संबंध ओडिशा के निवासी से है। |
| सुनवाई और प्रक्रिया | आयोग ने 15 अक्टूबर को मामले की सुनवाई की। सदस्य प्रियंक कानूनगो के अनुसार पुलिस की प्रतिक्रिया और कथित निष्क्रियता पर चिंता जताई गई। |
महत्व
मानवाधिकार (Human Rights)
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत स्थापित वैधानिक निकाय है, जो शिकायतों की जाँच कर संबंधित प्राधिकारियों से रिपोर्ट मांग सकता है।
- लापता व्यक्ति का मामला अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार से सीधे जुड़ता है, क्योंकि राज्य का दायित्व व्यक्ति की खोज और सुरक्षा दोनों से संबंधित है।
सामाजिक-आर्थिक (Socio-economic)
- आजीविका की तलाश में अंतर-राज्यीय पलायन करने वाले श्रमिक अक्सर अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं, जिससे उनकी सुरक्षा और सूचना-तंत्र दोनों कमज़ोर रहते हैं।
- परिवार की आर्थिक निर्भरता और लापता सदस्य की स्थिति से उत्पन्न मानसिक एवं आर्थिक बोझ सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
प्रशासनिक और संघीय (Administrative and Federal)
- दो राज्यों के बीच पुलिस सूचना और जाँच का समन्वय संघीय व्यवस्था की व्यावहारिक परीक्षा है।
- राज्य सूची के विषय पर राष्ट्रीय संस्था की निगरानी जवाबदेही का सिद्धांत मज़बूत करती है, हालाँकि संस्था की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होतीं।
विधिक (Legal)
- ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013) में सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य माना है।
- लापता व्यक्ति के मामले में अपहरण या अन्य संज्ञेय अपराध की आशंका हो, तो प्राथमिकी टालना विधिक दृष्टि से चिंता का विषय बनता है।
चुनौतियाँ
1. अंतर-राज्यीय पुलिस समन्वय की कमी
- मूल राज्य (ओडिशा) और कार्यस्थल राज्य (केरल) की पुलिस के बीच सूचना, दस्तावेज़ और जाँच का आदान-प्रदान धीमा पड़ सकता है।
- एक राज्य की जाँच दूसरे राज्य के क्षेत्र में कठिन होती है, जिससे सुराग खोने की संभावना बढ़ती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संघवाद और राज्यों के बीच समन्वय की भूमिका
2. प्रवासी श्रमिकों का अपंजीकृत रहना
- बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक पंजीकरण के बिना काम करते हैं, इसलिए उनका स्थान और संपर्क विवरण प्रशासन के पास नहीं होता।
- ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकरण और सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के प्रावधान अंतर-राज्यीय प्रवासी श्रमिकों के लिए हैं, किंतु उनका व्यावहारिक क्रियान्वयन असमान है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सामाजिक न्याय और श्रम कल्याण संहिताएँ
3. प्राथमिकी और जाँच में विलंब
- लापता व्यक्ति के मामलों को अक्सर सामान्य घटना मानकर टाल दिया जाता है, जबकि इनमें समय पर जाँच सबसे निर्णायक होती है।
- विलंब से साक्ष्य नष्ट होते हैं और परिवार को न्याय के लिए बार-बार आयोगों और अदालतों का रुख करना पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन में जवाबदेही और आपराधिक न्याय प्रणाली
4. लापता व्यक्तियों के आँकड़ों का अपर्याप्त एकीकरण
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) लापता व्यक्तियों के आँकड़े प्रकाशित करता है, किंतु राज्यों के बीच एकीकृत ट्रैकिंग प्रणाली सीमित है।
- प्रवासी श्रमिकों की गिनती उनके मूल राज्य और कार्यस्थल राज्य दोनों में अलग-अलग होने से वास्तविक संख्या का अनुमान कठिन होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सरकारी नीतियों के लिए आँकड़ों की भूमिका
5. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों की बाध्यकारी प्रकृति
- आयोग मानवाधिकार उल्लंघन की जाँच कर सकता है और सिफारिश या निर्देश दे सकता है, किंतु उसके आदेश न्यायालय की भाँति सीधे लागू नहीं होते।
- कार्रवाई-रिपोर्ट की समय-सीमा और अनुपालन की निगरानी पर ही प्रभावशीलता निर्भर करती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संवैधानिक और वैधानिक निकाय; NHRC की भूमिका
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| अंतर-राज्यीय समन्वय | दो राज्यों की पुलिस के बीच जाँच की जिम्मेदारी स्पष्ट न होने से जाँच में देरी की आशंका। |
| प्रवासी श्रमिकों की असुरक्षा | अपंजीकृत श्रमिकों की स्थिति दर्ज न होने से लापता होने पर खोज कठिन। |
| प्राथमिकी में विलंब | संज्ञेय अपराध की आशंका होने पर भी प्रारंभिक कार्रवाई में ढिलाई से साक्ष्य का नुकसान। |
| आँकड़ों की खंडित प्रकृति | राज्यवार और राष्ट्रीय स्तर पर लापता व्यक्तियों का एकीकृत डेटा उपलब्ध न होना। |
| आयोग की सिफारिशों का अनुपालन | गैर-बाध्यकारी प्रकृति के कारण कार्रवाई-रिपोर्ट के बाद भी परिणाम अनिश्चित रहना। |
आगे की राह
- लापता व्यक्ति के मामलों में प्रारंभिक चरण पर ही प्राथमिकी दर्ज करने और उसकी स्थिति-रिपोर्ट नियमित रूप से परिवार को देने की व्यवस्था सुदृढ़ की जाए।
- ओडिशा और केरल की पुलिस के बीच औपचारिक सूचना-साझाकरण तंत्र और संपर्क अधिकारी नियुक्त किए जाएँ।
- प्रवासी श्रमिकों के ई-श्रम पंजीकरण को अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में कार्यस्थल और रोज़गार एजेंसियों से जोड़ा जाए।
- लापता व्यक्तियों के आँकड़ों को राज्यवार और अंतर-राज्यीय स्तर पर एकीकृत डेटाबेस में दर्ज कर नियमित रूप से सार्वजनिक किया जाए।
- पुलिस अधिकारियों के लिए मानवाधिकार और प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएँ।
- आयोग की कार्रवाई-रिपोर्ट की समय-सीमा के अनुपालन की निगरानी के लिए स्पष्ट प्रक्रिया बनाई जाए।
- परिवारों को विधिक सहायता और सूचना का सरल मार्ग उपलब्ध कराया जाए, ताकि शिकायत के लिए उन्हें बार-बार दूसरे राज्य न जाना पड़े।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) · मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 · लापता व्यक्ति और राज्य की सकारात्मक बाध्यता · अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक · अनुच्छेद 21 (जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) · अनुच्छेद 23 (मानव तस्करी और बलात् श्रम का प्रतिषेध) · ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013) · शून्य एफआईआर (Zero FIR) · कार्रवाई रिपोर्ट (Action-Taken Report) · पुलिस और लोक व्यवस्था: राज्य सूची का विषय · पेरिस सिद्धांत (Paris Principles) · ई-श्रम पोर्टल (e-Shram Portal)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार
- सातवीं अनुसूची (राज्य सूची, प्रविष्टि 2): पुलिस राज्य का विषय
अवधारणा प्रवाह
प्रवासी श्रमिक आजीविका के लिए ओडिशा से केरल जाता है। → 4 अक्टूबर 2025 के बाद श्रमिक का संपर्क टूटता है और वह लापता हो जाता है। → परिवार या मानवाधिकार कार्यकर्ता द्वारा पुलिस की निष्क्रियता की शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दर्ज होती है। → आयोग 15 अक्टूबर को सुनवाई कर पुलिस प्रतिक्रिया पर चिंता व्यक्त करता है। → आयोग एर्नाकुलम ज़िला पुलिस आयुक्त को गहन जाँच का नोटिस जारी कर चार सप्ताह में कार्रवाई-रिपोर्ट मांगता है। → कार्रवाई-रिपोर्ट के आधार पर आयोग आगे की सिफारिश या निगरानी का निर्णय लेता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक सांविधिक निकाय है, जिसका गठन मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत हुआ है।
2. आयोग स्वप्रेरणा (suo motu) से भी किसी मानवाधिकार उल्लंघन के मामले का संज्ञान ले सकता है।
3. आयोग के पास दोषी पाए गए लोक सेवकों को दंडित करने की प्रत्यक्ष शक्ति है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: NHRC का गठन PHRA, 1993 के अंतर्गत हुआ है, जो इसे सांविधिक दर्जा देता है। कथन 2 सही है: आयोग स्वप्रेरणा से संज्ञान ले सकता है। कथन 3 गलत है, क्योंकि आयोग सिफारिश कर सकता है या अभियोजन की सिफारिश कर सकता है, पर दंड देने की प्रत्यक्ष शक्ति उसके पास नहीं है।
Q2. निम्नलिखित में दो कथन दिए गए हैं, जिनमें एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) है।
अभिकथन (A): राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग किसी शिकायत के संबंध में राज्य पुलिस से कार्रवाई रिपोर्ट मँगवा सकता है।
कारण (R): मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 आयोग को किसी भी सरकारी प्राधिकारी से सूचना या रिपोर्ट माँगने की शक्ति प्रदान करता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — PHRA, 1993 की धारा 17 के अंतर्गत आयोग शिकायतों की जाँच करते समय किसी सरकारी प्राधिकारी से सूचना या रिपोर्ट मँगवा सकता है, इसलिए (R) सही है और वही (A) की व्याख्या करता है। राज्य पुलिस से कार्रवाई रिपोर्ट माँगना इसी शक्ति का व्यावहारिक रूप है।
Q3. निम्नलिखित स्तंभों का सुमेल कीजिए:
स्तंभ I
A. अनुच्छेद 21
B. अनुच्छेद 23
C. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993
D. ललिता कुमारी निर्णय (2013)
स्तंभ II
1. संज्ञेय अपराध में एफआईआर का अनिवार्य पंजीकरण
2. मानव तस्करी और बलात् श्रम का प्रतिषेध
3. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
4. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सांविधिक आधार
सही सुमेल चुनिए:
- A-3, B-2, C-4, D-1
- A-2, B-3, C-1, D-4
- A-3, B-1, C-4, D-2
- A-4, B-2, C-3, D-1
उत्तर: A-3, B-2, C-4, D-1 — अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 23 मानव तस्करी और बलात् श्रम का प्रतिषेध करता है। PHRA, 1993 NHRC को सांविधिक आधार देता है। ललिता कुमारी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञेय अपराध की एफआईआर के अनिवार्य पंजीकरण की व्यवस्था दी।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ प्रवासी श्रमिकों के लापता होने के मामलों में राज्य पुलिस की जाँच-प्रक्रिया और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसे सांविधिक निकायों की भूमिका, दोनों की सीमाएँ और संभावनाएँ एक साथ रखती हैं। इस व्यवस्था का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि यदि आयोग की सिफारिशों पर राज्य प्राधिकारी समय-सीमा में कार्रवाई रिपोर्ट न दें, तो संघीय ढाँचे में जवाबदेही सुनिश्चित करने के कौन-से उपाय उपलब्ध हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना: (1) भूमिका: हाल का मामला (ओडिशा के कालाहांडी ज़िले के प्रवासी श्रमिक के केरल में लापता होने पर NHRC द्वारा एर्नाकुलम पुलिस आयुक्त से चार सप्ताह में कार्रवाई रिपोर्ट माँगना; शिकायत पर सुनवाई 15 अक्तूबर को; केस संख्या 273/11/3/2026)। (2) संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 21 (जीवन और दैहिक स्वतंत्रता; सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसमें गरिमा और राज्य की सकारात्मक बाध्यता का विस्तार), अनुच्छेद 19(1)(d) और (e) (देश में आवागमन और निवास), अनुच्छेद 23 (बलात् श्रम और तस्करी का प्रतिषेध)। (3) NHRC का ढाँचा: मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत गठन; धारा 12 में कार्य; धारा 17 में शिकायत की जाँच और सूचना/रिपोर्ट माँगने की शक्ति; आयोग सिफारिश करता है, दंड नहीं देता; पेरिस सिद्धांतों (1993) के अनुरूप स्वतंत्रता की अपेक्षा। सीमाएँ: सिफारिशें बाध्यकारी नहीं; धारा 36 के अनुसार लंबित मामलों पर सीमाएँ; आयोग का अपना जाँच-बल सीमित। (4) पुलिस और राज्य विषय: पुलिस और लोक व्यवस्था राज्य सूची का विषय है, इसलिए गृहराज्य और कार्यक्षेत्र राज्य के बीच समन्वय की समस्या। (5) विधिक प्रक्रिया: ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013) में संज्ञेय अपराध की एफआईआर का अनिवार्य पंजीकरण; भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 173 में शून्य एफआईआर और इलेक्ट्रॉनिक एफआईआर की व्यवस्था; लापता व्यक्ति की खोज में समयबद्ध कार्रवाई का प्रश्न। (6) सामाजिक-आर्थिक आयाम: 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 45 करोड़ आंतरिक प्रवासी; अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक (Inter-State Migrant Workmen) अधिनियम, 1979 को व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020 में समाहित किया गया; सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 और ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकरण का प्रश्न, जिससे प्रवासी श्रमिकों का डेटा राज्यों के बीच साझा हो सके। (7) संतुलित दृष्टिकोण: मानवाधिकार निकाय की स्वतंत्र जाँच बनाम राज्य की प्रशासनिक स्वायत्तता; आयोग का नैतिक प्रभाव बनाम प्रवर्तन-शक्ति का अभाव; न्यायिक उपचार (रिट याचिका, अनुच्छेद 32/226) का विकल्प। (8) समाधान: अंतरराज्यीय समन्वय तंत्र, लापता व्यक्तियों हेतु समर्पित डेटाबेस, पुलिस प्रशिक्षण, समयबद्ध कार्रवाई-रिपोर्ट की निगरानी, और निष्कर्ष में सहकारी संघवाद की भावना से जवाबदेही का संतुलित मॉडल।
स्रोत: orissapost.com
Kerala PCS (Kerala PSC (KAS)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) द्वारा केरल पुलिस से रिपोर्ट मांगे जाने का मुख्य कारण क्या है?
- केरल में प्रवासी श्रमिकों के लापता होने की घटनाओं में वृद्धि
- केरल में प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों के उल्लंघन संबंधी शिकायतें
- केरल पुलिस द्वारा प्रवासी श्रमिकों के पुनर्वास में असफलता
- केरल सरकार द्वारा प्रवासी श्रमिकों के लिए नीतियों का उल्लंघन
उत्तर: केरल में प्रवासी श्रमिकों के लापता होने की घटनाओं में वृद्धि — NHRC ने केरल पुलिस से प्रवासी श्रमिकों के लापता होने की घटनाओं की रिपोर्ट मांगी है, जो मानवाधिकारों के उल्लंघन का संकेत हो सकता है।
Mains: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) द्वारा प्रवासी श्रमिकों के लापता होने संबंधी रिपोर्ट मांगने के संदर्भ में, केरल सरकार द्वारा उठाए गए कदमों और उनकी प्रभावशीलता का विश्लेषण कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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