मद्रास हाईकोर्ट ने उठाया बच्चों को राजनीतिक अपील का मुद्दा, संसद और राष्ट्र को करना होगा विचार

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मद्रास हाईकोर्ट ने उठाया बच्चों को राजनीतिक अपील का मुद्दा, संसद और राष्ट्र को करना होगा विचार

बच्चों का राजनीतिक उपयोगपरिवार द्वारा आग्रहभावनात्मक दबावसोशल मीडिया प्रसारणरीलों में प्रसारविधिक सीमा निर्धारणविधायी सुधार
बच्चों का राजनीतिक उपयोग

✎ निर्वाचन में बच्चों के उपयोग को वर्तमान विधि में 'अनुचित प्रभाव' (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, धारा 123) की परिभाषा में स्पष्ट रूप से सम्मिलित नहीं किया गया है; इस पर विधायी निर्णय संसद का विषय है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजनीति (Polity): निर्वाचन सुधार, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अंतर्गत भ्रष्ट आचरण और निर्वाचन याचिका  |  GS Paper II — संविधान और सामाजिक न्याय: बच्चों के अधिकार, संवैधानिक निर्देश और बाल संरक्षण विधियाँ  |  GS Paper IV — नैतिकता (Ethics): सार्वजनिक जीवन में नैतिक आचरण और निर्वाचन की शुचिता
  • Prelims: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 (भ्रष्ट आचरण) और धारा 100 (निर्वाचन को शून्य घोषित करने के आधार), अनुच्छेद 329(ख) और निर्वाचन विषयों में न्यायालय का सीमित हस्तक्षेप, अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ, अनुच्छेद 326: वयस्क मताधिकार (18 वर्ष), अनुच्छेद 39(च): बच्चों को स्वस्थ विकास के अवसर और गरिमा की स्थिति, बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005, निर्वाचन याचिका की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र: उच्च न्यायालय (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 80 और 81)
  • Essay: लोकतंत्र में निर्वाचन की शुचिता बनाम मतदाता की स्वतंत्र इच्छा: विधिक और नैतिक सीमाएँ, बच्चों का संरक्षण और सार्वजनिक जीवन: जब बचपन राजनीतिक प्रचार का साधन बन जाए

त्वरित पुनरावृत्ति: निर्वाचन में बच्चों के उपयोग को वर्तमान विधि में ‘अनुचित प्रभाव’ (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, धारा 123) की परिभाषा में स्पष्ट रूप से सम्मिलित नहीं किया गया है; इस पर विधायी निर्णय संसद का विषय है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

मद्रास उच्च न्यायालय ने एक निर्वाचन याचिका खारिज करते हुए कहा कि 2026 के विधानसभा चुनाव में बच्चों को परिवार के वयस्क सदस्यों से मतदान के लिए आग्रह करने हेतु उपयोग करना, और उसके बाद उन दृश्यों को सोशल मीडिया के रीलों में प्रसारित करना, ‘रुचिहीन’ और ‘गलत पालन-पोषण’ का द्योतक है। न्यायमूर्ति डी. भारथा चक्रवर्ती ने स्पष्ट किया कि वर्तमान विधि में ऐसे कृत्य ‘अनुचित प्रभाव’ (Undue Influence) की परिभाषा में नहीं आते, इसलिए न्यायालय निर्वाचित प्रत्याशी का निर्वाचन रद्द नहीं कर सकता। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पारिवारिक संबंधों का भावनात्मक दोहन करके मतदाताओं को प्रभावित किया गया। न्यायालय ने कहा कि इस प्रश्न पर विचार करना संसद और राष्ट्र का दायित्व है, अर्थात् क्या ऐसे कृत्यों को निर्वाचन रद्द करने का आधार बनाया जाना चाहिए। यह प्रकरण विधि की कमी और विधायी सुधार की आवश्यकता, दोनों को रेखांकित करता है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में निर्वाचन संबंधी विवाद निर्वाचन याचिका के माध्यम से ही उठाए जा सकते हैं। अनुच्छेद 329(ख) के अंतर्गत निर्वाचन के विषयों में न्यायालयों का हस्तक्षेप सीमित है और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में उपचार की व्यवस्था है।
  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 में ‘भ्रष्ट आचरण’ की सूची दी गई है, जिसमें ‘अनुचित प्रभाव’ भी सम्मिलित है। किसी भी भ्रष्ट आचरण के सिद्ध होने पर निर्वाचन को धारा 100 के अंतर्गत शून्य घोषित किया जा सकता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने अभिराम सिंह बनाम सी.डी. कोमाचेन (2017) में धर्म, जाति, समुदाय, भाषा आदि के आधार पर मत माँगने को धारा 123(3) के अंतर्गत भ्रष्ट आचरण माना था। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भावनात्मक और पहचान-आधारित अपीलों की विधिक जाँच संभव है।
  • भारत में बाल अधिकारों के लिए संवैधानिक ढाँचा मौजूद है। अनुच्छेद 39(च) राज्य को बच्चों को स्वस्थ विकास के अवसर और गरिमा की सुरक्षा देने का निर्देश देता है, और अनुच्छेद 24 कारखानों व खतरनाक कार्यों में बाल श्रम पर रोक लगाता है।
  • निर्वाचन आयोग आदर्श आचार संहिता के माध्यम से चुनाव प्रचार की मर्यादा सुनिश्चित करता है, जबकि विधिक दंड और निर्वाचन रद्द करने के आधार संसद द्वारा बनाए गए कानूनों में निहित हैं। इस प्रकरण में प्रश्न यह है कि क्या आचार संहिता और मौजूदा विधि, दोनों, डिजिटल माध्यम पर बच्चों के उपयोग को पर्याप्त रूप से कवर करते हैं।

निर्वाचन में बच्चों के उपयोग से जुड़ा ‘अनुचित प्रभाव’ क्या है?

  • ‘अनुचित प्रभाव’ (Undue Influence) जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(2) के अंतर्गत भ्रष्ट आचरण है, जिसमें मतदाता को धमकी, बल या दबाव द्वारा मतदान या उससे विरत रहने के लिए विवश करना सम्मिलित है।
  • भारत में मतदान का अधिकार वयस्कों को है (अनुच्छेद 326, 18 वर्ष), इसलिए बच्चों द्वारा परिवार के वयस्क सदस्यों से मतदान के लिए आग्रह की स्थिति विधिक रूप से भिन्न प्रश्न उठाती है।
  • वर्तमान विधि में ‘अनुचित प्रभाव’ की परिभाषा मुख्यतः बल, धमकी और प्रलोभन पर केंद्रित है; भावनात्मक या पारिवारिक संबंधों के दोहन को इसमें स्पष्ट रूप से सम्मिलित नहीं किया गया है। यही न्यायालय के निर्णय का आधार था।
  • निर्वाचन याचिका की सुनवाई उच्च न्यायालय में होती है और उसमें सिद्ध करना याचिकाकर्ता का दायित्व है कि भ्रष्ट आचरण ने परिणाम को प्रभावित किया। यदि प्रभाव सिद्ध न हो, तो निर्वाचन रद्द नहीं होता।
  • बाल संरक्षण की दृष्टि से प्रमुख विधियाँ हैं: किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015, बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 (2016 में संशोधित) और POCSO अधिनियम, 2012। इनमें से किसी में भी चुनावी प्रचार के लिए बच्चों के उपयोग का विशेष प्रावधान नहीं है।
  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) बाल अधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों पर कार्रवाई कर सकता है, जो बच्चों के डिजिटल उपयोग के मामलों में भी प्रासंगिक हो सकता है।
  • यह प्रश्न विधायी नीति का है कि ऐसे कृत्यों को भ्रष्ट आचरण या निर्वाचन रद्द करने का आधार बनाया जाए या नहीं। इसके लिए संसद द्वारा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन और आचार संहिता के सुदृढ़ीकरण जैसे विकल्प विचाराधीन हो सकते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
निर्वाचन याचिका की सुनवाई (Election Petition Adjudication) निर्वाचन परिणाम को चुनौती देने का मार्ग केवल उच्च न्यायालय या निर्वाचन न्यायाधिकरण के माध्यम से है। अनुच्छेद 329(ख) के अंतर्गत निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान सामान्य न्यायालयों का हस्तक्षेप सीमित रखा गया है।
अनुचित प्रभाव की परिभाषा (Definition of Undue Influence) लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 में भ्रष्ट आचरण की सूची दी गई है। न्यायालय ने कहा कि बच्चों को शामिल करने वाली अपीलें मौजूदा परिभाषा में नहीं आतीं, इसलिए इन्हें आधार बनाकर चुनाव रद्द नहीं किया जा सकता।
वयस्क मताधिकार और स्वतंत्र इच्छा (Adult Franchise and Free Will) अनुच्छेद 326 के अंतर्गत प्रत्येक वयस्क नागरिक को मत देने का अधिकार है। न्यायालय के अनुसार मतदाता की स्वतंत्र इच्छा को बाहरी भावनात्मक दबाव से अलग देखना होगा, जब तक वह विधिक रूप से अनुचित प्रभाव न बने।
विधायी क्षेत्र का विभाजन (Division of Legislative Domain) न्यायालय ने कहा कि ऐसे आचरण को निर्वाचन रद्द करने का आधार बनाना है या नहीं, यह संसद तय करेगी। इससे न्यायपालिका की भूमिका व्याख्या तक और विधायिका की भूमिका नीति-निर्माण तक सीमित दिखती है।
निर्वाचन आयोग की भूमिका (Role of Election Commission) अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग के पास निर्वाचन के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति है। आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर आयोग कार्रवाई कर सकता है, जबकि निर्वाचन रद्द करने की शक्ति न्यायिक प्रक्रिया से तय होती है।

महत्व

संवैधानिक और विधिक

  • निर्वाचन संबंधी विवादों में न्यायालय की भूमिका और संसद की विधायी शक्ति के बीच संतुलन का प्रश्न सामने आया है।
  • अनुच्छेद 327 संसद को निर्वाचन से संबंधित विधि बनाने की शक्ति देता है, इसलिए नए आधार जोड़ने का अधिकार संसद के पास है।
  • धारा 123 की परिभाषा का दायरा न्यायिक व्याख्या से तय होता है, और इसका विस्तार विधायी संशोधन से ही संभव है।

लोकतांत्रिक और सामाजिक

  • मतदाता की स्वतंत्र इच्छा लोकतंत्र का आधार है, और परिवार के भीतर भावनात्मक दबाव इस स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाता है।
  • बच्चों को राजनीतिक गतिविधि में शामिल करना बाल अधिकारों और उनकी गरिमा से जुड़ा विषय है।
  • सार्वजनिक मंचों पर बच्चों की सामग्री के प्रसार से निजता और सहमति के प्रश्न भी उठते हैं।

प्रशासनिक और निर्वाचन प्रबंधन

  • निर्वाचन आयोग के लिए डिजिटल माध्यमों पर चुनाव-प्रचार की निगरानी एक नई चुनौती बन रही है।
  • आदर्श आचार संहिता के प्रभावी पालन के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश आवश्यक हैं।

चुनौतियाँ

1. विधिक परिभाषा की सीमा

  • वर्तमान परिभाषा में बच्चों के माध्यम से वोट मांगने जैसे कृत्य अनुचित प्रभाव के रूप में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं हैं।
  • न्यायालय सीमित व्याख्या के आधार पर ही निर्णय दे सकता है, इसलिए नया प्रावधान विधायी स्तर पर ही आएगा।

2. डिजिटल प्रचार और साक्ष्य की समस्या

  • सोशल मीडिया पर साझा वीडियो का स्रोत, निर्माण की परिस्थिति और प्रामाणिकता सिद्ध करना कठिन है।
  • वीडियो बनाने में वयस्कों की भूमिका होने पर भी उसे प्रत्यक्ष प्रभाव के रूप में सिद्ध करना न्यायिक चुनौती है।

3. बाल अधिकार और राजनीतिक भागीदारी

  • बच्चों की सहमति, गरिमा और मानसिक विकास पर प्रभाव एक गंभीर नैतिक प्रश्न है।
  • भारत ने बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC) की पुष्टि की है, जो बच्चों के हितों की रक्षा पर बल देता है।

4. निर्वाचन रद्द करने के आधारों का प्रश्न

  • यदि हर ऐसे कृत्य को निर्वाचन रद्द करने का आधार बनाया जाए, तो तुच्छ याचिकाओं और राजनीतिक विवादों की बाढ़ आ सकती है।
  • इसके विपरीत, कोई स्पष्ट आधार न होने पर मतदाता के स्वतंत्र निर्णय की सुरक्षा कमजोर रह सकती है।

5. न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा

  • अनुच्छेद 329(ख) के कारण चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायालयों का हस्तक्षेप सीमित है, और विवाद प्रायः निर्वाचन याचिका के बाद ही उठता है।
  • इससे आचरण संबंधी शिकायतों का समय पर समाधान कठिन हो सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
विधिक खालीपन बच्चों को शामिल करने वाले प्रचार को अनुचित प्रभाव की परिभाषा में स्पष्ट रूप से शामिल न करना।
साक्ष्य और प्रामाणिकता डिजिटल वीडियो के निर्माण, संपादन और प्रसार की जिम्मेदारी तय करना कठिन।
बाल संरक्षण बच्चों की सहमति, गरिमा और मनोवैज्ञानिक प्रभाव की रक्षा।
निर्वाचन की स्थिरता हर आचरण को निर्वाचन रद्द करने का आधार बनाने से चुनाव परिणामों की अनिश्चितता बढ़ना।
समय-सीमा निर्वाचन याचिका के बाद ही उपचार मिलने से त्वरित कार्रवाई में बाधा।

आगे की राह

  • संसद में बच्चों को चुनाव-प्रचार में शामिल करने के विषय पर व्यापक सार्वजनिक और विधायी चर्चा की जाए।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 में ऐसे आचरण की स्पष्ट परिभाषा जोड़ने पर विचार किया जाए।
  • निर्वाचन आयोग आदर्श आचार संहिता में बच्चों के उपयोग पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करे।
  • डिजिटल सामग्री की निगरानी के लिए सोशल मीडिया मंचों के साथ समन्वित तंत्र विकसित किया जाए।
  • बाल अधिकार और निजता से जुड़े मानकों को निर्वाचन प्रचार के नियमों में समाहित किया जाए।
  • मतदाता जागरूकता अभियानों में परिवार के भीतर स्वतंत्र निर्णय के महत्व को रेखांकित किया जाए।
  • आचरण संबंधी शिकायतों के त्वरित निवारण के लिए प्रक्रियागत सुधार पर विचार किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

निर्वाचन याचिका (Election Petition) · अनावश्यक प्रभाव (Undue Influence) · जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) · भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practices) · अनुच्छेद 329(ख) (Article 329(b)) · निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) · आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) · वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise) · बाल अधिकार और राज्य के नीति निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy) · मुक्त अभिव्यक्ति और राजनीतिक प्रचार (Freedom of Speech in Political Campaigning) · विधायी सुधार और चुनावी सुधार (Electoral Reforms) · लोकतांत्रिक शुचिता (Electoral Integrity)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग का अधीक्षण और नियंत्रण
  • अनुच्छेद 326: वयस्क मताधिकार और स्वतंत्र मतदान
  • अनुच्छेद 327: निर्वाचन संबंधी विधि बनाने की संसद की शक्ति
  • अनुच्छेद 329(ख): निर्वाचन विवादों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा

अवधारणा प्रवाह

राजनीतिक दल के प्रचार में बच्चों को परिवार के वयस्कों से मत मांगने के लिए प्रेरित किया जाता है।  →  परिवार के भीतर इन गतिविधियों के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा किए जाते हैं।  →  एक प्रत्याशी द्वारा इसे अनुचित प्रभाव बताते हुए निर्वाचन याचिका दायर की जाती है।  →  उच्च न्यायालय मौजूदा विधिक परिभाषा के आधार पर याचिका खारिज करता है, क्योंकि ऐसे कृत्य धारा 123 में स्पष्ट रूप से नहीं आते।  →  न्यायालय इस विषय पर नीतिगत निर्णय के लिए संसद में चर्चा की आवश्यकता बताता है।  →  संसद द्वारा विधिक परिभाषा में संशोधन पर विचार होने से भविष्य में ऐसे मामलों का निर्णय स्पष्ट आधार पर संभव होगा।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 के अंतर्गत ‘अनावश्यक प्रभाव’ को भ्रष्ट आचरण माना गया है, जिसमें मतदाता के निर्वाचन अधिकार के स्वतंत्र प्रयोग में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप सम्मिलित है।
2. अनुच्छेद 329(ख) के अंतर्गत निर्वाचन विषयों में न्यायालयों का हस्तक्षेप सामान्यतः निर्वाचन याचिका के माध्यम से ही संभव है।
3. भारत के संविधान के अनुच्छेद 326 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग स्वयं निर्वाचन याचिकाओं का निस्तारण करता है।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: धारा 123(2) में अनावश्यक प्रभाव की परिभाषा दी गई है, और इसे भ्रष्ट आचरण माना गया है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 329(ख) विधायिका द्वारा निर्धारित निर्वाचन याचिका को ही निर्वाचन विवादों का एकमात्र उपाय बनाता है। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार से संबंधित है, जबकि निर्वाचन याचिकाओं की सुनवाई उच्च न्यायालय करते हैं, निर्वाचन आयोग नहीं।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के विरुद्ध यह आरोप कि उसने बच्चों के माध्यम से परिवार के वयस्क सदस्यों को मतदान हेतु प्रभावित किया, अपने आप में निर्वाचन को शून्य घोषित करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
कारण (R): जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 100 में निर्वाचन को शून्य घोषित करने के आधार विहित हैं, और न्यायालय अधिनियम में वर्णित परिभाषा से बाहर जाकर नए आधार नहीं जोड़ सकते।

दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, किंतु R गलत है।
  4. A गलत है, किंतु R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — धारा 100 में निर्वाचन शून्य करने के आधार सीमित और विहित हैं, इसलिए अभिकथन का समर्थन कारण से होता है। यदि कोई कार्य धारा 123 की परिभाषा में नहीं आता, तो वह निर्वाचन शून्य करने का आधार नहीं बनता। अतः R, A की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित में से किस अनुच्छेद के अंतर्गत यह उपबंध है कि निर्वाचन संबंधी विषयों में न्यायालय, निर्वाचन याचिका के अतिरिक्त, हस्तक्षेप नहीं कर सकते?

  1. अनुच्छेद 324
  2. अनुच्छेद 326
  3. अनुच्छेद 329
  4. अनुच्छेद 330

उत्तर: अनुच्छेद 329 — अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को निर्वाचन संबंधी अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण की शक्ति देता है। अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार से संबंधित है। अनुच्छेद 329 के खंड (ख) में निर्वाचन संबंधी विवादों के लिए न्यायालयीय हस्तक्षेप पर रोक और निर्वाचन याचिका का प्रावधान है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ नाबालिग बच्चों को परिवार के वयस्क सदस्यों को किसी दल या उम्मीदवार के पक्ष में मतदान हेतु प्रभावित करने के लिए उपयोग करना लोकतांत्रिक शुचिता के लिए गंभीर चुनौती है, किंतु वर्तमान विधि इस आचरण को अनावश्यक प्रभाव की परिभाषा में सम्मिलित नहीं करती। इस स्थिति का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या इस अंतर को विधायी संशोधन द्वारा भरा जाना चाहिए, और यदि विधि में परिवर्तन न हो, तो निर्वाचन आयोग की आदर्श आचार संहिता के अंतर्गत भूमिका कितनी प्रभावी हो सकती है? (15 Marks)

रूपरेखा: 1. प्रस्थान-बिंदु: मद्रास उच्च न्यायालय का निर्णय, जिसमें न्यायाधीश ने माना कि वर्तमान विधि में बच्चों की ऐसी भागीदारी अनावश्यक प्रभाव की परिभाषा में नहीं आती, और यह विषय संसद के विचार के लिए छोड़ा गया। निर्णय में निर्वाचन याचिका को अस्वीकार किया गया।
2. संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार, 61वें संशोधन, 1988 द्वारा आयु 21 से 18 वर्ष); अनुच्छेद 324 (निर्वाचन आयोग का अधीक्षण); अनुच्छेद 329(ख) (निर्वाचन विषयों में न्यायिक हस्तक्षेप पर रोक); N.P. Ponnuswami बनाम Returning Officer (1952) में निर्वाचन याचिका को एकमात्र उपाय माना गया।
3. विधिक परिभाषा: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(2) में अनावश्यक प्रभाव की परिभाषा (मतदाता के स्वतंत्र निर्वाचन अधिकार में हस्तक्षेप, धमकी, सामाजिक बहिष्कार, क्षति का भय); धारा 100(1) में निर्वाचन शून्य करने के आधार। विश्लेषण करें कि ‘पारिवारिक संबंधों और भावनात्मक दबाव’ का प्रयोग परिभाषा में किस सीमा तक आ सकता है, और साक्ष्य में ‘प्रभाव के कारण-संबंध’ को सिद्ध करने की कठिनाई।
4. राजनीतिक अभिव्यक्ति बनाम शुचिता: अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत राजनीतिक अभिव्यक्ति और प्रचार की स्वतंत्रता; सुबह्मण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार (2013) में प्रतिज्ञाओं को सामान्यतः भ्रष्ट आचरण न मानने का दृष्टिकोण और निर्वाचन आयोग से दिशानिर्देश बनाने का आग्रह। दोनों पक्षों का संतुलन: अधिक व्यापक परिभाषा से निर्वाचन शून्य होने के मामलों में वृद्धि और अभिव्यक्ति पर अंकुश का जोखिम, बनाम संरक्षण का अभाव।
5. बाल संरक्षण का संदर्भ: अनुच्छेद 39(च) (बालकों को स्वस्थ और स्वतंत्र तथा गरिमापूर्ण परिस्थितियों में विकास के अवसर); अनुच्छेद 51क(ञ) (माता-पिता का शिक्षा संबंधी कर्तव्य, 86वाँ संशोधन, 2002); बाल अधिकार अभिसमय (UN Convention on the Rights of the Child, 1989), जिसे भारत ने 1992 में अनुसमर्थित किया। पारिवारिक मामलों और निजता में राज्य के हस्तक्षेप की सीमा।
6. सुधार के सुझाव: विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999) और दिनेश गोस्वामी समिति (1990) के चुनावी सुधार सुझाव; धारा 123 में स्पष्ट उपबंध, या आदर्श आचार संहिता के अंतर्गत निर्वाचन आयोग द्वारा निवारक निर्देश तथा सामाजिक माध्यमों पर निगरानी।
7. निष्कर्ष: विधायी स्पष्टता (संसद का विशेषाधिकार) और आयोग के निवारक उपाय, दोनों का संयुक्त उपयोग; निर्वाचन शून्य करने के कठोर उपाय और निवारक उपायों के बीच संतुलन, तथा निर्णय के उपरांत संसद के समक्ष विचार का महत्व।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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