केरल राज्य बाल अधिकार आयोग की वेबसाइट पर राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग के दिशानिर्देश

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केरल राज्य बाल अधिकार आयोग की वेबसाइट पर राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग के दिशानिर्देश

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बाल अधिकार दिशानिर्देश प्रसार प्रक्रिया

✎ NCPCR (CPCR अधिनियम, 2005 के तहत सांविधिक निकाय, 2007 में गठित) की SOP अब केरल राज्य आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं; ये POCSO, किशोर न्याय, RTE, साइबर सुरक्षा और सड़कों पर रहने वाले बच्चों से संबंधित हैं, और POCSO व RTE में आयोग…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन: सांविधिक निकाय, बच्चों से जुड़े कल्याणकारी विधान और उनका क्रियान्वयन  |  GS Paper II — सामाजिक न्याय: बच्चों जैसे सुभेद्य वर्गों के संरक्षण की व्यवस्थाएँ  |  GS Paper II — संघवाद: केंद्रीय आयोग और राज्य आयोग के बीच समन्वय  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा/साइबर सुरक्षा: बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा
  • Prelims: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR), बाल अधिकार संरक्षण आयोग (CPCR) अधिनियम, 2005, POCSO अधिनियम, 2012, किशोर न्याय अधिनियम, 2015, बाल कल्याण समिति और किशोर न्याय बोर्ड, RTE अधिनियम, 2009 और अनुच्छेद 21A, मानक संचालन प्रक्रिया (SOP), संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC), 1989, मिशन वात्सल्य, अनुच्छेद 24 और अनुच्छेद 39(e)-(f)
  • Essay: बच्चे राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी हैं: कानून बनाना पर्याप्त नहीं, उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक है, पारदर्शिता और सूचना की सुलभता सुशासन का आधार है

त्वरित पुनरावृत्ति: NCPCR (CPCR अधिनियम, 2005 के तहत सांविधिक निकाय, 2007 में गठित) की SOP अब केरल राज्य आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं; ये POCSO, किशोर न्याय, RTE, साइबर सुरक्षा और सड़कों पर रहने वाले बच्चों से संबंधित हैं, और POCSO व RTE में आयोग निगरानी निकाय हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (National Commission for Protection of Child Rights – NCPCR) द्वारा बच्चों से जुड़े मामलों पर जारी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) संबंधी दिशानिर्देश अब केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध होंगे। इनमें लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015, निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009, साइबर सुरक्षा तथा सड़कों पर रहने वाले बच्चों के संरक्षण से जुड़े बाल-अनुकूल निर्देश सम्मिलित हैं। राज्य आयोग ने एक वक्तव्य में कहा कि बच्चों के साथ काम करने वाले व्यक्तियों और बाल देखरेख संस्थाओं को इन दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करना चाहिए।

पृष्ठभूमि

  • भारत ने 1992 में संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC), 1989 का अनुसमर्थन किया। इसके बाद बाल अधिकारों के संरक्षण और निगरानी के लिए समर्पित संस्थागत ढाँचा बनाने पर बल दिया गया।
  • बाल अधिकार संरक्षण आयोग (CPCR) अधिनियम, 2005 के अंतर्गत मार्च 2007 में NCPCR का गठन हुआ। यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करने वाला सांविधिक निकाय है। अधिनियम की धारा 17 के अंतर्गत राज्यों में भी राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग गठित किए जा सकते हैं।
  • संविधान में बच्चों से जुड़े प्रावधान हैं: अनुच्छेद 21A (6 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा, 86वें संशोधन, 2002 द्वारा), अनुच्छेद 24 (14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक कार्यों में लगाने का निषेध), अनुच्छेद 15(3), अनुच्छेद 39(e)-(f) और अनुच्छेद 45 (राज्य के नीति निदेशक तत्त्व), तथा अनुच्छेद 51A(k) (माता-पिता/संरक्षक का कर्तव्य)।
  • POCSO अधिनियम, 2012 और RTE अधिनियम, 2009 में NCPCR तथा राज्य आयोगों को निगरानी की भूमिका दी गई है। POCSO में यह प्रावधान धारा 44 में है, और RTE अधिनियम में धारा 31 में।
  • किशोर न्याय अधिनियम, 2015 ने किशोर न्याय अधिनियम, 2000 का स्थान लिया। इसमें विधि-विरोधी बच्चों और देखरेख व संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के लिए किशोर न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समिति और दत्तक ग्रहण के लिए केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) की व्यवस्था है।
  • बाल संरक्षण सेवाओं के लिए मिशन वात्सल्य (Mission Vatsalya) योजना केंद्र सरकार की समेकित योजना है। इसके अंतर्गत बाल देखरेख संस्थाओं, पालन-पोषण देखभाल (Foster Care) आदि को सहायता मिलती है।

मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और NCPCR की भूमिका क्या है?

  • मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) चरणबद्ध लिखित निर्देश होते हैं। इनसे यह स्पष्ट होता है कि किसी विशेष स्थिति में कौन-सा अधिकारी या संस्था क्या कार्रवाई करेगी और किस क्रम में। इससे अलग-अलग क्षेत्रों में एकरूपता आती है।
  • NCPCR के प्रमुख कार्यों में बाल अधिकारों की रक्षा करने वाले विधिक और नीतिगत उपायों की जाँच व समीक्षा, बाल अधिकार उल्लंघन की शिकायतों की जाँच, तथा बाल अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना सम्मिलित हैं। इसमें एक अध्यक्ष और छह सदस्य होते हैं, जिनमें कम से कम दो महिलाएँ अनिवार्यतः होती हैं।
  • POCSO अधिनियम, 2012 में 18 वर्ष से कम आयु के सभी व्यक्ति ‘बालक’ माने जाते हैं। इसमें लैंगिक अपराधों की रिपोर्टिंग अनिवार्य है और मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों की व्यवस्था है। पीड़ित की पहचान गोपनीय रखना भी आवश्यक है। बाल-अनुकूल प्रक्रिया पर विशेष बल है। 2019 के संशोधन से गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमले के लिए दंड कठोर किया गया।
  • किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में विधि-विरोधी बच्चों के लिए पुनर्वास और सुधार पर बल है। देखरेख व संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के लिए बाल कल्याण समिति सर्वोच्च प्राधिकारी है। जघन्य अपराधों में 16-18 वर्ष के किशोरों के प्रारंभिक मूल्यांकन के बाद वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का प्रावधान भी है।
  • RTE अधिनियम, 2009 में 6-14 वर्ष के बच्चों को पड़ोस के विद्यालय में निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। निजी गैर-सहायता प्राप्त विद्यालयों में आर्थिक रूप से कमज़ोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं। आयोग इसके क्रियान्वयन की निगरानी करते हैं।
  • साइबर सुरक्षा और सड़कों पर रहने वाले बच्चों से जुड़े दिशानिर्देश नए जोखिमों को संबोधित करते हैं, जैसे ऑनलाइन शोषण और अनुपयुक्त सामग्री का प्रसार। इनमें अभावग्रस्त बच्चों की पहचान, उनका बचाव और पुनर्वास भी सम्मिलित है।
  • राज्य आयोग की वेबसाइट पर दिशानिर्देश उपलब्ध कराने से विद्यालयों, बाल देखरेख संस्थाओं, पुलिस और आँगनवाड़ी कर्मियों तक सूचना की सुलभता बढ़ती है। यह केंद्र और राज्य के बीच समन्वय का भी उदाहरण है।
  • सीमा: SOP और दिशानिर्देश मुख्यतः मार्गदर्शक होते हैं। उनका वास्तविक प्रभाव प्रशिक्षण, निगरानी, संसाधनों और जवाबदेही पर निर्भर करता है। आयोगों के पास अनुशंसा की शक्ति होती है, प्रवर्तन की नहीं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
NCPCR के SOP और दिशानिर्देशों का राज्य आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध होना राष्ट्रीय स्तर के निर्देश अब एक ही स्थान पर सुलभ हैं। बाल-संरक्षण से जुड़े कर्मियों को अलग-अलग स्रोत नहीं खोजने पड़ेंगे और राष्ट्रीय व राज्य स्तर के बीच एकरूपता बढ़ेगी।
विषय-क्षेत्र: POCSO अधिनियम, 2012; किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015; शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 तीनों कानून बच्चों की सुरक्षा, पुनर्वास और शिक्षा के मूल कानूनी आधार हैं। SOP इन कानूनों की धाराओं को व्यावहारिक कार्यविधि में बदलते हैं।
साइबर सुरक्षा और सड़क पर रहने वाले बच्चों के संरक्षण पर निर्देश ऑनलाइन शोषण और सड़कों पर रह रहे बच्चों की असुरक्षा उभरती चुनौतियाँ हैं। इन पर स्पष्ट प्रक्रिया से शुरुआती हस्तक्षेप संभव होता है।
बाल-अनुकूल (Child-friendly) प्रक्रिया पर बल पूछताछ, चिकित्सा परीक्षण, बयान और पुनर्वास में बच्चे को दोबारा आघात (Secondary Victimisation) से बचाने का सिद्धांत अपनाया गया है।
बच्चों के साथ कार्य करने वालों और बाल देखरेख संस्थानों के लिए कठोर अनुपालन की अपेक्षा संस्थागत जवाबदेही तय होती है। निर्देशों की अनदेखी पर निरीक्षण और कार्रवाई का आधार बनता है, हालाँकि बाध्यकारी बल मूल अधिनियम पर निर्भर करता है।
संघीय ढाँचे में राष्ट्रीय और राज्य आयोग की पूरक भूमिका आयोग बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के अंतर्गत गठित वैधानिक निकाय हैं। राज्य आयोग राष्ट्रीय मानकों को स्थानीय स्तर पर लागू करने की कड़ी का काम करता है।

महत्व

सामाजिक और बाल-अधिकार आयाम

  • बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध, उपेक्षा और शोषण के मामलों में एकसमान प्रक्रिया से पीड़ित बच्चे को समय पर और संवेदनशील न्याय मिलने की संभावना बढ़ती है।
  • सड़क पर रहने वाले जैसे सर्वाधिक वंचित बच्चों को नीति के केंद्र में लाने से ‘कोई बच्चा पीछे न छूटे’ का लक्ष्य मज़बूत होता है।
  • बाल-अनुकूल प्रक्रिया बच्चे की गरिमा और निजता की रक्षा करती है, जो संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC) की भावना के अनुरूप है।

शासन और प्रशासनिक आयाम

  • सार्वजनिक वेबसाइट पर दिशानिर्देश रखने से पारदर्शिता और सूचना की सुलभता बढ़ती है।
  • पुलिस, बाल कल्याण समिति, शिक्षक, बाल देखरेख संस्थान और स्थानीय निकाय सभी एक ही प्रक्रिया-पुस्तिका का उपयोग कर सकते हैं, जिससे अंतर-विभागीय समन्वय सुधरता है।
  • स्पष्ट SOP से निगरानी और जवाबदेही का मानक तय होता है। चूक होने पर उत्तरदायित्व निर्धारण सरल होता है।

विधिक और संस्थागत आयाम

  • POCSO अधिनियम (धारा 44), किशोर न्याय अधिनियम (धारा 109) और शिक्षा का अधिकार अधिनियम (धारा 31) में NCPCR और राज्य आयोगों को क्रियान्वयन की निगरानी का दायित्व दिया गया है। यह कदम उसी भूमिका को व्यावहारिक रूप देता है।
  • राष्ट्रीय स्तर के निर्देशों का राज्य स्तर पर प्रसार सहकारी संघवाद की भावना को मज़बूत करता है।

डिजिटल और उभरती चुनौतियों का आयाम

  • साइबर सुरक्षा पर निर्देश ऑनलाइन ग्रूमिंग, साइबर बुलिंग और बाल यौन शोषण सामग्री जैसे खतरों के प्रति संस्थाओं को तैयार करते हैं।
  • विद्यालयों और संस्थानों में डिजिटल उपयोग बढ़ने के साथ ऐसे प्रोटोकॉल निवारक सुरक्षा-कवच का काम करते हैं।

चुनौतियाँ

1. निर्देशों का अनुपालन और क्रियान्वयन अंतराल

  • वेबसाइट पर निर्देश उपलब्ध होना ज़मीनी स्तर पर उनके पालन की गारंटी नहीं है।
  • ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में बाल देखरेख संस्थानों और स्थानीय कर्मियों तक जानकारी और प्रशिक्षण कम पहुँचता है।

2. निर्देशों की विधिक बाध्यता

  • SOP और दिशानिर्देशों का बाध्यकारी बल मूल अधिनियम और नियमों पर निर्भर करता है। आयोग के पास मुख्यतः जाँच, सिफ़ारिश और निगरानी की शक्तियाँ हैं।
  • अनुपालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई के लिए अन्य प्राधिकरणों पर निर्भर रहना पड़ता है।

3. संस्थागत क्षमता और संसाधनों की कमी

  • बाल कल्याण समितियों, किशोर न्याय बोर्डों, विशेष किशोर पुलिस इकाइयों और परिवीक्षा अधिकारियों में रिक्तियाँ और प्रशिक्षण की कमी बार-बार सामने आती है।
  • राज्य आयोगों के पास पर्याप्त कर्मचारी और बजट न होने पर निगरानी कमज़ोर पड़ती है।

4. POCSO मामलों में विलंब और पीड़ित का पुनः आघात

  • विशेष न्यायालयों में मामलों का लंबित रहना और बार-बार बयान लेना बच्चे के लिए कष्टकारी होता है।
  • चिकित्सा, परामर्श और विधिक सहायता का समन्वय अक्सर टूट जाता है।

5. साइबर जोखिमों की तीव्र गति

  • डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और तकनीक इतनी तेज़ी से बदलते हैं कि स्थिर दिशानिर्देश जल्दी पुराने पड़ सकते हैं।
  • अभिभावकों और बच्चों में डिजिटल साक्षरता कम होने से रिपोर्टिंग और रोकथाम कमज़ोर रहती है।

6. सड़क पर रहने वाले बच्चों की पहचान और पुनर्वास

  • इन बच्चों के पास प्रायः पहचान-पत्र, स्थायी पता और अभिभावक नहीं होते, इसलिए वे योजनाओं से बाहर रह जाते हैं।
  • पलायन, गरीबी और पारिवारिक हिंसा जैसे मूल कारणों का समाधान किए बिना केवल प्रक्रियात्मक निर्देश अपर्याप्त हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
सूचना की उपलब्धता बनाम उपयोग निर्देश ऑनलाइन होने पर भी निचले स्तर के कर्मी और संस्थान उन्हें पढ़ते और अपनाते हैं या नहीं, यह अनिश्चित है।
विधिक बल दिशानिर्देशों के उल्लंघन पर स्वतः दंड का स्पष्ट तंत्र न होने से उनका प्रभाव सीमित रह सकता है।
क्षमता रिक्त पद, अपर्याप्त प्रशिक्षण और सीमित बजट SOP के क्रियान्वयन में बाधा बनते हैं।
न्याय में विलंब POCSO मामलों की लंबित संख्या और बार-बार बयान बाल-अनुकूल प्रक्रिया की भावना को कमज़ोर करते हैं।
डिजिटल खतरे ऑनलाइन शोषण के नए रूपों के सामने दिशानिर्देशों को निरंतर अद्यतन करने की आवश्यकता है।
वंचित बच्चे सड़क पर रहने वाले बच्चों की पहचान, दस्तावेज़ और दीर्घकालिक पुनर्वास सबसे कठिन पक्ष हैं।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • मिशन वात्सल्य (Mission Vatsalya): बाल संरक्षण सेवाओं की एकीकृत योजना, जिसमें संस्थागत देखरेख के साथ प्रायोजन और पालन-पोषण जैसी गैर-संस्थागत देखरेख तथा संकटग्रस्त व सड़क पर रहने वाले बच्चों के लिए सहायता शामिल है।
  • POCSO ई-बॉक्स (POCSO e-Box): NCPCR की ऑनलाइन शिकायत प्रणाली, जिसके माध्यम से बच्चे यौन शोषण की शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
  • चाइल्डलाइन 1098 (CHILDLINE 1098): संकट में फँसे बच्चों के लिए 24 घंटे की निःशुल्क आपातकालीन हेल्पलाइन सेवा।
  • समग्र शिक्षा (Samagra Shiksha): स्कूली शिक्षा की एकीकृत योजना, जो शिक्षा का अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन से सीधे जुड़ी है।

आगे की राह

  • दिशानिर्देशों का सरल भाषा और स्थानीय भाषा में सारांश तैयार किया जाए, तथा पुलिस, शिक्षकों, बाल कल्याण समितियों और बाल देखरेख संस्थानों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएँ।
  • राज्य आयोग और ज़िला बाल संरक्षण इकाइयों द्वारा संस्थानों का आवधिक सामाजिक अंकेक्षण और निरीक्षण हो, ताकि अनुपालन की वास्तविक स्थिति सामने आए।
  • SOP को बदलती तकनीक और कानूनी संशोधनों के अनुसार निश्चित अंतराल पर अद्यतन किया जाए और उसकी संस्करण-तिथि वेबसाइट पर दी जाए।
  • बाल कल्याण समितियों, किशोर न्याय बोर्डों और विशेष किशोर पुलिस इकाइयों की रिक्तियाँ भरी जाएँ और राज्य आयोगों को पर्याप्त संसाधन तथा कर्मचारी उपलब्ध कराए जाएँ।
  • POCSO मामलों में बयान दर्ज करने, चिकित्सा परीक्षण और परामर्श के लिए एकीकृत सहायता व्यक्ति (Support Person) की व्यवस्था सुदृढ़ की जाए, ताकि विलंब और पुनः आघात घटे।
  • विद्यालयों में डिजिटल साक्षरता और साइबर सुरक्षा शिक्षा को पाठ्यचर्या तथा अभिभावक-शिक्षक संवाद का हिस्सा बनाया जाए।
  • सड़क पर रहने वाले बच्चों के लिए पहचान दस्तावेज़, आश्रय, शिक्षा में पुनः प्रवेश और परिवार से पुनर्मिलन को जोड़ने वाला व्यक्ति-आधारित केस प्रबंधन अपनाया जाए।
  • राष्ट्रीय और राज्य आयोगों के बीच नियमित समन्वय तथा निर्देशों के प्रभाव के आँकड़ों का सार्वजनिक प्रकाशन किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 (राष्ट्रीय एवं राज्य आयोग) · मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और अनुशंसात्मक दिशानिर्देश · POCSO अधिनियम, 2012 की धारा 44 (अनुश्रवण) · किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 · बाल कल्याण समिति और किशोर न्याय बोर्ड · अनुच्छेद 21A और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 · बाल-हितैषी न्याय प्रक्रिया · साइबर सुरक्षा और ऑनलाइन बाल शोषण · सड़क पर रहने वाले बच्चे (संस्थागत देखरेख और पुनर्वास) · सहकारी संघवाद और केंद्र-राज्य समन्वय · पारदर्शिता और सूचना की सुलभता · मिशन वात्सल्य

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21A — 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा
  • अनुच्छेद 15(3) — बच्चों के लिए विशेष प्रावधान की शक्ति
  • अनुच्छेद 21 — बच्चे का गरिमामय जीवन और सुरक्षा
  • अनुच्छेद 24 — खतरनाक कार्यों में बाल-नियोजन निषेध
  • अनुच्छेद 39(e) और (f) — बच्चों का स्वस्थ विकास, शोषण से सुरक्षा
  • अनुच्छेद 45 — छह वर्ष तक प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख
  • अनुच्छेद 51A(k) — माता-पिता का 6–14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा दिलाने का कर्तव्य

अवधारणा प्रवाह

संविधान के अनुच्छेद 15(3), 21, 21A और 39 बच्चों के संरक्षण का मूल आधार बनाते हैं  →  POCSO, किशोर न्याय और शिक्षा का अधिकार जैसे कानून अधिकारों को विधिक रूप देते हैं  →  बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के अंतर्गत NCPCR को निगरानी और मार्गदर्शन का दायित्व मिलता है  →  NCPCR कानूनों को लागू करने के लिए SOP और बाल-अनुकूल दिशानिर्देश जारी करता है  →  राज्य आयोग इन दिशानिर्देशों को अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध कराता है, जिससे सुलभता और एकरूपता बढ़ती है  →  संस्थान और कर्मी निर्देशों का पालन करते हैं तथा आयोग निगरानी और निरीक्षण करता है  →  परिणामस्वरूप बच्चों की सुरक्षा, समय पर न्याय और पुनर्वास सुदृढ़ होता है

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) एक सांविधिक निकाय है।
2. इस अधिनियम के अनुसार प्रत्येक राज्य सरकार के लिए राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग का गठन अनिवार्य है।
3. NCPCR को शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के क्रियान्वयन की निगरानी का दायित्व सौंपा गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: NCPCR का गठन 2005 के अधिनियम के अंतर्गत 2007 में हुआ। कथन 2 गलत है: अधिनियम की धारा 17 के अनुसार राज्य सरकार आयोग का गठन ‘कर सकती है’, यह अनिवार्य नहीं है। कथन 3 सही है: RTE अधिनियम की धारा 31 के अंतर्गत NCPCR और राज्य आयोग अनुश्रवण करते हैं।

Q2. अभिकथन (A): 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा भारत में मूल अधिकार है।
कारण (R): संविधान (86वाँ संशोधन) अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद 21A जोड़ा गया।
नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किंतु R गलत है
  4. A गलत है, किंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — 86वें संशोधन (2002) ने अनुच्छेद 21A जोड़कर 6-14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा को मूल अधिकार बनाया। इसी के क्रियान्वयन के लिए RTE अधिनियम, 2009 बना। अतः R, A की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित संवैधानिक अनुच्छेदों को उनके विषय से सुमेलित कीजिए:
स्तंभ-I: A. अनुच्छेद 21A B. अनुच्छेद 24 C. अनुच्छेद 45 D. अनुच्छेद 51A(k)
स्तंभ-II: 1. छह वर्ष तक के बच्चों की प्रारंभिक देखरेख और शिक्षा 2. माता-पिता/संरक्षक का 6-14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा के अवसर देने का कर्तव्य 3. 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा 4. कारखानों, खानों या अन्य खतरनाक कार्यों में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के नियोजन का निषेध

  1. A-1, B-4, C-3, D-2
  2. A-3, B-2, C-4, D-1
  3. A-3, B-4, C-1, D-2
  4. A-4, B-3, C-2, D-1

उत्तर: A-3, B-4, C-1, D-2 — अनुच्छेद 21A शिक्षा का मूल अधिकार है, अनुच्छेद 24 खतरनाक नियोजन का निषेध करता है, अनुच्छेद 45 (नीति निदेशक तत्त्व) छह वर्ष तक के बच्चों की प्रारंभिक देखरेख और शिक्षा से संबंधित है, और अनुच्छेद 51A(k) माता-पिता का मूल कर्तव्य है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ बाल संरक्षण के संस्थागत ढाँचे में राष्ट्रीय और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। राष्ट्रीय आयोग के मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) संबंधी दिशानिर्देशों को राज्य आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध कराना बच्चों के साथ कार्य करने वाली संस्थाओं में अनुपालन सुधारने में कहाँ तक प्रभावी हो सकता है? (15 Marks)

रूपरेखा: भूमिका: बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के अंतर्गत NCPCR (2007 में स्थापित) और राज्य आयोग (धारा 17, राज्य के लिए वैकल्पिक); केरल राज्य आयोग द्वारा NCPCR के दिशानिर्देश (POCSO, किशोर न्याय अधिनियम, RTE, साइबर सुरक्षा, सड़कों पर रहने वाले बच्चे) वेबसाइट पर डालना इस अनुपालन-ढाँचे की कड़ी है।
मुख्य भाग-1 (भूमिका): (i) धारा 13 के कार्य: अधिकार-रक्षा उपायों की जाँच, शिकायतों की जाँच, अनुशंसा; (ii) धारा 14 के अंतर्गत जाँच में सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ; (iii) POCSO अधिनियम की धारा 44, किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 109 और RTE अधिनियम की धारा 31 के अंतर्गत अनुश्रवण; (iv) संस्थाओं (बाल देखरेख संस्थाएँ, बाल कल्याण समिति, किशोर न्याय बोर्ड) का निरीक्षण; (v) संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 15(3), 21A, 24, 39(e)-(f), 45, 51A(k)।
मुख्य भाग-2 (SOP की प्रभावशीलता): सकारात्मक — सुलभता और पारदर्शिता, देश भर में एकरूप प्रक्रिया, ज़मीनी कर्मियों (पुलिस, शिक्षक, संस्था-प्रबंधक) के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन, सहकारी संघवाद के अंतर्गत राष्ट्रीय-राज्य समन्वय, बाल-हितैषी प्रक्रिया से द्वितीयक पीड़ा में कमी। सीमाएँ — दिशानिर्देश मुख्यतः अनुशंसात्मक हैं, उनका स्वतः बाध्यकारी बल नहीं; आयोगों में रिक्तियाँ और संसाधन-अभाव (सुप्रीम कोर्ट: Sampurna Behura बनाम भारत संघ, 2018, जिसमें राज्य आयोगों के गठन और किशोर न्याय तंत्र की कमियों पर निर्देश दिए गए); डिजिटल खाई और ग्रामीण स्तर पर जागरूकता का अभाव; प्रकाशन मात्र पर्याप्त नहीं, प्रशिक्षण और निरीक्षण आवश्यक।
न्यायिक संदर्भ: Bachpan Bachao Andolan बनाम भारत संघ (2011), Independent Thought बनाम भारत संघ (2017), Unni Krishnan (1993) — बच्चों के अधिकारों की व्याख्या।
आगे की राह: SOP का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद और सरल रूप, मिशन वात्सल्य के अंतर्गत नियमित प्रशिक्षण, अनुपालन का सामाजिक अंकेक्षण, आयोगों को सांविधिक स्वायत्तता और संसाधन, शिकायत निवारण का डिजिटल तंत्र (जैसे NCPCR का POCSO e-Box)। निष्कर्ष: सूचना की सुलभता अनुपालन की पहली सीढ़ी है, पर प्रभाव जवाबदेही और क्षमता-निर्माण से ही आएगा।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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