05 Nov NHRC हस्तक्षेप: हैदराबाद जेल में लैंगिक-तटस्थ प्रकोष्ठ की स्थापना
✎ जेल राज्य सूची का विषय है, पर बंदी की गरिमा और लैंगिक पहचान का संरक्षण अनुच्छेद 21 और 15 से जुड़ा संवैधानिक दायित्व है, जिसके प्रवर्तन में NHRC की सिफारिशें निर्णायक प्रभाव डालती हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजनीति एवं शासन (संवैधानिक निकाय, मानव अधिकार संरक्षण, राज्य के नीति-निर्देशक तत्व के संदर्भ में सामाजिक न्याय) | GS Paper II — सामाजिक न्याय (समाज के वंचित और सीमांत वर्गों के अधिकार, कमज़ोर वर्गों के लिए संरक्षण)
- Prelims: राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) और मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12, अनुच्छेद 21: जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार (गरिमा सहित), अनुच्छेद 14 और 15: समता और लिंग आधारित भेदभाव का निषेध, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ (NALSA, 2014) निर्णय, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019, जेल: राज्य सूची की प्रविष्टि 4 (सातवीं अनुसूची), मॉडल जेल मैनुअल, 2016 (गृह मंत्रालय), प्रिज़न्स एक्ट, 1894
- Essay: गरिमा के साथ जीने का अधिकार और राज्य का सकारात्मक दायित्व: बंदीगृहों में समानता का प्रश्न, लैंगिक विविधता और समावेशी समाज: कानून की घोषणा से व्यवहार के बदलाव तक
त्वरित पुनरावृत्ति: जेल राज्य सूची का विषय है, पर बंदी की गरिमा और लैंगिक पहचान का संरक्षण अनुच्छेद 21 और 15 से जुड़ा संवैधानिक दायित्व है, जिसके प्रवर्तन में NHRC की सिफारिशें निर्णायक प्रभाव डालती हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) के हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप हैदराबाद के सेंट्रल प्रिज़न में विविध लिंग पहचान और अभिव्यक्ति वाले व्यक्तियों के लिए एक लिंग-तटस्थ कक्ष (Gender-Neutral Cell) की स्थापना की गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जेल जैसे संस्थागत परिवेश में भी बंदियों की लैंगिक पहचान के आधार पर गरिमा, सुरक्षा और उचित आवास सुनिश्चित करना राज्य का संवैधानिक एवं मानवीय उत्तरदायित्व है। यह कदम उस व्यापक प्रवृत्ति को भी दर्शाता है जिसमें मानव अधिकार संस्थाएँ व्यक्तिगत शिकायतों और हस्तक्षेप के माध्यम से प्रशासनिक व्यवहार में सुधार लाती हैं।
पृष्ठभूमि
- भारत में जेल प्रशासन मुख्यतः राज्य का विषय है, इसलिए जेल सुधार और बंदी-कल्याण की नीतियाँ संबंधित राज्य सरकारों द्वारा लागू की जाती हैं, जबकि केंद्र सरकार मॉडल मैनुअल और दिशानिर्देश जारी करती है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने NALSA निर्णय (2014) में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तृतीय लिंग के रूप में मान्यता दी और आत्म-पहचान (self-identification) के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 से जोड़ा।
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने भेदभाव के निषेध और सामाजिक-आर्थिक अधिकारों का वैधानिक ढाँचा प्रदान किया।
- मॉडल जेल मैनुअल, 2016 में विविध लिंग पहचान वाले बंदियों के आवास, सुरक्षा और देखभाल से संबंधित प्रावधानों को स्थान दिया गया, जिन्हें राज्यों द्वारा अपनाने की अपेक्षा है।
- NHRC एक वैधानिक निकाय है जिसे मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत स्थापित किया गया है; इसके कार्यों में जेलों का निरीक्षण और मानव अधिकार उल्लंघन की जाँच शामिल है।
लिंग-तटस्थ कक्ष क्या है?
- लिंग-तटस्थ कक्ष ऐसा आवासीय या प्रशासनिक प्रावधान है जिसमें बंदी की लैंगिक पहचान और अभिव्यक्ति को ध्यान में रखते हुए उसे पुरुष या महिला वर्ग के कठोर द्विआधारी ढाँचे के बजाय उपयुक्त स्थान पर रखा जाता है।
- इसका मूल आधार गरिमा का अधिकार (अनुच्छेद 21) और लैंगिक भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15) है।
- ऐसे कक्षों में सुरक्षा, गोपनीयता, चिकित्सकीय देखभाल और सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करना प्रशासन की प्रमुख जिम्मेदारी है।
- NHRC का हस्तक्षेप मुख्यतः सिफारिश, निगरानी और जाँच के रूप में होता है; वह न्यायालय की भाँति बाध्यकारी आदेश नहीं देता, परंतु उसकी सिफारिशों का नैतिक और प्रशासनिक महत्व बहुत अधिक होता है।
- जेल एक राज्य विषय होने के कारण ऐसे कक्षों की स्थापना और संचालन का दायित्व संबंधित राज्य सरकार तथा जेल विभाग का होता है।
- मॉडल जेल मैनुअल, 2016 और NALSA निर्णय जैसे संदर्भ इस दिशा में नीतिगत आधार प्रदान करते हैं।
- यह व्यवस्था शारीरिक सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और पुनर्वास के सिद्धांतों से भी जुड़ी है, क्योंकि उपेक्षा से हिंसा और अलगाव का खतरा बढ़ता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| घटना का स्वरूप | राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (National Human Rights Commission) के हस्तक्षेप से हैदराबाद की केंद्रीय जेल में लैंगिक-तटस्थ कक्ष की स्थापना, जो विविध लैंगिक पहचान और अभिव्यक्ति वाले बंदियों के लिए है |
| संस्थागत आधार | राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत एक वैधानिक निकाय है, जो मानव अधिकार उल्लंघन की शिकायतों पर स्वतः संज्ञान या शिकायत के आधार पर कार्रवाई कर सकता है |
| लक्षित समूह | ट्रांसजेंडर व्यक्ति (Transgender Persons) और अन्य विविध लैंगिक पहचान वाले बंदी, जिन्हें सामान्य पुरुष या महिला बैरकों में रखने से शारीरिक सुरक्षा, गोपनीयता और गरिमा से जुड़े जोखिम उत्पन्न होते हैं |
| नीतिगत निहितार्थ | जेल प्रशासन में बंदियों के आवास, सुरक्षा और चिकित्सा सेवाओं को लैंगिक पहचान के आधार पर संवेदनशील बनाने का व्यावहारिक उदाहरण, जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की भावना से मेल खाता है |
| प्रशासनिक प्रभाव | राज्य स्तर पर जेल प्रबंधन की भूमिका को रेखांकित करता है, क्योंकि कारागार राज्य सूची का विषय है और सुधार के लिए राज्य सरकार की पहल निर्णायक होती है |
महत्व
मानव अधिकार और संवैधानिक दृष्टि
- गरिमा के साथ जीने का अधिकार बंदियों पर भी लागू होता है, और लैंगिक पहचान के आधार पर भेदभाव से बचाव संवैधानिक समानता का विस्तार है
- नालसा बनाम भारत संघ (NALSA v. Union of India, 2014) के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की स्व-पहचान को मान्यता दी, जिसे कारागार प्रशासन में भी लागू करना आवश्यक है
- जेल जैसे बंद परिवेश में राज्य की देखभाल की जिम्मेदारी अधिक होती है, इसलिए यह अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा प्रश्न बन जाता है
सामाजिक न्याय और समावेशन
- विविध लैंगिक पहचान वाले व्यक्ति पहले से ही सामाजिक बहिष्कार और हिंसा का सामना करते हैं, और कारागार में यह जोखिम और बढ़ जाता है
- पृथक और सुरक्षित आवास से यौन हिंसा, उत्पीड़न और मानसिक आघात की संभावना घटती है, जिससे पुनर्वास की प्रक्रिया सहज होती है
प्रशासनिक और सुधारात्मक पहलू
- आदर्श कारा नियमावली, 2016 (Model Prison Manual, 2016) में ट्रांसजेंडर बंदियों के वर्गीकरण और देखभाल के संदर्भ में दिशानिर्देश शामिल हैं, जिन्हें राज्यों द्वारा अपनाना अपेक्षित है
- मानव अधिकार आयोग का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि कानूनी दिशानिर्देशों के क्रियान्वयन की निगरानी में आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण है
चुनौतियाँ
1. सुरक्षा और गोपनीयता का संतुलन
- लैंगिक-तटस्थ कक्ष में रखे गए बंदियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और साथ ही उन्हें अलगाव (Isolation) की स्थिति में न डालना एक जटिल चुनौती है
- अलग कक्ष में रखे जाने पर सामाजिक कलंक और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ सकता है
यूपीएससी लिंक: GS-2: मानव अधिकार, सामाजिक न्याय और कमजोर वर्गों का संरक्षण
2. स्व-पहचान का व्यावहारिक निर्धारण
- बंदी की लैंगिक पहचान का सम्मान करते हुए उसका दस्तावेजी और चिकित्सीय रिकॉर्ड कैसे रखा जाए, यह स्पष्ट प्रक्रिया की माँग करता है
- पहचान की पुष्टि के लिए अनावश्यक या अपमानजनक जाँच से बचना आवश्यक है
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन में प्रक्रियात्मक न्याय और मानव गरिमा
3. राज्यों में एकरूप क्रियान्वयन का अभाव
- कारागार राज्य सूची का विषय होने के कारण हर राज्य की जेल नियमावली और संसाधन भिन्न हैं
- एक जेल में पहल होने से पूरे राज्य या देश में समान व्यवहार सुनिश्चित नहीं होता
यूपीएससी लिंक: GS-2: केंद्र-राज्य संबंध और संघवाद
4. प्रशिक्षण और संवेदनशीलता की कमी
- जेल कर्मचारियों में लैंगिक विविधता के प्रति संवेदनशीलता और प्रशिक्षण का अभाव अक्सर भेदभाव का कारण बनता है
- चिकित्सा, परामर्श और कानूनी सहायता की सेवाएँ इन बंदियों तक सीमित रूप में पहुँचती हैं
यूपीएससी लिंक: GS-2: लोक सेवा में संवेदनशीलता और प्रशासनिक सुधार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| सुरक्षा बनाम अलगाव | सुरक्षित आवास देते समय बंदी को सामाजिक और मानसिक रूप से अलग-थलग न होने देना |
| पहचान का सम्मान | बंदी की स्व-घोषित लैंगिक पहचान को दस्तावेज़ों और दैनिक व्यवहार में सम्मानपूर्वक लागू करना |
| राज्यों के बीच असमानता | कारागार राज्य सूची का विषय होने से समान मानक का अभाव |
| कर्मचारी प्रशिक्षण | जेल स्टाफ को लैंगिक संवेदनशीलता का नियमित प्रशिक्षण न मिल पाना |
| स्वास्थ्य और परामर्श सेवाएँ | चिकित्सीय और मनोवैज्ञानिक सहायता की उपलब्धता सीमित होना |
आगे की राह
- सभी राज्यों द्वारा आदर्श कारा नियमावली, 2016 के ट्रांसजेंडर बंदियों से संबंधित प्रावधानों को अपनी जेल नियमावली में औपचारिक रूप से शामिल करना
- बंदी की स्व-घोषित लैंगिक पहचान के आधार पर आवास, वर्गीकरण और सुरक्षा का स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाना
- जेल कर्मचारियों और पर्यवेक्षकों के लिए लैंगिक संवेदनशीलता और मानव अधिकार पर अनिवार्य प्रशिक्षण आयोजित करना
- चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक परामर्श और विधिक सहायता सेवाओं को ऐसे बंदियों तक विशेष रूप से पहुँचाना
- कारागार में शिकायत निवारण तंत्र को सुलभ बनाना, जिसमें गोपनीय शिकायत की व्यवस्था हो
- राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा राज्य जेलों के निरीक्षण में इस विषय को नियमित रूप से शामिल करना
- ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के पुनर्वास और रोजगार के लिए जेल से रिहाई के बाद सहायता तंत्र को जोड़ना
- जेल सुधार और मानव अधिकार से जुड़े नीतिगत अनुभवों का राज्यों के बीच साझा मंच पर आदान-प्रदान करना
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
लिंग-तटस्थ प्रकोष्ठ (Gender-Neutral Cell) · राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) · मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 · कारागार (Prison) और राज्य सूची की प्रविष्टि 4 · NALSA बनाम भारत संघ (2014) · अनुच्छेद 21 और गरिमा के साथ जीने का अधिकार · पारलिंगी व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 · मॉडल जेल मैनुअल, 2016 · नेल्सन मंडेला नियम (UN Mandela Rules, 2015) · स्वयं-अभिज्ञात लैंगिक पहचान (Self-identified Gender Identity) · समानता का अधिकार और भेदभाव-निषेध · विविध लैंगिक पहचान
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता, बंदियों के समान व्यवहार से जुड़ा
- अनुच्छेद 15: लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध, लैंगिक पहचान तक विस्तार
- अनुच्छेद 21: गरिमा और सुरक्षा के साथ जीवन का अधिकार
अवधारणा प्रवाह
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों और विविध लैंगिक पहचान वाले बंदियों को सामान्य बैरकों में रखने से सुरक्षा और गरिमा के जोखिम उत्पन्न होते हैं → राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग शिकायत या स्वतः संज्ञान के माध्यम से मामले में हस्तक्षेप करता है → आयोग के हस्तक्षेप से जेल प्रशासन लैंगिक-तटस्थ कक्ष की व्यवस्था की ओर अग्रसर होता है → लैंगिक-तटस्थ कक्ष में बंदियों को सुरक्षित और सम्मानजनक आवास मिलता है → सुरक्षा, गोपनीयता और चिकित्सीय सहायता में सुधार से मानव अधिकारों की व्यावहारिक रक्षा होती है → यह मॉडल नियमावली और अन्य राज्यों की जेलों के लिए मार्गदर्शक बनने की संभावना रखता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत हुई है।
2. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सिफारिशें राज्य सरकारों पर बाध्यकारी होती हैं।
3. कारागार और कारागारों का प्रबंधन संविधान की राज्य सूची का विषय है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: NHRC की स्थापना मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत हुई है। कथन 2 गलत है: आयोग की सिफारिशें सलाहकारी प्रकृति की होती हैं, बाध्यकारी नहीं; आयोग संबंधित प्राधिकारी से कार्रवाई-रिपोर्ट माँग सकता है। कथन 3 सही है: कारागार संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 4 में आता है, इसलिए इसका प्रबंधन मुख्यतः राज्यों का दायित्व है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ने NALSA मामले में पारलिंगी व्यक्तियों की स्वयं-अभिज्ञात लैंगिक पहचान को मान्यता दी।
कारण (R): सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार लैंगिक पहचान अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा के साथ जीने के अधिकार का अभिन्न अंग है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — NALSA बनाम भारत संघ (2014) में सर्वोच्च न्यायालय ने तीसरे लिंग की मान्यता दी और स्वयं-अभिज्ञात लैंगिक पहचान को अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 से जोड़ा। इसी निर्णय में कहा गया कि लैंगिक पहचान व्यक्ति की गरिमा का मूल तत्व है, इसलिए (R) (A) की सही व्याख्या करता है।
Q3. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए:
सूची-I (निर्णय/अधिनियम)
A. NALSA बनाम भारत संघ
B. नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ
C. के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ
D. मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993
सूची-II (विषय-वस्तु)
1. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का वैधानिक आधार
2. सहमति से समलैंगिक संबंधों पर दंड-प्रावधान का अंशतः निरस्तीकरण
3. निजता का अधिकार, जिसमें लैंगिक झुकाव भी सम्मिलित है
4. तीसरे लिंग की मान्यता
सही सुमेलन चुनिए:
- A-4, B-2, C-3, D-1
- A-2, B-4, C-3, D-1
- A-4, B-3, C-2, D-1
- A-4, B-2, C-1, D-3
उत्तर: A-4, B-2, C-3, D-1 — NALSA (2014) ने तीसरे लिंग को मान्यता दी (A-4)। नवतेज सिंह जौहर (2018) में धारा 377 को सहमति-आधारित वयस्क संबंधों के संदर्भ में अंशतः निरस्त किया गया (B-2)। पुट्टस्वामी (2017) ने निजता को अनुच्छेद 21 का मूल अंग माना, जिसमें लैंगिक झुकाव भी आता है (C-3)। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का वैधानिक आधार है (D-1)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ कारागार जैसी बंद संस्थाओं में विविध लैंगिक पहचान वाले व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमा और समानता की गारंटी का व्यावहारिक परीक्षण है। भारत में इस संदर्भ में विद्यमान विधिक और नीतिगत ढाँचे की पर्याप्तता की समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए। साथ ही बताइए कि कारागार-स्तर पर लिंग-तटस्थ प्रकोष्ठ जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ राज्य-विषयक प्रशासनिक अधिकार-क्षेत्र और केंद्रीय मानक-निर्धारण के बीच किस सीमा तक संतुलन स्थापित कर सकती हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा:
(1) भूमिका: NHRC के हस्तक्षेप से हैदराबाद के केंद्रीय कारागार में लिंग-तटस्थ प्रकोष्ठ की स्थापना को उदाहरण के रूप में रखें; यह बताएँ कि यह सुधार विधिक अधिकार को व्यवहार में उतारने का प्रयास है।
(2) संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता), 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव-निषेध), 19 (अभिव्यक्ति और आवागमन) और 21 (गरिमा सहित जीवन का अधिकार); कारागार अनुच्छेद 21 की सीमा के भीतर आने वाले बंदी-अधिकारों से बँधे हैं।
(3) न्यायिक विकास: NALSA बनाम भारत संघ (2014) में तीसरे लिंग की मान्यता और स्वयं-अभिज्ञात पहचान का सिद्धांत; के.एस. पुट्टस्वामी (2017) में निजता व लैंगिक झुकाव; नवतेज सिंह जौहर (2018) में धारा 377 का अंशतः निरस्तीकरण; इन निर्णयों का जेल-प्रशासन पर विस्तार।
(4) विधिक ढाँचा: पारलिंगी व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 में भेदभाव-निषेध और प्रमाण-पत्र-आधारित पहचान की व्यवस्था; इसकी सीमाएँ, जैसे प्रमाण-पत्र की प्रक्रिया और स्वयं-पहचान बनाम प्रशासनिक सत्यापन का विवाद।
(5) कारागार विधि और नीति: कारागार अधिनियम, 1894 पुराना ढाँचा है; मॉडल जेल मैनुअल, 2016 (गृह मंत्रालय) में विविध लैंगिक पहचान वाले बंदियों के वर्गीकरण, आवास और स्वास्थ्य-सेवाओं से जुड़े दिशानिर्देश; कारागार राज्य सूची का विषय होने से इनका कार्यान्वयन राज्य-विवेक पर निर्भर।
(6) अंतरराष्ट्रीय मानक: नेल्सन मंडेला नियम (UN Mandela Rules, 2015) में बंदियों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार और भेदभाव-निषेध के सिद्धांत; भारत की प्रतिबद्धता के संदर्भ में इनका महत्व।
(7) संस्थागत भूमिका: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जाँच, कारागार-निरीक्षण और सिफारिश की शक्तियाँ (मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993); आयोग की सिफारिशें सलाहकारी होने से अनुपालन की सीमा; सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की रिट-क्षेत्राधिकार की भूमिका।
(8) संतुलन का विश्लेषण: केंद्रीय मानक बनाम राज्य-विवेक; सुरक्षा-व्यवस्था और गोपनीयता के बीच संतुलन; प्रशिक्षित कर्मचारियों और बजटीय संसाधनों की कमी; पृथक आवास बनाम सम्मानजनक समावेश पर विभिन्न मत।
(9) निष्कर्ष: विधिक मान्यता से व्यवहारिक न्याय तक का अंतर पाटने हेतु संस्थागत प्रशिक्षण, निगरानी-तंत्र, शिकायत-निवारण और राज्यों के बीच एकरूप दिशानिर्देशों की आवश्यकता पर संतुलित निष्कर्ष।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Telangana PCS (TGPSC (TSPSC)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के हस्तक्षेप के बाद, हैदराबाद की केंद्रीय जेल में विविध लैंगिक पहचान और अभिव्यक्ति वाले व्यक्तियों के लिए एक लैंगिक-तटस्थ प्रकोष्ठ (Gender-Neutral Cell) स्थापित किया गया है। इस पहल का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
- A. जेल में महिला कैदियों की संख्या बढ़ाना।
- B. ट्रांसजेंडर और अन्य लैंगिक अल्पसंख्यक कैदियों के मानवाधिकारों की रक्षा करना और उन्हें सुरक्षित वातावरण प्रदान करना।
- C. पुरुष कैदियों के लिए विशेष सुविधाएं प्रदान करना।
- D. जेल प्रशासन के लिए नए नियम और कानून बनाना।
उत्तर: B. ट्रांसजेंडर और अन्य लैंगिक अल्पसंख्यक कैदियों के मानवाधिकारों की रक्षा करना और उन्हें सुरक्षित वातावरण प्रदान करना। — यह पहल ट्रांसजेंडर और अन्य लैंगिक अल्पसंख्यक कैदियों के मानवाधिकारों की रक्षा और उन्हें सुरक्षित वातावरण प्रदान करने के लिए की गई है, जो NHRC के हस्तक्षेप का सीधा परिणाम है।
Mains: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के हस्तक्षेप से हैदराबाद की केंद्रीय जेल में स्थापित लैंगिक-तटस्थ प्रकोष्ठ (Gender-Neutral Cell) तेलंगाना राज्य में लैंगिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस पहल के महत्व और तेलंगाना में ऐसे अन्य सुधारात्मक उपायों की आवश्यकता पर चर्चा करें।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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