पूर्वोत्तर मानसून जल्द दक्षिण प्रायद्वीप में सक्रिय होने की संभावना, जानिए मुख्य बातें

पूर्वोत्तर मानसून जल्द दक्षिण प्रायद्वीप में सक्रिय होने की संभावना, जानिए मुख्य बातें

पूर्वोत्तर मानसून जल्द दक्षिण प्रायद्वीप में सक्रिय होने की संभावना, जानिए मुख्य बातें

पूर्वोत्तर मानसून आरंभ प्रक्रियापूर्वोत्तर मानसून आरंभ2-3 दिनदक्षिण-पश्चिम मानसून लसितंबर मध्यतमिलनाडु में वर्षा वृद14-18 अक्टूबरनिम्न दाब क्षेत्र निर्बंगाल की खाड़ीकृषि आपूर्ति प्रभावमूल्य स्थिर
पूर्वोत्तर मानसून आरंभ प्रक्रिया

✎ पूर्वोत्तर मानसून (अक्टूबर-दिसंबर) बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर कोरोमंडल तट पर वर्षा करता है और तमिलनाडु की वार्षिक वर्षा का लगभग आधा भाग देता है। इसका आरंभ दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी के साथ होता है, और इसकी वर्षा मुख्यतः निम्न…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल: भारतीय मानसून की क्रियाविधि, मानसून का प्रत्यावर्तन, चक्रवात तथा क्षेत्रीय वर्षा-प्रतिरूप  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था एवं कृषि: वर्षा और फसल उत्पादन, सब्ज़ियों की आपूर्ति तथा खाद्य मुद्रास्फीति  |  GS Paper III — आपदा प्रबंधन: बंगाल की खाड़ी के चक्रवात, शहरी बाढ़ और पूर्वानुमान तंत्र
  • Prelims: पूर्वोत्तर मानसून (उत्तर-पूर्वी मानसून / शीतकालीन मानसून), दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी (प्रत्यावर्ती मानसून), अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ), निम्न दाब क्षेत्र एवं ऊपरी वायु चक्रवाती परिसंचरण, कोरोमंडल तट, मन्नार की खाड़ी, क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र (RMC), भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), अक्टूबर की गर्मी, एल नीनो एवं हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), कावेरी डेल्टा
  • Essay: मानसून और भारतीय अर्थव्यवस्था: वर्षा की अनिश्चितता के बीच कृषि, क़ीमतें और आजीविका, जलवायु परिवर्तन के दौर में मौसम पूर्वानुमान और आपदा-तैयारी: विज्ञान से शासन तक

त्वरित पुनरावृत्ति: पूर्वोत्तर मानसून (अक्टूबर-दिसंबर) बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर कोरोमंडल तट पर वर्षा करता है और तमिलनाडु की वार्षिक वर्षा का लगभग आधा भाग देता है। इसका आरंभ दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी के साथ होता है, और इसकी वर्षा मुख्यतः निम्न दाब क्षेत्रों और चक्रवातों पर निर्भर करती है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र (RMC), चेन्नई ने बताया है कि पूर्वोत्तर मानसून (Northeast Monsoon) अगले दो से तीन दिनों में दक्षिण प्रायद्वीप पर आरंभ हो सकता है। इसी समय दक्षिण-पश्चिम मानसून देश के शेष भागों से लौट रहा होगा। तमिलनाडु की वार्षिक वर्षा का बड़ा हिस्सा इसी मानसून से मिलता है। 14 अक्टूबर से राज्य में वर्षा क्रमशः बढ़ने और 15 अक्टूबर से कई ज़िलों में भारी वर्षा होने का अनुमान है, जो 18 अक्टूबर तक जारी रह सकती है। यह वर्षा दक्षिण-पूर्वी बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दाब क्षेत्र और मन्नार की खाड़ी के ऊपर स्थित चक्रवाती परिसंचरण पर निर्भर करेगी। पड़ोसी राज्यों में कम वर्षा से सब्ज़ियों की आपूर्ति घटी है और क़ीमतें बढ़ी हैं, इसलिए कोयम्बेडु थोक बाज़ार के व्यापारियों को वर्षा बढ़ने पर दो सप्ताह में क़ीमतें स्थिर होने की आशा है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में वर्षा के दो प्रमुख मौसम हैं: जून से सितंबर तक दक्षिण-पश्चिम मानसून और अक्टूबर से दिसंबर तक पूर्वोत्तर मानसून। देश की कुल वार्षिक वर्षा का अधिकांश भाग पहले मानसून से मिलता है, परंतु तमिलनाडु के लिए दूसरा मानसून अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी सामान्यतः सितंबर के मध्य में पश्चिमी राजस्थान से आरंभ होती है और अक्टूबर के मध्य तक पूरे देश से मानसून लौट जाता है। इसी संक्रमण-काल को ‘प्रत्यावर्ती मानसून’ का मौसम कहा जाता है।
  • सूर्य की आभासी गति दक्षिण की ओर होने पर अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) भी दक्षिण की ओर खिसकता है। उत्तर भारत में उच्च दाब बनता है और शुष्क उत्तर-पूर्वी पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती हैं।
  • ये पवनें बंगाल की खाड़ी से नमी ग्रहण कर कोरोमंडल तट से टकराती हैं। इससे तमिलनाडु, दक्षिणी आंध्र प्रदेश के तटीय भाग और रायलसीमा में वर्षा होती है। ग्रीष्मकालीन मानसून के समय तमिलनाडु वृष्टि-छाया क्षेत्र में पड़ता है, इसलिए वहाँ अपेक्षाकृत कम वर्षा होती है।
  • अक्टूबर-दिसंबर का समय बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों का प्रमुख मौसम भी है। निम्न दाब क्षेत्र और चक्रवाती तंत्र पूर्वोत्तर मानसून की वर्षा को तीव्र करते हैं, जिससे शहरी बाढ़ का ख़तरा भी बढ़ता है। चेन्नई की 2015 की बाढ़ इसका उदाहरण है।
  • खाद्य क़ीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा संबंध वर्षा से है। सब्ज़ियाँ शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुएँ हैं, इसलिए उत्पादक राज्यों में वर्षा की कमी या अधिकता से आपूर्ति और मूल्य तुरंत प्रभावित होते हैं।

पूर्वोत्तर मानसून (Northeast Monsoon) क्या है?

  • पूर्वोत्तर मानसून अक्टूबर से दिसंबर के बीच चलने वाली उत्तर-पूर्वी पवनों से होने वाली वर्षा की ऋतु है। इसे शीतकालीन मानसून भी कहते हैं। इसकी सामान्य शुरुआत अक्टूबर के तीसरे सप्ताह के आसपास मानी जाती है।
  • क्रियाविधि: स्थल भाग के ठंडा होने से उत्तर भारत में उच्च दाब बनता है। पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं और बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर पूर्वी तट पर वर्षा करती हैं। यही कारण है कि इसकी वर्षा मुख्यतः तटीय क्षेत्रों में केंद्रित रहती है।
  • प्रभावित क्षेत्र: तमिलनाडु (वार्षिक वर्षा का लगभग आधा भाग), पुदुचेरी, दक्षिण तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा, केरल तथा दक्षिणी आंतरिक कर्नाटक के कुछ भाग।
  • वर्षा की मात्रा चक्रवाती तंत्रों पर बहुत निर्भर करती है। बंगाल की खाड़ी में बने निम्न दाब क्षेत्र, अवदाब और चक्रवात इस वर्षा को बढ़ाते हैं। इसी कारण वर्षा में अस्थिरता रहती है और कभी अल्प समय में अत्यधिक वर्षा हो जाती है।
  • अंतर-वार्षिक परिवर्तनशीलता: एल नीनो और हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) जैसी महासागरीय-वायुमंडलीय परिघटनाएँ इसे प्रभावित करती हैं। सामान्यतः एल नीनो और धनात्मक IOD के वर्ष इसके लिए अनुकूल माने जाते हैं।
  • कृषि पर प्रभाव: कावेरी डेल्टा की सांबा और थालाडि धान की फसलें, तथा दलहन व तिलहन की वर्षा-आश्रित खेती इस वर्षा पर निर्भर हैं। इससे जलाशय और भूजल भी पुनर्भरित होते हैं। चेन्नई जैसे नगरों की पेयजल आपूर्ति भी इसी पर टिकी है।
  • संस्थागत ढाँचा: पूर्वानुमान और चेतावनी का दायित्व पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का है। चेन्नई का क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र दक्षिणी प्रायद्वीप के लिए सूचनाएँ जारी करता है।
  • नीतिगत पक्ष: समय पर पूर्वानुमान से कृषि-परामर्श, बाढ़-प्रबंधन और जलाशय-संचालन में सहायता मिलती है। सब्ज़ी जैसी शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं के लिए भंडारण और आपूर्ति-शृंखला सुदृढ़ करना खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने में आवश्यक है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
समय-सीमा: अक्टूबर से दिसंबर उत्तर-पूर्वी मानसून (Northeast Monsoon) को ‘शीतकालीन मानसून’ भी कहा जाता है। यह तमिलनाडु की वार्षिक वर्षा का लगभग आधा (लगभग 48 प्रतिशत) देता है। इसलिए इस राज्य की कृषि और जल-सुरक्षा इसी पर टिकी है।
मानसून की वापसी के साथ-साथ आगमन दक्षिण-पश्चिम मानसून शेष भारत से लौटता है और उसी समय दक्षिणी प्रायद्वीप में उत्तर-पूर्वी मानसून आरंभ होता है। इसलिए इसे ‘लौटते मानसून का मौसम’ भी कहा जाता है।
पवन-तंत्र: स्थल से समुद्र की ओर उत्तर भारत में उच्च दाब बनने से उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर कोरोमंडल तट से टकराती हैं। गर्मियों में वृष्टि-छाया क्षेत्र में रहने वाला यह तट अब वर्षा पाता है।
बंगाल की खाड़ी की मौसम-प्रणालियाँ निम्न दाब क्षेत्र, अवदाब और चक्रवात इस मानसून की वर्षा की तीव्रता तय करते हैं। इसी कारण वर्षा अनियमित होती है, जैसे कुछ दिनों में अत्यधिक और फिर लंबा अंतराल।
प्रभावित क्षेत्र तमिलनाडु, पुदुचेरी, तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा, दक्षिण आंतरिक कर्नाटक और केरल के कुछ भाग। मुख्य लाभार्थी कावेरी डेल्टा और दक्षिणी जिले हैं।
कृषि एवं कीमतों से संबंध वर्षा से सब्जियों की आपूर्ति सुधरने और कीमतें स्थिर होने की आशा बनती है। साथ ही पड़ोसी राज्यों में कम वर्षा के कारण हुई आपूर्ति-कमी का प्रभाव भी इस खबर में दिखता है।

महत्व

आर्थिक एवं कृषि

  • कावेरी डेल्टा में सांबा और थलाडी धान की फसल तथा तटीय क्षेत्रों की वर्षा-आश्रित खेती इसी वर्षा पर निर्भर है।
  • पर्याप्त वर्षा से सब्जियों की आवक बढ़ती है। इससे खाद्य मुद्रास्फीति (Inflation) पर दबाव घटने की संभावना रहती है।
  • वर्षा से भूजल पुनर्भरण होता है और जलाशय भरते हैं, जिससे रबी सिंचाई तथा ग्रीष्म ऋतु की जल-उपलब्धता सुधरती है।

जल एवं पर्यावरणीय

  • चेन्नई जैसे महानगर पेयजल के लिए झीलों और जलाशयों पर निर्भर हैं, जो इसी मौसम में भरते हैं।
  • वर्षा से अधिक तापमान से राहत मिलती है और ऊष्मा-तनाव घटता है।

आपदा-प्रबंधन संबंधी

  • निम्न दाब प्रणालियों की पूर्व-सूचना से चक्रवात और बाढ़ की तैयारी का समय मिलता है।
  • पूर्वानुमान की सटीकता मछुआरों, बंदरगाहों और स्थानीय प्रशासन के निर्णयों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

सामाजिक एवं शासन संबंधी

  • वर्षा से संबंधित आपूर्ति-शृंखला की जानकारी उपभोक्ता कीमतों के प्रबंधन में काम आती है।
  • भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की जिला-स्तरीय सूचनाएँ स्थानीय प्रशासन की निर्णय-क्षमता बढ़ाती हैं।

चुनौतियाँ

1. पूर्वानुमान की अनिश्चितता

  • मानसून का आगमन बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दाब क्षेत्र के विकास और उसके पथ पर निर्भर है, जिसका सटीक अनुमान कठिन है।
  • अल्पकालिक और स्थान-विशेष वर्षा का पूर्वानुमान अब भी चुनौतीपूर्ण है।

2. अत्यधिक वर्षा और नगरीय बाढ़

  • कम समय में तीव्र वर्षा से चेन्नई जैसे तटीय शहरों में जलभराव का जोखिम रहता है; 2015 की बाढ़ इसका उदाहरण है।
  • जलमार्गों पर अतिक्रमण और अपर्याप्त जल-निकासी इस जोखिम को बढ़ाते हैं।

3. खाद्य कीमतों में अस्थिरता

  • टमाटर, प्याज और सब्जियाँ शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुएँ हैं, इसलिए मौसम का झटका कीमतों में तुरंत दिखता है।
  • पड़ोसी राज्यों में कम वर्षा से हुई उपज-हानि अंतर-राज्यीय आपूर्ति को प्रभावित करती है।

4. जलवायु परिवर्तन और वर्षा की अनियमितता

  • वर्षा-दिवसों की संख्या घट रही है, जबकि अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
  • बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों की तीव्रता और बारंबारता में परिवर्तन की आशंका बनी रहती है।

5. फसल-क्षति और भंडारण-ढाँचे की कमी

  • अत्यधिक वर्षा से खड़ी फसल और खुले में रखी उपज को हानि पहुँचती है।
  • शीत-भंडारण और परिवहन की कमी से कटाई के बाद का नुकसान बढ़ता है।

6. जल-प्रबंधन और अंतर-राज्यीय समन्वय

  • वर्षा-जल का संचयन न होने पर अधिशेष जल व्यर्थ बहकर समुद्र में चला जाता है।
  • कावेरी जैसी अंतर-राज्यीय नदियों में जल-बँटवारे के विवाद मानसून की विफलता में उभरते हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
मानसून का सटीक आगमन-काल निम्न दाब प्रणाली के विकास पर निर्भरता के कारण पूर्वानुमान बदल सकता है।
तीव्र वर्षा नगरों में जलभराव और निचले क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा।
सब्जियों की आपूर्ति अन्य राज्यों में कम उपज से कीमतें ऊँची बनी रह सकती हैं।
फसल-सुरक्षा अधिक वर्षा से धान और सब्जी की फसलों को हानि।
जलवायु परिवर्तन अनियमित वर्षा-पैटर्न और चरम मौसम की घटनाएँ।
संस्थागत तैयारी पूर्व-चेतावनी का अंतिम छोर तक प्रसार और स्थानीय निकायों की क्षमता।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • मिशन मौसम (Mission Mausam): मौसम पूर्वानुमान, निगरानी और मौसम-प्रबंधन क्षमता बढ़ाने हेतु पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का राष्ट्रीय मिशन
  • ग्रामीण कृषि मौसम सेवा (Gramin Krishi Mausam Sewa): IMD द्वारा किसानों को ज़िला/ब्लॉक-स्तरीय कृषि-मौसम परामर्श
  • ऑपरेशन ग्रीन्स (Operation Greens): टमाटर, प्याज और आलू की आपूर्ति-शृंखला और मूल्य-स्थिरता के लिए
  • मूल्य स्थिरीकरण कोष (Price Stabilisation Fund): प्याज जैसी वस्तुओं के बफर स्टॉक और कीमतों की अस्थिरता के प्रबंधन के लिए

आगे की राह

  • IMD के संख्यात्मक पूर्वानुमान मॉडल और रडार नेटवर्क को सुदृढ़ कर अल्पकालिक एवं स्थान-विशेष पूर्वानुमान की सटीकता बढ़ाना।
  • मौसम-चेतावनी को स्थानीय भाषा में पंचायत और नगर निकाय तक पहुँचाने की व्यवस्था बनाना।
  • शहरी जल-निकासी, झीलों और जलमार्गों के संरक्षण तथा अतिक्रमण-हटाने पर बल देना।
  • शीत-भंडारण, मंडी-अवसंरचना और परिवहन-शृंखला मज़बूत कर शीघ्र नष्ट होने वाली उपज की हानि कम करना।
  • राज्यों के बीच सब्जी-आपूर्ति और मूल्य-सूचना का समन्वय सुधारना, ताकि कमी वाले क्षेत्रों में आपूर्ति पहुँच सके।
  • वर्षा-जल संचयन, जलाशय-प्रबंधन और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना।
  • फसल-बीमा और कृषि-मौसम परामर्श को जोड़कर किसानों की जोखिम-सहनशीलता बढ़ाना।
  • जलवायु-अनुकूल कृषि, जैसे जलभराव-सहिष्णु किस्में और फसल-विविधीकरण, को प्रोत्साहित करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

उत्तर-पूर्वी मानसून (प्रत्यावर्ती मानसून की अवधि, अक्टूबर–दिसंबर) · दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी · अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का दक्षिण की ओर खिसकना · ऊपरी वायु चक्रवातीय परिसंचरण और बंगाल की खाड़ी में निम्न दाब क्षेत्र · कोरोमंडल तट और वृष्टि-छाया प्रभाव · एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) और हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) · खाद्य मुद्रास्फीति और आपूर्ति-पक्ष के झटके · जल सुरक्षा: कावेरी डेल्टा, जलाशय और परंपरागत टैंक (एरी) सिंचाई · शहरी बाढ़ प्रबंधन और आपदा-पूर्व तैयारी · मिशन मौसम और पूर्वानुमान क्षमता · जलवायु-अनुकूल कृषि और फसल बीमा · शीत भंडारण एवं आपूर्ति शृंखला

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • सातवीं अनुसूची, राज्य सूची, प्रविष्टि 14: कृषि राज्य का विषय
  • सातवीं अनुसूची, राज्य सूची, प्रविष्टि 28: मंडियाँ और मेले राज्य-अधीन
  • अनुच्छेद 262: अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद का न्यायनिर्णयन

अवधारणा प्रवाह

उत्तर भारत में तापमान घटता है और उच्च दाब बनता है, जिससे दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी आरंभ होती है।  →  अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) दक्षिण की ओर खिसकता है और निम्न दाब की पट्टी बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ती है।  →  उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलकर बंगाल की खाड़ी से नमी ग्रहण करती हैं।  →  खाड़ी में निम्न दाब क्षेत्र या अवदाब बनने पर ये पवनें तमिलनाडु के तट और आंतरिक भागों में वर्षा लाती हैं।  →  वर्षा से जलाशय भरते हैं, भूजल पुनर्भरण होता है और धान तथा सब्जी की खेती को सहारा मिलता है।  →  आपूर्ति सुधरने से सब्जियों की कीमतें स्थिर होने की संभावना बनती है, जबकि अत्यधिक वर्षा बाढ़ और फसल-क्षति का जोखिम भी लाती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. उत्तर-पूर्वी मानसून के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. तमिलनाडु को अपनी वार्षिक वर्षा का अधिक हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून की तुलना में उत्तर-पूर्वी मानसून से प्राप्त होता है।
2. उत्तर-पूर्वी मानसून की पवनें स्थल से सागर की ओर चलती हैं और बंगाल की खाड़ी को पार करते समय नमी ग्रहण करके कोरोमंडल तट पर वर्षा करती हैं।
3. दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी की शुरुआत सबसे पहले दक्षिणी प्रायद्वीप से होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: तमिलनाडु की वार्षिक वर्षा का लगभग आधा भाग अक्टूबर–दिसंबर की वर्षा से आता है। कथन 2 सही है: शीतकालीन पवनें स्थल से सागर की ओर चलकर खाड़ी से नमी लेती हैं। कथन 3 गलत है: वापसी की शुरुआत उत्तर-पश्चिम भारत (पश्चिमी राजस्थान) से होती है और यह दक्षिण की ओर बढ़ती है।

Q2. अभिकथन (A): दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम में तमिलनाडु के अधिकांश भागों में अपेक्षाकृत कम वर्षा होती है।
कारण (R): अरब सागर की शाखा से आने वाली पवनें पश्चिमी घाट से टकराकर पश्चिमी ढाल पर वर्षा कर देती हैं, जिससे तमिलनाडु वृष्टि-छाया क्षेत्र में पड़ता है, और बंगाल की खाड़ी की शाखा कोरोमंडल तट के लगभग समानांतर चलती है।
सही विकल्प चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किंतु R गलत है
  4. A गलत है, किंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — तमिलनाडु जून–सितंबर में पश्चिमी घाट की वृष्टि-छाया में रहता है और खाड़ी की शाखा तट के समानांतर चलती है, इसलिए वहाँ वर्षा कम होती है। यही कारण है कि अक्टूबर–दिसंबर की वर्षा वहाँ निर्णायक है। अतः R, A की सही व्याख्या करता है।

Q3. दक्षिणी प्रायद्वीप में उत्तर-पूर्वी मानसून की वर्षा के संदर्भ में, सामान्यतः किस परिस्थिति को अधिक वर्षा के अनुकूल माना जाता है?

  1. मज़बूत La Niña और ऋणात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव
  2. El Niño और धनात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव
  3. केवल पश्चिमी विक्षोभों की बारंबारता में वृद्धि
  4. अरब सागर में दक्षिण-पश्चिम मानसून की धारा का लंबे समय तक बने रहना

उत्तर: El Niño और धनात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव — El Niño वर्षों और धनात्मक IOD में बंगाल की खाड़ी में चक्रवातीय गतिविधि और नमी का प्रवाह बढ़ने से दक्षिणी प्रायद्वीप में उत्तर-पूर्वी मानसून की वर्षा सामान्यतः अधिक रहती है। La Niña में प्रायः कमी देखी जाती है। पश्चिमी विक्षोभ शीतकाल में उत्तरी भारत को प्रभावित करते हैं, तमिलनाडु को नहीं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ उत्तर-पूर्वी मानसून तमिलनाडु और दक्षिणी प्रायद्वीप की जल सुरक्षा, कृषि और खाद्य कीमतों के लिए क्यों निर्णायक है? इसकी उत्पत्ति की क्रियाविधि स्पष्ट कीजिए तथा मानसूनी अनिश्चितता से उत्पन्न आपूर्ति-पक्ष के झटकों और शहरी बाढ़ जोखिम से निपटने के लिए आवश्यक संस्थागत उपायों का परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: 1) भूमिका: दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी और उत्तर-पूर्वी मानसून का आरंभ प्रायः साथ-साथ होता है; भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की सामान्य तिथि के अनुसार पूर्ण वापसी लगभग 15 अक्टूबर तक और तमिलनाडु में आरंभ लगभग 20 अक्टूबर के आसपास मानी जाती है।
2) क्रियाविधि: ITCZ का दक्षिण की ओर खिसकना; स्थल पर उच्च दाब बनने से स्थल से सागर की ओर चलने वाली उत्तर-पूर्वी पवनें; बंगाल की खाड़ी से नमी ग्रहण; खाड़ी में निम्न दाब क्षेत्र, अवदाब और चक्रवात; ऊपरी वायु चक्रवातीय परिसंचरण; कोरोमंडल तट, आंध्र तट, रायलसीमा और केरल व कर्नाटक के कुछ भागों पर प्रभाव। तमिलनाडु की लगभग आधी वार्षिक वर्षा इसी मौसम में होती है, क्योंकि दक्षिण-पश्चिम मानसून में वह वृष्टि-छाया में रहता है।
3) महत्त्व: कावेरी डेल्टा में सांबा धान, जलाशयों (मेट्टूर आदि) और परंपरागत एरी (टैंक) सिंचाई प्रणाली का पुनर्भरण; भूजल; कावेरी जल-बंटवारे (कावेरी जल विवाद अधिकरण 2007 और सर्वोच्च न्यायालय 2018 का निर्णय) में पड़ोसी राज्यों की वर्षा की भूमिका। खबर का उदाहरण: पड़ोसी राज्यों में वर्षा की कमी से कोयम्बेडु बाज़ार में सब्ज़ियों की आपूर्ति घटी और कीमतें बढ़ीं (प्याज़ ₹60 प्रति किलो)।
4) जोखिम: ENSO और IOD के कारण वर्षा में उतार-चढ़ाव; अत्यधिक वर्षा से शहरी बाढ़ (चेन्नई 2015, चक्रवात मिचौंग 2023), फसल-हानि; कम वर्षा से जल संकट। खाद्य मुद्रास्फीति से CPI और RBI की मौद्रिक नीति प्रभावित होती है।
5) संस्थागत उपाय: मिशन मौसम (2024, लगभग ₹2,000 करोड़) से पूर्वानुमान, उच्च-विभेदन रडार और प्रारंभिक चेतावनी में सुधार; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के दिशानिर्देश, आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005; ऑपरेशन ग्रीन्स (टमाटर, प्याज़, आलू), मूल्य स्थिरीकरण कोष, शीत भंडारण और प्रसंस्करण, e-NAM; प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY); जल निकासी तंत्र, आर्द्रभूमि और झील पुनर्स्थापन तथा भू-उपयोग नियमन।
6) संतुलित निष्कर्ष: वर्षा पर नियंत्रण संभव नहीं, पर सटीक पूर्वानुमान, भंडारण-आधारित आपूर्ति प्रबंधन और जलवायु-अनुकूल शहरी व कृषि नियोजन से जोखिम घटाया जा सकता है; अल्पकालिक कीमत नियंत्रण से अधिक महत्त्व दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों का है।

स्रोत: The Hindu


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