कच्छ में मस्जिद विध्वंस: उच्च न्यायालय ने कलेक्टर से जवाब तलब किया

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कच्छ में मस्जिद विध्वंस: उच्च न्यायालय ने कलेक्टर से जवाब तलब किया

मस्जिद ध्वस्तीकरण प्रक्रियाकारण बताओ नोटिस18 जूननोटिस मिला19 जूनउत्तर दिया20 जूनमस्जिद गिराई गई21 जूनउच्च न्यायालय में याचि13 अक्टूबरकलेक्टर को निर्देश19 अक्टूबर
मस्जिद ध्वस्तीकरण प्रक्रिया

✎ अतिक्रमण पर कार्रवाई का राज्य को अधिकार है, पर नोटिस, वास्तविक सुनवाई और तर्कसंगत आदेश के बिना ध्वस्तीकरण अनुच्छेद 14 और 21 तथा सर्वोच्च न्यायालय के 13 नवंबर 2024 के दिशानिर्देशों (15 दिन का नोटिस, 15 दिन का स्वयं हटाने का समय)…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: अनुच्छेद 14, 21, 226 और 300A; मूल अधिकार एवं न्यायिक समीक्षा  |  GS Paper II — शासन: कार्यपालिका की जवाबदेही, प्रशासनिक विवेकाधिकार और सम्यक् प्रक्रिया  |  GS Paper II — न्यायपालिका: सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की बाध्यता, अनुच्छेद 142 और उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता  |  GS Paper II — सांविधानिक मूल्य: धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26) बनाम सार्वजनिक भूमि का संरक्षण
  • Prelims: प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) — audi alteram partem, कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice), अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता, अनुच्छेद 300A — संपत्ति का अधिकार, अनुच्छेद 142 — सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण न्याय की शक्ति, गुजरात भू-राजस्व संहिता, 1879 की धारा 61, मामलातदार (Mamlatdar) और ज़िला कलेक्टर, मुतवल्ली और जमात (धार्मिक संस्था का प्रबंधन), ध्वस्तीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश (13 नवंबर 2024), विधि का शासन (Rule of Law) और मनमानापन
  • Essay: विधि की सम्यक् प्रक्रिया के बिना त्वरित कार्रवाई: प्रशासनिक दक्षता बनाम नागरिक अधिकार, विधि का शासन: कार्यपालिका की शक्ति पर न्यायिक अंकुश और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता का महत्त्व

त्वरित पुनरावृत्ति: अतिक्रमण पर कार्रवाई का राज्य को अधिकार है, पर नोटिस, वास्तविक सुनवाई और तर्कसंगत आदेश के बिना ध्वस्तीकरण अनुच्छेद 14 और 21 तथा सर्वोच्च न्यायालय के 13 नवंबर 2024 के दिशानिर्देशों (15 दिन का नोटिस, 15 दिन का स्वयं हटाने का समय) की कसौटी पर परखा जाएगा; गुजरात उच्च न्यायालय ने कच्छ कलेक्टर से 19 अक्टूबर तक शपथ-पत्र माँगा है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति निरल आर. मेहता ने 13 अक्टूबर 2026 को कच्छ ज़िले की मोहम्मदी मस्जिद के 21 जून को हुए ध्वस्तीकरण से जुड़ी याचिका पर सुनवाई की। उन्होंने कच्छ के ज़िला कलेक्टर को 19 अक्टूबर तक शपथ-पत्र (Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को तय की। याचिका मस्जिद जमात की ओर से उसके न्यासी एवं मुतवल्ली ने दायर की है। उसके अनुसार भुज (ग्रामीण) के मामलातदार ने 18 जून को गुजरात भू-राजस्व संहिता की धारा 61 के अंतर्गत कारण बताओ नोटिस जारी किया। नोटिस 19 जून को दोपहर 1 बजे मिला, यानी उत्तर देने के लिए लगभग दो दिन ही थे। याचिकाकर्ता ने 20 जून को उत्तर दिया, परंतु 19 जून की तिथि का एक आदेश पहले ही मस्जिद को सरकारी भूमि पर अतिक्रमण घोषित कर चुका था। 21 जून को मस्जिद गिरा दी गई। याचिका में मामलातदार के आदेश को रद्द करने, ध्वस्तीकरण को अवैध, मनमाना और असांविधानिक घोषित करने, मस्जिद की बहाली, मुआवज़े और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की माँग की गई है। साथ ही मामला लंबित रहने तक स्थल पर तृतीय पक्ष के अधिकार बनने या स्थायी निर्माण पर रोक माँगी गई है। न्यायालय ने ध्वस्तीकरण की वैधता पर अभी कोई टिप्पणी नहीं की है। ये सभी बातें याचिका के आरोप हैं और इनका निर्णय न्यायालय करेगा।

पृष्ठभूमि

  • अतिक्रमण-रोधी कार्रवाई में राज्य के पास सरकारी भूमि की रक्षा का वैध अधिकार है। परंतु यह अधिकार विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अधीन है। नोटिस, सुनवाई और तर्कसंगत आदेश इस प्रक्रिया के अनिवार्य चरण हैं।
  • भारत में भू-राजस्व अधिनियम अनधिकृत कब्ज़े पर राजस्व अधिकारियों को सारांश (summary) प्रक्रिया से बेदखली का अधिकार देते हैं। प्रक्रिया संक्षिप्त होने पर भी उसमें निष्पक्षता की न्यूनतम शर्तें पूरी होनी चाहिए।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 13 नवंबर 2024 को ‘In Re: Directions in the matter of demolition of structures’ में अनुच्छेद 142 के अंतर्गत ध्वस्तीकरण पर अखिल भारतीय दिशानिर्देश जारी किए। न्यायमूर्ति बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि बिना विधिवत प्रक्रिया के किसी का आवास या संपत्ति गिराना विधि के शासन के विरुद्ध है।
  • न्यायालय ने कार्यपालिका को न्यायाधीश की भूमिका निभाने से भी रोका। उसके अनुसार दोष का निर्धारण और दंड देना न्यायपालिका का कार्य है, और शक्तियों का पृथक्करण इसी पर आधारित है।
  • ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (1985) में सर्वोच्च न्यायालय ने आजीविका और आश्रय को अनुच्छेद 21 से जोड़ा और अतिक्रमण हटाने में उचित प्रक्रिया पर बल दिया। मेनका गांधी (1978) के बाद अनुच्छेद 21 की ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ का न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और युक्तिसंगत होना आवश्यक हो गया।
  • धार्मिक स्थलों के अतिक्रमण के प्रकरणों में सर्वोच्च न्यायालय पहले भी निर्देश दे चुका है कि सड़क, जलाशय या रेलवे भूमि पर कोई अनधिकृत धार्मिक निर्माण नहीं होना चाहिए। साथ ही कार्रवाई किसी भी धर्म के प्रति भेदभाव के बिना और प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए।

ध्वस्तीकरण में विधि की सम्यक् प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय क्या है?

  • प्राकृतिक न्याय के दो मूल सिद्धांत हैं: audi alteram partem (दूसरे पक्ष को सुने बिना निर्णय नहीं) और nemo judex in causa sua (कोई अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं)। सुनवाई का अर्थ केवल औपचारिक नोटिस नहीं, बल्कि उत्तर तैयार करने और साक्ष्य प्रस्तुत करने का पर्याप्त और वास्तविक अवसर है।
  • कारण बताओ नोटिस का उद्देश्य संबंधित व्यक्ति को आरोप की जानकारी देकर पक्ष रखने का अवसर देना है। यदि निर्णय नोटिस या उत्तर से पहले ही हो चुका हो, तो सुनवाई निष्फल (empty formality) मानी जा सकती है और आदेश पर ‘पूर्व-निर्धारित मन’ का प्रश्न उठता है। इस मामले में याचिका का यही मूल तर्क है।
  • सर्वोच्च न्यायालय (13 नवंबर 2024) के दिशानिर्देशों के अनुसार ध्वस्तीकरण से पहले पंजीकृत डाक से नोटिस भेजा जाए और उसे संरचना पर चस्पा किया जाए। नोटिस में अवैधता का स्वरूप, विशिष्ट उल्लंघन, ध्वस्तीकरण के आधार और व्यक्तिगत सुनवाई की तिथि व अधिकारी का उल्लेख हो। नोटिस जारी होने या प्राप्त होने की तिथि से 15 दिन से कम समय नहीं दिया जाना चाहिए।
  • अंतिम आदेश में पक्ष की दलीलें, अवैध निर्माण के शमनीय (compoundable) होने का विचार और ध्वस्तीकरण ही एकमात्र विकल्प क्यों है, इसके कारण दर्ज होने चाहिए। आदेश के बाद संरचना स्वयं हटाने के लिए 15 दिन का समय मिलता है। इसके बाद ही ध्वस्तीकरण हो सकता है, जिसकी वीडियोग्राफ़ी होनी चाहिए। ज़िला स्तर पर नोडल अधिकारी और डिजिटल पोर्टल की व्यवस्था भी निर्देशित है।
  • इन निर्देशों के अपवाद हैं: सड़क, गली, फुटपाथ, रेलवे लाइन के निकट या नदी व जलाशयों पर अनधिकृत निर्माण, तथा न्यायालय द्वारा दिया गया ध्वस्तीकरण का आदेश। इसलिए इस मामले में सरकारी भूमि के आरोप पर निर्णय के लिए भूमि की प्रकृति, स्वामित्व और अभिलेख महत्त्वपूर्ण होंगे। यह निर्धारण न्यायालय करेगा।
  • निर्देशों के उल्लंघन पर अवमानना की कार्यवाही हो सकती है। संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराए जा सकते हैं, उन्हें अपने खर्च पर संरचना की बहाली और मुआवज़े का दायित्व उठाना पड़ सकता है। याचिकाकर्ता ने इसी आधार पर बहाली, मुआवज़ा और अनुशासनात्मक कार्रवाई की माँग की है।
  • संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 14 मनमानी कार्रवाई को प्रतिबंधित करता है और अनुच्छेद 21 निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित करता है। अनुच्छेद 300A के अनुसार विधि के प्राधिकार के बिना किसी को संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन और अन्य प्रयोजनों के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है।
  • धार्मिक स्वतंत्रता का आयाम: अनुच्छेद 25 और 26 धर्म के पालन तथा धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन की स्वतंत्रता देते हैं, पर ये लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन हैं। इसलिए किसी धार्मिक स्थल को अतिक्रमण के आधार पर हटाया जा सकता है, पर केवल विधि-सम्मत प्रक्रिया से और बिना भेदभाव के। अंतिम निर्णय तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर न्यायालय का होगा।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
घटनाक्रम की समय-सारणी: 18 जून को कारण बताओ नोटिस, 19 जून को आदेश, 20 जून को उत्तर और 21 जून को ध्वस्तीकरण याचिकाकर्ता के अनुसार नोटिस 19 जून को दोपहर 1 बजे मिला और उत्तर देने के लिए केवल दो दिन मिले। उत्तर से पहले ही 19 जून का आदेश बन चुका था। विवाद का मूल यही है कि सुनवाई की प्रक्रिया वास्तविक थी या औपचारिक
गुजरात भू-राजस्व संहिता (Gujarat Land Revenue Code) की धारा 61 के अंतर्गत कार्रवाई राजस्व अधिकारी (मामलतदार, भुज ग्रामीण) ने सरकारी भूमि पर अतिक्रमण (Encroachment) का आरोप लगाया। राजस्व कानून में अतिक्रमण हटाने की शक्ति कार्यपालिका को मिली है, पर उसका प्रयोग प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) की कसौटी पर परखा जाता है
याचिका की प्रार्थनाएँ आदेश को रद्द करना, ध्वस्तीकरण को अवैध घोषित करना, मस्जिद की पुनर्स्थापना, मुआवज़ा और दोषी अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई। साथ ही विवाद लंबित रहने तक स्थल पर तृतीय-पक्ष अधिकार या स्थायी निर्माण पर रोक की माँग
याचिका का आधार: सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्देशों का उल्लंघन याचिका में कहा गया है कि ध्वस्तीकरण संवैधानिक संरक्षण और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के विरुद्ध है। ये निर्देश नवंबर 2024 के उस निर्णय से जुड़े हैं जिसमें ध्वस्तीकरण से पहले नोटिस और सुनवाई की न्यूनतम प्रक्रिया तय की गई थी
उच्च न्यायालय का अंतरिम रुख न्यायमूर्ति निरल आर. मेहता ने जिला कलेक्टर, कच्छ को 19 अक्टूबर तक शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को तय की। न्यायालय ने ध्वस्तीकरण की वैधता पर अभी कोई टिप्पणी नहीं की है

महत्व

संवैधानिक एवं विधिक महत्त्व

  • मामला दिखाता है कि कार्यपालिका की सांविधिक शक्ति भी निष्पक्ष प्रक्रिया की सीमा में बँधी है। अनुच्छेद 14 और 21 के अंतर्गत प्रक्रिया का न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत होना आवश्यक है।
  • ‘पहले सुनवाई, फिर कार्रवाई’ का सिद्धांत (audi alteram partem) प्राकृतिक न्याय का मूल तत्त्व है। यह प्रकरण उसकी व्यावहारिक परीक्षा है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का अनुपालन निचले स्तर के प्रशासन में कितना होता है, इसका आकलन इसी तरह के मामलों से होता है।

प्रशासनिक महत्त्व

  • अतिक्रमण हटाना सार्वजनिक भूमि की रक्षा के लिए वैध प्रशासनिक दायित्व है। प्रशासन की विश्वसनीयता इस बात पर टिकी है कि यह कार्य विधिसम्मत प्रक्रिया से हो।
  • शपथपत्र की माँग से जवाबदेही तय होती है। इससे नोटिस, आदेश और ध्वस्तीकरण की तिथियों का आधिकारिक अभिलेख न्यायालय के सामने आएगा।
  • अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही का प्रश्न प्रशासनिक अनुशासन और विधि के शासन से सीधे जुड़ता है।

सामाजिक एवं धार्मिक महत्त्व

  • धार्मिक स्थलों से जुड़ी कार्रवाई संवेदनशील होती है। प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता से सामुदायिक विश्वास बना रहता है।
  • समान प्रक्रिया सभी समुदायों और सभी प्रकार के ढाँचों पर लागू होने से राज्य की निष्पक्षता और धर्मनिरपेक्ष आचरण पर विश्वास मज़बूत होता है।

न्यायिक महत्त्व

  • अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय प्रशासनिक कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) करता है। यह मामला उसी भूमिका का उदाहरण है।
  • तथ्यों के आधार पर निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि कितना समय ‘पर्याप्त अवसर’ माना जाए। यह भविष्य के मामलों के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।

चुनौतियाँ

1. प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और समय की कमी

  • नोटिस प्राप्ति और ध्वस्तीकरण के बीच बहुत कम अंतर होने से उत्तर देने और अपील करने का वास्तविक अवसर सीमित हो जाता है।
  • आदेश की तिथि उत्तर की तिथि से पहले होने का आरोप है। इससे यह संदेह उठता है कि सुनवाई पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष की औपचारिकता मात्र थी।

2. सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का अनुपालन

  • नवंबर 2024 के निर्णय में सामान्यतः 15 दिन का पूर्व नोटिस, व्यक्तिगत सुनवाई, तर्कसंगत अंतिम आदेश और ध्वस्तीकरण से पहले अपील का समय देने की बात कही गई है।
  • सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण या न्यायालय के आदेश वाले मामलों में छूट है। यह तय करना कि कोई मामला छूट में आता है या नहीं, स्पष्ट और अभिलिखित कारणों पर आधारित होना चाहिए।

3. सरकारी भूमि की रक्षा बनाम व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार

  • जन-संपत्ति की सुरक्षा राज्य का कर्तव्य है, पर कथित अतिक्रमण के स्वामित्व या वैधता के प्रश्न का निर्णय उचित प्रक्रिया से होना चाहिए।
  • पुराने धार्मिक या सामुदायिक स्थलों के अभिलेख प्रायः अपूर्ण होते हैं। इससे स्वामित्व और कब्ज़े का विवाद जटिल हो जाता है।

4. अपरिवर्तनीय कार्रवाई और उपचार की कठिनाई

  • ध्वस्तीकरण हो जाने पर न्यायालय का बाद का निर्णय भी पुनर्स्थापना को कठिन बना देता है। इसी कारण पूर्व-सुनवाई और अंतरिम संरक्षण महत्त्वपूर्ण हैं।
  • मुआवज़ा और अधिकारियों पर कार्रवाई जैसे उपाय बाद में मिलते हैं और मूल क्षति की पूरी भरपाई नहीं कर पाते।

5. जवाबदेही और विवेकाधीन शक्ति का दुरुपयोग

  • अतिक्रमण-विरोधी कार्रवाई में स्थानीय अधिकारियों के पास व्यापक विवेकाधिकार होता है। चयनात्मक कार्रवाई की आशंका से जन-विश्वास घटता है।
  • निर्देशों के उल्लंघन पर व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने की व्यवस्था अभी भी कमज़ोर है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
नोटिस की अवधि नोटिस प्राप्ति के लगभग दो दिन में उत्तर और साक्ष्य देना व्यावहारिक रूप से कठिन है
आदेश और उत्तर का क्रम उत्तर से पहले आदेश की तिथि होने से विचार-विमर्श की वास्तविकता पर प्रश्न उठता है
अपील का अवसर ध्वस्तीकरण आदेश के तुरंत बाद होने पर अपील का अधिकार निष्फल हो सकता है
अभिलेख और स्वामित्व पुराने स्थलों के भू-अभिलेख अस्पष्ट होने से अतिक्रमण का निर्धारण विवादित बनता है
अधिकारियों की जवाबदेही निर्देशों के उल्लंघन पर कार्रवाई की प्रक्रिया धीमी और अनिश्चित है

आगे की राह

  • ध्वस्तीकरण से पहले सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप पर्याप्त समय वाला नोटिस, व्यक्तिगत सुनवाई और तर्कसंगत अंतिम आदेश अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किए जाएँ।
  • नोटिस पंजीकृत डाक, संबंधित स्थल पर चिपकाने और डिजिटल पोर्टल से भेजे जाएँ, ताकि प्राप्ति और समय का प्रमाणिक अभिलेख बने।
  • अंतिम आदेश के बाद अपील के लिए निश्चित अवधि तक कार्रवाई रोकने का नियम राजस्व कानूनों के क्रियान्वयन में भी स्पष्ट रूप से लागू हो।
  • ध्वस्तीकरण की वीडियोग्राफी और निरीक्षण रिपोर्ट सुरक्षित रखी जाएँ, ताकि कार्रवाई की न्यायिक जाँच सरल हो।
  • सरकारी भूमि और धार्मिक या सामुदायिक स्थलों के भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण और सीमांकन किया जाए, जिससे अतिक्रमण पर विवाद कम हों।
  • निर्देशों के उल्लंघन पर अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने के लिए स्पष्ट विभागीय प्रक्रिया बने।
  • स्थानीय अधिकारियों को प्राकृतिक न्याय और न्यायिक निर्देशों पर नियमित प्रशिक्षण दिया जाए।
  • न्यायालय का अंतिम निर्णय आने तक इस मामले की वैधता पर निष्कर्ष न निकाला जाए; न्यायिक प्रक्रिया के परिणाम की प्रतीक्षा की जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

प्राकृतिक न्याय (audi alteram partem – सुनवाई का उचित अवसर) · विधि की सम्यक् प्रक्रिया और विधि का शासन · अनुच्छेद 14 – मनमानी के विरुद्ध संरक्षण · अनुच्छेद 21 – निष्पक्ष, न्यायसंगत एवं युक्तियुक्त प्रक्रिया · अनुच्छेद 226 – उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता · अनुच्छेद 300A – संपत्ति का संवैधानिक अधिकार · कारण बताओ नोटिस एवं सकारण (speaking) आदेश · सर्वोच्च न्यायालय के ध्वस्तीकरण संबंधी दिशानिर्देश (13 नवंबर 2024) · गुजरात भू-राजस्व संहिता, 1879 की धारा 61 – सरकारी भूमि पर अतिक्रमण · कार्यपालिका की अतिशयता एवं अधिकारियों का व्यक्तिगत उत्तरदायित्व · अनुच्छेद 142 – पूर्ण न्याय · प्रक्रियात्मक औचित्य बनाम सार्वजनिक भूमि की रक्षा

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 14 – विधि के समक्ष समता, मनमानी कार्रवाई निषिद्ध
  • अनुच्छेद 21 – विधि द्वारा स्थापित उचित प्रक्रिया
  • अनुच्छेद 26 – धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति का प्रबंधन
  • अनुच्छेद 300A – विधि के बिना संपत्ति से वंचित नहीं
  • अनुच्छेद 226 – उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता
  • अनुच्छेद 141 – सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय सब पर बाध्यकारी
  • अनुच्छेद 142 – पूर्ण न्याय हेतु सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश

अवधारणा प्रवाह

राजस्व अधिकारी द्वारा सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का आरोप और कारण बताओ नोटिस जारी  →  नोटिस प्राप्ति के बाद बहुत कम समय में उत्तर और साक्ष्य देने की बाध्यता  →  उत्तर से पहले की तिथि वाले आदेश में अतिक्रमण की घोषणा  →  आदेश के तुरंत बाद ध्वस्तीकरण, अपील का अवसर सीमित  →  प्रबंधन समिति द्वारा उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के अंतर्गत याचिका  →  न्यायालय द्वारा जिला कलेक्टर से शपथपत्र की माँग और अगली सुनवाई तय  →  अंतिम निर्णय से प्रक्रिया की वैधता और अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. सर्वोच्च न्यायालय ने 13 नवंबर 2024 को संपत्तियों के ध्वस्तीकरण के संबंध में अखिल भारतीय दिशानिर्देश जारी किए। निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. किसी अनधिकृत निर्माण को ध्वस्त करने से पहले मालिक को पंजीकृत डाक द्वारा कम-से-कम 15 दिन का पूर्व नोटिस दिया जाना चाहिए।
2. ये दिशानिर्देश सड़कों, फुटपाथों, नदियों और जलाशयों पर हुए अनधिकृत निर्माणों पर भी लागू होते हैं।
3. ध्वस्तीकरण की कार्यवाही की वीडियोग्राफी कराई जानी चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: कम-से-कम 15 दिन का नोटिस पंजीकृत डाक से देना और उसे संरचना पर चिपकाना अनिवार्य है। कथन 2 गलत है: सड़क, फुटपाथ, रेल पटरी के किनारे, नदी या जलाशय पर हुए अतिक्रमण तथा न्यायालय के ध्वस्तीकरण आदेश वाले मामले इन दिशानिर्देशों से बाहर हैं। कथन 3 सही है: ध्वस्तीकरण की वीडियोग्राफी आवश्यक है। अतः केवल दो कथन सही हैं।

Q2. अभिकथन (A): बिना उचित सुनवाई का अवसर दिए अतिक्रमण के आरोप में किसी धार्मिक या अन्य संरचना का ध्वस्तीकरण अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन माना जा सकता है।
कारण (R): मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रक्रिया निष्पक्ष, न्यायसंगत और युक्तियुक्त होनी चाहिए तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत अनुच्छेद 14 की समता-संबंधी निष्पक्षता में समाहित हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किंतु R गलत है
  4. A गलत है, किंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — मेनका गांधी मामले ने अनुच्छेद 14, 19 और 21 के अंतर्संबंध को स्थापित किया और मनमानी कार्रवाई को अनुच्छेद 14 के विरुद्ध माना। सुनवाई का अवसर (audi alteram partem) निष्पक्ष प्रक्रिया का मूल तत्त्व है। इसी आधार पर बिना अवसर दिया गया ध्वस्तीकरण संवैधानिक रूप से संदिग्ध होता है, इसलिए R, A की सही व्याख्या करता है।

Q3. भारत के संविधान के अंतर्गत संपत्ति के अधिकार की वर्तमान स्थिति के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

  1. यह अनुच्छेद 31 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है
  2. यह अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संवैधानिक (विधिक) अधिकार है, जिससे विधि के प्राधिकार के बिना किसी को वंचित नहीं किया जा सकता
  3. यह राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों में शामिल एक गैर-न्यायोचित अधिकार है
  4. संपत्ति के अधिकार को संविधान से पूर्णतः हटा दिया गया है

उत्तर: यह अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संवैधानिक (विधिक) अधिकार है, जिससे विधि के प्राधिकार के बिना किसी को वंचित नहीं किया जा सकता — 44वें संविधान संशोधन (1978) ने अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 को हटाकर संपत्ति के अधिकार को भाग XII के अनुच्छेद 300A में संवैधानिक अधिकार बना दिया। अतः राज्य विधि के प्राधिकार के बिना किसी की संपत्ति नहीं छीन सकता। यह नीति निदेशक तत्त्व नहीं है और संविधान से पूर्णतः हटाया भी नहीं गया है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ “अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई राज्य का वैध अधिकार है, किंतु उसकी वैधता प्रक्रिया की निष्पक्षता पर निर्भर करती है।” कच्छ (गुजरात) में एक मस्जिद के ध्वस्तीकरण को लेकर गुजरात उच्च न्यायालय में लंबित याचिका के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि सर्वोच्च न्यायालय के नवंबर 2024 के दिशानिर्देश ऐसी कार्यवाहियों में किस प्रकार का सुरक्षा-कवच प्रदान करते हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: भूमिका (30-40 शब्द): कच्छ के मामले के तथ्य रखिए: मामलातदार, भुज (ग्रामीण) ने 18 जून को गुजरात भू-राजस्व संहिता की धारा 61 के अंतर्गत कारण बताओ नोटिस जारी किया; नोटिस 19 जून को दोपहर 1 बजे मिला; 20 जून को उत्तर दिया गया; 19 जून की तिथि वाले आदेश में पहले ही अतिक्रमण घोषित था; 21 जून को ध्वस्तीकरण हुआ। उच्च न्यायालय ने न्यायाधीश निरल मेहता के माध्यम से कलेक्टर से 19 अक्टूबर तक शपथ-पत्र माँगा है और वैधता पर अभी कोई टिप्पणी नहीं की है, इसलिए निष्कर्ष आरोपों के रूप में ही रखिए।

भाग 1 – राज्य का वैध अधिकार: सरकारी भूमि की रक्षा सार्वजनिक न्यास का दायित्व है; भू-राजस्व संहिता के अंतर्गत संक्षिप्त बेदखली का वैधानिक ढाँचा; अतिक्रमण को वैधता देना विधि के शासन और समता के विपरीत होगा; धार्मिक स्थल होने से अतिक्रमण-कार्रवाई से छूट नहीं मिलती (सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 के दिशानिर्देशों में सार्वजनिक स्थलों पर अतिक्रमण को अलग रखा है)।

भाग 2 – प्रक्रिया की निष्पक्षता: अनुच्छेद 14 (मनमानी के विरुद्ध), अनुच्छेद 21 (मेनका गांधी, 1978: निष्पक्ष, न्यायसंगत, युक्तियुक्त प्रक्रिया), अनुच्छेद 300A (विधि के प्राधिकार के बिना संपत्ति से वंचित नहीं); ओल्गा टेलिस (1985) में सुनवाई और पर्याप्त नोटिस का महत्त्व; audi alteram partem; सकारण आदेश; पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष वाली सुनवाई औपचारिकता मात्र है; 2 दिन का नोटिस और नोटिस से पहले की तिथि का आदेश ‘पूर्वनिर्णय’ की आशंका जगाते हैं; ध्वस्तीकरण अपरिवर्तनीय है, इसलिए अपील का अवसर दिए बिना कार्रवाई ‘निरर्थक उपचार’ बना देती है।

भाग 3 – सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश (13 नवंबर 2024, न्यायमूर्ति गवई और विश्वनाथन; अनुच्छेद 142 के अंतर्गत): पंजीकृत डाक से कम-से-कम 15 दिन का नोटिस और संरचना पर चिपकाना; नोटिस में उल्लंघन का स्वरूप, आपत्ति के आधार और व्यक्तिगत सुनवाई की तिथि; डिजिटल पोर्टल पर सूचना; सकारण अंतिम आदेश; आदेश के बाद 15 दिन का समय ताकि स्वयं हटाया या चुनौती दी जा सके; वीडियोग्राफी; उल्लंघन पर अवमानना, तथा संबंधित अधिकारी के खर्च पर पुनर्निर्माण और क्षतिपूर्ति। साथ ही सीमाएँ बताइए: सार्वजनिक सड़क, फुटपाथ, जलाशय पर अतिक्रमण और न्यायालय-आदेशित ध्वस्तीकरण इनसे बाहर हैं, इसलिए यह देखना होगा कि प्रस्तुत मामला किस श्रेणी में आता है।

भाग 4 – उपचार एवं सुधार: अनुच्छेद 226 के अंतर्गत आदेश रद्द करने, यथास्थिति, क्षतिपूर्ति और अनुशासनात्मक कार्रवाई की माँग; अंतरिम संरक्षण; बुलडोजर ‘त्वरित न्याय’ की प्रवृत्ति की आलोचना (शक्तियों का पृथक्करण: कार्यपालिका न्यायाधीश नहीं बन सकती); सुझाव: समयबद्ध लेकिन पर्याप्त नोटिस, भूमि-अभिलेखों का डिजिटलीकरण, स्वतंत्र अपीलीय मंच, अधिकारी-उत्तरदायित्व, धार्मिक संरचनाओं हेतु स्पष्ट नीति।

निष्कर्ष: संतुलित मत रखिए कि अतिक्रमण-हटाओ कार्रवाई वैध है, परंतु ‘वैध उद्देश्य’ ‘अवैध साधन’ को उचित नहीं ठहराता; विधि का शासन वहीं सुरक्षित है जहाँ राज्य अपनी ही प्रक्रिया का पालन करे।

स्रोत: The Indian Express

Gujarat PCS (GPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: गुजरात के कच्छ जिले में मस्जिद विध्वंस मामले में उच्च न्यायालय द्वारा कलेक्टर से 3-4 दिनों में जवाब मांगे जाने के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?

  1. उच्च न्यायालय ने विध्वंस को वैध ठहराते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है।
  2. उच्च न्यायालय ने कलेक्टर से विध्वंस के कारणों और कानूनी प्रक्रिया का जवाब मांगा है।
  3. उच्च न्यायालय ने विध्वंस को अवैध घोषित कर दिया है और पुनर्निर्माण का आदेश दिया है।
  4. उच्च न्यायालय ने मामले को केंद्र सरकार को भेज दिया है।

उत्तर: उच्च न्यायालय ने कलेक्टर से विध्वंस के कारणों और कानूनी प्रक्रिया का जवाब मांगा है। — उच्च न्यायालय ने कलेक्टर से विध्वंस के कारणों, कानूनी प्रक्रिया और संबंधित नियमों का जवाब मांगा है।

Mains: गुजरात में भूमि विवादों और धार्मिक संरचनाओं के विध्वंस से संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं में उच्च न्यायालय की भूमिका की चर्चा करते हुए, कच्छ जिले में हाल ही में हुई घटना के संदर्भ में राज्य सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदमों का विश्लेषण कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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