02 Oct उड़ीसा सरकार ने शुरू किया 44-दिवसीय अभियान: ग्राम पंचायतों को बाल श्रम मुक्त बनाने का लक्ष्य
✎ बाल श्रम एक सामाजिक बुराई है जो बच्चों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करती है और इसके उन्मूलन के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — सामाजिक न्याय, शासन और नीतियां | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास
- Prelims: बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986, अनुच्छेद 21A, अनुच्छेद 23, अनुच्छेद 24, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO), राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (NCLP)
- Essay: भारत में बाल श्रम उन्मूलन: चुनौतियाँ और समाधान, बच्चों का अधिकार: एक समृद्ध समाज की नींव
त्वरित पुनरावृत्ति: बाल श्रम एक सामाजिक बुराई है जो बच्चों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करती है और इसके उन्मूलन के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
ओडिशा सरकार ने ‘शिशु श्रम मुक्त ग्राम पंचायत’ अभियान नामक 44-दिवसीय राज्यव्यापी जागरूकता अभियान शुरू किया है। इस अभियान का उद्देश्य राज्य को बाल श्रम की बुराई से मुक्त करना है और गांधी जयंती के अवसर पर मुख्यमंत्री ने इस पहल की घोषणा की। यह अभियान बाल श्रम के खिलाफ जागरूकता पैदा करने और इसके उन्मूलन के लिए सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित है।
पृष्ठभूमि
- बाल श्रम (Child Labour) एक सामाजिक बुराई है जो बच्चों और किशोरों को शिक्षा के उनके मौलिक अधिकार (Fundamental Right to Education) से वंचित करती है।
- भारत के संविधान (Constitution of India) के अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।
- अनुच्छेद 23 मानव दुर्व्यापार और बलात् श्रम (Forced Labour) पर प्रतिबंध लगाता है, जबकि अनुच्छेद 24 चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों आदि में नियोजन पर प्रतिबंध लगाता है।
- बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 (Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986) भारत में बाल श्रम को विनियमित और प्रतिबंधित करने वाला प्रमुख कानून है।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labour Organization – ILO) ने बाल श्रम के उन्मूलन के लिए कई अभिसमयों (Conventions) को अपनाया है, जिनमें से भारत ने भी कुछ की पुष्टि की है।
- ओडिशा में 1997 के एक सर्वेक्षण में 2,15,222 बाल श्रमिक पाए गए थे, हालांकि उसके बाद कोई व्यवस्थित राज्यव्यापी सर्वेक्षण नहीं हुआ है।
बाल श्रम क्या है?
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, बाल श्रम वह कार्य है जो बच्चों को उनके बचपन, उनकी क्षमता और उनकी गरिमा से वंचित करता है, और जो उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए हानिकारक है।
- यह आमतौर पर बच्चों को स्कूल जाने से रोकता है या उन्हें स्कूल से जल्दी छोड़ने के लिए मजबूर करता है।
- भारत में, बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986, 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी व्यवसाय या प्रक्रिया में काम करने से प्रतिबंधित करता है, और 14 से 18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक व्यवसायों में काम करने से प्रतिबंधित करता है।
- यह अधिनियम कुछ अपवादों की भी अनुमति देता है, जैसे कि पारिवारिक उद्यमों में स्कूल के घंटों के बाद या छुट्टियों के दौरान काम करना, बशर्ते यह उनके स्कूल के प्रदर्शन को प्रभावित न करे।
- बाल श्रम के प्रमुख कारणों में गरीबी, शिक्षा तक पहुंच की कमी, सामाजिक मानदंड और कमजोर कानून प्रवर्तन शामिल हैं।
- बाल श्रम के उन्मूलन के लिए शिक्षा, जागरूकता, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और मजबूत कानूनी ढांचे का संयोजन आवश्यक है।
- भारत सरकार ने बाल श्रम को समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (National Child Labour Project – NCLP) जैसी कई योजनाएं शुरू की हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| ‘शिशु श्रम मुक्त ग्राम पंचायत’ अभियान | ओडिशा को बाल श्रम से मुक्त करने के लिए राज्यव्यापी जागरूकता अभियान। |
| 44-दिवसीय अवधि | राज्य के प्रत्येक ग्राम पंचायत में गहन और केंद्रित जागरूकता फैलाई जाएगी। |
| गांधी जयंती पर संकल्प | महात्मा गांधी के सिद्धांतों के अनुरूप सामाजिक बुराई के उन्मूलन के प्रति प्रतिबद्धता। |
| सामूहिक कर्तव्य पर जोर | बाल श्रम उन्मूलन को केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की जिम्मेदारी बताया गया। |
| बच्चों के समग्र विकास पर ध्यान | समृद्ध ओडिशा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बच्चों का विकास एक महत्वपूर्ण आधार है। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह अभियान बच्चों को शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित करने वाली सामाजिक बुराई, बाल श्रम को समाप्त करने पर केंद्रित है।
- यह समाज में जागरूकता पैदा करके और सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करके बाल श्रम को खत्म करने में मदद करेगा, जिससे बच्चों का समग्र विकास सुनिश्चित होगा।
शासनिक महत्व
- यह राज्य सरकार की बाल अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है और जमीनी स्तर पर (ग्राम पंचायत स्तर पर) इस मुद्दे को संबोधित करने के लिए एक सक्रिय दृष्टिकोण अपनाता है।
- यह अभियान प्रशासन और जनता के बीच सहयोग को बढ़ावा देता है, जिससे नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित होता है।
मानवाधिकार महत्व
- यह बच्चों के मौलिक अधिकारों, विशेषकर शिक्षा के अधिकार की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
- बाल श्रम से मुक्ति बच्चों को गरिमापूर्ण जीवन जीने और अपनी पूरी क्षमता का एहसास करने का अवसर प्रदान करती है।
चुनौतियाँ
1. बाल श्रम की पहचान और निगरानी
- राज्य में 1997 के बाद से कोई व्यवस्थित राज्यव्यापी सर्वेक्षण नहीं हुआ है, जिससे बाल श्रमिकों की वास्तविक संख्या का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है।
- दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों में बाल श्रम के मामलों की पहचान करना और उनकी निगरानी करना एक चुनौती बनी हुई है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक मुद्दे: बाल श्रम, मानवाधिकार
2. गरीबी और आर्थिक असमानता
- गरीबी और आर्थिक असमानता परिवारों को अपने बच्चों को काम पर भेजने के लिए मजबूर करती है, जिससे बाल श्रम उन्मूलन के प्रयासों में बाधा आती है।
- प्रवासी बाल श्रमिक और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले बच्चों की पहचान और उन्हें मुख्यधारा में लाना एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: गरीबी उन्मूलन, कमजोर वर्ग
3. जागरूकता और सामाजिक दृष्टिकोण
- कुछ समुदायों में बाल श्रम को लेकर सामाजिक स्वीकृति अभी भी मौजूद है, जिससे जागरूकता अभियानों की प्रभावशीलता कम हो सकती है।
- माता-पिता और नियोक्ताओं के बीच शिक्षा के महत्व और बाल श्रम के कानूनी परिणामों के बारे में जागरूकता की कमी एक बड़ी बाधा है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक मुद्दे: सामाजिक कुरीतियां, शिक्षा
4. कानूनी प्रावधानों का क्रियान्वयन
- बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम जैसे कानूनों का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन सुनिश्चित करना एक चुनौती है, विशेषकर जब संसाधनों और जनशक्ति की कमी हो।
- उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई और त्वरित न्याय सुनिश्चित करना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: शासन: कानून और नीतियां, न्यायिक प्रक्रिया
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| बाल श्रमिकों की पहचान | 1997 के बाद से कोई व्यवस्थित राज्यव्यापी सर्वेक्षण नहीं हुआ है, जिससे वास्तविक संख्या अज्ञात है। |
| गरीबी का प्रभाव | आर्थिक तंगी परिवारों को बच्चों को काम पर भेजने के लिए मजबूर करती है। |
| सामाजिक स्वीकृति | कुछ क्षेत्रों में बाल श्रम को लेकर सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता है। |
| कानून का क्रियान्वयन | बाल श्रम कानूनों के प्रभावी और सख्त क्रियान्वयन में चुनौतियाँ। |
| प्रवासी बाल श्रमिक | प्रवासी और असंगठित क्षेत्र के बाल श्रमिकों की पहचान और पुनर्वास मुश्किल। |
आगे की राह
- बाल श्रमिकों की पहचान के लिए नियमित और व्यापक राज्यव्यापी सर्वेक्षण आयोजित किए जाएं।
- बाल श्रम के मूल कारणों, जैसे गरीबी और शिक्षा की कमी, को दूर करने के लिए लक्षित सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम चलाए जाएं।
- बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 का सख्त और प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
- समुदायों, माता-पिता और नियोक्ताओं के बीच बाल श्रम के हानिकारक प्रभावों और कानूनी परिणामों के बारे में गहन जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
- बाल श्रमिकों के पुनर्वास और शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन और सहायता प्रणाली प्रदान की जाए।
- प्रशासन, नागरिक समाज संगठनों और स्थानीय समुदायों के बीच सहयोग को मजबूत किया जाए ताकि बाल श्रम मुक्त वातावरण बनाया जा सके।
- शिकायत निवारण तंत्र को सुदृढ़ किया जाए और बाल श्रम के मामलों की रिपोर्टिंग को प्रोत्साहित किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
बाल श्रम उन्मूलन · ग्राम पंचायत की भूमिका · मौलिक अधिकार · शिक्षा का अधिकार · बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम · अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) · सतत विकास लक्ष्य (SDG) · सामाजिक बुराई · राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत (DPSP) · सामूहिक उत्तरदायित्व
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21A’, ‘note’: ‘शिक्षा का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 23’, ‘note’: ‘मानव दुर्व्यापार और बलात् श्रम का निषेध’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 24’, ‘note’: ‘कारखानों आदि में बच्चों के नियोजन का निषेध’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 39(e) और (f)’, ‘note’: ‘बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसर’}
अवधारणा प्रवाह
बाल श्रम की सामाजिक बुराई → बच्चों के मौलिक अधिकारों का हनन (विशेषकर शिक्षा) → राज्य सरकार द्वारा ‘शिशु श्रम मुक्त ग्राम पंचायत’ अभियान का शुभारंभ → 44-दिवसीय जागरूकता अभियान → सामूहिक प्रयासों से बाल श्रम का उन्मूलन → बच्चों का समग्र विकास और समृद्ध ओडिशा का निर्माण
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 24, 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों या अन्य खतरनाक नियोजन में नियोजित करने का निषेध करता है।
2. बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986, 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सभी प्रकार के श्रम को प्रतिबंधित करता है।
3. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) बाल श्रम के उन्मूलन के लिए वैश्विक स्तर पर कार्य करता है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 24 खतरनाक नियोजन में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के नियोजन पर रोक लगाता है। कथन 2 गलत है। बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 (संशोधित 2016) कुछ व्यवसायों और प्रक्रियाओं में बाल श्रम को प्रतिबंधित करता है, लेकिन सभी प्रकार के श्रम को नहीं। 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को पारिवारिक उद्यमों में स्कूल के घंटों के बाद या छुट्टियों के दौरान काम करने की अनुमति है, बशर्ते यह खतरनाक न हो। कथन 3 सही है। ILO बाल श्रम के उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों और कार्यक्रमों को बढ़ावा देता है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है?
- अनुच्छेद 21
- अनुच्छेद 21A
- अनुच्छेद 23
- अनुच्छेद 24
उत्तर: अनुच्छेद 21A — अनुच्छेद 21A (86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया) 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ बाल श्रम एक सामाजिक बुराई है जो बच्चों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करती है और उनके समग्र विकास में बाधा डालती है। इस संदर्भ में, बाल श्रम उन्मूलन में ग्राम पंचायतों की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: बाल श्रम की परिभाषा, इसके सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ और बच्चों के मौलिक अधिकारों पर इसके प्रभाव का संक्षिप्त उल्लेख।
2. संवैधानिक और कानूनी प्रावधान: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A, 23, 24 और राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों (अनुच्छेद 39(e) और (f)) का उल्लेख। बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 (संशोधित 2016) और किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 का संदर्भ।
3. बाल श्रम उन्मूलन में ग्राम पंचायतों की भूमिका:
क. जागरूकता अभियान: स्थानीय स्तर पर जागरूकता फैलाने में भूमिका।
ख. पहचान और रिपोर्टिंग: बाल श्रमिकों की पहचान करना और संबंधित अधिकारियों को रिपोर्ट करना।
ग. शिक्षा को बढ़ावा देना: बच्चों को स्कूल भेजने और ड्रॉपआउट दर कम करने में सहायता।
घ. कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन: सरकारी योजनाओं जैसे मनरेगा, मध्याह्न भोजन योजना आदि के प्रभावी क्रियान्वयन में योगदान, जो परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान कर बाल श्रम को कम कर सकते हैं।
ङ. सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदाय और स्वयं सहायता समूहों को शामिल करना।
च. पुनर्वास: बाल श्रमिकों के पुनर्वास और उनके परिवारों को सहायता प्रदान करने में समन्वय।
4. चुनौतियों और सीमाएं:
क. संसाधनों की कमी: वित्तीय और मानव संसाधनों की कमी।
ख. जागरूकता का अभाव: स्वयं ग्राम पंचायत सदस्यों में बाल श्रम कानूनों और उनके कर्तव्यों के प्रति जागरूकता की कमी।
ग. सामाजिक-आर्थिक कारक: गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक मानदंडों का प्रभाव।
घ. राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।
5. आगे का रास्ता/सुझाव: ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाने, क्षमता निर्माण, अंतर-विभागीय समन्वय और सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करने के उपाय।
6. निष्कर्ष: बाल श्रम मुक्त समाज के निर्माण में ग्राम पंचायतों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए एक संतुलित निष्कर्ष।
स्रोत: orissapost.com
Odisha PCS (OPSC (OAS)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: ओडिशा सरकार द्वारा शुरू किए गए 44-दिवसीय अभियान का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- A. ग्राम पंचायतों को बाल श्रम मुक्त बनाना
- B. ग्राम पंचायतों में शिक्षा का स्तर सुधारना
- C. ग्राम पंचायतों में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना
- D. ग्राम पंचायतों में कृषि उत्पादन बढ़ाना
उत्तर: A. ग्राम पंचायतों को बाल श्रम मुक्त बनाना — इस अभियान का मुख्य उद्देश्य ओडिशा के ग्राम पंचायतों को बाल श्रम मुक्त बनाना है, ताकि बच्चों को शिक्षा और सुरक्षा मिल सके।
Mains: ओडिशा सरकार द्वारा बाल श्रम मुक्त ग्राम पंचायतों के निर्माण हेतु शुरू किए गए 44-दिवसीय अभियान की प्रमुख चुनौतियों एवं सफलता के लिए अपनाई जाने वाली रणनीतियों पर चर्चा कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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