13 Oct आरबीआई रुपये की अस्थिरता रोकने के लिए करेगा नियामक उपाय: वित्त मंत्री सीतारमण
✎ RBI की नीति किसी निश्चित विनिमय दर को थामना नहीं, बल्कि विनियामक उपायों से रुपये की अत्यधिक अस्थिरता घटाकर बाजार को व्यवस्थित रखना है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था: मौद्रिक नीति, बाह्य क्षेत्र, विनिमय दर और भुगतान संतुलन | GS Paper III — समावेशी संवृद्धि, मुद्रास्फीति और राजकोषीय अनुशासन | GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाएँ और वैश्विक घटनाक्रम का भारत पर प्रभाव
- Prelims: विनिमय दर (Exchange Rate) और रुपये का मूल्यह्रास, प्रबंधित तैरती विनिमय दर प्रणाली (Managed Floating), विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम (FEMA), 1999, विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves), विदेशी मुद्रा व्युत्पन्न संविदाएँ (Forex Derivatives) और अंतर्निहित जोखिम (Underlying Exposure), विशेष डॉलर तरलता खिड़की (तेल विपणन कंपनियों हेतु), आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation), चालू खाता घाटा (CAD), असंभव त्रिमूर्ति (Impossible Trinity), हाजिर और वायदा बाजार में हस्तक्षेप
- Essay: विनिमय दर की स्थिरता बनाम बाजार-निर्धारित मुद्रा: खुली अर्थव्यवस्था में केंद्रीय बैंक की भूमिका, वैश्विक झटकों के दौर में आर्थिक संप्रभुता और बाह्य क्षेत्र की सुदृढ़ता
त्वरित पुनरावृत्ति: RBI की नीति किसी निश्चित विनिमय दर को थामना नहीं, बल्कि विनियामक उपायों से रुपये की अत्यधिक अस्थिरता घटाकर बाजार को व्यवस्थित रखना है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 13 अक्टूबर 2026 को ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में कहा कि वैश्विक घटनाक्रम से रुपये पर दबाव है और RBI विनियामक उपायों के माध्यम से विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को सीमित करने के प्रयास जारी रखेगा। उनके अनुसार RBI का उद्देश्य बाजार में व्यवस्थित स्थितियाँ बनाए रखना है, किसी विशेष विनिमय दर को थामना नहीं। इससे कुछ दिन पहले RBI ने रुपये में गिरावट के बाद कई कदम उठाए थे: सरकारी तेल विपणन कंपनियों के लिए विशेष डॉलर तरलता खिड़की, रद्द किए गए विदेशी मुद्रा व्युत्पन्न संविदाओं के पुनः बुकिंग के नियमों में कड़ाई, और बिना अंतर्निहित जोखिम वाले कुछ व्युत्पन्न लेन-देन की सीमा को 10 करोड़ डॉलर से घटाकर 50 लाख डॉलर करना। इन उपायों के बाद सोमवार को रुपया 95.78 प्रति डॉलर पर बंद हुआ और मंगलवार को शुरुआती कारोबार में 77 पैसे मज़बूत होकर 95.05 पर पहुँच गया।
पृष्ठभूमि
- भारत में विनिमय दर मुख्यतः बाजार की माँग और आपूर्ति से तय होती है, किंतु RBI अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए हस्तक्षेप करता है। इसे प्रबंधित तैरती विनिमय दर प्रणाली (Managed Floating) कहा जाता है।
- समाचार के अनुसार पिछले लगभग डेढ़ वर्ष में रुपये का मूल्यह्रास उल्लेखनीय रहा है। सरकार का मत है कि इसके अधिकांश कारण बाह्य हैं, जैसे वैश्विक अनिश्चितता और पूँजी प्रवाह में बदलाव।
- विदेशी मुद्रा बाजार का विनियमन विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम (Foreign Exchange Management Act), 1999 के अंतर्गत होता है। यह अधिनियम ‘बाह्य व्यापार और भुगतान को सुगम बनाने तथा विदेशी मुद्रा बाजार के व्यवस्थित विकास’ पर केंद्रित है और FERA, 1973 के स्थान पर आया।
- 1991 के भुगतान संतुलन संकट के बाद भारत ने बाजार-निर्धारित विनिमय दर की ओर कदम बढ़ाए। चालू खाते पर परिवर्तनीयता 1994 में आई, जबकि पूँजी खाते पर परिवर्तनीयता आज भी आंशिक है।
- भारत ने पहले भी रुपये पर दबाव के समय विशेष उपाय अपनाए हैं। 2013 में तेल कंपनियों के लिए विशेष डॉलर विंडो और FCNR(B) जमाओं पर स्वैप विंडो इसके उदाहरण हैं।
- डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी और वैश्विक ब्याज दरें रुपये पर दबाव डालने वाले सामान्य कारक हैं। भारत अपनी तेल आवश्यकता का बड़ा भाग आयात करता है, इसलिए तेल कंपनियों की डॉलर माँग बाजार को प्रभावित करती है।
विनिमय दर प्रबंधन और RBI के विनियामक उपाय क्या हैं?
- विनिमय दर: एक देश की मुद्रा की दूसरे देश की मुद्रा में कीमत। बाजार शक्तियों के कारण जब रुपये की डॉलर के सापेक्ष कीमत घटती है, तो इसे मूल्यह्रास (Depreciation) कहते हैं। सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से मूल्य घटाना अवमूल्यन (Devaluation) कहलाता है।
- RBI की भूमिका: RBI का लक्ष्य किसी निश्चित दर को थामना नहीं, बल्कि अत्यधिक अस्थिरता घटाकर व्यवस्थित बाजार सुनिश्चित करना है। इसके साधनों में हाजिर और वायदा बाजार में डॉलर की बिक्री या खरीद, स्वैप और विनियामक नियम शामिल हैं।
- विशेष डॉलर तरलता खिड़की: तेल विपणन कंपनियों की डॉलर माँग बड़ी और एकमुश्त होती है। विशेष खिड़की से उन्हें डॉलर उपलब्ध कराने पर खुले बाजार में डॉलर की माँग का दबाव घटता है।
- व्युत्पन्न संविदाएँ और अंतर्निहित जोखिम: आयातक या निर्यातक विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव (हेजिंग) के लिए वायदा संविदाएँ करते हैं। जब ऐसी संविदाएँ वास्तविक व्यापारिक जोखिम के बिना की जाती हैं, तो वे सट्टेबाजी का माध्यम बन सकती हैं। इसलिए ऐसे लेन-देन की सीमा 10 करोड़ डॉलर से घटाकर 50 लाख डॉलर की गई।
- रद्द संविदाओं की पुनः बुकिंग पर कड़ाई: रद्द कर पुनः बुक की गई संविदाओं से सट्टा-आधारित पोजीशन बनाई जा सकती है। नियम कड़े करने से डॉलर की सट्टा-माँग घटती है और बाजार पर अनावश्यक दबाव कम होता है।
- रुपये के मूल्यह्रास के प्रभाव: आयात महँगा होने से आयातित मुद्रास्फीति बढ़ती है, विशेषकर कच्चे तेल, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स में। विदेशी ऋण की सेवा-लागत बढ़ती है और चालू खाता घाटे पर दबाव पड़ता है। निर्यात की प्रतिस्पर्धा सुधर सकती है, पर आयातित कच्चे माल पर निर्भर निर्यातकों को पूरा लाभ नहीं मिलता।
- असंभव त्रिमूर्ति (Impossible Trinity): कोई देश एक साथ स्वतंत्र मौद्रिक नीति, स्थिर विनिमय दर और मुक्त पूँजी प्रवाह नहीं रख सकता। इसी कारण भारत ‘प्रबंधित’ मार्ग अपनाता है और किसी एक दर के बजाय अस्थिरता घटाने पर ध्यान देता है।
- दीर्घकालिक समाधान: सरकार ने राजकोषीय अनुशासन और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार को रुपये की स्थिरता का आधार बताया है। इसके साथ निर्यात विविधीकरण, ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाना, स्थिर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करना और घरेलू मुद्रा में व्यापार निपटान जैसे संरचनात्मक कदम भी महत्त्वपूर्ण हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| लक्ष्य: व्यवस्थित बाज़ार, कोई निश्चित दर नहीं | वित्त मंत्री के अनुसार RBI रुपये को किसी विशेष स्तर पर स्थिर करने का प्रयास नहीं कर रहा। यह प्रबंधित अस्थिर विनिमय दर (Managed Float) की नीति के अनुरूप है, जिसमें बाज़ार दर तय करता है और केंद्रीय बैंक केवल अत्यधिक उतार-चढ़ाव को थामता है। |
| तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के लिए विशेष डॉलर तरलता खिड़की | सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर माँग एक साथ बाज़ार में आने से रुपये पर दबाव पड़ता है। विशेष खिड़की से यह माँग अलग से पूरी होती है और बाज़ार का दबाव घटता है। |
| रद्द विदेशी मुद्रा व्युत्पन्न (Derivative) संविदाओं के पुनः बुकिंग के नियम कड़े किए गए | रद्द की गई संविदाओं को बार-बार दोबारा बुक करने से सट्टा बढ़ता है। नियम कड़े होने से बचाव (Hedging) की आड़ में होने वाली सट्टेबाज़ी पर रोक लगती है। |
| अंतर्निहित जोखिम (Underlying Exposure) के बिना कुछ व्युत्पन्न लेन-देन की सीमा $100 मिलियन से घटाकर $5 मिलियन | बिना वास्तविक व्यापारिक या वित्तीय जोखिम के किए जाने वाले सट्टात्मक सौदों का आकार सीमित होता है। इससे रुपये पर एकतरफ़ा दाँव घटते हैं। |
| सुदृढ़ समष्टि-आर्थिक बुनियाद पर बल | वित्त मंत्री ने राजकोषीय अनुशासन और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार को रुपये की स्थिरता का आधार बताया। इससे निवेशकों का विश्वास बना रहता है। |
| सतर्कता और अतिरिक्त कदमों का संकेत | आवश्यकता पड़ने पर और उपाय किए जा सकते हैं। यह बाज़ार को संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक अव्यवस्थित उतार-चढ़ाव को सहन नहीं करेगा। |
महत्व
आर्थिक
- रुपये के तीव्र मूल्यह्रास (Depreciation) से कच्चे तेल, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयात महँगे होते हैं। इससे आयातित मुद्रास्फीति बढ़ती है। अस्थिरता पर अंकुश इस जोखिम को घटाता है।
- स्थिर विनिमय दर से आयातकों और निर्यातकों को लागत तथा आय का पूर्वानुमान लगाना आसान होता है, जिससे व्यापारिक योजना बेहतर बनती है।
- जिन कंपनियों ने विदेशी मुद्रा में ऋण लिया है, उनका पुनर्भुगतान बोझ मूल्यह्रास से बढ़ता है। उपायों से यह बोझ नियंत्रित रहता है।
वित्तीय स्थिरता
- व्युत्पन्न बाज़ार में सट्टात्मक गतिविधि सीमित करने से मुद्रा बाज़ार में अचानक उछाल या गिरावट का खतरा घटता है।
- तेल कंपनियों के लिए विशेष खिड़की से विदेशी मुद्रा बाज़ार की तरलता पर पड़ने वाला दबाव कम होता है।
- सोमवार को रुपये का 95.78 पर बंद होना और मंगलवार को शुरुआती कारोबार में 77 पैसे की मज़बूती (95.05) दर्शाती है कि उपायों से बाज़ार की धारणा में सुधार हुआ।
बाह्य क्षेत्र एवं रणनीतिक
- वित्त मंत्री के अनुसार मूल्यह्रास के अधिकांश कारण बाहरी हैं, जैसे वैश्विक अनिश्चितता और पूँजी प्रवाह में बदलाव। इसलिए अर्थव्यवस्था की बाहरी संवेदनशीलता का प्रबंधन आवश्यक है।
- पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार वैश्विक आघातों के विरुद्ध बफर का काम करता है और भारत की साख को सहारा देता है।
संस्थागत एवं नीतिगत
- विनिमय दर प्रबंधन में सरकार (राजकोषीय पक्ष) और RBI (मौद्रिक एवं विनियामक पक्ष) की भूमिकाओं में समन्वय दिखता है।
- ‘विनियामक उपकरणों’ का उपयोग दर्शाता है कि केवल डॉलर की बिक्री (हस्तक्षेप) ही नहीं, बल्कि नियम-आधारित साधन भी मुद्रा प्रबंधन के अंग हैं।
चुनौतियाँ
1. बाहरी कारकों पर निर्भरता
- वैश्विक ब्याज दरों, कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारक भारत के नियंत्रण से बाहर हैं।
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के पूँजी बहिर्वाह से रुपये पर अचानक दबाव पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: भारतीय अर्थव्यवस्था, भुगतान संतुलन, बाह्य क्षेत्र
2. विदेशी मुद्रा भंडार की सीमा
- रुपये को सँभालने के लिए डॉलर की बिक्री से भंडार घटता है।
- लंबे समय तक चलने वाले दबाव में भंडार का उपयोग टिकाऊ विकल्प नहीं है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: विदेशी मुद्रा भंडार एवं RBI की भूमिका
3. आयातित मुद्रास्फीति और चालू खाता घाटा
- कमज़ोर रुपये से तेल और अन्य आयात महँगे होते हैं, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ती है और चालू खाता घाटे (CAD) पर दबाव पड़ता है।
- मुद्रास्फीति बढ़ने पर RBI के मौद्रिक नीति विकल्प सीमित हो जाते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: मुद्रास्फीति, मौद्रिक नीति
4. विनियमन और बाज़ार दक्षता में संतुलन
- सट्टात्मक सौदों पर कड़ी सीमाएँ बाज़ार की गहराई और तरलता घटा सकती हैं।
- वास्तविक बचाव (Hedging) की आवश्यकता वाले आयातक-निर्यातक भी कठिनाई झेल सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: वित्तीय बाज़ार, विनियमन
5. असंभव त्रिकोण (Impossible Trinity) की बाध्यता
- स्वतंत्र मौद्रिक नीति, स्थिर विनिमय दर और खुला पूँजी खाता तीनों एक साथ संभव नहीं हैं।
- भारत की प्रबंधित अस्थिर दर नीति में इनके बीच निरंतर समझौता करना पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: मुद्रा एवं पूँजी खाता परिवर्तनीयता
6. तेल पर संरचनात्मक निर्भरता
- OMCs के लिए विशेष खिड़की अस्थायी राहत है। कच्चे तेल के आयात पर भारी निर्भरता बनी रहने से डॉलर की माँग संरचनात्मक रूप से ऊँची रहती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: ऊर्जा सुरक्षा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मूल्यह्रास की गति | पिछले लगभग डेढ़ वर्ष में रुपये में उल्लेखनीय गिरावट आई है। इस प्रवृत्ति के बने रहने पर आयात लागत और मुद्रास्फीति बढ़ने का खतरा है। |
| सट्टात्मक दबाव | बिना अंतर्निहित जोखिम के किए गए व्युत्पन्न सौदे रुपये पर एकतरफ़ा दाँव को बढ़ावा देते हैं। सीमा घटाने के बाद भी कड़ी निगरानी आवश्यक है। |
| हस्तक्षेप की लागत | भंडार से डॉलर बेचने पर भंडार का क्षरण होता है और घरेलू तरलता भी प्रभावित होती है। |
| बाहरी झटके | वैश्विक घटनाक्रम से पूँजी बहिर्वाह होता है, जिस पर घरेलू नीति का सीमित प्रभाव है। |
| संकेतों की स्पष्टता | ‘कोई निश्चित स्तर नहीं’ का रुख़ सही है, पर बाज़ार को नीति की सीमाओं के बारे में स्पष्ट संकेत न मिलें तो अनिश्चितता बढ़ सकती है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- तेल विपणन कंपनियों के लिए RBI की विशेष डॉलर तरलता खिड़की (अक्टूबर 2026 में घोषित उपाय, समाचार में उल्लिखित)
- विदेशी मुद्रा व्युत्पन्न संविदाओं के पुनः बुकिंग संबंधी कड़े नियम (RBI का विनियामक उपाय, समाचार में उल्लिखित)
- अंतर्निहित जोखिम के बिना व्युत्पन्न लेन-देन की सीमा में कटौती ($100 मिलियन से $5 मिलियन; RBI का विनियामक उपाय)
आगे की राह
- विदेशी मुद्रा भंडार को पर्याप्त स्तर पर बनाए रखना और हस्तक्षेप को केवल अत्यधिक अस्थिरता तक सीमित रखना, ताकि भंडार का क्षरण न हो।
- चालू खाता घाटा घटाने के लिए निर्यात विविधीकरण, आयात प्रतिस्थापन और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना।
- ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा, इथेनॉल मिश्रण और ऊर्जा दक्षता को गति देना।
- स्थिर दीर्घकालिक पूँजी, विशेषकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), को आकर्षित करना ताकि अस्थिर पोर्टफोलियो प्रवाह पर निर्भरता घटे।
- राजकोषीय अनुशासन और मुद्रास्फीति नियंत्रण बनाए रखकर समष्टि-आर्थिक विश्वसनीयता सुदृढ़ रखना।
- व्युत्पन्न बाज़ार में सट्टेबाज़ी रोकने वाले नियमों के साथ वास्तविक बचाव (Hedging) की सुविधा बनाए रखना, ताकि छोटे आयातकों और निर्यातकों को असुविधा न हो।
- द्विपक्षीय व्यापार में रुपये के उपयोग और स्थानीय मुद्रा में निपटान को बढ़ावा देकर डॉलर पर निर्भरता घटाना।
- नीतिगत संवाद को पारदर्शी रखना, ताकि बाज़ार को हस्तक्षेप के उद्देश्य और सीमाओं की स्पष्ट जानकारी रहे।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
प्रबंधित तैरती विनिमय दर (Managed Float) · रुपये का मूल्यह्रास (Depreciation) · विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप (Intervention) · विनिमय दर में अत्यधिक अस्थिरता · विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) · विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम (FEMA), 1999 · मूल एक्सपोज़र रहित व्युत्पन्न लेन-देन (Derivatives without Underlying Exposure) · तेल विपणन कंपनियों के लिए विशेष डॉलर तरलता खिड़की · मुंडेल-फ्लेमिंग त्रिकोण (Impossible Trinity) · चालू खाता घाटा (CAD) · विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) का पूँजी बहिर्गमन · आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- संघ सूची, सातवीं अनुसूची, प्रविष्टि 36 — मुद्रा, सिक्का-निर्माण, वैध निविदा और विदेशी मुद्रा संघ का विषय
- संघ सूची, सातवीं अनुसूची, प्रविष्टि 38 — भारतीय रिज़र्व बैंक संबंधी विधायन संघ के अधीन
अवधारणा प्रवाह
वैश्विक अनिश्चितता, पूँजी बहिर्वाह और तेल की डॉलर माँग से रुपये पर दबाव बढ़ता है → रुपये का मूल्यह्रास होता है और विदेशी मुद्रा बाज़ार में अत्यधिक अस्थिरता आती है → RBI तेल कंपनियों के लिए विशेष डॉलर खिड़की खोलता है और व्युत्पन्न सौदों के नियम कड़े करता है → सट्टात्मक दाँव और डॉलर की एकमुश्त माँग घटती है, जिससे बाज़ार में व्यवस्था लौटती है → रुपया मज़बूत होता है (95.78 पर बंद, फिर शुरुआती कारोबार में 95.05) और बाज़ार का विश्वास सुधरता है → सरकार का राजकोषीय अनुशासन और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार दीर्घकालिक स्थिरता को सहारा देते हैं → आवश्यकता पड़ने पर RBI अतिरिक्त कदम उठाने के लिए सतर्क रहता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. भारत में विनिमय दर प्रबंधन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में रुपये की विनिमय दर मुख्यतः बाजार द्वारा निर्धारित होती है, और भारतीय रिज़र्व बैंक अत्यधिक अस्थिरता को सीमित करने के लिए हस्तक्षेप करता है।
2. विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम (FEMA), 1999 ने विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (FERA), 1973 का स्थान लिया।
3. रुपये के मूल्यह्रास से आयात सस्ते और निर्यात डॉलर-मूल्य में महँगे हो जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: भारत की व्यवस्था बाजार-निर्धारित है, जिसमें RBI अस्थिरता घटाने के लिए हस्तक्षेप करता है। कथन 2 सही है: FEMA, 1999 ने FERA, 1973 को प्रतिस्थापित किया। कथन 3 गलत है: मूल्यह्रास से आयात महँगे होते हैं, जबकि निर्यात विदेशी खरीदारों के लिए सस्ते (प्रतिस्पर्धी) हो जाते हैं।
Q2. अभिकथन (A): रुपये के तीव्र मूल्यह्रास से सरकारी तेल विपणन कंपनियों पर दबाव बढ़ता है।
कारण (R): भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का बड़ा भाग आयात करता है और उसका भुगतान मुख्यतः अमेरिकी डॉलर में होता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, किंतु R गलत है
- A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — कच्चे तेल का आयात डॉलर में भुगतान माँगता है। रुपया कमज़ोर होने पर इन कंपनियों की डॉलर माँग और रुपया-लागत बढ़ जाती है। इसीलिए RBI ने उनके लिए विशेष डॉलर तरलता खिड़की खोली। अतः R, A की सही व्याख्या है।
Q3. ‘मुंडेल-फ्लेमिंग त्रिकोण’ (Impossible Trinity) के अनुसार कोई अर्थव्यवस्था निम्नलिखित में से किन तीनों लक्ष्यों को एक साथ प्राप्त नहीं कर सकती?
- स्थिर विनिमय दर, स्वतंत्र मौद्रिक नीति और मुक्त पूँजी प्रवाह
- स्थिर विनिमय दर, राजकोषीय अनुशासन और व्यापार अधिशेष
- स्वतंत्र मौद्रिक नीति, कम मुद्रास्फीति और उच्च संवृद्धि
- मुक्त पूँजी प्रवाह, राजकोषीय घाटा नियंत्रण और विदेशी मुद्रा भंडार वृद्धि
उत्तर: स्थिर विनिमय दर, स्वतंत्र मौद्रिक नीति और मुक्त पूँजी प्रवाह — त्रिकोण के अनुसार स्थिर विनिमय दर, स्वतंत्र मौद्रिक नीति और मुक्त पूँजी गतिशीलता में से केवल दो ही एक साथ संभव हैं। भारत विनिमय दर को पूरी तरह स्थिर नहीं रखता; वह प्रबंधित तैरती दर अपनाकर मौद्रिक स्वायत्तता बचाता है और पूँजी प्रवाह पर आंशिक नियंत्रण रखता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ “भारतीय रिज़र्व बैंक का उद्देश्य रुपये को किसी विशेष स्तर पर थामना नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित स्थितियाँ सुनिश्चित करना है।” हाल के रुपया-मूल्यह्रास के संदर्भ में RBI द्वारा अपनाए गए विनियामक उपायों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि केवल विनियामक उपाय रुपये की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए कहाँ तक पर्याप्त हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: प्रस्तावना: भारत की प्रबंधित तैरती विनिमय दर व्यवस्था (1993 से बाजार-निर्धारित दर; इससे पहले 1992 की LERMS); RBI की भूमिका RBI अधिनियम, 1934 और FEMA, 1999 से। समाचार का संदर्भ: डेढ़ वर्ष में रुपये का उल्लेखनीय मूल्यह्रास, अक्टूबर में रुपया लगभग 95-96 प्रति डॉलर।
मुख्य भाग-1 (उपाय): (क) तेल विपणन कंपनियों के लिए विशेष डॉलर तरलता खिड़की, जिससे बाजार में डॉलर माँग का दबाव घटता है; (ख) रद्द किए गए विदेशी मुद्रा व्युत्पन्न अनुबंधों की पुनर्बुकिंग पर कड़े नियम; (ग) बिना मूल एक्सपोज़र वाले व्युत्पन्न लेन-देन की सीमा $100 मिलियन से घटाकर $5 मिलियन, जिससे सट्टात्मक स्थितियाँ सीमित होती हैं। प्रभाव: रुपया 95.78 पर बंद हुआ और अगले दिन शुरुआती कारोबार में 77 पैसे मज़बूत हुआ।
मुख्य भाग-2 (मूल्यांकन): लाभ — विदेशी मुद्रा भंडार की बचत, सट्टेबाज़ी पर रोक, आयातित मुद्रास्फीति का नियंत्रण, बाजार में भरोसा। सीमाएँ — वैध हेजिंग और बाजार की गहराई पर प्रतिकूल असर की आशंका, उपाय लक्षणों पर केंद्रित, अनुपालन लागत।
दीर्घकालिक कारक: बाहरी कारण (वित्त मंत्री के अनुसार) जैसे वैश्विक ब्याज दरें, मज़बूत डॉलर, कच्चे तेल की कीमतें, FPI बहिर्गमन; आंतरिक कारण — चालू खाता घाटा, आयात-निर्भरता (तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स)। स्थायी समाधान: निर्यात विविधीकरण, आयात प्रतिस्थापन, ऊर्जा सुरक्षा, FDI आकर्षण, राजकोषीय अनुशासन, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार। मुंडेल-फ्लेमिंग त्रिकोण के संदर्भ में मौद्रिक स्वायत्तता बनाम विनिमय दर प्रबंधन का समझौता भी स्पष्ट करें।
निष्कर्ष: विनियामक उपाय अल्पकालिक ‘शॉक-एब्ज़ॉर्बर’ हैं; निरंतर स्थिरता के लिए संरचनात्मक सुधार और संतुलित हस्तक्षेप आवश्यक हैं। पारदर्शिता और नीतिगत स्पष्टता बनाए रखना भी ज़रूरी है।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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