13 Oct आरबीआई रुपये को स्थिर रखने के प्रयास जारी रखेगा: वित्त मंत्री
✎ RBI रुपये का कोई स्तर तय नहीं करता, केवल अस्थिरता घटाता है। FEMA, 1999 के अंतर्गत नियामक उपायों (तेल कंपनियों के लिए विशेष विंडो, डेरिवेटिव पर सख़्ती, बड़ी डॉलर-खरीद पर 20 प्रतिशत आरक्षित निधि) और विदेशी मुद्रा भंडार के सहारे वह…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था: मौद्रिक नीति, विनिमय दर, भुगतान संतुलन और विदेशी मुद्रा भंडार | GS Paper III — समावेशी संवृद्धि, मुद्रास्फीति और बाह्य क्षेत्र की चुनौतियाँ | GS Paper II — सरकारी नीतियाँ और संस्थाएँ: RBI की नियामक भूमिका और सरकार-RBI समन्वय
- Prelims: विनिमय दर (Exchange Rate), मूल्यह्रास बनाम अवमूल्यन, प्रबंधित अस्थिर विनिमय दर (Managed Floating), विदेशी मुद्रा भंडार, विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999, भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934, तेल विपणन कंपनियाँ (OMCs) के लिए विशेष विंडो, विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव और सट्टा, चालू खाता घाटा (CAD), NEER और REER, नीतिगत त्रिकोण (Impossible Trinity)
- Essay: मुद्रा की स्थिरता बनाम बाज़ार-निर्धारित मूल्य: खुली अर्थव्यवस्था में विनिमय दर प्रबंधन की दुविधा, वैश्विक अनिश्चितता के दौर में समष्टि-आर्थिक स्थिरता: बाहरी आघातों से अर्थव्यवस्था की रक्षा
त्वरित पुनरावृत्ति: RBI रुपये का कोई स्तर तय नहीं करता, केवल अस्थिरता घटाता है। FEMA, 1999 के अंतर्गत नियामक उपायों (तेल कंपनियों के लिए विशेष विंडो, डेरिवेटिव पर सख़्ती, बड़ी डॉलर-खरीद पर 20 प्रतिशत आरक्षित निधि) और विदेशी मुद्रा भंडार के सहारे वह प्रबंधित अस्थिर विनिमय दर व्यवस्था चलाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 13 अक्टूबर 2026 को Bloomberg New Economy Forum 2026 में कहा कि पिछले लगभग डेढ़ वर्ष में रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले उल्लेखनीय गिरावट आई है और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अत्यधिक अस्थिरता रोकने के प्रयास जारी रखेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि RBI रुपये का कोई निश्चित मूल्य तय नहीं कर रहा, बल्कि केवल उतार-चढ़ाव को थामने की कोशिश कर रहा है। उनके अनुसार अस्थिरता का बड़ा हिस्सा बाहरी कारणों से आ रहा है, जबकि देश के भीतर समष्टि-आर्थिक बुनियादी तत्त्व और विदेशी मुद्रा भंडार सुदृढ़ हैं। इससे पहले सप्ताहांत में RBI ने कई उपाय घोषित किए थे। इनमें तेल विपणन कंपनियों के लिए विशेष विंडो, जो डॉलर की माँग को हाज़िर (स्पॉट) बाज़ार से हटाएगी, विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों के नियमों में सख़्ती, ताकि रुपये के विरुद्ध सट्टा रोका जा सके, और 2 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की डॉलर-खरीद पर बैंकों के लिए 20 प्रतिशत आरक्षित निधि की व्यवस्था शामिल हैं। इन उपायों के बाद सोमवार को रुपया लगभग 1 प्रतिशत मज़बूत हुआ और मंगलवार को शुरुआती कारोबार में 94.96 रुपये प्रति डॉलर पर पहुँचा।
पृष्ठभूमि
- भारत में रुपये की विनिमय दर मुख्यतः विदेशी मुद्रा बाज़ार में माँग और आपूर्ति से तय होती है। RBI केवल अत्यधिक अस्थिरता की स्थिति में हस्तक्षेप करता है। इसे प्रबंधित अस्थिर विनिमय दर व्यवस्था (Managed Floating) कहा जाता है।
- 1991 के भुगतान संतुलन संकट के बाद भारत ने निश्चित विनिमय दर से बाज़ार-निर्धारित दर की ओर संक्रमण किया। इसके चरण थे: 1991 में रुपये का अवमूल्यन, 1992 में दोहरी विनिमय दर (LERMS) और 1993 में एकीकृत बाज़ार-निर्धारित दर। चालू खाते पर रुपये की पूर्ण परिवर्तनीयता 1994 में लागू हुई।
- विदेशी मुद्रा लेन-देन का नियमन विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999 के अंतर्गत होता है, जिसने FERA, 1973 का स्थान लिया। यह अधिनियम ‘नियंत्रण’ के बजाय ‘प्रबंधन’ पर बल देता है। इसमें RBI को अधिकृत डीलर बैंकों को निर्देश देने की शक्ति प्राप्त है।
- भारत कच्चे तेल की अपनी अधिकांश आवश्यकता का आयात करता है। इसलिए तेल कंपनियों की डॉलर माँग विनिमय दर पर प्रत्यक्ष दबाव डालती है। साथ ही वैश्विक ब्याज दरों में वृद्धि, डॉलर की मज़बूती और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी भी रुपये को कमज़ोर करती है।
- रुपये के गिरने से आयात महँगा होता है, जिससे आयातित मुद्रास्फीति बढ़ती है। विदेशी ऋण की सेवा-लागत भी बढ़ती है। दूसरी ओर, निर्यात की प्रतिस्पर्धा कुछ सुधर सकती है, पर यह लाभ आयातित कच्चे माल पर निर्भरता के कारण सीमित रहता है।
- राजकोषीय अनुशासन का संबंध FRBM अधिनियम, 2003 के ढाँचे से है। निवेशकों का विश्वास राजकोषीय घाटे, चालू खाता घाटे, मुद्रास्फीति और विदेशी मुद्रा भंडार जैसे समष्टि-आर्थिक संकेतकों पर टिका रहता है।
विनिमय दर प्रबंधन और रुपये की स्थिरता से जुड़े RBI के उपाय क्या हैं?
- विनिमय दर (Exchange Rate) एक देश की मुद्रा की दूसरी मुद्रा के रूप में कीमत है। रुपये का 94.96 प्रति डॉलर होना यह दर्शाता है कि 1 अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए लगभग 95 रुपये देने पड़ रहे हैं।
- मूल्यह्रास (Depreciation) बाज़ार शक्तियों के कारण मुद्रा के मूल्य में गिरावट है। अवमूल्यन (Devaluation) निश्चित विनिमय दर व्यवस्था में सरकार द्वारा जानबूझकर किया गया मूल्य-ह्रास है। भारत में वर्तमान में मूल्यह्रास की शब्दावली उपयुक्त है।
- RBI के हस्तक्षेप के मुख्य साधन हैं: विदेशी मुद्रा बाज़ार में डॉलर की बिक्री या खरीद, वायदा (Forward) और स्वैप सौदे, तथा बैंकों और बाज़ार प्रतिभागियों पर नियामक प्रतिबंध। इनका उद्देश्य किसी विशेष स्तर की रक्षा करना नहीं, बल्कि अव्यवस्थित उतार-चढ़ाव रोकना है।
- तेल विपणन कंपनियों के लिए विशेष विंडो: तेल आयात के लिए डॉलर की भारी माँग बाज़ार में एक साथ आने से हाज़िर दर पर दबाव बढ़ता है। विशेष विंडो इस माँग को बाज़ार से अलग एक व्यवस्थित मार्ग से पूरा करती है, जिससे दैनिक अस्थिरता घटने की अपेक्षा रहती है।
- विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव पर सख़्ती: डेरिवेटिव का मूल उद्देश्य जोखिम का बचाव (Hedging) है। सट्टा सौदे रुपये के विरुद्ध एकतरफ़ा दाँव लगाकर गिरावट को तेज़ कर सकते हैं। इसलिए नियमों को कड़ा करके हेजिंग की वास्तविक आवश्यकता से जुड़े सौदों को प्रोत्साहित किया जाता है।
- बैंकों के लिए 20 प्रतिशत आरक्षित निधि: 2 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की डॉलर-खरीद पर आरक्षित निधि की शर्त से बड़े सौदों की लागत बढ़ती है, जिससे डॉलर की सट्टात्मक या अनावश्यक खरीद हतोत्साहित होती है। यह पूँजी-प्रवाह प्रबंधन जैसा नियामक उपाय है।
- विदेशी मुद्रा भंडार RBI के हस्तक्षेप की क्षमता का आधार है। इसमें विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ, स्वर्ण, IMF में विशेष आहरण अधिकार (SDR) और आरक्षित किस्त शामिल हैं। भंडार का पर्याप्त होना बाज़ार का विश्वास बनाए रखता है।
- नीतिगत त्रिकोण (Impossible Trinity) के अनुसार कोई देश एक साथ स्वतंत्र मौद्रिक नीति, स्थिर विनिमय दर और मुक्त पूँजी प्रवाह में से केवल दो ही प्राप्त कर सकता है। भारत इसी कारण दर को पूर्णतः स्थिर रखने के बजाय केवल अस्थिरता सीमित करने का मार्ग अपनाता है। वित्त मंत्री का कथन ‘रुपये को स्थिर करना, तय करना नहीं’ इसी दृष्टिकोण को दर्शाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के लिए विशेष खिड़की | तेल कंपनियों की डॉलर माँग स्पॉट बाज़ार से हटकर अलग माध्यम से पूरी होती है। इससे बाज़ार पर एकमुश्त दबाव घटता है और विनिमय दर (Exchange Rate) में अचानक उछाल रुकता है। |
| विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों पर कड़े नियम | रुपये के विरुद्ध सट्टात्मक दाँव महँगे और कठिन हो जाते हैं। इससे अपेक्षाजनित (Expectation-driven) मूल्यह्रास पर अंकुश लगता है। |
| 2 मिलियन डॉलर से अधिक की डॉलर खरीद पर बैंकों के लिए 20 प्रतिशत आरक्षित निधि की अपेक्षा | बड़े आकार की डॉलर खरीद की लागत बढ़ती है और अनावश्यक या सट्टे की खरीद हतोत्साहित होती है। |
| लक्ष्य स्तर नहीं, केवल अस्थिरता पर नियंत्रण | वित्त मंत्री के अनुसार RBI रुपये का मूल्य ‘तय’ नहीं करता, केवल अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकता है। यह प्रबंधित अस्थिर (Managed Float) विनिमय दर व्यवस्था की मूल भावना है। |
| नियामकीय शक्तियों का प्रयोग | इन उपायों में विदेशी मुद्रा भंडार बेचने के बजाय नियमन का सहारा लिया गया है। इससे भंडार सुरक्षित रहता है, जबकि बाज़ार को स्पष्ट संकेत मिलता है। |
| तात्कालिक बाज़ार प्रतिक्रिया | घोषणा के बाद सोमवार को रुपया लगभग 1 प्रतिशत मज़बूत हुआ और मंगलवार को शुरुआती कारोबार में 94.96 रुपये प्रति डॉलर पर रहा। |
महत्व
आर्थिक
- रुपये की तीव्र अस्थिरता आयातित मुद्रास्फीति (Inflation) को बढ़ाती है। कच्चा तेल, उर्वरक, खाद्य तेल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयात महँगे होते हैं, इसलिए स्थिरता से मूल्य-स्तर पर नियंत्रण में सहायता मिलती है।
- विनिमय दर की पूर्वानुमेयता आयातकों, निर्यातकों और विदेशी मुद्रा में उधार लेने वाली कंपनियों को योजना बनाने तथा बचाव (Hedging) की लागत घटाने में सहायक है।
- तेल कंपनियों की डॉलर माँग को अलग करने से चालू खाता घाटे के सबसे बड़े घटक का दबाव बाज़ार से हटता है।
वित्तीय स्थिरता
- डॉलर में लिए गए बाहरी ऋण की सेवा-लागत रुपये के मूल्यह्रास से बढ़ती है। नियंत्रित विनिमय दर कंपनियों और बैंकों की बैलेंस शीट को सुरक्षित रखती है।
- सट्टात्मक गतिविधि पर अंकुश से ‘एकतरफ़ा दाँव’ की प्रवृत्ति रुकती है, जो अनियंत्रित पूँजी पलायन का कारण बन सकती है।
- विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षण बाहरी झटकों के विरुद्ध भारत की पहली सुरक्षा-पंक्ति बना रहता है।
नीतिगत एवं संस्थागत
- यह दिखाता है कि केंद्रीय बैंक के पास केवल ब्याज दर ही नहीं, विनियामकीय उपकरणों की भी विस्तृत शृंखला है।
- वित्त मंत्री का यह कथन कि राजकोषीय अनुशासन निवेशकों की चिंता का विषय नहीं होना चाहिए, सरकार और RBI के बीच नीतिगत समन्वय का संकेत है।
सामरिक एवं बाह्य
- ऊर्जा आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था में मुद्रा-स्थिरता ऊर्जा सुरक्षा से सीधे जुड़ी है।
- स्थिर मुद्रा भारत की निवेश-गंतव्य के रूप में साख को बनाए रखती है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का विश्वास टिकाए रखती है।
चुनौतियाँ
1. बाह्य कारकों पर निर्भरता
- डॉलर की मज़बूती, वैश्विक ब्याज दरें और कच्चे तेल की कीमतें भारत के नियंत्रण से बाहर हैं।
- घरेलू नीतिगत उपाय बाहरी झटकों को केवल सीमित सीमा तक ही संभाल सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: भारतीय अर्थव्यवस्था — भुगतान संतुलन और बाह्य क्षेत्र
2. चालू खाता घाटा और तेल आयात
- कच्चे तेल का भारी आयात डॉलर की संरचनात्मक माँग पैदा करता है।
- विशेष खिड़की तात्कालिक राहत देती है, पर आयात-निर्भरता का स्थायी समाधान नहीं है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: ऊर्जा सुरक्षा, चालू खाता घाटा
3. पूँजी प्रवाह की अनिश्चितता
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेश ‘हॉट मनी’ की प्रकृति का होता है और वैश्विक जोखिम-भावना बदलते ही बाहर चला जाता है।
- इससे रुपये पर अचानक दबाव बनता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पूँजी खाता, FPI और FDI
4. नियामकीय उपायों की लागत और सीमाएँ
- डेरिवेटिव पर कड़े नियम वैध बचाव (Hedging) को भी महँगा बना सकते हैं, जिससे निर्यातकों और आयातकों पर बोझ पड़ता है।
- आरक्षित निधि की अपेक्षा से बैंकों की तरलता और विदेशी मुद्रा बाज़ार की गहराई प्रभावित हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: बैंकिंग क्षेत्र, वित्तीय बाज़ार और नियमन
5. मौद्रिक नीति की स्वायत्तता का द्वंद्व
- भारत आंशिक पूँजी गतिशीलता और प्रबंधित विनिमय दर के साथ स्वतंत्र मौद्रिक नीति चाहता है, पर ‘असंभव त्रिमूर्ति’ (Impossible Trinity) के कारण तीनों लक्ष्य एक साथ पूर्णतः संभव नहीं।
- विनिमय दर को थामने के प्रयास घरेलू ब्याज दर और तरलता नीति के विकल्पों को सीमित कर सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: मौद्रिक नीति; अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र की अवधारणाएँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| रुपये का मूल्यह्रास | आयातित मुद्रास्फीति, बाहरी ऋण-सेवा की ऊँची लागत और घरेलू क्रय-शक्ति में कमी। |
| विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग | लगातार हस्तक्षेप से भंडार घटता है, जो दीर्घकाल में बाहरी सुरक्षा-कवच को कमज़ोर कर सकता है। |
| सट्टेबाज़ी और अपेक्षाएँ | मूल्यह्रास की आशंका स्वयं उसे बढ़ाती है, जिससे अस्थिरता का दुष्चक्र बन सकता है। |
| तेल कंपनियों की डॉलर माँग | कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर माँग का दबाव बढ़ता है और अलग खिड़की भी पर्याप्त नहीं रहती। |
| निर्यात प्रतिस्पर्धा बनाम महँगाई | कमज़ोर रुपया निर्यात को सहारा देता है, पर आयात-निर्भर क्षेत्रों की लागत बढ़ाता है। संतुलन साधना कठिन है। |
आगे की राह
- निर्यात बाज़ारों और उत्पादों का विविधीकरण करते हुए चालू खाता घाटे को दीर्घकाल में टिकाऊ स्तर पर रखना चाहिए।
- ऊर्जा आयात-निर्भरता घटाने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा, इथेनॉल मिश्रण और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना चाहिए।
- स्थिर और दीर्घकालिक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि अस्थिर पोर्टफोलियो प्रवाह पर निर्भरता घटे।
- द्विपक्षीय व्यापार में रुपये में बीजक (Invoicing) और निपटान को बढ़ाकर डॉलर पर निर्भरता कम करनी चाहिए।
- विदेशी मुद्रा बाज़ार को अधिक गहरा बनाना चाहिए और वैध बचाव (Hedging) उपकरणों की लागत नियंत्रित रखनी चाहिए।
- विदेशी मुद्रा भंडार को पर्याप्त स्तर पर रखना चाहिए तथा हस्तक्षेप में नियमन, बाज़ार-संचालन और भंडार के उपयोग का संतुलित मिश्रण अपनाना चाहिए।
- राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना चाहिए और RBI तथा सरकार के बीच नीतिगत संवाद पारदर्शी रखना चाहिए, ताकि निवेशकों का विश्वास टिके।
- उपायों की स्पष्ट घोषणा और अपेक्षाओं का प्रबंधन करना चाहिए, ताकि बाज़ार को यह संदेश मिले कि लक्ष्य स्तर तय करना नहीं, केवल अस्थिरता घटाना है।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
प्रबंधित अस्थायी विनिमय दर (Managed Floating Exchange Rate) · रुपये का मूल्यह्रास (Depreciation) बनाम अस्थिरता (Volatility) · विदेशी मुद्रा भंडार एवं हस्तक्षेप · विदेशी मुद्रा व्युत्पन्न (Forex Derivatives) और सट्टेबाजी · तेल विपणन कंपनियों के लिए विशेष खिड़की · आयातित मुद्रास्फीति · चालू खाता घाटा · विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999 · असंभव त्रिमूर्ति (Impossible Trinity) · वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (REER) · मौद्रिक एवं राजकोषीय नीति का समन्वय · पूँजी प्रवाह की अनिश्चितता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- सातवीं अनुसूची, संघ सूची की प्रविष्टि 36 — मुद्रा, सिक्का और विदेशी मुद्रा
- सातवीं अनुसूची, संघ सूची की प्रविष्टि 38 — भारतीय रिज़र्व बैंक संबंधी विषय
- अनुच्छेद 246(1) — संघ सूची पर संसद की अनन्य विधायी शक्ति
अवधारणा प्रवाह
वैश्विक कारक: डॉलर में मज़बूती, कच्चे तेल की ऊँची कीमतें और पूँजी का बहिर्गमन → डॉलर की माँग बढ़ने से रुपये का मूल्यह्रास और अस्थिरता → आयातित मुद्रास्फीति और बाहरी ऋण-सेवा की लागत में वृद्धि का जोखिम → RBI का नियामकीय हस्तक्षेप: OMCs के लिए विशेष खिड़की, कड़े डेरिवेटिव नियम और 20 प्रतिशत आरक्षित निधि → स्पॉट बाज़ार पर डॉलर माँग का दबाव और सट्टात्मक दाँव घटे → रुपये में लगभग 1 प्रतिशत की मूल्यवृद्धि और अस्थिरता में कमी → दीर्घकालिक समाधान: चालू खाता घाटे में सुधार, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और स्थिर पूँजी प्रवाह
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. रुपये की विनिमय दर के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में विनिमय दर पूर्णतः स्थिर नहीं है, बल्कि RBI अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करता है।
2. विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999 का उद्देश्य बाह्य व्यापार एवं भुगतान को सुगम बनाना तथा विदेशी मुद्रा बाज़ार के व्यवस्थित विकास को बढ़ावा देना है।
3. रुपये के मूल्यह्रास से भारत का आयात बिल रुपये के संदर्भ में अनिवार्यतः घटता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: भारत में प्रबंधित अस्थायी विनिमय दर व्यवस्था है। कथन 2 सही है: यह FEMA की प्रस्तावना का उद्देश्य है। कथन 3 गलत है: रुपये के मूल्यह्रास से डॉलर में मूल्यांकित आयात रुपये के संदर्भ में महँगे हो जाते हैं।
Q2. अभिकथन (A): रुपये के मूल्यह्रास से भारत में आयातित मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ सकता है।
कारण (R): भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का बड़ा भाग आयात करता है और उसका भुगतान मुख्यतः अमेरिकी डॉलर में होता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, परंतु R गलत है
- A गलत है, परंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — मूल्यह्रास होने पर डॉलर-मूल्यांकित कच्चे तेल के लिए अधिक रुपये चुकाने पड़ते हैं, जिससे परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ती है। अतः R, A की सही व्याख्या करता है।
Q3. RBI द्वारा तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के लिए डॉलर की विशेष खिड़की बनाने का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- OMCs की डॉलर माँग को हाज़िर (स्पॉट) बाज़ार से अलग कर रुपये पर दबाव घटाना
- OMCs को रुपये में कच्चा तेल खरीदने के लिए बाध्य करना
- पेट्रोल-डीज़ल के खुदरा मूल्य को सीधे निर्धारित करना
- विदेशी मुद्रा भंडार का एक भाग स्वर्ण में बदलना
उत्तर: OMCs की डॉलर माँग को हाज़िर (स्पॉट) बाज़ार से अलग कर रुपये पर दबाव घटाना — तेल कंपनियाँ डॉलर की सबसे बड़ी और नियमित खरीदार हैं। उनकी माँग को अलग खिड़की से पूरा करने पर हाज़िर बाज़ार में अचानक डॉलर माँग घटती है और रुपये की अस्थिरता कम होती है। अन्य विकल्पों का इस उपाय से संबंध नहीं है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ “विनिमय दर नीति का लक्ष्य रुपये का मूल्य ‘निर्धारित’ करना नहीं, बल्कि उसकी अत्यधिक अस्थिरता को रोकना है।” हाल में रुपये के तीव्र मूल्यह्रास के संदर्भ में RBI द्वारा अपनाए गए उपायों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि बाह्य झटकों से निपटने के लिए केवल विनियामक उपाय पर्याप्त क्यों नहीं हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: प्रस्तावना (2-3 पंक्तियाँ): रुपया लगभग 95 प्रति डॉलर के आसपास; वित्त मंत्री का वक्तव्य कि RBI ‘रुपये को तय’ नहीं कर रहा, केवल अस्थिरता रोक रहा है। भारत की प्रबंधित अस्थायी विनिमय दर व्यवस्था।
भाग 1 – RBI के उपाय और तर्क: (क) OMCs के लिए विशेष खिड़की, जिससे डॉलर माँग हाज़िर बाज़ार से हटती है (संदर्भ: 2013 में भी तेल कंपनियों के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी); (ख) विदेशी मुद्रा व्युत्पन्न सौदों के नियम कड़े करना ताकि रुपये के विरुद्ध सट्टेबाजी घटे; (ग) 2 मिलियन डॉलर से अधिक की डॉलर खरीद पर बैंकों के लिए 20 प्रतिशत आरक्षित अपेक्षा। लाभ: समाचार के अनुसार अगले ही दिन रुपया लगभग 1 प्रतिशत मज़बूत हुआ; विदेशी मुद्रा भंडार की बचत; वैधानिक आधार FEMA 1999 और RBI अधिनियम 1934।
भाग 2 – आलोचनात्मक पक्ष: ये अल्पकालिक, प्रशासनिक उपाय हैं और मूल कारणों (डॉलर की वैश्विक मज़बूती, कच्चे तेल की कीमतें, पूँजी का बहिर्गमन, चालू खाता घाटा) का समाधान नहीं करते; पूँजी नियंत्रण जैसे कदमों से बाज़ार की गहराई और निवेशक विश्वास प्रभावित हो सकता है; वैध हेजिंग की लागत बढ़ सकती है; असंभव त्रिमूर्ति की सीमाएँ; भंडार के उपयोग की सीमा। संतुलन के लिए तर्क: विनिमय दर को पूर्णतः बाज़ार पर छोड़ने से आयातित मुद्रास्फीति और कंपनियों की विदेशी ऋण-सेवा पर जोखिम बढ़ता है।
भाग 3 – केवल विनियामक उपाय अपर्याप्त क्यों: दीर्घकालिक उपाय हैं निर्यात विविधीकरण, ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाना (नवीकरणीय ऊर्जा, इथेनॉल मिश्रण), FDI और स्थिर पूँजी प्रवाह आकर्षित करना, राजकोषीय अनुशासन, रुपये में व्यापार निपटान, REER पर निगरानी, मौद्रिक और राजकोषीय नीति का समन्वय। वित्त मंत्री के अनुसार अस्थिरता मुख्यतः बाह्य कारणों से है, परंतु घरेलू बुनियादी तत्त्वों की मज़बूती ही दीर्घकालिक स्थिरता देती है।
निष्कर्ष: ‘अस्थिरता पर नियंत्रण, स्तर पर नहीं’ के सिद्धांत के साथ अल्पकालिक विनियामक उपायों और संरचनात्मक सुधारों का संयोजन आवश्यक है।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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