सुप्रीम कोर्ट ने जंतर मंतर हिंसा पर शिकायतों के लिए पोर्टल लॉन्च किया: जानें पूरी प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने जंतर मंतर हिंसा पर शिकायतों के लिए पोर्टल लॉन्च किया: जानें पूरी प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने जंतर मंतर हिंसा पर शिकायतों के लिए पोर्टल लॉन्च किया: जानें पूरी प्रक्रिया

जुलाई हिंसा जांच प्रक्रियाआंदोलन शुरूजून 2026झड़पें हुईं20 जुलाई 2026आंदोलन बंद25 जुलाई 2026जांच समिति गठितसर्वोच्च न्यायालयशिकायत पोर्टल शुरूHPEC
जुलाई हिंसा जांच प्रक्रिया

✎ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित जाँच समिति न्यायिक आदेश से बनती है (अनुच्छेद 32 और 142), जबकि जाँच आयोग अधिनियम, 1952 के आयोग सरकारी अधिसूचना से गठित होते हैं; दोनों का उद्देश्य तथ्यों की स्वतंत्र जाँच और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राज्यव्यवस्था एवं शासन (न्यायपालिका की भूमिका, अनुच्छेद 32 और 142, जाँच आयोग, पुलिस सुधार)  |  GS Paper II — मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19 और 21, शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और उसकी युक्तियुक्त सीमाएँ)  |  GS Paper II — संघ और दिल्ली (NCT दिल्ली का विशेष संवैधानिक प्रावधान, दिल्ली पुलिस का प्रशासनिक नियंत्रण)
  • Prelims: अनुच्छेद 32 (मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट क्षेत्राधिकार), अनुच्छेद 142 (सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण न्याय करने की शक्ति), जाँच आयोग अधिनियम, 1952 (Commissions of Inquiry Act, 1952), अनुच्छेद 239AA (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली), राज्य सूची की प्रविष्टि 1 (पुलिस और लोक व्यवस्था), अनुच्छेद 19(1)(ख) और 19(3) (शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और युक्तियुक्त निर्बंधन), गवाह संरक्षण योजना, 2018 (सर्वोच्च न्यायालय के महेंदर चावला मामले पर आधारित), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) में गवाह संरक्षण से संबंधित प्रावधान
  • Essay: लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन, न्यायिक जाँच तंत्र: जवाबदेही, पारदर्शिता और पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा

त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित जाँच समिति न्यायिक आदेश से बनती है (अनुच्छेद 32 और 142), जबकि जाँच आयोग अधिनियम, 1952 के आयोग सरकारी अधिसूचना से गठित होते हैं; दोनों का उद्देश्य तथ्यों की स्वतंत्र जाँच और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

यह खबर चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित पाँच-सदस्यीय उच्चाधिकार जाँच समिति (High Powered Enquiry Committee – HPEC) ने जुलाई 2026 में जंतर-मंतर तथा दिल्ली के बाहर हुई हिंसा से प्रभावित लोगों, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल हैं, की शिकायतों और अभ्यावेदनों के लिए एक पोर्टल (hpec.nic.in) शुरू किया है। गृह मंत्रालय के अनुसार इस पोर्टल में पहचान गोपनीय रखने की सुविधा है, ताकि असुरक्षित गवाह सुरक्षित रूप से सहयोग कर सकें। समिति पेलेट गन के प्रयोग, लक्षित हिंसा, महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न तथा दोनों पक्षों द्वारा अत्यधिक हिंसा और संपत्ति की क्षति से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देगी। शिकायतें पोर्टल, व्यक्तिगत रूप से शिक्षा सदन (17 रूज़ एवेन्यू) स्थित कार्यालय में, डाक द्वारा या ईमेल ([email protected]) के माध्यम से भी भेजी जा सकती हैं। यह कदम सर्वोच्च न्यायालय में पुलिस अतिरेक के आरोपों और प्रदर्शनकारियों पर हिंसा के आरोपों से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के बाद उठाया गया है।

पृष्ठभूमि

  • जून 2026 में जंतर-मंतर से छात्र-नेतृत्व वाला आंदोलन आरंभ हुआ, जो कई शहरों तक फैला। आंदोलन के केंद्र में एक केंद्रीय मंत्री के त्यागपत्र की मांग थी।
  • 20 जुलाई 2026 को CJP के नेतृत्व में संसद की ओर किए गए मार्च में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पें हुईं। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले का प्रयोग किया गया।
  • 25 जुलाई 2026 को आंदोलन स्थगित हुआ, जब संबंधित मंत्री ने त्यागपत्र दिया और सरकार ने आंदोलनकारी संगठन की कुछ अन्य मांगें स्वीकार कीं।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदर्शनकारी छात्रों के विरुद्ध पुलिस अतिरेक तथा पुलिसकर्मियों पर हिंसा, दोनों के आरोपों वाली याचिकाओं की सुनवाई करते हुए जाँच समिति के गठन का आदेश दिया।
  • समिति का मूल्यांकन उसके विशेषाधिकार क्षेत्र तक सीमित है, जो सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में निर्दिष्ट विषयों तक ही है।

उच्चाधिकार जाँच समिति (HPEC) क्या है?

  • यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 32 के अंतर्गत दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान गठित एक विशेष जाँच निकाय है। इसका उद्देश्य तथ्यों की स्वतंत्र जाँच और न्यायिक निगरानी में निष्कर्ष प्रस्तुत करना है।
  • जाँच आयोग अधिनियम, 1952 के अंतर्गत आयोग आमतौर पर केंद्र या राज्य सरकार की अधिसूचना से गठित होते हैं। इसके विपरीत, यह समिति न्यायालय के आदेश से बनी है, इसलिए इसकी वैधता न्यायिक आदेश पर आधारित है।
  • पूर्ण न्याय करने की शक्ति (अनुच्छेद 142) न्यायालय को ऐसे विशेष निर्देश देने की क्षमता देती है, जो मौजूदा विधिक ढाँचे में पूरी तरह उपलब्ध न हों।
  • दिल्ली में पुलिस का नियंत्रण केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास है, क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली को अनुच्छेद 239AA के अंतर्गत विशेष दर्जा प्राप्त है। सामान्यतः लोक व्यवस्था राज्य सूची का विषय है।
  • पेलेट गन और आंसू गैस जैसे उपकरणों के प्रयोग से जुड़े मामले बल-प्रयोग के सिद्धांतों, अर्थात आनुपातिकता और न्यूनतम बल, की कसौटी पर परखे जाते हैं।
  • गवाह संरक्षण का उद्देश्य भय या दबाव के बिना सत्य सामने लाना है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के महेंदर चावला मामले में गवाह संरक्षण योजना को मान्यता दी थी, और पहचान गोपनीय रखने का प्रावधान इसी सिद्धांत से जुड़ा है।
  • शांतिपूर्ण सभा का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(ख) में है, जिस पर अनुच्छेद 19(3) के अंतर्गत सार्वजनिक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं। जाँच ऐसे अधिकार और व्यवस्था बनाए रखने के दायित्व के संतुलन से जुड़ी है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
उच्च अधिकार प्राप्त जांच समिति (High Powered Enquiry Committee – HPEC) सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) द्वारा गठित पांच सदस्यीय समिति, जिसे जुलाई 2026 में जंतर मंतर और दिल्ली के बाहर हुई हिंसा के सभी पहलुओं की जांच सौंपी गई है
ऑनलाइन पोर्टल (Portal) hpec.nic.in पीड़ितों, पुलिसकर्मियों और अन्य हितधारकों से शिकायतें व अभ्यावेदन निर्धारित प्रपत्रों के माध्यम से लेने की व्यवस्था
पहचान की गोपनीयता संवेदनशील गवाहों की सुरक्षा के लिए पहचान गुप्त रखने का विकल्प, ताकि भय के बिना साक्ष्य दिए जा सकें
प्राथमिकता वाले विषय छर्रा बंदूक (Pellet Gun) का प्रयोग, लक्षित हिंसा, महिला प्रदर्शनकारियों का उत्पीड़न, तथा दोनों पक्षों द्वारा अत्यधिक हिंसा और संपत्ति की तोड़फोड़
बहुमाध्यम प्रस्तुति व्यवस्था ऑनलाइन, व्यक्तिगत रूप से शिक्षा सदन, 17 रूज़ एवेन्यू (नई दिल्ली) में कार्यदिवसों पर दोपहर 2 से 4 बजे के बीच, डाक द्वारा, तथा ईमेल [email protected] द्वारा

महत्व

संस्थागत एवं प्रशासनिक

  • न्यायिक निगरानी में स्वतंत्र जांच से किसी एक एजेंसी के आंतरिक मूल्यांकन पर निर्भरता घटती है और जांच की विश्वसनीयता बढ़ती है।
  • समिति में पूर्व उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश, पूर्व सीबीआई निदेशक और पूर्व पुलिस महानिदेशक जैसे अनुभवी सदस्य शामिल हैं, जिससे विधिक और पुलिस दोनों दृष्टिकोण उपलब्ध होते हैं।
  • जांच के दायरे में केवल दिल्ली की घटनाएं नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी के बाहर की घटनाएं भी हैं, जिससे राज्यों के साथ समन्वय की आवश्यकता बनती है।

संवैधानिक एवं विधिक

  • नागरिक अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत के लिए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष याचिका का मार्ग अनुच्छेद 32 से जुड़ा है, और इसी के अंतर्गत जांच समिति के गठन का आदेश आया।
  • शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति के अधिकार तथा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के राज्य के दायित्व के बीच संतुलन की परीक्षा इस मामले में होती है।

मानवाधिकार एवं सामाजिक

  • महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न को प्राथमिकता देना लैंगिक गरिमा और सुरक्षा के प्रश्न को केंद्र में लाता है।
  • गोपनीयता की व्यवस्था यह संकेत देती है कि भय के कारण पीड़ित और गवाह सामने न आएं, तो न्याय अधूरा रहता है।

पुलिस सुधार एवं जवाबदेही

  • बल प्रयोग के उपकरणों, विशेषकर छर्रा बंदूक के प्रयोग की जांच, पुलिस के आचरण-मानकों और जवाबदेही तंत्र की समीक्षा का अवसर देती है।
  • प्रकाश सिंह मामले (2006) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए पुलिस सुधार निर्देशों की प्रासंगिकता इस संदर्भ में फिर से उभरती है।

चुनौतियाँ

1. बल प्रयोग की वैधता और अनुपात

  • लाठी और आंसू गैस (Tear Gas) के प्रयोग को भीड़ नियंत्रण के वैध उपाय माना जाता है, परंतु यह देखना आवश्यक है कि प्रयोग आवश्यकता के अनुपात में था या नहीं।
  • छर्रा बंदूक जैसे उपकरणों के प्रयोग के लिए स्पष्ट परिचालन-नियम और उनकी सीमाएं तय होनी चाहिए, ताकि अनावश्यक क्षति से बचा जा सके।

2. गवाहों की सुरक्षा और गोपनीयता

  • प्रदर्शनकारी छात्र और पुलिसकर्मी दोनों ही प्रतिशोध के भय से शिकायत करने से हिचक सकते हैं।
  • पहचान गुप्त रखने की व्यवस्था तभी प्रभावी होगी जब डिजिटल डेटा की सुरक्षा और सूचना की गोपनीयता सुनिश्चित हो।

3. साक्ष्य संग्रह और दावों का सत्यापन

  • आरोप और प्रति-आरोप दोनों पक्षों की ओर से किए गए हैं, इसलिए तथ्यों की पुष्टि के लिए वीडियो, चिकित्सा रिपोर्ट और पुलिस अभिलेखों का मिलान आवश्यक है।
  • ऑनलाइन प्राप्त शिकायतों की प्रामाणिकता जांचना और झूठे या दोहराए गए दावों को छांटना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है।

4. पुलिस और प्रदर्शनकारी दोनों पक्षों की जवाबदेही

  • जांच का आदेश पुलिस बल की ज्यादतियों के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों द्वारा हिंसा और संपत्ति की तोड़फोड़ को भी देखता है।
  • दोनों पक्षों के प्रति निष्पक्षता बनाए रखना जांच की साख के लिए अनिवार्य है।

5. समिति की वैधानिक स्थिति और समयबद्धता

  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित यह समिति वैधानिक आयोग अधिनियम, 1952 (Commissions of Inquiry Act, 1952) के अंतर्गत गठित आयोग से भिन्न है, इसलिए उसकी शक्तियां और प्रतिवेदन की बाध्यता न्यायालय के आदेश की शर्तों पर निर्भर करती हैं।
  • जांच की व्यापकता और समयसीमा के बीच संतुलन न हो तो न्याय में देरी और जनविश्वास में कमी की स्थिति बन सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
बल प्रयोग छर्रा बंदूक और आंसू गैस के प्रयोग की आनुपातिकता व अनुपालित परिचालन-नियमों की अनुपस्थिति
गवाह सुरक्षा भय और प्रतिशोध के कारण शिकायतकर्ताओं की संख्या कम रहने की आशंका
महिला प्रदर्शनकारी उत्पीड़न के मामलों में शिकायत दर्ज करने और साक्ष्य जुटाने की कठिनाई
डिजिटल गोपनीयता पोर्टल और ईमेल पर प्राप्त व्यक्तिगत विवरणों की सुरक्षा और डेटा प्रबंधन
समयबद्धता व्यापक दायरे वाली जांच में विलंब से न्याय और जनविश्वास दोनों प्रभावित होने का खतरा

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • गवाह संरक्षण योजना, 2018 (Witness Protection Scheme, 2018)

आगे की राह

  • पोर्टल पर प्राप्त शिकायतों के लिए स्पष्ट समय-सीमा, पावती-प्रणाली और स्थिति-ट्रैकिंग की व्यवस्था की जाए, ताकि शिकायतकर्ता को प्रक्रिया की जानकारी मिलती रहे।
  • छर्रा बंदूक, आंसू गैस और लाठी के प्रयोग के लिए मानक परिचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure) स्पष्ट रूप से निर्धारित और सार्वजनिक की जाए।
  • गवाह संरक्षण योजना, 2018 के प्रावधानों को पोर्टल की गोपनीयता व्यवस्था से जोड़ा जाए, ताकि संवेदनशील गवाहों की पहचान सुरक्षित रहे।
  • महिला प्रदर्शनकारियों से जुड़ी शिकायतों के लिए महिला अधिकारियों की उपस्थिति में बयान दर्ज करने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
  • वीडियो, चिकित्सा रिपोर्ट और पुलिस अभिलेखों के डिजिटल संरक्षण और मिलान की प्रक्रिया अपनाई जाए, ताकि साक्ष्य की प्रामाणिकता बनी रहे।
  • प्रकाश सिंह मामले (2006) के निर्देशों के आलोक में पुलिस शिकायत प्राधिकरण जैसे स्वतंत्र तंत्र की भूमिका पर विचार हो।
  • जांच के निष्कर्षों को सार्वजनिक करने और कार्रवाई की समीक्षा की प्रक्रिया स्पष्ट की जाए, ताकि आंदोलनकारियों और पुलिस दोनों के प्रति विश्वास बने।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

सर्वोच्च न्यायालय · उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति · जनता के अधिकार · न्यायिक सक्रियता · शिकायत निवारण तंत्र · कानून और व्यवस्था · मौलिक अधिकार · विरोध प्रदर्शन का अधिकार · पुलिस जवाबदेही · न्याय तक पहुंच

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 32: सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाओं का मार्ग
  • अनुच्छेद 19(1)(a) और (b): शांतिपूर्ण सभा व अभिव्यक्ति का अधिकार
  • अनुच्छेद 19(3): सार्वजनिक व्यवस्था पर युक्तियुक्त प्रतिबंध
  • अनुच्छेद 21: जीवन, गरिमा और सुरक्षा का अधिकार
  • अनुच्छेद 239AA: दिल्ली की विशेष स्थिति; पुलिस केंद्र के अधीन
  • सातवीं अनुसूची, सूची II: सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस (राज्य सूची)

अवधारणा प्रवाह

जून 2026 में जंतर मंतर पर छात्र-नेतृत्व वाला आंदोलन शुरू हुआ, जिसकी मांगों में शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग केंद्र में थी।  →  20 जुलाई 2026 को CJP के नेतृत्व में संसद की ओर मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच झड़पें हुईं, जिनमें लाठी और आंसू गैस का प्रयोग हुआ।  →  हिंसा और पुलिस ज्यादतियों के आरोपों पर सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर हुईं और अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सुनवाई हुई।  →  सर्वोच्च न्यायालय ने पांच सदस्यीय उच्च अधिकार प्राप्त जांच समिति (HPEC) गठित की, जिसे जुलाई 2026 की घटनाओं के सभी पहलुओं की जांच सौंपी गई।  →  समिति ने ऑनलाइन पोर्टल hpec.nic.in शुरू किया, जिसमें गोपनीयता की व्यवस्था और प्राथमिकता वाले विषय (छर्रा बंदूक, लक्षित हिंसा, महिलाओं का उत्पीड़न, संपत्ति की तोड़फोड़) तय किए गए।  →  पीड़ित, पुलिसकर्मी और अन्य हितधारक शिकायतें व अभ्यावेदन प्रस्तुत करेंगे, जिनके आधार पर समिति साक्ष्यों का परीक्षण कर सर्वोच्च न्यायालय को अपना निष्कर्ष सौंपेगी।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने का अधिकार है।
2. सर्वोच्च न्यायालय किसी विशेष मामले की जांच के लिए समिति का गठन नहीं कर सकता, यह केवल सरकार का कार्य है।
3. जनहित याचिका (PIL) न्यायिक सक्रियता का एक उपकरण है जिसने न्यायपालिका को सामाजिक न्याय के मामलों में हस्तक्षेप करने में सक्षम बनाया है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने का अधिकार देता है। कथन 2 गलत है। सर्वोच्च न्यायालय के पास अपनी अंतर्निहित शक्तियों और न्यायिक सक्रियता के माध्यम से ऐसी समितियों का गठन करने का अधिकार है, खासकर जब कानून और व्यवस्था या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है। कथन 3 सही है। जनहित याचिका (PIL) न्यायिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो न्यायपालिका को सार्वजनिक हित के मामलों में हस्तक्षेप करने की अनुमति देती है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति के संदर्भ में सही नहीं है?

  1. यह समिति केवल दिल्ली में हुई हिंसा की जांच करेगी।
  2. यह समिति प्रभावित व्यक्तियों से शिकायतें और अभ्यावेदन प्राप्त करने के लिए एक पोर्टल का उपयोग कर रही है।
  3. समिति का गठन सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर किया गया है।
  4. यह समिति संवेदनशील गवाहों की पहचान गोपनीय रखने की अनुमति देती है।

उत्तर: यह समिति केवल दिल्ली में हुई हिंसा की जांच करेगी। — समिति का गठन दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी के बाहर जुलाई 2026 में हुई हिंसा की जांच के लिए किया गया है, जैसा कि समाचार में बताया गया है। अतः विकल्प A गलत है। अन्य सभी विकल्प सही हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) ने न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने और शासन में जवाबदेही बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हाल ही में जंतर-मंतर हिंसा की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति के गठन के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर की रूपरेखा:
1. **परिचय:** न्यायिक सक्रियता को परिभाषित करें और बताएं कि यह कैसे न्यायपालिका को सामाजिक न्याय और मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए हस्तक्षेप करने में सक्षम बनाती है।
2. **न्यायिक सक्रियता के सकारात्मक पहलू:**
* मौलिक अधिकारों का संरक्षण (अनुच्छेद 32, 226)।
* कार्यपालिका और विधायिका की निष्क्रियता के मामलों में हस्तक्षेप।
* जनहित याचिका (PIL) का महत्व और इसके माध्यम से सामाजिक न्याय की स्थापना।
* शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना।
* पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकारों और कमजोर वर्गों के अधिकारों जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण निर्णय।
3. **जंतर-मंतर मामले का संदर्भ:**
* सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति का गठन।
* यह समिति न्यायिक सक्रियता का एक उदाहरण कैसे है (न्यायपालिका द्वारा सीधे जांच तंत्र स्थापित करना)।
* शिकायत निवारण पोर्टल का महत्व और न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने में इसकी भूमिका।
* संवेदनशील गवाहों की सुरक्षा और पहचान की गोपनीयता का प्रावधान।
4. **न्यायिक सक्रियता की आलोचनाएँ/सीमाएँ:**
* शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन।
* न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्र में अतिक्रमण।
* न्यायिक ओवररीच (Judicial Overreach) की संभावना।
* न्यायिक जवाबदेही की कमी।
* अदालतों पर बढ़ते कार्यभार का प्रभाव।
5. **निष्कर्ष:** न्यायिक सक्रियता के महत्व को स्वीकार करते हुए, शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सम्मान करते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें। बताएं कि जंतर-मंतर जैसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो सकता है।

स्रोत: orissapost.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


Related guides on our sites

No Comments

Post A Comment