राज्यों ने महिला आजीविका मिशन के लिए तुरंत फंड की मांग की, अभी तक NULM 2.0 पर कोई निर्णय नहीं

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राज्यों ने महिला आजीविका मिशन के लिए तुरंत फंड की मांग की, अभी तक NULM 2.0 पर कोई निर्णय नहीं

DAY-NULM से DJAY-S तकDAY-NULMअक्टूबर 2024 तकपायलट DJAY-Sदिसंबर 2025 तकनई योजना विचाराधीनस्थिति अनिश्चितराज्यों ने मांगा फंडनिधि रुकने का खतरामंत्रालय ने सुझाया ढांकार्यबल बनाए रखने हेतु
DAY-NULM से DJAY-S तक

✎ DAY-NULM (2013/2014 से अक्टूबर 2024 तक; केंद्र प्रायोजित; MoHUA) ने 10 लाख से अधिक महिला SHG बनाए; DJAY-S पायलट दिसंबर 2025 तक चला, पर नई योजना अधर में है, इसलिए राज्य निधि और मिशन-ढाँचे की निरंतरता मांग रहे हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन: सरकारी नीतियाँ व हस्तक्षेप, केंद्र प्रायोजित योजनाएँ, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध  |  GS Paper II — गरीबी और भूख से संबंधित मुद्दे; शहरी स्थानीय निकाय  |  GS Paper III — समावेशी संवृद्धि, वित्तीय समावेशन, महिला स्वयं सहायता समूह और सूक्ष्म उद्यम
  • Prelims: DAY-NULM (दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन), DJAY-S (दीनदयाल जन आजीविका योजना – शहरी) पायलट परियोजना, स्वयं सहायता समूह (SHG) और क्षेत्र स्तरीय संघ (ALF), केंद्र प्रायोजित योजना और निधि-साझाकरण अनुपात, ब्याज अनुदान (Interest Subvention) और बैंक-संपर्क, बैंक सखी और सामुदायिक संसाधन व्यक्ति, आवास और शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA), 74वाँ संविधान संशोधन और बारहवीं अनुसूची, DAY-NRLM (ग्रामीण आजीविका मिशन)
  • Essay: महिला स्वयं सहायता समूह: सामाजिक संरक्षण से आर्थिक सशक्तीकरण तक, सहकारी संघवाद की कसौटी: केंद्र प्रायोजित योजनाओं में निरंतरता बनाम नीतिगत बदलाव

त्वरित पुनरावृत्ति: DAY-NULM (2013/2014 से अक्टूबर 2024 तक; केंद्र प्रायोजित; MoHUA) ने 10 लाख से अधिक महिला SHG बनाए; DJAY-S पायलट दिसंबर 2025 तक चला, पर नई योजना अधर में है, इसलिए राज्य निधि और मिशन-ढाँचे की निरंतरता मांग रहे हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM) अक्टूबर 2024 में समाप्त हो गया। इसके बाद आवास और शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) ने दीनदयाल जन आजीविका योजना–शहरी (DJAY-S) नाम से एक पायलट परियोजना दिसंबर 2025 तक चलाई। इसका उद्देश्य नई योजना का मार्ग प्रशस्त करना था, पर सूत्रों के अनुसार अब वह विचाराधीन नहीं है। नई योजना पर स्पष्टता न होने से तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और त्रिपुरा सहित कम से कम पाँच राज्यों ने प्रधानमंत्री और MoHUA को अलग-अलग पत्र लिखे हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि निधि रुकने से बैंक-संपर्क और संस्थागत ऋण तक पहुँच बाधित होगी तथा शहरी निर्धनों का सामाजिक संरक्षण कमज़ोर पड़ेगा। राज्यों की मांग इस प्रकार है: तमिलनाडु 350 करोड़ रुपये (2026-27 के लिए), मध्य प्रदेश 101 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र 81 करोड़ रुपये और त्रिपुरा 6.5 करोड़ रुपये। तमिलनाडु के अनुसार वहाँ NULM की निधि अप्रैल 2025 तक पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी। मंत्रालय ने राज्यों को मिशन का मौजूदा ढाँचा और कार्यबल बनाए रखने की सलाह दी है।

पृष्ठभूमि

  • शहरी निर्धनों की आजीविका के लिए स्वर्ण जयंती शहरी रोज़गार योजना (SJSRY) चल रही थी। उसे पुनर्गठित कर सितंबर 2013 में राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NULM) शुरू किया गया। 2014 में इसका नाम दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM) हुआ।
  • यह मिशन केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) के रूप में चला। इसमें केंद्र और राज्य निधि साझा करते हैं। सामान्यतः यह अनुपात 75:25 और पूर्वोत्तर तथा विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए 90:10 था। इसलिए केंद्र की किस्त रुकने पर राज्यों का कार्यक्रम सीधे प्रभावित होता है।
  • समाचार के अनुसार मिशन ने लगभग एक दशक में 1 करोड़ से अधिक महिलाओं को लाभ पहुँचाया और 10 लाख से अधिक महिला स्वयं सहायता समूह (SHG) बनाए। तमिलनाडु में ही 1.72 लाख SHG हैं, जिनके 18.70 लाख सदस्य हैं।
  • ग्रामीण क्षेत्रों के लिए इसी तरह का कार्यक्रम DAY-NRLM है, जो 2011 में आजीविका के नाम से शुरू हुआ। शहरी क्षेत्र में NULM इसका समकक्ष माना जाता है। नई शहरी योजना के बिना ग्रामीण और शहरी आजीविका ढाँचों में असमानता का जोखिम रहता है।
  • DJAY-S पायलट में तमिलनाडु के चेन्नई और तिरुप्पुर चुने गए। वहाँ लगभग 1.26 लाख असुरक्षित व्यावसायिक परिवारों की पहचान और प्रोफ़ाइलिंग हुई तथा लगभग 2,500 SHG बने। फिर भी योजना को स्थायी रूप देने पर निर्णय लंबित है।
  • शहरी स्थानीय निकाय संविधान की बारहवीं अनुसूची (अनुच्छेद 243W) के अंतर्गत आते हैं। उसमें ‘शहरी निर्धनता उन्मूलन’ और ‘समाज के कमज़ोर वर्गों के हितों की रक्षा’ जैसे विषय शामिल हैं। फिर भी निकायों की सीमित वित्तीय क्षमता के कारण उन्हें केंद्रीय और राज्य अनुदानों पर निर्भर रहना पड़ता है।

DAY-NULM क्या है?

  • DAY-NULM आवास और शहरी कार्य मंत्रालय की केंद्र प्रायोजित योजना थी। इसका उद्देश्य शहरी निर्धनों को स्वरोज़गार तथा कौशल-आधारित मज़दूरी रोज़गार के अवसर देकर आजीविका सुदृढ़ करना था। इसका लक्ष्य था कि शहरी निर्धन परिवार संगठित हों और स्थायी आजीविका पा सकें।
  • इसका मुख्य घटक सामाजिक संगठन और संस्था विकास है। इसमें निर्धन महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों में संगठित किया जाता है और समूहों को क्षेत्र स्तरीय संघों (ALF) से जोड़ा जाता है। समूहों को चक्रीय निधि (Revolving Fund) जैसी आरंभिक सहायता भी दी जाती है।
  • कौशल प्रशिक्षण और नियुक्ति (EST&P) घटक के अंतर्गत शहरी निर्धन युवाओं को बाज़ार-उन्मुख कौशल प्रशिक्षण और नौकरी दिलाने में सहायता दी जाती है।
  • स्वरोज़गार कार्यक्रम (SEP) के अंतर्गत व्यक्तियों और समूहों के सूक्ष्म उद्यमों के लिए बैंक ऋण पर ब्याज अनुदान की व्यवस्था थी। इससे संस्थागत ऋण सस्ता होता है और साहूकारों पर निर्भरता घटती है। यही ‘बैंक-संपर्क’ का मुद्दा राज्यों ने उठाया है।
  • शहरी बेघरों के लिए आश्रय (SUH) और शहरी फेरीवालों को सहायता (SUSV) भी मिशन के घटक थे। साथ ही क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण तथा नवाचारी एवं विशेष परियोजनाओं का प्रावधान था।
  • मिशन की संस्थागत मशीनरी में राज्य और शहर स्तर की मिशन इकाइयाँ, सामुदायिक संसाधन व्यक्ति और बैंक सखी शामिल हैं। राज्यों का कहना है कि निधि रुकने पर इस कार्यबल और सामुदायिक संस्थाओं का ढाँचा टूट सकता है।
  • राजकोषीय संघवाद की दृष्टि से मुद्दा यह है कि केंद्र प्रायोजित योजना बंद या अनिश्चित होने पर संक्रमण-काल की व्यवस्था क्या हो। राज्यों के पास सीमित राजकोषीय गुंजाइश होती है, इसलिए वे केंद्रीय सहायता चाहते हैं। इस प्रकरण में नीतिगत पुनर्गठन और कार्यक्रम-निरंतरता के बीच संतुलन की आवश्यकता दिखती है।
  • संवैधानिक संदर्भ: नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 41, काम का अधिकार; अनुच्छेद 39(क), आजीविका के पर्याप्त साधन), महिला सशक्तीकरण और वित्तीय समावेशन की नीति। इस योजना के उद्देश्य इन्हीं से जुड़ते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM): 2014 से अक्टूबर 2024 तक संचालित, केंद्र प्रायोजित योजना शहरी निर्धनों के लिए आजीविका का एक राष्ट्रव्यापी संस्थागत ढाँचा बना। इसके अंतर्गत 10 लाख से अधिक महिला स्वयं सहायता समूह (SHG) गठित हुए और एक करोड़ से अधिक महिलाओं को लाभ पहुँचा।
सामाजिक संगठन एवं संस्थागत विकास SHG, क्षेत्र स्तरीय महासंघ, सामुदायिक संसाधन व्यक्ति और बैंक सखी जैसी सामुदायिक संस्थाएँ बनीं। इनसे गरीबों की सामूहिक सौदेबाज़ी क्षमता बढ़ती है और योजनाओं की पहुँच सुधरती है।
बैंक सहबद्धता और संस्थागत ऋण SHG को बैंक ऋण और ब्याज अनुदान (Interest Subvention) के माध्यम से सूदखोरों पर निर्भरता घटती है और वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बल मिलता है।
कौशल प्रशिक्षण, स्वरोज़गार और अन्य घटक कौशल प्रशिक्षण एवं रोज़गार, स्वरोज़गार कार्यक्रम, शहरी बेघरों के लिए आश्रय और street vendors को सहायता जैसे घटक एक साथ आजीविका के कई पक्षों को संबोधित करते हैं।
पायलट परियोजना: दीनदयाल जन आजीविका योजना–शहरी (DJAY-S), दिसंबर 2025 तक नई योजना की पूर्व-परीक्षा के रूप में शुरू हुई। समाचार के अनुसार अब इसे नई योजना का आधार बनाने पर विचार नहीं हो रहा, इसलिए आगे की दिशा अनिश्चित है।
वित्त-पोषण की साझेदारी केंद्र और राज्य के बीच लागत-साझेदारी वाली योजना में केंद्रीय अंश रुकने पर राज्य को अपने संसाधनों से मिशन-कर्मियों का वेतन और अन्य व्यय उठाना पड़ता है। इससे राज्यों की राजकोषीय क्षमता पर दबाव पड़ता है।

महत्व

आर्थिक और वित्तीय समावेशन

  • SHG के माध्यम से अनौपचारिक क्षेत्र की महिलाएँ बैंकिंग और संस्थागत ऋण तंत्र से जुड़ती हैं, जिससे सूक्ष्म उद्यमिता को आधार मिलता है।
  • शहरी निर्धनों की आय में स्थिरता आती है और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में उत्पादकता बढ़ती है।
  • बैंक सखी जैसी व्यवस्था अंतिम छोर तक बैंकिंग सेवाएँ पहुँचाने में सहायक है।

सामाजिक और लैंगिक सशक्तीकरण

  • महिलाओं की आय और निर्णय-क्षमता बढ़ने से परिवार तथा समुदाय में उनकी स्थिति मज़बूत होती है।
  • सामूहिक संस्थाएँ सामाजिक पूँजी (Social Capital) का निर्माण करती हैं और गरीबों को सुरक्षा-तंत्र से जोड़ती हैं।
  • महिला नेतृत्व वाले समूह स्वास्थ्य, स्वच्छता और बच्चों की शिक्षा जैसे विषयों पर भी सामुदायिक पहल का मंच बनते हैं।

शासन और संघीय पक्ष

  • विभिन्न राज्यों द्वारा एक ही माँग उठाना केंद्र-राज्य राजकोषीय संबंधों में केंद्र प्रायोजित योजनाओं की निर्भरता को दर्शाता है।
  • योजना की निरंतरता नीतिगत विश्वसनीयता का प्रश्न है, क्योंकि केंद्र ने राज्यों को मिशन का ढाँचा और कर्मी बनाए रखने की सलाह दी थी।
  • शहरी स्थानीय निकायों के माध्यम से गरीबी उन्मूलन के संवैधानिक दायित्व की पूर्ति में यह मिशन सहायक रहा है।

सामाजिक संरक्षण

  • शहरी निर्धन प्रायः किसी औपचारिक सामाजिक सुरक्षा से बाहर रहते हैं, इसलिए समुदाय आधारित संस्थाएँ उनके लिए संकट-काल में सहारा बनती हैं।
  • आश्रय, कौशल और ऋण को एक साथ जोड़ने वाला ढाँचा आजीविका जोखिम को कम करता है।

चुनौतियाँ

1. वित्त-पोषण में अनिश्चितता और निधि का समाप्त होना

  • तमिलनाडु के अनुसार राज्य में NULM की निधि अप्रैल 2025 तक पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी।
  • तमिलनाडु (₹350 करोड़), मध्य प्रदेश (₹101 करोड़), महाराष्ट्र (₹81 करोड़) और त्रिपुरा (₹6.5 करोड़) ने निधि जारी करने की माँग की है।
  • निधि रुकने से बैंक सहबद्धता और ब्याज अनुदान जैसी सेवाएँ बाधित होने का जोखिम है।

2. उत्तराधिकारी योजना पर अस्पष्टता

  • DJAY-S पायलट दिसंबर 2025 में समाप्त हुआ, पर समाचार के अनुसार उसे आगे बढ़ाने पर अब विचार नहीं हो रहा।
  • पायलट में चेन्नई और तिरुप्पुर में लगभग 1.26 लाख परिवारों की पहचान और लगभग 2,500 SHG का गठन हुआ, पर उसके विस्तार का मार्ग स्पष्ट नहीं है।
  • नीति-निर्माण में पायलट से राष्ट्रीय योजना तक संक्रमण की कोई समयबद्ध व्यवस्था न होने से अंतराल उत्पन्न होता है।

3. मिशन-कर्मियों और सामुदायिक संस्थाओं की निरंतरता

  • केंद्र ने राज्यों को मिशन का ढाँचा और कर्मी बनाए रखने की सलाह दी, पर इसके लिए वित्तीय सहायता स्पष्ट नहीं है।
  • निधि के अभाव में कर्मियों का पलायन होने पर बनी हुई सामुदायिक संस्थाएँ निष्क्रिय हो सकती हैं।
  • SHG, महासंघ और सामुदायिक संसाधन व्यक्ति की सहायक-व्यवस्था टूटने से दशकों में बनी संस्थागत पूँजी नष्ट होने का भय है।

4. ऋण की गुणवत्ता और निधियों का उपयोग

  • ग्रामीण आजीविका योजना की समीक्षा में यह संकेत मिला है कि महिला उद्यमों के लिए दी गई निधि का एक भाग घरेलू आवश्यकताओं पर खर्च हुआ।
  • यदि ऐसी प्रवृत्ति शहरी क्षेत्रों में भी हो तो उद्यम-निर्माण का उद्देश्य कमज़ोर पड़ता है और ऋण-चूक का जोखिम बढ़ता है।
  • ऋण के बाद विपणन, बाज़ार-संपर्क और उद्यम-परामर्श की सुविधा के बिना केवल वित्त पर्याप्त नहीं है।

5. राज्यों की असमान राजकोषीय क्षमता

  • सीमित संसाधनों वाले राज्य केंद्रीय अंश रुकने पर अपने बजट से लागत उठाने में कठिनाई महसूस करते हैं।
  • इससे योजना का कार्यान्वयन राज्यों के बीच असमान हो सकता है और क्षेत्रीय विषमता बढ़ सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
निधि जारी न होना राज्यों की निधि समाप्त होने से मिशन की दैनिक गतिविधियाँ और बैंक सहबद्धता प्रभावित हो रही हैं।
योजना की निरंतरता DJAY-S पायलट के बाद नई योजना की घोषणा न होने से कार्यक्रम-संचालन में रिक्तता बनी है।
कर्मी और संस्थाएँ मिशन-कर्मी और सामुदायिक संसाधन व्यक्ति के हटने से SHG का मार्गदर्शन और निगरानी कमज़ोर पड़ती है।
वित्तीय समावेशन ऋण और ब्याज अनुदान की सुविधा रुकने पर निर्धन महिलाएँ अनौपचारिक ऋण की ओर लौट सकती हैं।
निधि उपयोग ऋण का उत्पादक उपयोग सुनिश्चित न होने से उद्यम-निर्माण का लक्ष्य अधूरा रहता है।
केंद्र-राज्य संबंध केंद्र प्रायोजित योजनाओं में केंद्रीय अंश की अनिश्चितता राज्य बजट की योजना-क्षमता को सीमित करती है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM): शहरी निर्धनों के लिए केंद्र प्रायोजित आजीविका मिशन; समाचार का मूल विषय
  • दीनदयाल जन आजीविका योजना–शहरी (DJAY-S): MoHUA की पायलट परियोजना, दिसंबर 2025 तक संचालित
  • दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM): ग्रामीण क्षेत्र में SHG आधारित समकक्ष मिशन, जिसकी समीक्षा का उल्लेख समाचार में है
  • स्वर्ण जयंती शहरी रोज़गार योजना (SJSRY): NULM से पूर्व की शहरी गरीबी उन्मूलन योजना, जिसका स्थान NULM ने लिया

आगे की राह

  • केंद्र को DJAY-S के निष्कर्षों के आधार पर नई शहरी आजीविका योजना या NULM के विस्तार पर समयबद्ध निर्णय लेकर स्पष्ट घोषणा करनी चाहिए।
  • संक्रमण-काल के लिए अंतरिम निधि जारी की जाए ताकि मिशन-कर्मी, SHG की सहायक-व्यवस्था और बैंक सहबद्धता बनी रहे।
  • योजना के लिए बहु-वर्षीय वित्तीय प्रतिबद्धता तय की जाए, जिससे राज्य अपने बजट की योजना पहले से बना सकें।
  • राज्यों की राजकोषीय क्षमता के अनुसार केंद्र-राज्य लागत-साझेदारी के अनुपात की समीक्षा की जाए।
  • SHG ऋण के उत्पादक उपयोग के लिए उद्यम-परामर्श, विपणन-संपर्क और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म से जोड़ने की व्यवस्था मज़बूत की जाए।
  • शहरी स्थानीय निकायों को आजीविका कार्यक्रमों के संचालन में अधिक भूमिका और संसाधन दिए जाएँ।
  • ग्रामीण मिशन की समीक्षा से मिले सबक़ के आधार पर निधि-उपयोग की निगरानी और स्वतंत्र मूल्यांकन की व्यवस्था बने।
  • पायलट से राष्ट्रीय योजना तक संक्रमण के लिए नीति-स्तर पर स्पष्ट प्रक्रिया और समय-सीमा निर्धारित की जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM) · स्वयं सहायता समूह (Self-Help Group) एवं बैंक सहलग्नता · केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) · राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) · शहरी निर्धनता उन्मूलन – बारहवीं अनुसूची और अनुच्छेद 243W · वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) · सामुदायिक संसाधन व्यक्ति एवं बैंक सखी · अनौपचारिक क्षेत्र के कामगार एवं सामाजिक सुरक्षा · योजना की निरंतरता और संस्थागत स्मृति का ह्रास · पायलट परियोजना से राष्ट्रव्यापी योजना तक संक्रमण · महिला सशक्तीकरण और आजीविका संवर्धन · शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय क्षमता

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 243W और बारहवीं अनुसूची (प्रविष्टि 11): शहरी निकायों के लिए शहरी गरीबी उन्मूलन
  • अनुच्छेद 41: काम पाने के अधिकार का निदेशक तत्त्व
  • अनुच्छेद 38: सामाजिक व्यवस्था द्वारा जन-कल्याण संवर्धन
  • अनुच्छेद 282: केंद्र द्वारा राज्यों को योजनागत अनुदान

अवधारणा प्रवाह

शहरी निर्धनता और अनौपचारिक रोज़गार की समस्या से निपटने हेतु NULM का आरंभ  →  महिला SHG, सामुदायिक संस्थाओं और बैंक सहबद्धता का निर्माण  →  अक्टूबर 2024 में DAY-NULM की अवधि समाप्त; DJAY-S पायलट दिसंबर 2025 तक  →  नई योजना पर अस्पष्टता और नई निधि का अभाव; राज्यों की निधि समाप्त  →  राज्यों द्वारा कर्मियों और ढाँचे को बनाए रखने के लिए केंद्र से निधि की माँग  →  निधि न मिलने पर बैंक सहबद्धता और ऋण-पहुँच में बाधा का जोखिम  →  शहरी निर्धन महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा और संस्थागत पूँजी पर प्रतिकूल प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NULM) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसने स्वर्ण जयंती शहरी रोज़गार योजना (SJSRY) का स्थान लिया।
2. इसका क्रियान्वयन आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
3. शहरी निर्धनता उन्मूलन पूर्णतः संघ सूची का विषय है, इसलिए राज्यों की इसमें कोई भूमिका नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: NULM (2013) ने SJSRY का स्थान लिया। कथन 2 सही है: यह आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय की योजना है। कथन 3 गलत है: शहरी निर्धनता उन्मूलन बारहवीं अनुसूची की प्रविष्टि 11 में है और राज्य तथा शहरी स्थानीय निकाय इसके क्रियान्वयन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। यह संघ सूची का विशेष विषय नहीं है।

Q2. अभिकथन (A): किसी केंद्र प्रायोजित आजीविका योजना के लिए धन का रुकना स्वयं सहायता समूहों की बैंक सहलग्नता और संस्थागत ऋण तक पहुँच को प्रभावित कर सकता है।
कारण (R): समूहों के गठन, प्रशिक्षण और बैंक सहलग्नता में सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों, बैंक सखियों तथा मिशन कर्मियों की सतत सहायता की आवश्यकता होती है, जिसका वित्तपोषण योजनागत निधि से होता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किंतु R गलत है
  4. A गलत है, किंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — समूह-आधारित आजीविका मॉडल में मिशन कर्मी, सामुदायिक संसाधन व्यक्ति और बैंक सखी समूहों को बैंकों से जोड़ने तथा ऋण-अनुशासन बनाए रखने में सहायक होते हैं। इनका व्यय योजनागत निधि से चलता है। निधि रुकने पर यह सहायता कमज़ोर पड़ती है, इसलिए R, A की सही व्याख्या करता है।

Q3. भारत के संविधान में ‘शहरी निर्धनता उन्मूलन’ का उल्लेख किस अनुसूची में नगरपालिकाओं के कार्यों के रूप में किया गया है?

  1. ग्यारहवीं अनुसूची
  2. बारहवीं अनुसूची
  3. सातवीं अनुसूची की संघ सूची
  4. नौवीं अनुसूची

उत्तर: बारहवीं अनुसूची — 74वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ी गई बारहवीं अनुसूची (अनुच्छेद 243W) में 18 कार्य हैं। इनमें प्रविष्टि 11 शहरी निर्धनता उन्मूलन की है। ग्यारहवीं अनुसूची पंचायतों से संबंधित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM) ने शहरी निर्धन महिलाओं के सशक्तीकरण में किस सीमा तक योगदान दिया है? उत्तराधिकारी योजना के अभाव में राज्यों द्वारा निधि की माँग के संदर्भ में केंद्र प्रायोजित योजनाओं से जुड़े राजकोषीय संघवाद के प्रश्नों का परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: भूमिका (2-3 पंक्तियाँ): NULM 2013 में SJSRY के स्थान पर शुरू हुआ और बाद में DAY-NULM कहलाया। समाचार के अनुसार इसने 10 लाख से अधिक महिला स्वयं सहायता समूह बनाए और 1 करोड़ से अधिक महिलाओं को लाभ पहुँचाया। यह अक्टूबर 2024 तक चला। उसके बाद DJAY-S पायलट दिसंबर 2025 तक चला और अब स्थायी योजना अनिश्चित है।

भाग 1 – उपलब्धियाँ और सीमाएँ:
(क) उपलब्धियाँ: सामाजिक संगठन और संस्थागत विकास, बैंक सहलग्नता, कौशल प्रशिक्षण और नियुक्ति, स्वरोज़गार कार्यक्रम, शहरी बेघरों के लिए आश्रय, पथ-विक्रेताओं को सहायता। वित्तीय समावेशन, सामाजिक पूँजी और महिलाओं की आय पर प्रभाव। तमिलनाडु में 1.72 लाख समूह और 18.70 लाख सदस्य उदाहरण हैं।
(ख) सीमाएँ: अनौपचारिक कामगारों तक अपूर्ण पहुँच, समूहों की ऋण-योग्यता और बाज़ार संपर्क की कमी, स्थानीय निकायों की सीमित क्षमता, निधि वितरण में विलंब। संदर्भ के लिए हाशिम समिति (शहरी निर्धनता पर कार्यबल) का उल्लेख किया जा सकता है।

भाग 2 – राजकोषीय संघवाद:
(क) संवैधानिक आधार: बारहवीं अनुसूची की प्रविष्टि 11 और अनुच्छेद 243W। अनुच्छेद 282 के अंतर्गत विवेकाधीन अनुदान। स्थानीय शासन राज्य सूची का विषय है, फिर भी योजना का स्वरूप केंद्र तय करता है।
(ख) समाचार के तथ्य: तमिलनाडु 350 करोड़ रुपये, मध्य प्रदेश 101 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र 81 करोड़ रुपये और त्रिपुरा 6.5 करोड़ रुपये माँग रहे हैं। तमिलनाडु का NULM कोष अप्रैल 2025 तक समाप्त हो चुका है। मंत्रालय ने राज्यों को मिशन ढाँचा और कर्मियों को बनाए रखने की सलाह दी, परंतु वित्तीय स्पष्टता नहीं है। इससे राज्यों पर अनिर्धारित देयता आती है। मामला दलीय सीमाओं से परे है, इसलिए यह संस्थागत प्रश्न है।
(ग) मुद्दे: केंद्र-राज्य निधि साझेदारी (सामान्यतः 75:25, पूर्वोत्तर और विशेष श्रेणी राज्यों में 90:10), योजना के बीच में बंद होने से संक्रमण की रिक्ति, केंद्र प्रायोजित योजनाओं का युक्तिकरण, राज्यों की वित्तीय सीमाएँ और शहरी स्थानीय निकायों की कमज़ोर राजस्व क्षमता।

सुझाव / आगे की राह: समयबद्ध उत्तराधिकारी योजना या अंतरिम निधि, पायलट के निष्कर्षों का सार्वजनिक मूल्यांकन, योजना समाप्ति के लिए संक्रमण प्रोटोकॉल, निधि का समय पर अंतरण, वित्त आयोग की संस्तुतियों के माध्यम से शहरी निकायों को सुदृढ़ करना, पथ-विक्रेता अधिनियम 2014 और PM SVANidhi से अभिसरण, परिणाम-आधारित निगरानी।

निष्कर्ष: समूह-आधारित संस्थाएँ बनाने में वर्षों लगते हैं, पर धन के अभाव में वे जल्दी कमज़ोर पड़ जाती हैं। इसलिए स्पष्ट, पूर्वानुमेय और सहभागी वित्तपोषण आवश्यक है।

स्रोत: The Indian Express


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