06 Oct सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की संविधान की प्रस्तावना पाठ की याचिका
✎ संविधान की प्रस्तावना भारतीय संविधान के दर्शन और आदर्शों का सार है, जो भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का संकल्प लेती है और सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व सुनिश्चित…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ | GS Paper II — सरकार की नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय
- Prelims: संविधान की प्रस्तावना, संविधान का मूल ढाँचा, अनुच्छेद 21A, शिक्षा का अधिकार, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, गणतंत्र
- Essay: भारतीय संविधान की प्रस्तावना: एक मार्गदर्शक दर्शन, शिक्षा का अधिकार और संवैधानिक मूल्यों का प्रसार
त्वरित पुनरावृत्ति: संविधान की प्रस्तावना भारतीय संविधान के दर्शन और आदर्शों का सार है, जो भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का संकल्प लेती है और सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व सुनिश्चित करती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने स्कूलों में सुबह की सभा के दौरान संविधान की प्रस्तावना (Preamble) के पाठ की मांग करने वाली एक याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि प्रस्तावना पहले से ही स्कूलों में, विशेष रूप से कक्षा 6 में, पढ़ाई जाती है। यह निर्णय संविधान के महत्वपूर्ण प्रावधानों और उनके शैक्षणिक संस्थानों में प्रसार के संबंध में चर्चा को पुनः केंद्र में लाता है।
पृष्ठभूमि
- याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) का हवाला देते हुए स्कूलों में प्रस्तावना के पाठ को अनिवार्य करने की मांग की गई थी।
- संविधान की प्रस्तावना भारतीय संविधान के सिद्धांतों और दर्शन को दर्शाती है, जिसमें भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का संकल्प शामिल है।
- प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है, जिसे केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया था।
- यह निर्णय इस बात पर प्रकाश डालता है कि संवैधानिक मूल्यों को स्कूलों में किस प्रकार पढ़ाया जाना चाहिए और क्या इसके लिए औपचारिक पाठ अनिवार्य है।
- शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (Right to Education Act, 2009) के तहत 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि प्रस्तावना पहले से ही स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसका ज्ञान छात्रों तक पहुँच रहा है।
संविधान की प्रस्तावना क्या है?
- प्रस्तावना भारतीय संविधान का परिचय या मुखबंध है, जो इसके उद्देश्यों, दर्शन और आदर्शों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है।
- यह ‘हम भारत के लोग’ शब्दों से शुरू होती है, जो भारत के लोगों की संप्रभुता को रेखांकित करती है।
- प्रस्तावना भारत को एक संप्रभु (Sovereign), समाजवादी (Socialist), धर्मनिरपेक्ष (Secular), लोकतांत्रिक (Democratic) गणराज्य (Republic) घोषित करती है।
- यह सभी नागरिकों के लिए न्याय (Justice), स्वतंत्रता (Liberty), समानता (Equality) और बंधुत्व (Fraternity) सुनिश्चित करने का संकल्प लेती है।
- प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़े गए थे।
- यह संविधान के निर्माताओं के महान और उदात्त दृष्टिकोण को दर्शाती है और संविधान के व्याख्या में एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में कार्य करती है।
- प्रस्तावना संविधान का एक गैर-न्यायसंगत हिस्सा है, जिसका अर्थ है कि इसके प्रावधानों को सीधे अदालतों में लागू नहीं किया जा सकता है, लेकिन यह संवैधानिक व्याख्या में महत्वपूर्ण है।
- केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्थापित किया कि प्रस्तावना संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) का हिस्सा है और इसे संशोधित किया जा सकता है, बशर्ते मूल ढाँचे को नुकसान न पहुँचे।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| संविधान की प्रस्तावना (Preamble) | यह भारतीय संविधान का परिचय पत्र है, जो इसके दर्शन, आदर्शों और उद्देश्यों को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करता है। |
| सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का निर्णय | न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि प्रस्तावना पहले से ही स्कूलों में पढ़ाई जा रही है, जिससे इस पर अलग से निर्देश की आवश्यकता नहीं है। |
| मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties) | संविधान के आदर्शों और संस्थाओं का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है, जिसमें प्रस्तावना में निहित आदर्श भी शामिल हैं। |
| शिक्षा का अधिकार (Right to Education) (अनुच्छेद 21A) | यह अनुच्छेद 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है, जिसके तहत संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा भी महत्वपूर्ण है। |
| संवैधानिक मूल्य | प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व जैसे मूल्य भारतीय लोकतंत्र की नींव हैं और इन्हें छात्रों में विकसित करना आवश्यक है। |
महत्व
शैक्षिक महत्व
- प्रस्तावना का अध्ययन छात्रों को भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों और मूल्यों से परिचित कराता है, जिससे उनमें संवैधानिक साक्षरता (Constitutional Literacy) बढ़ती है।
- यह छात्रों में नागरिक चेतना और राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा देता है, उन्हें देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति संवेदनशील बनाता है।
संवैधानिक महत्व
- प्रस्तावना संविधान की आत्मा और कुंजी है, जो इसके निर्माताओं के इरादों को समझने में मदद करती है।
- सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय यह दर्शाता है कि संवैधानिक शिक्षा पहले से ही पाठ्यक्रम का हिस्सा है, जिससे न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
सामाजिक महत्व
- प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों को आत्मसात करने से एक समतावादी और समावेशी समाज के निर्माण में मदद मिलती है।
- यह छात्रों को विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों के प्रति सम्मान और सहिष्णुता विकसित करने के लिए प्रेरित करता है।
चुनौतियाँ
1. संवैधानिक मूल्यों का प्रभावी आत्मसातीकरण
- केवल प्रस्तावना का पाठ कराना पर्याप्त नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि छात्र इसके निहितार्थों और मूल्यों को समझें और उन्हें अपने जीवन में उतारें।
- शिक्षण विधियों को और अधिक आकर्षक और व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता है ताकि संवैधानिक अवधारणाओं को छात्रों के लिए सुलभ बनाया जा सके।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान – महत्वपूर्ण प्रावधान
2. पाठ्यक्रम में एकरूपता और गुणवत्ता
- विभिन्न राज्यों और बोर्डों के बीच संवैधानिक शिक्षा के पाठ्यक्रम और शिक्षण की गुणवत्ता में भिन्नता हो सकती है, जिससे एक समान समझ का अभाव हो सकता है।
- शिक्षकों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि वे संवैधानिक मूल्यों को प्रभावी ढंग से सिखा सकें।
यूपीएससी लिंक: शिक्षा प्रणाली – मुद्दे और चुनौतियाँ
3. औपचारिकता बनाम वास्तविक समझ
- कई बार शिक्षा केवल औपचारिकताओं तक सीमित रह जाती है, जहाँ छात्र केवल जानकारी याद करते हैं, न कि उसे समझते या आत्मसात करते हैं।
- संवैधानिक शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखकर, उसे वास्तविक जीवन के उदाहरणों और चर्चाओं से जोड़ना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: मानव संसाधन विकास
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| प्रस्तावना की समझ का अभाव | छात्रों द्वारा केवल रटना, बजाय इसके कि वे प्रस्तावना के गहरे अर्थ और संवैधानिक दर्शन को समझें। |
| शिक्षण पद्धति की प्रभावशीलता | वर्तमान शिक्षण विधियाँ संवैधानिक मूल्यों को छात्रों के दैनिक जीवन और सोच से जोड़ने में कितनी सफल हैं? |
| संवैधानिक साक्षरता का स्तर | क्या भारतीय नागरिक, विशेषकर युवा पीढ़ी, संविधान के मूल सिद्धांतों और अपने अधिकारों व कर्तव्यों से पर्याप्त रूप से अवगत हैं? |
| न्यायिक सक्रियता की सीमा | शिक्षा जैसे नीतिगत मामलों में न्यायालयों का हस्तक्षेप कहाँ तक उचित है, जब तक कि कोई मौलिक अधिकार का उल्लंघन न हो? |
आगे की राह
- संवैधानिक शिक्षा को केवल प्रस्तावना के पाठ तक सीमित न रखकर, उसे एक व्यापक और इंटरैक्टिव पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।
- शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं ताकि वे संवैधानिक मूल्यों को प्रभावी और रुचिकर तरीके से पढ़ा सकें।
- स्कूलों में वाद-विवाद, निबंध लेखन और रोल-प्ले जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए ताकि छात्र संवैधानिक अवधारणाओं को व्यावहारिक रूप से समझ सकें।
- पाठ्यक्रम को इस तरह से डिजाइन किया जाए कि वह छात्रों को संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों, मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों से परिचित करा सके।
- डिजिटल माध्यमों और मल्टीमीडिया उपकरणों का उपयोग करके संवैधानिक शिक्षा को अधिक सुलभ और आकर्षक बनाया जाए।
- माता-पिता और समुदाय को भी संवैधानिक मूल्यों के महत्व के बारे में जागरूक किया जाए ताकि घर और स्कूल दोनों जगह इन मूल्यों को बढ़ावा मिल सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
संविधान की प्रस्तावना · मौलिक अधिकार · शिक्षा का अधिकार · न्यायिक समीक्षा · संवैधानिक नैतिकता · धर्मनिरपेक्षता · न्यायपालिका की भूमिका · राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत · नागरिक कर्तव्य · संविधानवाद
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21A’, ‘note’: ‘शिक्षा का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A’, ‘note’: ‘मौलिक कर्तव्य’}
- {‘article’: ‘प्रस्तावना’, ‘note’: ‘संविधान का दर्शन और उद्देश्य’}
अवधारणा प्रवाह
याचिका दायर की गई: स्कूलों में प्रस्तावना पाठ की मांग → सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका पर विचार किया → न्यायालय ने मौजूदा प्रावधानों पर गौर किया → न्यायालय ने याचिका खारिज की → संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा का महत्व बना रहा
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. भारत के संविधान की प्रस्तावना के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है, लेकिन यह न्याययोग्य नहीं है।
2. प्रस्तावना को केवल एक बार संशोधित किया गया है।
3. ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़े गए थे।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि प्रस्तावना संविधान का एक हिस्सा है, लेकिन यह न्याययोग्य नहीं है, जिसका अर्थ है कि इसके प्रावधानों को अदालतों द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है। कथन 2 सही है। प्रस्तावना को केवल एक बार, 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संशोधित किया गया है। कथन 3 सही है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्द जोड़े गए थे।
Q2. अभिकथन (A): भारत का संविधान अपने नागरिकों को शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है।
कारण (R): अनुच्छेद 21A के तहत, राज्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि संविधान शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है। कारण (R) भी सही है और अभिकथन की सही व्याख्या करता है। अनुच्छेद 21A, जिसे 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया था, शिक्षा के अधिकार को एक मौलिक अधिकार बनाता है, जिसमें राज्य को 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत के संविधान की प्रस्तावना भारतीय राज्य के मूलभूत दर्शन और मूल्यों को समाहित करती है। इस कथन के आलोक में, प्रस्तावना के महत्व का विश्लेषण कीजिए और चर्चा कीजिए कि क्या इसे विद्यालयों में अनिवार्य रूप से पढ़ाना संवैधानिक नैतिकता को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** संविधान की प्रस्तावना का संक्षिप्त परिचय दें, जिसमें इसके ‘परिचय पत्र’ या ‘पहचान पत्र’ के रूप में इसकी भूमिका का उल्लेख करें।
2. **प्रस्तावना का महत्व:**
* **मूलभूत दर्शन:** ‘हम भारत के लोग’ से शुरू होकर संप्रभुता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और गणराज्य के आदर्शों को स्पष्ट करें।
* **उद्देश्य:** न्याय (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक), स्वतंत्रता (विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना), समानता (प्रतिष्ठा और अवसर) और बंधुत्व (व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता) के उद्देश्यों पर प्रकाश डालें।
* **संविधान की आत्मा:** केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा माने जाने का उल्लेख करें।
* **कानूनी व्याख्या में भूमिका:** यह बताएं कि यह संविधान के अस्पष्ट प्रावधानों की व्याख्या में सहायक है।
3. **विद्यालयों में प्रस्तावना के पाठ की आवश्यकता पर चर्चा:**
* **संवैधानिक नैतिकता को बढ़ावा देना (पक्ष में तर्क):**
* नागरिकों में संवैधानिक मूल्यों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता।
* लोकतांत्रिक मूल्यों, धर्मनिरपेक्षता और न्याय के सिद्धांतों को आत्मसात करना।
* राष्ट्रीय एकता और अखंडता की भावना को सुदृढ़ करना।
* बच्चों में संवैधानिक साक्षरता (constitutional literacy) का विकास।
* **विरोध में तर्क/अन्य दृष्टिकोण:**
* सर्वोच्च न्यायालय का वर्तमान निर्णय: प्रस्तावना पहले से ही पाठ्यक्रम का हिस्सा है।
* शिक्षा के अधिकार (अनुच्छेद 21A) का व्यापक दायरा।
* अनिवार्य पाठ से उत्पन्न होने वाली व्यावहारिक चुनौतियाँ और विविधता का सम्मान।
* केवल पाठ से अधिक, मूल्यों को व्यवहार में लाना महत्वपूर्ण है।
4. **निष्कर्ष:** एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें, जिसमें प्रस्तावना के महत्व को स्वीकार करते हुए यह बताया जाए कि संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए केवल पाठ ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा प्रणाली में इन मूल्यों को गहराई से एकीकृत करने और व्यवहार में लाने की आवश्यकता है।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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