04 Nov आरक्षित सीटों के रोटेशन पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
✎ संसदीय और विधानसभा सीटों के आरक्षण में चक्रानुक्रम का संवैधानिक प्रावधान नहीं है, जबकि पंचायतों और नगरपालिकाओं में अनुच्छेद 243घ(4) और 243न(4) के अंतर्गत यह अनिवार्य है; ऐसे नीतिगत परिवर्तन का मार्ग संसद है, न कि न्यायिक आदेश।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन (Polity and Governance): संविधान, संसद और राज्य विधानमंडल, निर्वाचन, संसदीय प्रणाली | GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन: सामाजिक न्याय, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए संवैधानिक प्रावधान
- Prelims: परिसीमन अधिनियम, 2002 (Delimitation Act, 2002) की धारा 9(1)(ग), अनुच्छेद 330 और 332 (लोक सभा और विधान सभाओं में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण), अनुच्छेद 334 (आरक्षण की अवधि और उसका विस्तार), अनुच्छेद 243घ (Article 243D) और 243न (Article 243T): पंचायतों और नगरपालिकाओं में स्थानों का चक्रानुक्रम से आवंटन, अनुच्छेद 14, 15 और 19 के मूल अधिकार संबंधी प्रावधान, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) की भूमिका और उसके आदेशों की वैधता, अनुच्छेद 329(क): परिसीमन से जुड़े विषयों में न्यायालयीय हस्तक्षेप पर सीमा, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और नीतिगत विषयों का विधायिका के क्षेत्राधिकार में होना
- Essay: लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय: आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था क्या निर्वाचक-चयन की स्वतंत्रता को प्रभावित करती है?, न्यायपालिका और विधायिका का कार्य-विभाजन: नीतिगत परिवर्तन की उचित संस्था कौन है?
त्वरित पुनरावृत्ति: संसदीय और विधानसभा सीटों के आरक्षण में चक्रानुक्रम का संवैधानिक प्रावधान नहीं है, जबकि पंचायतों और नगरपालिकाओं में अनुच्छेद 243घ(4) और 243न(4) के अंतर्गत यह अनिवार्य है; ऐसे नीतिगत परिवर्तन का मार्ग संसद है, न कि न्यायिक आदेश।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें संसद और राज्य विधान सभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में अनिवार्य चक्रानुक्रम (Rotation) की माँग की गई थी। न्यायालय ने कहा कि ऐसे निर्णय विधायिका के क्षेत्राधिकार में आते हैं और न्यायालय इन्हें आदेशित नहीं कर सकते। पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, जिसमें परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(ग) को वैध ठहराया गया था। यह धारा उन क्षेत्रों में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान का प्रावधान करती है जहाँ अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि एक ही निर्वाचन क्षेत्र का लंबे समय तक आरक्षित रहना अनुच्छेद 14, 15 और 19 का उल्लंघन है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे परिवर्तन के लिए उचित मंच संसद है।
पृष्ठभूमि
- संविधान में लोक सभा और राज्य विधान सभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद 330 और 332 में है। अनुच्छेद 334 के अंतर्गत ये आरक्षण मूल रूप से दस वर्ष के लिए थे, जिन्हें समय-समय पर संवैधानिक संशोधनों द्वारा बढ़ाया गया है।
- परिसीमन अधिनियम, 2002 के अंतर्गत गठित परिसीमन आयोग निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ तय करता है और आरक्षित सीटों की पहचान करता है। इसी प्रक्रिया में यह तय होता है कि किस निर्वाचन क्षेत्र में किस वर्ग के लिए आरक्षण होगा।
- पंचायतों (अनुच्छेद 243घ) और नगरपालिकाओं (अनुच्छेद 243न) में आरक्षित स्थानों का चक्रानुक्रम से आवंटन संवैधानिक रूप से अनिवार्य है। इसी आधार पर याचिका में समानांतर व्यवस्था की माँग की गई थी।
- संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों में चक्रानुक्रम का प्रावधान संविधान में नहीं है। इसलिए ऐसा परिवर्तन संवैधानिक संशोधन या विधि-निर्माण के माध्यम से ही संभव है, न कि न्यायिक आदेश से।
- उच्च न्यायालय ने माना कि आदर्श रूप से चक्रानुक्रम अपनाया जाना चाहिए, किंतु वर्तमान विधिक ढाँचे में उसे अनिवार्य नहीं ठहराया जा सकता। यह विषय नीति-निर्माण और विधायी विवेक का है।
आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र और चक्रानुक्रम की अवधारणा क्या है?
- आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र वे सीटें हैं जो संविधान और परिसीमन प्रक्रिया के अंतर्गत अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए सुरक्षित की जाती हैं। ऐसी सीट पर केवल उसी वर्ग का उम्मीदवार चुनाव लड़ सकता है, परंतु मतदान सभी निर्वाचक करते हैं।
- परिसीमन (Delimitation) वह प्रक्रिया है जिसमें जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ पुनर्निर्धारित की जाती हैं। इसके लिए परिसीमन आयोग गठित होता है।
- चक्रानुक्रम (Rotation) का अर्थ है कि आरक्षित सीटें समय-समय पर अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों को आवंटित की जाएँ, ताकि कोई एक क्षेत्र लंबे समय तक एक ही वर्ग के लिए आरक्षित न रहे।
- पंचायती राज में अनुच्छेद 243घ(4) और नगरपालिकाओं में अनुच्छेद 243न(4) चक्रानुक्रम का स्पष्ट प्रावधान करते हैं। लोक सभा और विधान सभाओं के लिए ऐसा कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है।
- अनुच्छेद 329(क) परिसीमन से संबंधित कुछ विषयों में न्यायालयीय हस्तक्षेप को सीमित करता है। फिर भी संवैधानिक प्रावधानों की वैधता की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का अधिकार न्यायालयों के पास बना रहता है।
- न्यायालय का यह तर्क कि नीति-परिवर्तन विधायिका का कार्य है, संविधान के शक्ति-पृथक्करण और संसदीय संप्रभुता के सिद्धांत से जुड़ा है।
- मतदाता का मताधिकार और उम्मीदवार बनने का अधिकार अलग-अलग विषय हैं। सामान्य वर्ग के उम्मीदवार अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने के लिए पात्र रहते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र का आधार | परिसीमन अधिनियम, 2002 (Delimitation Act, 2002) की धारा 9(1)(c) के अंतर्गत ऐसे निर्वाचन क्षेत्र चिह्नित किए जाते हैं जहाँ अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की जनसंख्या का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक हो |
| याचिका का मुख्य तर्क | एक ही निर्वाचन क्षेत्र का लगभग सात दशक से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रहना; आवर्तन (Rotation) के अभाव को अनुच्छेद 14, 15 और 19 के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत करना |
| प्रस्तावित तंत्र | पंचायतों और नगरपालिकाओं की भाँति विधानमंडल के निर्वाचन क्षेत्रों में नियमित अंतराल पर आवर्तन की व्यवस्था; इसके लिए अनुच्छेद 243D और 243T का संदर्भ |
| न्यायालय का रुख | निर्णय को विधायिका का क्षेत्र मानते हुए न्यायिक आदेश से आवर्तन लागू करने से इनकार; उच्च न्यायालय का निर्णय यथावत रखा गया |
| मतदान और प्रत्याशिता में अंतर | मतदान का अधिकार और किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने का दावा अलग-अलग विषय हैं; सामान्य वर्ग के उम्मीदवार अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने के लिए पात्र हैं |
महत्व
संवैधानिक एवं विधिक
- नीति-निर्माण का दायित्व विधायिका का है; न्यायपालिका विधि की संवैधानिकता की समीक्षा कर सकती है, पर आरक्षण की संरचना को स्वयं नहीं बदल सकती
- परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) की वैधता उच्च न्यायालय द्वारा बनाए रखी गई, जिससे मौजूदा विधिक ढाँचा स्थिर रहा
- पंचायत और नगरपालिका स्तर पर आवर्तन की संवैधानिक व्यवस्था (अनुच्छेद 243D और 243T) तथा लोकसभा और विधानसभा के आरक्षण (अनुच्छेद 330 और 332) में अंतर स्पष्ट हुआ
सामाजिक प्रतिनिधित्व
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों का उद्देश्य उन समुदायों को विधायी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, जो सामान्य निर्वाचन में पिछड़ सकते हैं
- आवर्तन और स्थायी आरक्षण के बीच का विमर्श सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की निरंतरता के प्रश्न से जुड़ा है
- आरक्षित क्षेत्र में एक ही समुदाय के लिए सीट बने रहने के प्रभाव पर अलग-अलग मत हो सकते हैं, इसलिए इस पर नीतिगत अध्ययन आवश्यक है
लोकतांत्रिक शासन
- बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाता से वैचारिक आधार पर चयन की अपेक्षा की जाती है, यह न्यायालय की टिप्पणी का मूल बिंदु था
- मतदान के अधिकार और निर्वाचन क्षेत्र के चयन के अधिकार को अलग रखकर देखने की न्यायिक दृष्टि को समझना उपयोगी है
प्रक्रियागत
- नीतिगत परिवर्तन की माँग के लिए उचित मंच संसद है; इस कारण याचिका को गलत मंच पर दायर माना गया
- संवैधानिक संशोधन या विधि-परिवर्तन की प्रक्रिया विधायी है, जिसमें संसद की भूमिका केंद्रीय है
चुनौतियाँ
1. आरक्षण की स्थिरता बनाम प्रतिनिधित्व की समानता
- लंबे समय तक एक ही निर्वाचन क्षेत्र के आरक्षित रहने से मतदाताओं के प्रत्याशी-चयन पर सीमा लगने का तर्क दिया गया
- दूसरी ओर, आरक्षण का उद्देश्य वंचित समुदायों का विधायी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, इसलिए स्थिरता और परिवर्तन के बीच संतुलन आवश्यक है
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारतीय संविधान, मौलिक अधिकार और आरक्षण
2. मौलिक अधिकारों के बीच टकराव
- याचिका में समानता (अनुच्छेद 14), भेदभाव-निषेध (अनुच्छेद 15) और अभिव्यक्ति व पेशे से जुड़े अधिकार (अनुच्छेद 19) के उल्लंघन का तर्क रखा गया
- राज्य द्वारा वंचित वर्गों के लिए विशेष प्रावधान (अनुच्छेद 15(4) और 16(4)) और सामान्य समानता के सिद्धांत के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है
यूपीएससी लिंक: GS-2: मौलिक अधिकार, सामाजिक न्याय हेतु संवैधानिक प्रावधान
3. परिसीमन और बदलता जनसांख्यिकीय आधार
- परिसीमन के बाद आरक्षित क्षेत्रों का निर्धारण जनसंख्या के अनुपात पर आधारित होता है, इसलिए जनसांख्यिकीय परिवर्तन आरक्षण की प्रासंगिकता को प्रभावित कर सकते हैं
- परिसीमन की प्रक्रिया और आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का चयन अक्सर विवाद का विषय बनता है
यूपीएससी लिंक: GS-2: परिसीमन, जनगणना और निर्वाचन सुधार
4. न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा
- न्यायालय ने कहा कि आवर्तन जैसे नीतिगत निर्णय विधायिका के क्षेत्र में आते हैं, इसलिए अदालत आदेश देकर इन्हें लागू नहीं कर सकती
- न्यायिक समीक्षा का उपयोग विधि की संवैधानिकता जाँचने तक सीमित है, नीति का निर्धारण करने तक नहीं
यूपीएससी लिंक: GS-2: शक्ति-पृथक्करण, न्यायिक समीक्षा और संसद की भूमिका
5. विभिन्न स्तरों पर असमान आरक्षण-व्यवस्था
- पंचायत और नगरपालिका स्तर पर आवर्तन का स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान है, जबकि लोकसभा और विधानसभा के आरक्षित क्षेत्रों में ऐसा प्रावधान नहीं है
- इस अंतर के कारण एक ही संवैधानिक भावना के अलग-अलग स्तरों पर भिन्न व्यावहारिक परिणाम दिखते हैं
यूपीएससी लिंक: GS-2: स्थानीय स्वशासन, 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| आवर्तन का अभाव | लंबे समय तक एक ही निर्वाचन क्षेत्र के आरक्षित रहने से प्रत्याशी-चयन और प्रतिस्पर्धा सीमित होने का तर्क |
| मौलिक अधिकारों का संतुलन | समानता (अनुच्छेद 14) और वंचित वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों (अनुच्छेद 15(4)) के बीच सामंजस्य की आवश्यकता |
| न्यायिक और विधायी भूमिका | नीतिगत परिवर्तन का अधिकार विधायिका के पास होने से न्यायालय का सीमित हस्तक्षेप |
| जनसांख्यिकीय परिवर्तन | जनसंख्या के बदलते अनुपात के साथ आरक्षित क्षेत्रों की उपयुक्तता पर प्रश्न |
| असमान स्तरीय व्यवस्था | पंचायत और नगरपालिका तथा लोकसभा-विधानसभा के बीच आवर्तन-नियमों में अंतर |
आगे की राह
- आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के निर्धारण में जनसांख्यिकीय आँकड़ों और परिसीमन प्रक्रिया की पारदर्शिता बढ़ाई जाए
- आवर्तन जैसे विषयों पर संसद में विस्तृत विधिक और नीतिगत बहस सुनिश्चित की जाए
- पंचायत और नगरपालिका स्तर के आवर्तन-अनुभव का तुलनात्मक अध्ययन कर विधानमंडल के स्तर पर साक्ष्य-आधारित विमर्श किया जाए
- समानता और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए संवैधानिक सिद्धांतों की स्पष्ट व्याख्या हो
- मतदाता शिक्षा के माध्यम से निर्वाचन में वैचारिक विकल्प की समझ को बढ़ावा दिया जाए
- न्यायालय और विधायिका की भूमिकाओं की स्पष्ट समझ के लिए नीतिगत मुद्दों को उचित मंच पर उठाने की प्रक्रिया अपनाई जाए
- परिसीमन और आरक्षण से जुड़े निर्णयों के प्रभाव का नियमित मूल्यांकन किया जाए
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
आरक्षण · परिसीमन अधिनियम 2002 · अनुसूचित जाति · अनुसूचित जनजाति · निर्वाचन क्षेत्र · अनुच्छेद 14 · अनुच्छेद 15 · अनुच्छेद 19 · अनुच्छेद 243D · अनुच्छेद 243T · न्यायिक समीक्षा · विधायिका का क्षेत्राधिकार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 330: लोकसभा में अनुसूचित जाति/जनजाति हेतु आरक्षित सीटें
- अनुच्छेद 332: राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति/जनजाति हेतु आरक्षण
- अनुच्छेद 334: विधायी आरक्षण की समय-सीमा का निर्धारण
- अनुच्छेद 243D: पंचायतों में आरक्षित सीटों का आवर्तन
- अनुच्छेद 243T: नगरपालिकाओं में आरक्षित सीटों का आवर्तन
- अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता का तर्क
- अनुच्छेद 15: भेदभाव-निषेध और विशेष प्रावधान का संदर्भ
- अनुच्छेद 19: याचिका में उठाए गए नागरिक स्वतंत्रता के तर्क
- अनुच्छेद 82: जनगणना के आधार पर परिसीमन का प्रावधान
अवधारणा प्रवाह
परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) के अंतर्गत अधिक अनुसूचित जाति/जनजाति जनसंख्या वाले निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित चिह्नित होते हैं → एक निर्वाचन क्षेत्र के लंबे समय तक आरक्षित रहने पर आवर्तन की माँग उठती है → याचिकाकर्ता इसे अनुच्छेद 14, 15 और 19 के संदर्भ में चुनौती देता है और अनुच्छेद 243D व 243T की तर्ज पर आवर्तन की माँग करता है → उच्च न्यायालय धारा 9(1)(c) को वैध मानते हुए चुनौती को अस्वीकार करता है → सर्वोच्च न्यायालय यह कहते हुए याचिका खारिज करता है कि ऐसे नीतिगत निर्णय विधायिका के क्षेत्र में आते हैं → इस स्थिति में आवर्तन जैसे परिवर्तन के लिए संसद में विधि-निर्माण ही उपयुक्त मार्ग है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 243D पंचायतों में सीटों के आरक्षण से संबंधित है।
2. परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान का प्रावधान करती है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में संसद और राज्य विधानसभाओं में SC/ST आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के अनिवार्य रोटेशन की मांग वाली याचिका को स्वीकार कर लिया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। अनुच्छेद 243D पंचायतों में आरक्षण का प्रावधान करता है, और परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान से संबंधित है। कथन 3 गलत है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी याचिका को अस्वीकार कर दिया है, यह कहते हुए कि यह विधायिका का कार्यक्षेत्र है।
Q2. अभिकथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ने संसद और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के अनिवार्य रोटेशन की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है।
कारण (R): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे निर्णय विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और अदालतों द्वारा इसका आदेश नहीं दिया जा सकता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन और कारण दोनों सही हैं, और कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया क्योंकि उसने इसे विधायिका के अधिकार क्षेत्र का मामला माना।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ संसद और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के रोटेशन की मांग को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज करने के निहितार्थों का परीक्षण कीजिए। क्या यह निर्णय संवैधानिक सिद्धांतों और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन को प्रभावित करता है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय का संक्षिप्त उल्लेख, जिसमें SC/ST आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के रोटेशन की याचिका को खारिज कर दिया गया।
2. **निर्णय के निहितार्थ:**
* **विधायिका का क्षेत्राधिकार:** न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह नीतिगत निर्णय विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है, न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे से बाहर है।
* **परिसीमन अधिनियम, 2002:** धारा 9(1)(c) की वैधता को बरकरार रखा, जो उच्च SC/ST जनसंख्या वाले क्षेत्रों में आरक्षण का प्रावधान करती है।
* **संवैधानिक प्रावधान:** याचिकाकर्ता के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव का निषेध) और 19 (स्वतंत्रता) के उल्लंघन के दावों को खारिज किया।
* **मतदाताओं के विकल्प:** न्यायालय ने कहा कि मतदाता राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर मतदान करते हैं, न कि केवल जाति या धर्म के आधार पर।
* **पंचायतों से भिन्नता:** अनुच्छेद 243D और 243T के तहत पंचायतों और नगरपालिकाओं में रोटेशन के प्रावधानों को संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए लागू करने से इनकार किया।
3. **संवैधानिक सिद्धांतों और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर प्रभाव:**
* **संवैधानिक संतुलन:** यह निर्णय शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) के सिद्धांत को पुष्ट करता है, जहाँ नीतिगत निर्णय विधायिका के पास रहते हैं।
* **प्रतिनिधित्व की निरंतरता:** आरक्षित सीटों के रोटेशन की अनुपस्थिति उन क्षेत्रों में SC/ST प्रतिनिधित्व की निरंतरता सुनिश्चित करती है जहाँ उनकी जनसंख्या अधिक है।
* **राजनीतिक परिवारों का आरोप:** याचिकाकर्ता के ‘सीमित राजनीतिक परिवारों’ को लाभ पहुँचाने के आरोप पर न्यायालय ने सीधे टिप्पणी नहीं की, लेकिन यह एक सामाजिक-राजनीतिक बहस का विषय है।
* **मतदान का अधिकार बनाम चुनाव लड़ने का अधिकार:** न्यायालय ने मतदान के अधिकार और किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के अधिकार के बीच अंतर किया।
* **संसद की भूमिका:** यह निर्णय संसद को इस मुद्दे पर विचार करने और यदि आवश्यक हो तो कानून बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।
4. **निष्कर्ष:** निर्णय का सारांश और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विधायिका की सर्वोच्चता पर जोर।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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