29 Oct सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के ‘भ्रष्ट’ 2011 भर्ती कानून को किया रद्द, जानिए पूरा मामला
✎ विधायिका किसी न्यायिक निर्णय के आधार में सुधार करने वाला मान्यकरण कानून बना सकती है, परंतु न्यायिक निर्णय को सीधे निष्प्रभावी करना शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक समीक्षा के मूल ढांचे का उल्लंघन है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — राजव्यवस्था (संविधान की मूल विशेषताएँ, शक्तियों का पृथक्करण, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, संघवाद) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र IV — नैतिकता, सत्यनिष्ठा और अभिशासन (लोक सेवा में भाई-भतीजावाद और पारदर्शिता)
- Prelims: अनुच्छेद 13 (मौलिक अधिकारों के विरुद्ध विधियाँ अवैध), अनुच्छेद 14 और 16 (समता और लोक नियोजन में अवसर की समानता), अनुच्छेद 309 (सेवा की भर्ती और सेवा शर्तों का विनियमन), अनुच्छेद 315 और 320 (लोक सेवा आयोग का गठन और कार्य), न्यायिक समीक्षा और मूल ढांचा सिद्धांत (केशवानंद भारती वाद, 1973), पी. संबमूर्ति बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1987): विधायिका द्वारा न्यायिक निर्णय को सीधे निष्प्रभावी करने पर रोक, मान्यकरण अधिनियम (Validation Act) और उसकी सीमाएँ, कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) और कर्नाटक परीक्षा प्राधिकरण (KEA) में अंतर
- Essay: विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन: क्या संसद या विधानमंडल न्यायिक निर्णय को कानून से पलट सकते हैं?, सार्वजनिक भर्ती में पारदर्शिता, योग्यता और नैतिक शासन: अभ्यर्थियों के विश्वास की रक्षा
त्वरित पुनरावृत्ति: विधायिका किसी न्यायिक निर्णय के आधार में सुधार करने वाला मान्यकरण कानून बना सकती है, परंतु न्यायिक निर्णय को सीधे निष्प्रभावी करना शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक समीक्षा के मूल ढांचे का उल्लंघन है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 29 अक्टूबर 2026 को कर्नाटक राज्य के कर्नाटक सिविल सेवा (2011 बैच के राजपत्रित परिवीक्षार्थी अधिकारियों के चयन और नियुक्ति का मान्यकरण) अधिनियम, 2022 को असंवैधानिक घोषित किया। इस अधिनियम के माध्यम से राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा वर्ष 2011 में संचालित 362 समूह ‘क’ और ‘ख’ पदों की चयन प्रक्रिया को वैध ठहराने का प्रयास किया गया था, जबकि उस प्रक्रिया को रद्द करने के निर्णय को उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय दोनों ने बरकरार रखा था। पीठ ने कहा कि अधिनियम का उद्देश्य इन न्यायिक निर्णयों को निष्प्रभावी करना था। इसलिए यह मामला संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें विधायी शक्ति की सीमा, न्यायिक निर्णयों की बाध्यता और सार्वजनिक भर्ती में पारदर्शिता, तीनों प्रश्न एक साथ जुड़े हैं।
पृष्ठभूमि
- वर्ष 2011 की इस भर्ती प्रक्रिया में 1,38,307 आवेदक शामिल हुए थे। बाद में एक आपराधिक अन्वेषण विभाग (CID) की जाँच में प्रक्रिया में “गंभीर हेरफेर” और उत्तर-पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में गंभीर अनियमितताएँ पाई गईं।
- उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय ने पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद्द करने के निर्णय को बरकरार रखा, अर्थात् यह न्यायिक रूप से अंतिम हो चुका था।
- राज्य सरकार का रुख वर्षों तक बदलता रहा: कभी भर्ती रद्द करने का समर्थन, तो कभी उसे वैध ठहराने वाले कानून का निर्माण। इस अस्थिरता से अभ्यर्थी सबसे अधिक प्रभावित हुए।
- वर्ष 2022 में कर्नाटक सिविल सेवा (मान्यकरण) अधिनियम पारित हुआ, जिसके द्वारा 2011 बैच की नियुक्तियों को वैध बनाने का प्रयास किया गया।
- उच्चतम न्यायालय ने अधिनियम को “स्टिलबॉर्न लेजिस्लेशन” (जन्म से ही निष्प्रभावी विधि) कहा और निर्णय दिया कि इस अधिनियम के आधार पर चयनित अभ्यर्थियों के लिए भी कोई साम्यिक राहत नहीं दी जा सकती।
मान्यकरण अधिनियम (Validation Act) क्या है?
- मान्यकरण अधिनियम वह विधि है जिसके द्वारा विधानमंडल किसी पूर्व कार्रवाई, नियुक्ति या कर को पिछली तिथि से वैध घोषित करता है, जिसे न्यायालय ने अवैध ठहराया हो।
- वैध मान्यकरण का सिद्धांत यह है कि विधायिका न्यायालय द्वारा बताई गई कमी या त्रुटि को दूर कर सकती है, जैसे कि किसी कानून में सक्षमता का अभाव हो या प्रक्रियात्मक दोष हो। ऐसा करते समय वह कानून को पूर्वव्यापी रूप से सुधार सकती है।
- विधायिका को न्यायिक निर्णय को सीधे निरस्त या निष्प्रभावी करने की शक्ति नहीं है। पी. संबमूर्ति वाद (1987) में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विधायिका किसी निर्णय के आधार को बदल सकती है, परंतु निर्णय को केवल इस उद्देश्य से निष्प्रभावी नहीं कर सकती कि उसका परिणाम बदल जाए।
- न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल विशेषता है। केशवानंद भारती वाद (1973) के अनुसार न्यायिक समीक्षा मूल ढांचे का हिस्सा है, इसलिए उसे विधायी उपायों से समाप्त नहीं किया जा सकता।
- अनुच्छेद 309 के अंतर्गत राज्य विधानमंडल सेवाओं की भर्ती और सेवा शर्तों को विनियमित कर सकता है, परंतु यह शक्ति अनुच्छेद 14 और 16 के समता और अवसर की समानता के सिद्धांतों के अधीन है।
- अनुच्छेद 315 और 320 के अंतर्गत लोक सेवा आयोग की स्थापना और उसके कार्य निर्धारित हैं। भर्ती प्रक्रिया में आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सार्वजनिक विश्वास की मूल शर्त है।
- यदि कोई कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो अनुच्छेद 13 के अंतर्गत उसे शून्य घोषित किया जा सकता है। ऐसे मामलों में अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत न्यायालय हस्तक्षेप करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| निर्णय का स्वरूप | सर्वोच्च न्यायालय की पीठ (न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन) ने कर्नाटक सिविल सेवा (2011 बैच के राजपत्रित परिवीक्षाधीन अधिकारियों के चयन और नियुक्ति का वैधीकरण) अधिनियम, 2022 (Karnataka Civil Services (Validation of Selection and Appointment of 2011 Batch Gazetted Probationers) Act, 2022) को असंवैधानिक घोषित किया। यह निर्णय वैधीकरण विधि (Validation Law) की संवैधानिक सीमाओं को स्पष्ट करता है। |
| विवादित भर्ती की पृष्ठभूमि | कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) द्वारा 2011 में 362 Group ‘A’ और ‘B’ पदों के लिए हुई भर्ती में 1,38,307 आवेदक थे। दो वर्ष बाद CID जांच में “गंभीर हेरफेर” और उत्तर-पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में अनियमितताएं पाई गईं। |
| न्यायिक निर्णयों की स्थिति | उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय, दोनों ने पूरी भर्ती प्रक्रिया रद्द करने के निर्णय को बरकरार रखा था। इसलिए यह निर्णय अंतिम हो चुका था। |
| केंद्रीय संवैधानिक सिद्धांत | विधायिका न्यायालय के अंतिम निर्णय को कानून बनाकर निष्प्रभावी नहीं कर सकती। वैधीकरण विधि तभी वैध मानी जाती है, जब वह संबंधित कानूनी कमी दूर करे और न्यायिक निर्णय के आधार को सक्षम रूप से बदले। |
| सरकार के रुख में परिवर्तन | राज्य सरकार का रुख एक दशक में बार-बार बदला। कभी भर्ती रद्द करने का समर्थन किया गया, तो कभी 2022 की विधि बनाई गई। न्यायालय ने इसे अभ्यर्थियों के लिए अनिश्चितता का कारण माना। |
| अपरिवर्तित अभ्यर्थियों की स्थिति | जो अभ्यर्थी इस भर्ती में सफल हुए थे और जिनकी कोई दोषपूर्ण भूमिका नहीं थी, उन्हें भी 2022 की विधि के आधार पर साम्यिक राहत नहीं दी गई। न्यायालय ने 2022 की विधि को “stillborn legislation” कहा। |
महत्व
संवैधानिक और विधिक
- शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत की पुष्टि हुई। विधायिका और न्यायपालिका की भूमिकाएं अलग हैं और विधायिका न्यायिक निर्णय को सीधे पलट नहीं सकती।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से अनुच्छेद 13 के अंतर्गत ऐसी विधि शून्य घोषित हुई, जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
- वैधीकरण विधि के दुरुपयोग पर न्यायिक सीमा तय हुई, जिससे भविष्य में ऐसी विधियों की वैधता की जांच अधिक कठोर होगी।
प्रशासनिक और शासन
- लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित चयन की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर बल दिया गया। अनियमित चयन को विधि से वैध ठहराना प्रशासनिक ढांचे की साख को क्षति पहुंचाता है।
- भर्ती प्रक्रिया में मूल्यांकन की पारदर्शिता और जांच-तंत्र की भूमिका स्पष्ट हुई।
- लंबित भर्ती विवादों से पद रिक्त रहते हैं और प्रशासनिक कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
सामाजिक न्याय और लोक विश्वास
- अवसर की समानता (Equality of Opportunity) का सिद्धांत सार्वजनिक रोजगार में केंद्रीय है। भाई-भतीजावाद और अनियमितता से वास्तविक योग्य अभ्यर्थी वंचित होते हैं।
- आयु-सीमा पार कर चुके अभ्यर्थियों के लिए विलंब का दुष्प्रभाव गंभीर है, इसलिए न्यायालय ने उनके लगातार प्रयास को रेखांकित किया।
- सार्वजनिक संस्थाओं में भरोसा तभी बनता है, जब नियम स्थिर हों और उनका पालन निष्पक्ष हो।
राज्य-स्तरीय विधायी क्षमता
- लोक सेवा और राज्य लोक सेवा आयोग राज्य सूची का विषय हैं, इसलिए राज्य विधायिका को इनसे जुड़ी विधि बनाने का अधिकार है।
- परंतु यह विधायी क्षमता संविधान के मौलिक अधिकारों और न्यायिक निर्णयों के अधीन है। क्षमता होने का अर्थ यह नहीं कि विधि न्यायिक निर्णय को निष्प्रभावी कर दे।
चुनौतियाँ
1. विधायी शक्ति और न्यायिक निर्णय के बीच संतुलन
- राज्य विधायिका द्वारा ऐसी विधि, जो अंतिम न्यायिक निर्णय को निष्प्रभावी करे, शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विरुद्ध है।
- वैधीकरण विधि और न्यायिक हस्तक्षेप के बीच की रेखा स्पष्ट न होने से विवाद बढ़ते हैं।
- न्यायालय का निर्णय इस रेखा को परिभाषित करता है, परंतु विधि-निर्माण में इसका पालन सुनिश्चित करना चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: GS2: शासन और संविधान; शक्तियों का पृथक्करण, न्यायिक समीक्षा
2. भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता और मूल्यांकन की विश्वसनीयता
- CID जांच में उत्तर-पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में गंभीर अनियमितताएं सामने आईं, जो प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाती हैं।
- बड़ी संख्या में आवेदकों वाली परीक्षाओं में गोपनीयता, मूल्यांकन-प्रणाली और निगरानी का सुदृढ़ होना आवश्यक है।
- अनियमितता के बाद भी जब प्रक्रिया को वैध ठहराने का प्रयास होता है, तो संस्थागत विश्वास को गहरी क्षति पहुंचती है।
यूपीएससी लिंक: GS2: शासन; लोक सेवा आयोगों की स्वायत्तता और कार्यप्रणाली
3. नीतिगत अस्थिरता और प्रशासनिक निरंतरता
- दशक भर में सरकार के बदलते रुख से अभ्यर्थी और प्रशासन, दोनों अनिश्चितता में रहे।
- नीति में बार-बार परिवर्तन से कानूनी प्रक्रियाएं लंबी होती हैं और संस्थागत निर्णय कमजोर होते हैं।
- स्थिर और सुसंगत नीति-निर्माण प्रशासनिक निरंतरता और सार्वजनिक भरोसे के लिए आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS2: शासन; नीति-निर्माण में पारदर्शिता और जवाबदेही
4. न्याय में विलंब और अभ्यर्थियों पर प्रभाव
- भर्ती विवाद वर्षों तक चलने से कई अभ्यर्थी आयु-सीमा से बाहर हो जाते हैं, जिससे उनका अवसर स्थायी रूप से छिन जाता है।
- सफल किंतु निर्दोष अभ्यर्थियों के हित भी संकट में पड़ते हैं, जिससे साम्यिक न्याय का प्रश्न उठता है।
- पद रिक्त रहने से सार्वजनिक सेवा-वितरण पर भी प्रभाव पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS2: सामाजिक न्याय और शासन; न्याय-वितरण व्यवस्था की कार्यक्षमता
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| विधायी अतिक्रमण | न्यायिक निर्णय को कानून द्वारा निष्प्रभावी करने से शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत कमजोर होता है। |
| चयन की विश्वसनीयता | अनियमित चयन को वैधीकरण से बचाने से लोक सेवा आयोग की साख पर प्रश्न उठते हैं। |
| नीतिगत अस्थिरता | सरकारी रुख में बार-बार बदलाव से अभ्यर्थियों और प्रशासन में अनिश्चितता बढ़ती है। |
| अभ्यर्थियों का अहित | विलंब से आयु-सीमा पार होने पर योग्य अभ्यर्थी स्थायी रूप से अवसर से वंचित हो जाते हैं। |
| साम्यिक न्याय | निर्दोष सफल अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट और न्यायसंगत प्रक्रिया का अभाव है। |
| पद रिक्तता | लंबित भर्ती विवाद से सार्वजनिक सेवा में रिक्तियां बनी रहती हैं और प्रशासनिक दक्षता घटती है। |
आगे की राह
- भर्ती प्रक्रिया में समयबद्धता, परीक्षा-कैलेंडर और मूल्यांकन की पारदर्शी प्रणाली सुनिश्चित की जाए, ताकि विवाद उत्पन्न होने की संभावना घटे।
- लोक सेवा आयोगों की संस्थागत स्वायत्तता और जवाबदेही को सुदृढ़ किया जाए, जैसा कि संविधान के भाग XIV में परिकल्पित है।
- वैधीकरण विधि बनाने से पहले विधायी प्रक्रिया में यह परीक्षण हो कि क्या वह केवल संवैधानिक कमी दूर करती है या किसी न्यायिक निर्णय को सीधे निष्प्रभावी करती है।
- न्यायिक निर्णयों के प्रति विधायी सम्मान और उनके अनुपालन की स्पष्ट प्रक्रिया विकसित की जाए।
- भर्ती संबंधी विवादों के शीघ्र निपटारे के लिए विशेष तंत्र और समयबद्ध सुनवाई व्यवस्था पर विचार किया जाए।
- परीक्षा की गोपनीयता, मूल्यांकन-निरीक्षण और हितों के टकराव की रोकथाम के लिए कठोर आचार-संहिता और आंतरिक नियंत्रण लागू हों।
- नीति-निर्माण में स्थिरता लाने के लिए सरकारों को अपने पूर्व रुख और न्यायिक निर्देशों का समुचित संज्ञान लेना चाहिए।
- जहां विवाद के कारण अभ्यर्थियों की आयु-सीमा प्रभावित हो, वहां न्यायसंगत और सुविचारित नीतिगत विकल्पों पर विचार हो, ताकि योग्य अभ्यर्थियों का अवसर सुरक्षित रहे।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · विधायी वैधीकरण (Legislative Validation) · न्यायिक निर्णय को निष्प्रभावी करना · शक्ति पृथक्करण (Separation of Powers) · संविधान का मूल ढाँचा (Basic Structure Doctrine) · विधि का शासन (Rule of Law) · अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 (समानता और अवसर की समानता) · राज्य लोक सेवा आयोग (State Public Service Commission) · योग्यता-आधारित भर्ती (Merit-based Recruitment) · भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद (Corruption and Nepotism) · पूर्वव्यापी कानून (Retrospective Legislation) · अनुच्छेद 13 (मौलिक अधिकारों से असंगत विधि)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 14: मनमानेपन और चयन में भाई-भतीजावाद से संरक्षण
- अनुच्छेद 16: सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता
- अनुच्छेद 13: मौलिक अधिकार-विरोधी विधि की शून्यता
- अनुच्छेद 32 और 226: विधि की न्यायिक समीक्षा का अधिकार
- अनुच्छेद 320: लोक सेवा आयोग की भर्ती-संबंधी भूमिका
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 41: राज्य लोक सेवा और आयोग
अवधारणा प्रवाह
2011 में KPSC द्वारा 362 Group ‘A’ और ‘B’ पदों के लिए भर्ती संपन्न हुई। → CID जांच में मूल्यांकन और प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। → उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने पूरी भर्ती प्रक्रिया रद्द करने का निर्णय बरकरार रखा। → राज्य विधायिका ने 2022 में वैधीकरण विधि पारित कर उस चयन को वैध बनाने का प्रयास किया। → सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 की विधि को असंवैधानिक ठहराया और रद्द करने का निर्णय प्रभावी रखा। → निर्णय से यह सिद्धांत पुष्ट हुआ कि विधायिका न्यायिक निर्णय को कानून बनाकर निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 13 के अनुसार मौलिक अधिकारों से असंगत कोई भी विधि उस सीमा तक शून्य होगी।
2. विधायिका किसी विधि में वह दोष दूर कर सकती है जिसके आधार पर न्यायालय ने उसे असंवैधानिक ठहराया था, बशर्ते वह विधायिका की विधायी क्षमता के भीतर हो।
3. विधायिका साधारण विधि बनाकर किसी अंतिम न्यायिक निर्णय को तब भी निष्प्रभावी कर सकती है जब मूल विधि में कोई परिवर्तन न किया गया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 13 मौलिक अधिकारों से असंगत विधियों को शून्य घोषित करता है। कथन 2 सही है: वैध आधार पर दोष-निवारण (curative validation) संभव है। कथन 3 गलत है: विधायिका न्यायिक निर्णय को सीधे, बिना विधि-दोष दूर किए, निष्प्रभावी नहीं कर सकती, क्योंकि यह न्यायिक समीक्षा और शक्ति पृथक्करण के मूल सिद्धांत के विरुद्ध है। अतः सही उत्तर ‘केवल दो’ है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ऐसे राज्य कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकता है जो किसी रद्द की गई भर्ती प्रक्रिया को वैधता प्रदान करने के लिए बनाया गया हो।
कारण (R): न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढाँचे का अंग है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
(d) (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — (A) सही है, क्योंकि न्यायालय ऐसे कानून की संवैधानिकता की जाँच कर सकता है और उसे शून्य घोषित कर सकता है। (R) सही है, क्योंकि केशवानंद भारती (1973) में न्यायिक समीक्षा को संविधान के मूल ढाँचे का भाग माना गया। अतः (R), (A) की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची I (संवैधानिक अनुच्छेद)
1. अनुच्छेद 315
2. अनुच्छेद 316
3. अनुच्छेद 320
4. अनुच्छेद 323
सूची II (विषय)
A. लोक सेवा आयोगों के सदस्यों की नियुक्ति और कार्यकाल
B. लोक सेवा आयोगों का गठन
C. लोक सेवा आयोगों के कृत्य (भर्ती हेतु परामर्श सहित)
D. लोक सेवा आयोगों की वार्षिक रिपोर्ट
सही सुमेल चुनिए:
- 1-B, 2-A, 3-C, 4-D
- 1-A, 2-B, 3-C, 4-D
- 1-B, 2-C, 3-A, 4-D
- 1-D, 2-A, 3-B, 4-C
उत्तर: 1-B, 2-A, 3-C, 4-D — अनुच्छेद 315 राज्य लोक सेवा आयोगों के गठन से संबंधित है (B)। अनुच्छेद 316 सदस्यों की नियुक्ति और कार्यकाल से (A)। अनुच्छेद 320 आयोग के कृत्यों, जिनमें भर्ती और अनुशासनात्मक मामलों पर परामर्श शामिल है, से संबंधित है (C)। अनुच्छेद 323 आयोग की वार्षिक रिपोर्ट से संबंधित है (D)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ यह तर्क दिया जाता है कि जब कोई भर्ती प्रक्रिया भ्रष्टाचार के आधार पर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द की जा चुकी हो, तब विधायिका साधारण विधि बनाकर उस रद्दीकरण को निष्प्रभावी नहीं कर सकती। इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और विधायी वैधीकरण तथा न्यायिक निर्णय को निष्प्रभावी करने के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि ऐसी विधि को असंवैधानिक ठहराए जाने पर चयनित अभ्यर्थियों और रिक्त पदों की भर्ती के संदर्भ में क्या परिणाम होते हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
1. भूमिका: कर्नाटक सिविल सेवा (2011 बैच के राजपत्रित प्रोबेशनरों के चयन का सत्यापन और नियुक्ति) अधिनियम, 2022 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक घोषित करना; 2011 की 362 पदों की भर्ती का रद्द होना, जिसकी पुष्टि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय दोनों ने की थी; न्यायालय की टिप्पणी कि ऐसा अधिनियम ‘stillborn legislation’ है।
2. संवैधानिक ढाँचा:
– अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता, मनमानेपन का निषेध) और अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता) का भर्ती प्रक्रिया से संबंध।
– अनुच्छेद 309 (सेवाओं की भर्ती हेतु विधि) और अनुच्छेद 315-323 (राज्य लोक सेवा आयोग का गठन, कृत्य, परामर्श और रिपोर्ट) के अंतर्गत भर्ती की संस्थागत प्रक्रिया।
– अनुच्छेद 13 (मौलिक अधिकारों से असंगत विधि की शून्यता) और अनुच्छेद 32/226 के अंतर्गत रिट क्षेत्राधिकार।
– अनुच्छेद 141 (सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की बाध्यता) और अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय) का प्रयोग।
3. सैद्धांतिक विमर्श:
– विधायी वैधीकरण (curative validation): विधायिका न्यायालय द्वारा बताए गए दोष को हटाकर कानून को पुनः वैध बना सकती है, परंतु यह वैध विधायी क्षमता और मूल अधिकारों के अनुरूप होना चाहिए।
– न्यायिक निर्णय को निष्प्रभावी करना: विधायिका किसी अंतिम न्यायिक निर्णय के आधार को हटाए बिना उसे बेअसर नहीं कर सकती। इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) में पूर्वव्यापी वैधीकरण को विधि के शासन के उल्लंघन के रूप में रद्द किया गया था।
– केशवानंद भारती (1973) वाद: न्यायिक समीक्षा और विधि का शासन मूल ढाँचे के अंग हैं; शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत।
– I.R. Coelho (2007): न्यायिक समीक्षा से परे रखी गई विधियों पर भी मूल ढाँचे की कसौटी लागू होती है।
– ‘योग्यता’ बनाम ‘राजनीतिक सुविधा’ का प्रश्न: सार्वजनिक सेवा में चयन का आधार योग्यता होनी चाहिए; राज्य सरकार का बार-बार बदलता रुख नीति-निर्माण में निरंतरता और पारदर्शिता पर प्रश्न उठाता है।
4. विभिन्न दृष्टिकोण: (क) सरकार का अधिकार कि वह विधि बनाकर प्रशासनिक त्रुटि सुधार सके; (ख) न्यायपालिका का मत कि ऐसा करना न्यायिक निर्णयों की अवमानना और मनमानी है; (ग) ईमानदार अभ्यर्थियों के हितों का संतुलन।
5. परिणाम (दूसरा भाग):
– अवैध विधि के आधार पर हुई नियुक्तियाँ और चयनित अभ्यर्थियों के अधिकार: न्यायालय ने ऐसे ‘निर्दोष’ चयनित अभ्यर्थियों को समानता (equity) का लाभ देने से इंकार किया।
– आयु-सीमा पार कर चुके अभ्यर्थियों की स्थिति और पुनः भर्ती/नई प्रक्रिया की आवश्यकता।
– प्रशासनिक निरंतरता, सेवा में विलंब और राज्य की विश्वसनीयता पर प्रभाव।
6. निष्कर्ष: विधायिका की शक्ति सीमित है; दोष-निवारण वैध है, परंतु न्यायिक निर्णय को निष्प्रभावी करना संविधान की भावना और शक्ति पृथक्करण के विरुद्ध है। सुशासन के लिए पारदर्शी भर्ती और संस्थागत स्वायत्तता आवश्यक है।
स्रोत: The Hindu
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में किस कानून को निरस्त किया गया है, जो कर्नाटक में वर्ष 2011 की भ्रष्टाचार से प्रभावित भर्ती को वैधता प्रदान करता था?
- A. कर्नाटक लोक सेवा आयोग (भर्ती) अधिनियम, 2011
- B. कर्नाटक सरकारी सेवा (विशेष भर्ती) अधिनियम, 2011
- C. कर्नाटक लोक सेवा (वैधिक संरक्षण) अधिनियम, 2011
- D. कर्नाटक सरकारी सेवा (भ्रष्टाचार निरोधक) अधिनियम, 2011
उत्तर: C. कर्नाटक लोक सेवा (वैधिक संरक्षण) अधिनियम, 2011 — सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2011 में हुई भ्रष्टाचार से प्रभावित सरकारी भर्तियों को वैधता प्रदान करने वाले ‘कर्नाटक लोक सेवा (वैधिक संरक्षण) अधिनियम, 2011’ को निरस्त कर दिया।
Mains: वर्ष 2011 में कर्नाटक में हुई भ्रष्टाचार से प्रभावित सरकारी भर्तियों के संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के राजनीतिक, प्रशासनिक और न्यायिक निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए। कर्नाटक राज्य लोक सेवा आयोग (KPSC) की भूमिका तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों पर भी प्रकाश डालिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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