07 Nov तमिलनाडु में मानव-वन्यजीव संघर्ष क्षतिपूर्ति में वृद्धि: एक विश्लेषण
✎ मानव-वन्यजीव संघर्ष में मुआवजा राज्य सरकार की अनुग्रह राशि के रूप में दिया जाता है, क्योंकि वन और वन्यजीव संरक्षण समवर्ती सूची का विषय है, जबकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 मुआवजा दरें तय नहीं करता।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था (संघीय ढाँचा, राज्य विषय, केंद्र-राज्य समन्वय) | GS Paper II — शासन (सरकारी योजनाएँ और सार्वजनिक नीति का कार्यान्वयन) | GS Paper III — पर्यावरण (जैव विविधता, संरक्षित क्षेत्र, मानव-वन्यजीव संघर्ष)
- Prelims: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife (Protection) Act, 1972), संरक्षित क्षेत्र और आरक्षित वन में अंतर, संविधान की समवर्ती सूची: प्रविष्टि 17A (वन) और 17B (वन्यजीवों का संरक्षण), प्रोजेक्ट एलिफेंट (Project Elephant), 1992, अनुग्रह राशि (Ex gratia payment) और उसका कानूनी स्वरूप, भारतीय वन अधिनियम, 1927 (Indian Forest Act, 1927), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के आदेश (Government Order) से नीति-परिवर्तन की प्रक्रिया
- Essay: मानव-वन्यजीव संघर्ष: विकास, आजीविका और जैव विविधता संरक्षण के बीच संतुलन, क्षतिपूर्ति नीति: संरक्षण के सामाजिक मूल्य और ग्रामीण आजीविका की सुरक्षा
त्वरित पुनरावृत्ति: मानव-वन्यजीव संघर्ष में मुआवजा राज्य सरकार की अनुग्रह राशि के रूप में दिया जाता है, क्योंकि वन और वन्यजीव संरक्षण समवर्ती सूची का विषय है, जबकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 मुआवजा दरें तय नहीं करता।
यह खबर चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु सरकार ने पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन एवं वन विभाग के एक सरकारी आदेश (Government Order) के माध्यम से संरक्षित क्षेत्रों और आरक्षित वनों के भीतर तथा बाहर होने वाले मानव-वन्यजीव संघर्ष के विभिन्न प्रकारों के लिए मुआवजे की दरें बढ़ाई हैं। गंभीर चोट या 20 से 60 प्रतिशत तक स्थायी विकलांगता के मामलों में मुआवजा ₹59,100 से बढ़ाकर अधिकतम ₹5 लाख किया गया है। पहले न दिए जाने वाले मामूली चोट के लिए अधिकतम ₹20,000 और केले के पौधों के लिए ₹250 प्रति पौधा का प्रावधान किया गया है। फसल नुकसान, नारियल के पेड़, पक्के तथा कच्चे मकान और दुधारू पशुओं के लिए भी दरें संशोधित की गई हैं। इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि मुआवजा नीति राज्य स्तर पर लगातार समीक्षा और संशोधन के दायरे में रहती है।
पृष्ठभूमि
- वन और वन्यजीव संरक्षण संविधान की समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों इसमें कानून बना सकते हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़ी मुआवजा नीति में राज्य सरकारें प्रमुख भूमिका निभाती हैं, क्योंकि वन विभाग का प्रशासन उन्हीं के पास होता है।
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत वन्यजीवों के संरक्षण और संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन की व्यवस्था है। इस अधिनियम में मुआवजे की दरें अलग से तय नहीं की गई हैं, इसलिए राज्य सरकारें अनुग्रह राशि के रूप में अपने स्तर पर दरें निर्धारित करती हैं।
- भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष की समस्या बढ़ने के साथ केंद्र सरकार ने हाथियों से जुड़े संघर्ष के लिए प्रोजेक्ट एलिफेंट चलाया है। यह केंद्र प्रायोजित योजना है, जो हाथियों के आवास संरक्षण और संघर्ष-शमन उपायों पर केंद्रित है।
- पूर्व में तमिलनाडु में मानव हानि, फसल, मकान और पशुधन के लिए मुआवजे की दरें समय-समय पर संशोधित होती रही हैं। वर्तमान आदेश में कुछ प्रकारों के लिए पहली बार निश्चित राशि तय की गई है, जैसे मामूली चोट और केले के पौधे।
- महँगाई, निर्माण लागत और फसल मूल्य में बदलाव के कारण पुरानी दरें व्यवहारिक नहीं रह जातीं। इसलिए मुआवजा दरों की नियमित समीक्षा को प्रशासनिक न्याय और ग्रामीण सुरक्षा दोनों से जोड़ा जाता है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष और मुआवजा नीति क्या है?
- मानव-वन्यजीव संघर्ष वह स्थिति है जिसमें वन्यजीवों के आवास और मानव बस्तियों, खेतों या पशुधन के बीच टकराव होता है, जिससे जान-माल की हानि होती है।
- यह संघर्ष संरक्षित क्षेत्रों (Protected Areas) के भीतर और उनके बाहर, दोनों जगह हो सकता है, तथा आरक्षित वनों (Reserved Forests) के आसपास भी इसकी संभावना अधिक रहती है।
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए अनुसूचियाँ बनाई गई हैं, जबकि मानव-हानि और फसल-हानि के लिए मुआवजा सामान्यतः राज्य सरकार की अनुग्रह राशि के रूप में दिया जाता है।
- मुआवजा सामान्यतः कई श्रेणियों में दिया जाता है: मानव हानि या चोट, फसल क्षति, मकान क्षति, पशुधन की हानि और पेड़ों या पौधों का नुकसान।
- मानव हानि के मामलों में चोट की गंभीरता का निर्धारण ज़िला चिकित्सा अधिकारी (District Medical Officer) या गठित चिकित्सा बोर्ड द्वारा प्रमाणित विकलांगता के आधार पर किया जाता है।
- मकान क्षति के मामलों में पक्के और कच्चे (ठाठ या छप्पर वाले) मकानों के लिए अलग-अलग दरें तय की जाती हैं, और अधिकतम राशि वास्तविक नुकसान के आकलन से सीमित रहती है।
- संघवाद की दृष्टि से यह नीति दर्शाती है कि संरक्षण कानून केंद्र में बन सकते हैं, पर उनके प्रशासनिक और वित्तीय क्रियान्वयन में राज्यों की भूमिका निर्णायक होती है।
- सतत संरक्षण के लिए मुआवजे के साथ-साथ आवास प्रबंधन, बाड़ लगाना, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और ग्राम स्तर पर जागरूकता जैसे निवारक उपाय भी आवश्यक माने जाते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| गंभीर चोट / आंशिक अक्षमता (20% से 60%) | प्रमाणित अक्षमता पर क्षतिपूर्ति (Compensation) ₹59,100 से बढ़ाकर अधिकतम ₹5 लाख की गई है। जिला चिकित्सा अधिकारी (District Medical Officer) या गठित चिकित्सा बोर्ड का प्रमाणन अनिवार्य है |
| मामूली चोट | इसके लिए पहले क्षतिपूर्ति का प्रावधान नहीं था; अब अधिकतम ₹20,000 तय किए गए हैं |
| फसल क्षति | प्रति एकड़ ₹25,000 (या वास्तविक हानि, जो कम हो) की दर बढ़ाकर ₹40,000 प्रति एकड़ की गई है। आकलित क्षेत्र के अनुपात में राशि भी देय है, जो कम हो |
| नारियल वृक्ष और केला | नारियल पर पहले एकसमान ₹500 प्रति वृक्ष था, जिसे आयु-वर्ग के आधार पर ₹500, ₹1,000 और ₹2,000 में बाँटा गया है। केले के पौधों के लिए ₹250 प्रति पौधा का नया प्रावधान हुआ है |
| आवास क्षति | पक्के मकान की पूर्ण या गंभीर क्षति पर ₹95,100 से बढ़ाकर ₹1.5 लाख; कच्चे या छप्पर वाले मकान की पूर्ण या गंभीर क्षति पर ₹15,000; आंशिक क्षति पर ₹5,200 से बढ़ाकर ₹10,000 |
| दुधारू पशु | प्रति पशु क्षतिपूर्ति ₹30,000 से बढ़ाकर ₹40,000 की गई है, जो ग्रामीण परिवारों की आजीविका से सीधे जुड़ी है |
महत्व
सामाजिक-आर्थिक
- ग्रामीण और कृषि-आश्रित परिवारों की आय-सुरक्षा बढ़ेगी, क्योंकि फसल, पशु और आवास की हानि का बोझ अपेक्षाकृत कम होगा
- गंभीर चोट और स्थायी अक्षमता की स्थिति में ₹5 लाख तक की सहायता से परिवार पर आर्थिक निर्भरता का दबाव कुछ हद तक घटेगा
- मामूली चोट और केले जैसी फसलों को शामिल करने से पहले अनदेखे रह गए नुकसान को मान्यता मिली है
पर्यावरणीय और संरक्षण
- संरक्षित क्षेत्र (Protected Areas) और आरक्षित वन (Reserved Forest) दोनों के भीतर और बाहर की घटनाओं को शामिल किया गया है, जिससे संघर्ष का दायरा व्यापक माना गया है
- क्षतिपूर्ति से स्थानीय लोगों की वन्यजीवों के प्रति सहनशीलता बढ़ने की संभावना रहती है, और इससे सह-अस्तित्व (Coexistence) की नीति को बल मिलता है
- सहनशीलता बढ़ने से प्रतिशोध में वन्यजीवों को नुकसान पहुँचाने की प्रवृत्ति घटने की दीर्घकालिक संभावना बनती है
प्रशासनिक और शासन
- दरों में संशोधन सरकारी आदेश (Government Order) के माध्यम से हुआ है, जिससे कार्यकारी स्तर पर नीति को समय-समय पर अद्यतन करने का तरीका स्पष्ट होता है
- पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन एवं वन विभाग (Environment, Climate Change and Forest Department) की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में है
- चिकित्सा प्रमाणन और क्षति के वास्तविक आकलन की शर्तें दावों की जाँच में मानकीकरण और पारदर्शिता लाने का प्रयास दर्शाती हैं
संघीय ढाँचा
- वन और वन्यजीव संरक्षण संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) में हैं, इसलिए राज्य अपने स्तर पर क्षतिपूर्ति की दरें तय कर सकता है
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife (Protection) Act, 1972) के ढाँचे के भीतर राज्य द्वारा अपनी वित्तीय सामर्थ्य के अनुसार दरें तय करने का उदाहरण मिलता है
चुनौतियाँ
1. राजकोषीय भार और वित्तीय स्थिरता
- प्रति दावा अधिकतम राशि बढ़ने से राज्य के आकस्मिक व्यय पर दबाव बढ़ सकता है, विशेषकर गंभीर चोट के मामलों में
- फसल क्षति और आवास क्षति की संख्या में अचानक वृद्धि हो तो वार्षिक बजट का अनुमान कठिन हो जाता है
- दरों को समय-समय पर संशोधित करने के लिए स्पष्ट वित्तीय मानदंड और निधि-प्रबंधन की व्यवस्था आवश्यक है
यूपीएससी लिंक: राज्य वित्त और सार्वजनिक व्यय प्रबंधन; राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) (GS-3: अर्थव्यवस्था)
2. दावों का सत्यापन और धोखाधड़ी का जोखिम
- अधिकतम दर बढ़ने से गलत या बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों का जोखिम बढ़ता है
- क्षति का आकलन स्थल पर करना, जैसे फसल क्षेत्र की माप और मकान की स्थिति, प्रशासनिक क्षमता की परीक्षा लेता है
- चिकित्सा बोर्ड और क्षेत्रीय अधिकारियों के बीच समन्वय न होने से दावों के निपटान में देरी हो सकती है
यूपीएससी लिंक: प्रशासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व; सेवा वितरण में सुधार (GS-2: शासन)
3. मानव-वन्यजीव संघर्ष के मूल कारण
- क्षतिपूर्ति घटना के बाद की राहत है, जबकि संघर्ष के कारण, जैसे आवास विखंडन, गलियारों का अतिक्रमण और भोजन की कमी, बने रहते हैं
- वन्यजीवों की आवाजाही वाले मार्गों पर खेती और बस्ती का विस्तार संघर्ष की आवृत्ति बढ़ाता है
- केवल मुआवजे से दीर्घकालिक समाधान संभव नहीं है; पारिस्थितिक प्रबंधन और भूमि-उपयोग नियोजन भी आवश्यक हैं
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव-विविधता संरक्षण (GS-3: पर्यावरण)
4. प्रकृति के कारण हुई क्षति का आकलन और वर्गीकरण
- कच्चे, पक्के और छप्पर वाले मकानों की श्रेणियों के बीच भेद स्पष्ट न होने पर विवाद की स्थिति बन सकती है
- निश्चित दर और वास्तविक क्षति में से जो कम हो, उसे लागू करने से कुछ मामलों में पूरी हानि की भरपाई नहीं हो पाती
- फसल और पशु की कीमतें समय के साथ बदलती हैं, इसलिए स्थिर दरें बाजार-मूल्य से पीछे रह सकती हैं
यूपीएससी लिंक: कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा और न्याय (GS-2: सामाजिक न्याय)
5. क्षेत्रीय वन-कर्मचारियों की संस्थागत क्षमता
- संघर्ष-प्रवण क्षेत्रों में निगरानी, चेतावनी प्रणाली और त्वरित प्रतिक्रिया दल की कमी घटनाओं को बढ़ा सकती है
- पीड़ित परिवारों तक समय पर सहायता पहुँचाने के लिए जमीनी स्तर पर संसाधन और प्रशिक्षण आवश्यक हैं
- केंद्र और राज्य के बीच नीतिगत समन्वय तथा तकनीकी सहायता की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए
यूपीएससी लिंक: केंद्र-राज्य समन्वय और संघीय शासन; आपदा प्रबंधन (GS-2: शासन और GS-3: आपदा प्रबंधन)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता |
|---|---|
| राजकोषीय दबाव | दरों में वृद्धि से राज्य के वार्षिक व्यय और आकस्मिक निधि पर भार बढ़ सकता है |
| दावों में धोखाधड़ी | बढ़ी हुई राशि के कारण गलत या अतिरंजित दावों और जाँच की कठिनाई का जोखिम |
| संघर्ष के मूल कारण | क्षतिपूर्ति राहत देती है, पर आवास विखंडन और गलियारों का अतिक्रमण बने रहने से संघर्ष दोहराया जा सकता है |
| आकलन और वर्गीकरण | कच्चे, पक्के और आंशिक क्षति की श्रेणियों में विवाद और निश्चित दर बनाम वास्तविक हानि का अंतर |
| मूल्य-संशोधन | फसल और पशु के बाजार-मूल्य बदलने पर स्थिर दरें समय के साथ अप्रासंगिक हो सकती हैं |
आगे की राह
- दावों के निपटान के लिए समयबद्ध और डिजिटल प्रक्रिया अपनाई जाए, ताकि प्रभावित परिवारों को राहत में विलंब न हो
- संघर्ष-प्रवण क्षेत्रों में प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और त्वरित प्रतिक्रिया दल को सुदृढ़ किया जाए
- गलियारों की पहचान, उनकी सुरक्षा और भूमि-उपयोग नियोजन में स्थानीय समुदायों को सम्मिलित किया जाए
- फसल बीमा जैसी अन्य वित्तीय व्यवस्थाओं के साथ समन्वय कर क्षतिपूर्ति पर निर्भरता का संतुलन बनाया जाए
- दरों की समीक्षा नियमित अंतराल पर बाजार-मूल्य और वास्तविक लागत के आधार पर की जाए
- दावों के आँकड़े, भुगतान और घटनाओं का सार्वजनिक डेटा तैयार किया जाए, ताकि नीति-निर्माण वैज्ञानिक आधार पर हो
- प्रतिशोधी कार्रवाई रोकने के लिए ग्रामीण समुदायों में जागरूकता और वन्यजीव संरक्षण के कानूनी प्रावधानों की जानकारी बढ़ाई जाए
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) · अनुग्रह राशि (Ex Gratia Payment) · संरक्षित क्षेत्र (Protected Areas) · आरक्षित वन (Reserved Forests) · वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife (Protection) Act, 1972) · अनुच्छेद 48A (Article 48A) · अनुच्छेद 51A(g) (Article 51A(g)) · सहअस्तित्व (Coexistence) · फसल क्षति (Crop Damage) · नैतिक जोखिम (Moral Hazard) · प्रोजेक्ट एलिफेंट (Project Elephant) · राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना (National Wildlife Action Plan) · आवास विखंडन (Habitat Fragmentation) · प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का राज्य का दायित्व
- अनुच्छेद 51A(g): नागरिकों का प्राकृतिक पर्यावरण और जीव-जंतुओं की रक्षा का मौलिक कर्तव्य
- अनुच्छेद 162: राज्य की कार्यकारी शक्ति, जिसके अंतर्गत सरकारी आदेश जारी हुआ
- सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची की प्रविष्टि 17क और 17ख: वन और वन्यजीव संरक्षण
अवधारणा प्रवाह
संरक्षित क्षेत्र और आरक्षित वन के भीतर व बाहर मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएँ होती हैं → फसल, आवास, दुधारू पशु या मानव जीवन की क्षति होती है → चिकित्सा प्रमाणन और क्षति के वास्तविक आकलन के आधार पर दावा तय होता है → पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन एवं वन विभाग सरकारी आदेश से क्षतिपूर्ति की दरें संशोधित करता है → प्रभावित परिवारों को राहत मिलने से आजीविका पर तत्काल दबाव घटता है → दीर्घकाल में सहनशीलता और सह-अस्तित्व बढ़ने से संघर्ष और प्रतिशोधी घटनाओं में कमी की संभावना बनती है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority) वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत गठित एक वैधानिक निकाय है।
2. आरक्षित वन (Reserved Forests) भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अंतर्गत गठित किए जाते हैं।
3. सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र (Community Reserves) निजी या सामुदायिक भूमि पर भी घोषित किए जा सकते हैं।
4. मानव-वन्यजीव संघर्ष में क्षति के लिए मुआवजा केवल राष्ट्रीय उद्यानों के भीतर हुई क्षति पर ही देय है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- चारों
उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: NTCA वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के 2006 के संशोधन द्वारा सृजित वैधानिक निकाय है। कथन 2 सही है: आरक्षित वन भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अंतर्गत घोषित होते हैं। कथन 3 सही है: सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र का प्रावधान 2002 के संशोधन द्वारा जोड़ा गया और इसमें निजी या सामुदायिक भूमि शामिल हो सकती है। कथन 4 गलत है: तमिलनाडु का नवीन आदेश संरक्षित क्षेत्रों के भीतर और बाहर, दोनों स्थितियों में मुआवजे का प्रावधान करता है।
Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है।
अभिकथन (A): मानव-वन्यजीव संघर्ष में दिया जाने वाला अनुग्रह राशि (Ex Gratia) मुआवजा एक प्रशासनिक नीति-साधन है, न कि प्रवर्तनीय विधिक अधिकार।
कारण (R): वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 फसल या संपत्ति की क्षति के लिए स्पष्ट रूप से वैधानिक मुआवजे का अधिकार सृजित नहीं करता।
दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (b) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (c) (A) सही है, परन्तु (R) गलत है।
- (d) (A) गलत है, परन्तु (R) सही है।
उत्तर: (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — मुआवजा राज्य सरकारों द्वारा अपने नियमों और आदेशों के अंतर्गत दिया जाता है, इसलिए इसे अनुग्रह राशि कहा जाता है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में फसल या संपत्ति क्षति के लिए अनिवार्य मुआवजे का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, इसलिए कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।
Q3. भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद राज्य को देश के पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करने तथा वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा का प्रयास करने का निर्देश देता है?
- अनुच्छेद 42
- अनुच्छेद 48A
- अनुच्छेद 51A(g)
- अनुच्छेद 243G
उत्तर: अनुच्छेद 48A — अनुच्छेद 48A राज्य नीति का निदेशक तत्व है, जो राज्य को पर्यावरण, वनों और वन्यजीवों की रक्षा का निर्देश देता है। अनुच्छेद 51A(g) यही दायित्व नागरिकों पर मौलिक कर्तव्य के रूप में डालता है। अनुच्छेद 42 कार्य की न्यायोचित दशाओं और प्रसूति सहायता से संबंधित है, तथा अनुच्छेद 243G पंचायतों के कार्यों से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मानव-वन्यजीव संघर्ष को अब केवल संरक्षण की समस्या नहीं, बल्कि मानव और वन्यजीवों के सहअस्तित्व की समस्या माना जा रहा है। इस संदर्भ में अनुग्रह राशि मुआवजे को संघर्ष-प्रबंधन के एक उपकरण के रूप में आलोचनात्मक रूप से परखिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या केवल मुआवजा प्रतिशोधात्मक हत्याओं को कम कर सकता है, विशेष रूप से प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और आवास प्रबंधन जैसे उपायों के संदर्भ में। (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
(1) परिचय: मानव-वन्यजीव संघर्ष की परिभाषा; आवास विखंडन, गलियारों (corridors) की हानि और कृषि विस्तार को मूल कारण बताएं। तमिलनाडु सरकार द्वारा पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन एवं वन विभाग के आदेश से दरों में वृद्धि (मानव क्षति के लिए अधिकतम 5 लाख रुपये, फसल के लिए प्रति एकड़ 40,000 रुपये, पक्के मकान के लिए 1.5 लाख रुपये, दुधारू पशु के लिए 40,000 रुपये) को उदाहरण के रूप में रखें।
(2) संवैधानिक एवं विधिक ढांचा: अनुच्छेद 48A (राज्य का निदेशक तत्व) और अनुच्छेद 51A(g) (नागरिकों का मौलिक कर्तव्य); वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत संरक्षित क्षेत्रों का वर्गीकरण (राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, संरक्षण आरक्षित क्षेत्र, सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र); आरक्षित वनों के लिए भारतीय वन अधिनियम, 1927; मुआवजे का स्वरूप अनुग्रह राशि होने के कारण इसका प्रवर्तनीय अधिकार न होना।
(3) मुआवजे के पक्ष में तर्क: ग्रामीणों की वन्यजीव-सहिष्णुता बढ़ाना; आर्थिक आघात कम करना; सामाजिक लाइसेंस बनाए रखना; SDG 15 (भूमि पर जीवन) के अनुरूप होना।
(4) मुआवजे की सीमाएं: नैतिक जोखिम (moral hazard) और अतिक्रमण को अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन की आशंका; क्षति के आकलन में देरी और प्रमाणन की जटिलता (जिला चिकित्सा अधिकारी या चिकित्सा मंडल की भूमिका); राजकोषीय भार; बढ़ती दरों के बावजूद क्षति की मात्रा और आवृत्ति का नियंत्रण न होना।
(5) पूरक उपाय: प्रोजेक्ट एलिफेंट (1992) के अंतर्गत हाथी-गलियारे और सौर बाड़; प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली; फसल बीमा से समन्वय; आवास प्रबंधन और वन क्षेत्र का पुनर्स्थापन; राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना (2017-2031) की सिफारिशें; समुदाय-आधारित सहभागी प्रबंधन।
(6) संतुलित निष्कर्ष: मुआवजा तात्कालिक राहत और सहिष्णुता का साधन है, परंतु प्रतिशोधात्मक हत्याओं को रोकने के लिए निवारक उपाय, त्वरित भुगतान तंत्र और पारदर्शी आकलन अनिवार्य हैं। अंत में सहअस्तित्व की दीर्घकालिक रणनीति पर बल दें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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