07 Nov तमिलनाडु फसल ऋण माफी योजना: पात्रता विस्तार और पुनर्संरचना
✎ सहकारिता राज्य सूची का विषय है; फसल ऋण माफी राज्य का राजकोषीय निर्णय है, जिसमें ऋण माफी, ऋण निपटान और ब्याज प्रतिपूर्ति का अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — राज्यव्यवस्था एवं शासन (सहकारी संघवाद, राज्य सूची, राज्य सरकार की योजनाएँ) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — अर्थव्यवस्था (कृषि वित्त, राजकोषीय नीति, सब्सिडी और ऋण राहत) तथा कृषि (कृषि ऋण संरचना, किसान हितैषी उपाय)
- Prelims: सहकारी समिति (Cooperative Society) और राज्य सूची की प्रविष्टि 32, 97वाँ संविधान संशोधन (2011) और भाग IX-B, अल्पकालिक फसल ऋण (Short-term Crop Loan) और किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card), ब्याज प्रतिपूर्ति (Interest Reimbursement) और ब्याज अनुदान (Interest Subvention), त्रि-स्तरीय सहकारी ऋण संरचना: प्राथमिक कृषि ऋण समिति (PACS), जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (DCCB) और राज्य सहकारी बैंक, राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) की पुनर्वित्त भूमिका, ऋण माफी और ऋण निपटान (Loan Settlement) में अंतर, राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम और राज्य का राजकोषीय घाटा
- Essay: कृषि ऋण माफी: किसान राहत बनाम राजकोषीय अनुशासन और नैतिक जोखिम, सहकारी संस्थाएँ और सहकारी संघवाद: राज्य की भूमिका का विस्तार
त्वरित पुनरावृत्ति: सहकारिता राज्य सूची का विषय है; फसल ऋण माफी राज्य का राजकोषीय निर्णय है, जिसमें ऋण माफी, ऋण निपटान और ब्याज प्रतिपूर्ति का अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु सरकार ने सहकारी संस्थाओं से लिए गए फसल ऋण के लिए अपनी ऋण माफी योजना को पुनर्गठित किया है। संशोधित व्यवस्था के अंतर्गत ₹75,000 तक के फसल ऋण पर पूर्ण माफी जारी रहेगी, जबकि ₹75,000 से अधिक ऋण लेने वाले किसानों को अधिकतम ₹75,000 की एकसमान माफी मिलेगी। पात्रता अवधि एक माह बढ़ाकर 31 मार्च 2026 तक लिए गए ऋणों तक की गई है। सहकारिता, खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग द्वारा जारी शासकीय आदेश के अनुसार इस संशोधित योजना के लिए अतिरिक्त ₹2,842.77 करोड़ स्वीकृत किए गए हैं और कुल अनुमानित व्यय ₹9,062.83 करोड़ है, जिसमें से ₹6,220.056 करोड़ जारी किया जा चुका है। आदेश में पूर्व में पूरा ऋण चुका चुके 10,810 किसानों को भी लाभ देने तथा कुछ ब्याज-संबंधी प्रतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान में सहकारिता राज्य सूची का विषय है (सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 32), इसलिए सहकारी ऋण से जुड़ी राहत योजनाएँ मुख्यतः राज्य सरकारें बनाती और लागू करती हैं।
- 97वें संविधान संशोधन (2011) द्वारा सहकारी समितियों से संबंधित प्रावधान जोड़े गए, जिनमें भाग IX-B और अनुच्छेद 43B (राज्य के नीति निदेशक तत्व) शामिल हैं। वर्ष 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने भाग IX-B के उस हिस्से को अमान्य ठहराया, जो बहु-राज्य सहकारी समितियों से संबंधित था।
- भारत में अल्पकालिक फसल ऋण का बड़ा हिस्सा सहकारी ऋण संरचना के माध्यम से दिया जाता है। इसमें प्राथमिक स्तर पर PACS, मध्य स्तर पर DCCB और राज्य स्तर पर राज्य सहकारी बैंक कार्य करते हैं, तथा NABARD पुनर्वित्त उपलब्ध कराता है।
- पूर्व व्यवस्था में ₹75,000 से ₹1 लाख तक के ऋण पर अधिकतम ₹75,000 और ₹1 लाख से अधिक ऋण पर अधिकतम ₹35,000 की माफी थी। संशोधित व्यवस्था में ₹75,000 से अधिक के सभी ऋणों के लिए एकसमान माफी का ढाँचा अपनाया गया है और योजना को अधिक किसानों तक विस्तारित किया गया है।
- पिछली योजना में 1 मई 2025 से 28 फरवरी 2026 के बीच लिए गए ऋण शामिल थे; अब यह अवधि 31 मार्च 2026 तक बढ़ाई गई है। ऐसी योजनाओं में पात्रता तिथि का निर्धारण प्रशासनिक और वित्तीय दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है।
फसल ऋण माफी योजना क्या है?
- फसल ऋण माफी से आशय राज्य सरकार द्वारा किसानों के अल्पकालिक फसल ऋण का एक निर्धारित सीमा तक भुगतान स्वयं वहन करना है, जिससे किसान का देय ऋण घट या समाप्त हो जाता है।
- ऋण माफी (Loan Waiver) और ऋण निपटान (Loan Settlement) अलग अवधारणाएँ हैं। माफी में बकाया राशि का एक भाग या पूरा भाग राज्य द्वारा चुकाया जाता है, जबकि निपटान में ऋणदाता संस्था और उधारकर्ता के बीच समझौते से राशि तय होती है।
- अल्पकालिक फसल ऋण सामान्यतः एक फसल-चक्र के लिए, लगभग एक वर्ष की अवधि हेतु दिया जाता है। किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) इसका प्रमुख माध्यम है।
- ब्याज अनुदान (Interest Subvention) केंद्र सरकार की समय पर भुगतान पर ब्याज छूट से जुड़ी व्यवस्था है, जबकि ब्याज प्रतिपूर्ति राज्य द्वारा सहकारी संस्थाओं को उनके ब्याज-व्यय की भरपाई है। दोनों को एक ही अवधारणा मानना त्रुटि है।
- ऐसी राहत योजनाओं से सहकारी बैंकों की वसूली-क्षमता, उनकी तरलता और किसानों के समय पर भुगतान के व्यवहार पर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए नीति-निर्माण में नैतिक जोखिम (Moral Hazard) पर भी विचार किया जाता है।
- राज्य के बजट में ऐसी योजनाओं का व्यय राजकोषीय घाटे और ऋण-भार को प्रभावित करता है। इसलिए ये योजनाएँ राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) के सिद्धांतों और राज्य की वित्तीय क्षमता के संदर्भ में देखी जाती हैं।
- सहकारी संस्थाएँ राज्य की कृषि-वित्त नीति का मुख्य साधन हैं, इसलिए ऐसी योजनाएँ सहकारी संघवाद के उस व्यावहारिक पक्ष को दर्शाती हैं जिसमें राज्य सूची के विषयों पर राज्य अपनी प्राथमिकताएँ तय करते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| संशोधित संरचना | ₹75,000 तक के फसल ऋण पर पूर्ण माफी दी गई है, जबकि ₹75,000 से अधिक ऋण पर अधिकतम ₹75,000 की एकसमान (Flat) माफी तय की गई है। पहले ₹75,000 से ₹1 लाख के ऋण पर अधिकतम ₹75,000 और ₹1 लाख से अधिक के ऋण पर अधिकतम ₹35,000 की माफी थी। |
| पात्रता अवधि का विस्तार | योजना की पात्रता अवधि एक माह बढ़ाई गई है। अब 31 मार्च 2026 तक लिए गए ऋण शामिल हैं, जबकि पहले 1 मई 2025 से 28 फरवरी 2026 की अवधि के ऋण ही योजना में आते थे। |
| लाभार्थी किसान | 5,90,621 किसानों को पूर्ण माफी मिलेगी, 7,34,260 किसानों को ₹75,000 की एकसमान माफी मिलेगी। इसके अतिरिक्त 10,810 ऐसे किसानों को भी लाभ दिया गया है जिन्होंने घोषणा से पहले ऋण पूरी तरह चुका दिया था। |
| वित्तीय व्यवस्था | संशोधित योजना पर कुल अनुमानित व्यय ₹9,062.83 करोड़ है। राज्य सरकार ने अतिरिक्त ₹2,842.77 करोड़ स्वीकृत किए हैं और अब तक ₹6,220.056 करोड़ जारी हो चुके हैं। |
| ऋण का स्रोत | माफी केवल सहकारी संस्थाओं से लिए गए फसल ऋण पर लागू है। इससे सहकारी ऋण संरचना की भूमिका स्पष्ट होती है। |
| प्रशासनिक प्रक्रिया | सहकारिता, खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग द्वारा शासनादेश (Government Order) जारी किया गया है। ब्याज से जुड़ी प्रतिपूर्ति का प्रावधान भी इसी आदेश में शामिल है। |
महत्व
कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था
- फसल ऋण का बोझ घटने से किसानों की तात्कालिक नकदी स्थिति सुधरती है और अगली फसल के लिए निवेश की क्षमता बढ़ती है।
- ब्याज से जुड़ी प्रतिपूर्ति से ऋण की वास्तविक लागत घटती है, जिससे कृषि आय पर दबाव कुछ कम होता है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग और मांग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, हालाँकि इसका आकलन आँकड़ों से ही संभव है।
राजकोषीय
- कुल व्यय ₹9,062.83 करोड़ होने से यह राज्य के बजट में एक बड़ा दायित्व है, जिसका वित्तपोषण राज्य की संचित निधि से होता है।
- अतिरिक्त ₹2,842.77 करोड़ की स्वीकृति से स्पष्ट है कि योजना के विस्तार के साथ राज्य के व्यय में वृद्धि हुई है। इससे राज्य के राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) पर असर पड़ सकता है।
- स्वीकृत और जारी राशि के बीच का अंतर बजटीय प्रबंधन और भुगतान की समय-सारणी की ओर संकेत करता है।
सहकारी संस्थागत ढाँचा
- माफी का लाभ सहकारी संस्थाओं से लिए गए ऋण तक सीमित है, इसलिए इन संस्थाओं की वित्तीय स्थिति और वसूली-क्षमता पर इसका सीधा असर होता है।
- सहकारी ऋण संस्थाएँ ग्रामीण अल्पकालिक ऋण का एक प्रमुख स्रोत हैं, इसलिए ऋण वितरण में व्यवधान की आशंका रहती है।
शासन और प्रशासन
- संशोधन के लिए शासनादेश जारी करना और पात्रता अवधि बढ़ाना सरकार के नीतिगत निर्णय की प्रक्रिया को दर्शाता है।
- पात्रता की स्पष्ट शर्तें (जैसे ऋण की राशि और तिथि-सीमा) प्रशासनिक पारदर्शिता और लाभार्थियों की पहचान के लिए आवश्यक हैं।
चुनौतियाँ
1. राजकोषीय दबाव
- ऋण माफी जैसी योजनाएँ राज्य के सार्वजनिक व्यय को बढ़ाती हैं और दीर्घकालिक राजकोषीय संतुलन पर प्रभाव डालती हैं।
- राज्यों के लिए राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (FRBM Act) के तहत घाटे की सीमा का पालन आवश्यक होता है, इसलिए ऐसी योजनाओं को बजट में संतुलित करना चुनौती है।
- पूँजी निवेश और कल्याण व्यय के बीच संसाधनों का संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: राजकोषीय संघवाद और सार्वजनिक वित्त प्रबंधन
2. नैतिक जोखिम (Moral Hazard) और ऋण संस्कृति
- बार-बार की ऋण माफी से यह धारणा बन सकती है कि ऋण चुकाना अनिवार्य नहीं है, जिससे समय पर भुगतान करने वाले किसानों के प्रोत्साहन पर असर पड़ता है।
- पूरा ऋण पहले चुकाने वाले किसानों को लाभ देने के बावजूद, भविष्य में समय पर भुगतान की संस्कृति को बनाए रखना नीतिगत चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: कृषि ऋण नीति, वित्तीय अनुशासन और सुशासन
3. सहकारी संस्थाओं की वित्तीय सेहत
- माफी की राशि सीधे सहकारी संस्थाओं की वसूली पर असर डालती है, जिससे उनकी तरलता (Liquidity) और नए ऋण वितरण की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
- ऋण माफी के बाद संस्थाओं को होने वाली हानि की भरपाई का तंत्र स्पष्ट होना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: सहकारी ऋण संरचना और ग्रामीण वित्तीय संस्थाएँ
4. ऋण तक औपचारिक पहुँच का प्रश्न
- माफी योजनाएँ तभी दीर्घकालिक लाभ देती हैं जब किसानों की औपचारिक संस्थागत ऋण तक पहुँच बढ़े और वे साहूकारों पर निर्भर न रहें।
- यदि माफी के बाद संस्थागत ऋण का प्रवाह घटता है, तो छोटे और सीमांत किसान अनौपचारिक स्रोतों की ओर लौट सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: वित्तीय समावेशन और कृषि अर्थव्यवस्था
5. पात्रता, सत्यापन और बार-बार विस्तार
- पात्रता की तिथि-सीमा बार-बार बढ़ाने से लाभार्थियों के सत्यापन और डेटा की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं।
- सही लाभार्थी तक लाभ पहुँचाने के लिए भूमि अभिलेख और ऋण रिकॉर्ड का समन्वय आवश्यक है, जो प्रायः कठिन होता है।
यूपीएससी लिंक: लोक प्रशासन में पारदर्शिता और लक्षित लाभ वितरण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| राजकोषीय भार | कुल व्यय ₹9,062.83 करोड़ होने से राज्य के बजट और राजकोषीय घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। |
| नैतिक जोखिम | बार-बार की माफी से समय पर ऋण चुकाने का प्रोत्साहन घट सकता है। |
| सहकारी संस्थाओं की तरलता | माफी से संस्थाओं की वसूली प्रभावित होती है और नए ऋण वितरण की क्षमता घट सकती है। |
| संस्थागत ऋण तक पहुँच | माफी के बाद ऋण प्रवाह घटने पर छोटे किसान अनौपचारिक और महँगे स्रोतों की ओर जा सकते हैं। |
| लाभार्थी सत्यापन | पात्रता अवधि का बार-बार विस्तार डेटा की विश्वसनीयता और लक्षित वितरण पर प्रश्न उठाता है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- तमिलनाडु फसल ऋण माफी योजना (Tamil Nadu Crop Loan Waiver Scheme)
आगे की राह
- माफी की राशि और लाभार्थियों की संख्या का वास्तविक समय में डिजिटल सत्यापन किया जाए, ताकि पात्रता की स्पष्टता और पारदर्शिता बनी रहे।
- माफी से होने वाले व्यय का वार्षिक लेखा-परीक्षण और सार्वजनिक प्रकटीकरण किया जाए, ताकि राजकोषीय उत्तरदायित्व सुनिश्चित हो।
- सहकारी संस्थाओं को माफी की प्रतिपूर्ति समय पर हो, ताकि उनकी वित्तीय स्थिति और ऋण वितरण क्षमता बनी रहे।
- ऋण माफी के साथ ऋण साक्षरता और समय पर भुगतान को बढ़ावा देने वाले उपाय अपनाए जाएँ, ताकि नैतिक जोखिम कम हो।
- सहकारी ऋण संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण और विस्तार पर ध्यान दिया जाए, ताकि किसानों की संस्थागत ऋण तक निरंतर पहुँच बनी रहे।
- फसल बीमा और उत्पादन-आधारित आय सहायता जैसे उपायों के साथ ऋण नीति का समन्वय किया जाए, ताकि कृषि जोखिम का समग्र प्रबंधन हो।
- माफी के प्रभाव का मूल्यांकन स्वतंत्र अध्ययन से किया जाए, ताकि भविष्य की नीतियाँ आँकड़ों पर आधारित हों।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
कृषि ऋण माफी (Agricultural Loan Waiver) · सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) · नैतिक जोखिम (Moral Hazard) · राजकोषीय उत्तरदायित्व (Fiscal Responsibility) · प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ (PACS) · संस्थागत ऋण (Institutional Credit) · किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card) · ब्याज अनुदान योजना (Interest Subvention Scheme) · प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) · अनुच्छेद 43B · अनुच्छेद 48 · ऋण अनुशासन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 246 एवं सातवीं अनुसूची: राज्य सूची की प्रविष्टि 14, 30, 32
- अनुच्छेद 266: राज्य की संचित निधि से व्यय
- भाग IXB (अनुच्छेद 243ZH–243ZI): सहकारी समितियों का संवैधानिक ढाँचा
अवधारणा प्रवाह
राज्य सरकार ने सहकारी संस्थाओं से लिए फसल ऋण की माफी का ढाँचा संशोधित किया। → ₹75,000 तक के ऋण पर पूर्ण माफी और अधिक ऋण पर ₹75,000 की एकसमान माफी तय की गई। → पात्रता अवधि एक माह बढ़ाकर 31 मार्च 2026 तक लिए गए ऋण शामिल किए गए। → सहकारिता, खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने शासनादेश जारी कर अतिरिक्त ₹2,842.77 करोड़ स्वीकृत किए। → संचित निधि से राशि जारी होने पर लाभार्थी किसानों के ऋण खाते समायोजित होंगे और सहकारी संस्थाओं की वसूली प्रभावित होगी। → इसका परिणाम किसानों की नकदी स्थिति में सुधार और राज्य के राजकोषीय संतुलन पर दबाव के रूप में सामने आता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में सहकारी समितियों से संबंधित प्रविष्टि सम्मिलित है।
2. 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा अनुच्छेद 43B जोड़ा गया, जो सहकारी समितियों के संवर्धन से संबंधित है।
3. अनुच्छेद 19(1)(ग) के अंतर्गत नागरिकों को सहकारी समितियाँ बनाने का अधिकार प्राप्त है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- तीनों
- कोई नहीं
उत्तर: तीनों — कथन 1 सही है: सहकारी समितियाँ राज्य सूची (प्रविष्टि 32) का विषय हैं, इसीलिए राज्य सरकारें सहकारी ऋण संबंधी योजनाएँ बनाती हैं। कथन 2 सही है: 97वें संशोधन (2011) ने भाग IXB और अनुच्छेद 43B जोड़े। कथन 3 सही है: उसी संशोधन से अनुच्छेद 19(1)(ग) में ‘सहकारी समितियों’ का उल्लेख जुड़ा।
Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है।
अभिकथन (A): राज्य सरकार सहकारी संस्थाओं से लिए गए फसल ऋण की माफी की योजना बना और लागू कर सकती है।
कारण (R): कृषि और सहकारी समितियाँ सातवीं अनुसूची की राज्य सूची के विषय हैं।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — कृषि (प्रविष्टि 14) और सहकारी समितियाँ (प्रविष्टि 32) राज्य सूची में हैं, इसलिए राज्य विधायी और कार्यकारी क्षमता के भीतर ऋण माफी की योजना बना सकते हैं। यह क्षमता राज्य के उधार और राजकोषीय सीमाओं (अनुच्छेद 293 सहित) के अधीन रहती है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
स्तंभ I (संवैधानिक प्रावधान): A. अनुच्छेद 48, B. अनुच्छेद 43B, C. अनुच्छेद 293, D. अनुच्छेद 19(1)(ग)
स्तंभ II (विषय): 1. कृषि एवं पशुपालन का संगठन, 2. सहकारी समितियों का संवर्धन, 3. राज्यों द्वारा ऋण लेना, 4. संघ बनाने का अधिकार (सहकारी समितियों सहित)
सही सुमेलन चुनिए:
- A-1, B-2, C-3, D-4
- A-2, B-1, C-3, D-4
- A-1, B-3, C-2, D-4
- A-1, B-2, C-4, D-3
उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — अनुच्छेद 48 राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में कृषि और पशुपालन के आधुनिक संगठन से संबंधित है। अनुच्छेद 43B सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन और संवर्धन से जुड़ा है। अनुच्छेद 293 राज्यों के उधार को नियंत्रित करता है। अनुच्छेद 19(1)(ग) संघ, संगठन और सहकारी समितियाँ बनाने का अधिकार देता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ कृषि ऋण माफी जैसी योजनाएँ राज्यों की नीति का नियमित साधन बनती जा रही हैं। इन योजनाओं के राजकोषीय, संस्थागत और सहकारी संघवाद से जुड़े प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि बार-बार ऋण माफी किसानों के ऋण अनुशासन और सहकारी ऋण संस्थाओं की वसूली क्षमता पर क्या प्रभाव डाल सकती है। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर के संकेत-बिंदु: (1) संवैधानिक ढाँचा: सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 14 (कृषि) और प्रविष्टि 32 (सहकारी समितियाँ); 97वें संशोधन (2011) द्वारा अनुच्छेद 19(1)(ग) में सहकारी समितियों का समावेश तथा अनुच्छेद 43B; अनुच्छेद 48 (कृषि और पशुपालन का संगठन) तथा अनुच्छेद 293 (राज्यों का उधार)। (2) संदर्भ: तमिलनाडु सरकार द्वारा सहकारी फसल ऋण माफी का पुनर्गठन, जिसमें अतिरिक्त ₹2,842.77 करोड़ स्वीकृत हुए, कुल व्यय ₹9,062.83 करोड़ अनुमानित है और लगभग 13,35,691 किसान (5,90,621 पूर्ण माफी, 7,34,260 ₹75,000 की समान माफी, 10,810 पूर्व-भुगतान करने वाले) लाभार्थी हैं; तथा 2008 की कृषि ऋण माफी एवं ऋण राहत योजना (लगभग ₹60,000 करोड़)। (3) राजकोषीय पक्ष: FRBM अधिनियम, 2003 और N.K. Singh समिति (2017) की समीक्षा; राज्य के राजकोषीय घाटे और ऋण-GDP अनुपात पर दबाव; पूँजीगत व्यय पर प्रभाव। (4) संस्थागत पक्ष: प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ (PACS) की वसूली क्षमता; Shivaraman समिति (2010) की संस्थागत कृषि ऋण संबंधी सिफ़ारिशें; ब्याज अनुदान योजना (MISS) और किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) द्वारा समय पर भुगतान को प्रोत्साहन; नैतिक जोखिम (Moral Hazard) का तर्क। (5) संतुलित दृष्टिकोण: ग्रामीण संकट और ऋणग्रस्तता से राहत का औचित्य बनाम वित्तीय अनुशासन और सहकारी संघवाद की संस्थागत मज़बूती। (6) वैकल्पिक उपाय: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) से जोखिम-प्रबंधन, ऋण संरचना सुधार, लक्षित और पारदर्शी लाभ-अंतरण। (7) निष्कर्ष: लक्षित, एक-बारगी और शर्तों पर आधारित राहत तथा दीर्घकालिक संस्थागत सुधार के बीच संतुलन की आवश्यकता।
स्रोत: The Hindu
Tamil Nadu PCS (TNPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में फसल ऋण माफी योजना को पुनर्गठित किया है। इस पुनर्गठन के तहत, पात्रता अवधि को कितने समय के लिए बढ़ाया गया है?
- दो सप्ताह
- एक महीना
- दो महीने
- तीन महीने
उत्तर: एक महीना — तमिलनाडु सरकार ने फसल ऋण माफी योजना की पात्रता अवधि को एक महीने के लिए बढ़ा दिया है।
Mains: तमिलनाडु सरकार द्वारा फसल ऋण माफी योजना के हालिया पुनर्गठन और पात्रता अवधि के विस्तार के महत्व पर चर्चा करें। यह कदम राज्य के किसानों को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है?
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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