अल्लाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रणाली में देरी पर उठाया सवाल, मुख्य न्यायाधीश से मांगी जवाबदेही

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अल्लाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रणाली में देरी पर उठाया सवाल, मुख्य न्यायाधीश से मांगी जवाबदेही

न्यायिक विलंब का चक्रमामलों का लंबित होनादशकों सेन्याय में देरीनागरिक असंतोषप्रशासनिक कमियांजवाबदेही का अभावमुख्य न्यायाधीश प्रणालपुनर्मूल्यांकन आवश्यकन्यायिक सुधारपारदर्शिता सुनिश्चित
न्यायिक विलंब का चक्र

✎ इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने न्यायिक प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता की कमी पर चिंता व्यक्त करते हुए मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रणाली के पुनर्मूल्यांकन का आह्वान किया है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: कार्यपालिका और न्यायपालिका का संगठन और कार्यप्रणाली; सरकार के मंत्रालय और विभाग; दबाव समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका।  |  GS Paper II — न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली।
  • Prelims: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, न्यायिक स्वतंत्रता, न्यायिक जवाबदेही, मुख्य न्यायाधीश की प्रशासनिक शक्तियाँ, मामलों का आवंटन, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)
  • Essay: न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन: भारतीय न्यायपालिका के समक्ष चुनौतियाँ, भारत में न्यायपालिका की दक्षता और सुलभता सुनिश्चित करना

त्वरित पुनरावृत्ति: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने न्यायिक प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता की कमी पर चिंता व्यक्त करते हुए मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रणाली के पुनर्मूल्यांकन का आह्वान किया है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में मामलों के निपटान में अत्यधिक देरी और न्यायिक प्रशासन में जवाबदेही की कमी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। एक एकल पीठ ने ‘तारीख पे तारीख’ की पुरानी शिकायत को दोहराते हुए कहा कि दशकों से लंबित मामले संस्था की छवि को धूमिल करते हैं। न्यायालय ने मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रणाली के पुनर्मूल्यांकन और अधिक सहयोगात्मक तथा जवाबदेह दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में अदालतों में बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं, जिनमें से कई दशकों से चले आ रहे हैं। यह स्थिति न्याय में देरी और नागरिकों के लिए न्याय तक पहुँच में बाधा उत्पन्न करती है।
  • उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के पास रोस्टर आवंटन (Roster Allocation), मामलों की सूचीकरण और विभिन्न समितियों के कामकाज सहित महत्वपूर्ण प्रशासनिक शक्तियाँ होती हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रणाली की परिकल्पना की थी, जिसमें मजबूत नेतृत्व के साथ सहयोगात्मक, सहभागी और परामर्शदात्री दृष्टिकोण शामिल था, लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पाया कि इसका लगातार पालन नहीं किया गया है।
  • न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) को कार्यपालिका या विधायिका के हस्तक्षेप से बचाने के लिए प्रशासनिक निर्णयों को अक्सर बाहरी और आंतरिक समीक्षा से परे माना जाता है।
  • न्यायाधीशों की पदोन्नति और अगले स्तर पर पदोन्नति के लिए कोई परिभाषित, संहिताबद्ध और अधिसूचित मापदंड नहीं हैं, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं।
  • न्यायालय ने न्यायिक चरित्र को भ्रष्ट करने वाले प्रभावों, जैसे वंशवादी विशेषाधिकार, भाई-भतीजावाद (Nepotism), जातिवाद और सामंती संरक्षण को दूर करने की आवश्यकता पर भी बल दिया है.

न्यायिक प्रशासन और जवाबदेही

  • न्यायिक प्रशासन से तात्पर्य न्यायालयों के कुशल और प्रभावी कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं और प्रणालियों से है। इसमें मामलों का आवंटन, रोस्टर का निर्धारण, न्यायाधीशों की पदोन्नति और न्यायालय के संसाधनों का प्रबंधन शामिल है।
  • भारत में, उच्च न्यायालयों का प्रशासन मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रणाली पर आधारित है, जहाँ मुख्य न्यायाधीश के पास व्यापक प्रशासनिक शक्तियाँ होती हैं।
  • न्यायिक जवाबदेही (Judicial Accountability) का अर्थ है कि न्यायाधीशों को अपने न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। यह न्यायिक स्वतंत्रता के साथ संतुलन स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
  • न्यायिक स्वतंत्रता न्यायपालिका को कार्यपालिका और विधायिका के अनुचित प्रभाव से मुक्त रखने के लिए आवश्यक है, ताकि न्यायाधीश बिना किसी भय या पक्षपात के निर्णय दे सकें।
  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियम, 1952 के लगातार पालन न होने पर चिंता व्यक्त की है, जो प्रशासनिक निर्णयों को नियंत्रित करते हैं।
  • न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि प्रशासनिक निर्णयों की स्वतंत्र लेखा परीक्षा (Independent Audit) का अभाव जवाबदेही तय करने में बाधा डालता है, खासकर पक्षपात या अन्य बाहरी विचारों के मामलों में।
  • न्यायालय ने ‘न्यायिक चरित्र’ की अवधारणा पर जोर दिया, जिसमें वंशवादी विशेषाधिकार, भाई-भतीजावाद और जातिवाद जैसे प्रभावों को दूर करना शामिल है, जो न्यायिक अखंडता को कमजोर कर सकते हैं।
  • न्यायालय ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न को उठाया है कि जब न्यायाधीश प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करते हैं और उन पर मनमानी या भेदभावपूर्ण कार्य करने का आरोप लगता है, तो ‘न्यायाधीश का न्याय कौन करेगा’।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
मामलों का अत्यधिक लंबित होना न्याय प्रणाली की दक्षता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, जिससे नागरिकों का विश्वास कम होता है।
मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रणाली की आलोचना यह प्रणाली में अधिक सहयोगात्मक (collaborative), सहभागी (participative) और परामर्शदात्री (consultative) दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देती है।
न्यायिक चरित्र पर प्रभाव भाई-भतीजावाद (nepotism), जातिवाद (casteism) और सामंती संरक्षण (feudal patronage) जैसे प्रभावों को न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता के लिए खतरा बताया गया है।
प्रशासनिक जवाबदेही का अभाव न्यायाधीशों द्वारा प्रशासनिक शक्तियों के मनमाने उपयोग और उसकी समीक्षा की कमी को उजागर करता है।
कार्य आवंटन में पारदर्शिता की कमी मामलों के आवंटन में प्रदर्शन से जुड़ाव न होना और पदोन्नति के लिए परिभाषित मापदंडों का अभाव।

महत्व

शासन और न्यायपालिका

  • यह न्यायपालिका की आंतरिक कार्यप्रणाली, विशेषकर उच्च न्यायालयों के प्रशासन में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
  • न्यायिक जवाबदेही (judicial accountability) और पारदर्शिता (transparency) सुनिश्चित करने के महत्व पर प्रकाश डालता है, जो सुशासन (good governance) का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

सामाजिक न्याय

  • न्यायिक चरित्र को प्रभावित करने वाले जातिवाद और भाई-भतीजावाद जैसे कारकों का उल्लेख सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के लिए एक चुनौती प्रस्तुत करता है।
  • यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर देता है कि न्याय प्रणाली सभी नागरिकों के लिए समान रूप से सुलभ और निष्पक्ष हो, चाहे उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो।

संवैधानिक मूल्य

  • न्याय में देरी और प्रशासनिक कमियां संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत त्वरित न्याय के अधिकार का उल्लंघन करती हैं।
  • यह न्यायिक स्वतंत्रता (judicial independence) और न्यायिक जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता को दर्शाता है, दोनों ही संवैधानिक लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं।

चुनौतियाँ

1. न्यायिक मामलों का अत्यधिक लंबित होना

  • लाखों मामले दशकों से लंबित हैं, जिससे न्याय मिलने में अत्यधिक देरी होती है।
  • यह नागरिकों के त्वरित न्याय के अधिकार का उल्लंघन करता है और न्यायपालिका में विश्वास को कम करता है।

2. न्यायिक प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव

  • मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रणाली में परामर्श और भागीदारी की कमी।
  • मामलों के आवंटन, पदोन्नति और अन्य प्रशासनिक निर्णयों में स्पष्ट मापदंडों का अभाव।

3. न्यायिक चरित्र पर बाहरी प्रभाव

  • भाई-भतीजावाद, जातिवाद और सामंती संरक्षण जैसे कारक न्यायिक निष्पक्षता को कमजोर कर सकते हैं।
  • यह न्यायपालिका की विश्वसनीयता और उसकी सार्वभौमिक पहुंच को प्रभावित करता है।

4. न्यायाधीशों की प्रशासनिक शक्तियों की समीक्षा का अभाव

  • रोस्टर आवंटन और समिति के कामकाज जैसी प्रशासनिक शक्तियों की आंतरिक या बाहरी समीक्षा का अभाव।
  • यह मनमानी या पक्षपात की संभावना को बढ़ाता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
मामलों का अत्यधिक लंबित होना न्याय में देरी, नागरिकों के विश्वास में कमी, त्वरित न्याय के अधिकार का उल्लंघन।
मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रणाली निर्णय लेने में भागीदारी और परामर्श की कमी, संस्थागत संतुलन का अभाव।
न्यायिक चरित्र पर प्रभाव भाई-भतीजावाद, जातिवाद और पक्षपात से न्यायिक निष्पक्षता और विश्वसनीयता का क्षरण।
प्रशासनिक जवाबदेही का अभाव न्यायाधीशों द्वारा प्रशासनिक शक्तियों के मनमाने उपयोग की संभावना, समीक्षा तंत्र की कमी।
कार्य आवंटन और पदोन्नति प्रदर्शन से जुड़ाव न होना, परिभाषित और अधिसूचित मापदंडों का अभाव, पारदर्शिता की कमी।

आगे की राह

  • न्यायिक प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण और आधुनिकीकरण करके मामलों के निपटान में तेजी लाना।
  • उच्च न्यायालयों के प्रशासन में अधिक सहयोगात्मक, सहभागी और परामर्शदात्री दृष्टिकोण अपनाना।
  • मामलों के आवंटन, पदोन्नति और अन्य प्रशासनिक निर्णयों के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और अधिसूचित मापदंड स्थापित करना।
  • न्यायाधीशों की प्रशासनिक शक्तियों की आंतरिक और बाहरी समीक्षा के लिए एक तंत्र विकसित करना, ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
  • न्यायिक अधिकारियों के लिए निरंतर प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित करना।
  • न्यायिक रिक्तियों को समय पर भरना और न्यायिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना।
  • न्यायिक चरित्र को प्रभावित करने वाले बाहरी प्रभावों, जैसे भाई-भतीजावाद और जातिवाद, को समाप्त करने के लिए मजबूत संस्थागत उपाय करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘त्वरित न्याय का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 214’, ‘note’: ‘राज्यों के लिए उच्च न्यायालय’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 235’, ‘note’: ‘अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण’}

अवधारणा प्रवाह

मामलों का अत्यधिक लंबित होना  →  न्याय में देरी और नागरिकों का असंतोष  →  न्यायिक प्रशासन में कमियां उजागर  →  मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रणाली पर प्रश्न  →  न्यायिक जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग  →  न्यायपालिका में सुधार की आवश्यकता

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।
2. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है।
3. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास अपने न्यायालय में मामलों के आवंटन का प्रशासनिक अधिकार होता है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और किसी अन्य उद्देश्य के लिए रिट जारी करने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति अनुच्छेद 217 के तहत राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल और मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से की जाती है। कथन 3 सही है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास अपने न्यायालय के प्रशासनिक प्रमुख के रूप में मामलों के आवंटन का अधिकार होता है, जिसे ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ शक्ति के रूप में जाना जाता है।

Q2. अभिकथन (A): न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारत के संविधान की एक मूल विशेषता है।
कारण (R): न्यायिक स्वतंत्रता कार्यपालिका और विधायिका के हस्तक्षेप से न्यायपालिका को मुक्त रखने के लिए आवश्यक है ताकि वह निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से कार्य कर सके।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि न्यायिक स्वतंत्रता भारतीय संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है, जैसा कि विभिन्न सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में स्थापित किया गया है। कारण (R) भी सही है और यह A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि न्यायिक स्वतंत्रता का मुख्य उद्देश्य न्यायपालिका को बाहरी दबावों से बचाना है ताकि वह बिना किसी डर या पक्षपात के न्याय प्रदान कर सके।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ न्यायिक विलंब भारत में न्याय वितरण प्रणाली के समक्ष एक गंभीर चुनौती है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में की गई टिप्पणियों के संदर्भ में, न्यायिक प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रणाली में सुधार के संभावित उपायों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय: न्यायिक विलंब की समस्या और इलाहाबाद उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों का संक्षिप्त उल्लेख।
मुख्य भाग:
1. न्यायिक विलंब के कारण: मामलों का भारी बोझ, न्यायाधीशों की कमी, बुनियादी ढांचे का अभाव, प्रक्रियात्मक जटिलताएँ।
2. मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रणाली की चुनौतियाँ: मामलों के आवंटन में पारदर्शिता की कमी, प्रशासनिक निर्णयों की समीक्षा का अभाव, भाई-भतीजावाद और जातिवाद जैसे प्रभावों की संभावना।
3. न्यायिक जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए सुधार के उपाय:
क. मामलों के आवंटन के लिए स्पष्ट और संहिताबद्ध मानदंड (जैसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियम, 1952 का पालन)।
ख. प्रशासनिक निर्णयों की स्वतंत्र लेखापरीक्षा (Independent Audit) की व्यवस्था।
ग. न्यायाधीशों के बीच सहयोगात्मक, सहभागी और परामर्शदात्री दृष्टिकोण को बढ़ावा देना।
घ. पदोन्नति और पदोन्नति के लिए परिभाषित और अधिसूचित मापदंड।
ङ. न्यायिक प्रदर्शन मूल्यांकन प्रणाली।
च. न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता और योग्यता पर जोर।
छ. न्यायिक शिकायत निवारण तंत्र।
4. न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन: यह सुनिश्चित करना कि सुधार न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर न करें।
निष्कर्ष: न्याय वितरण प्रणाली की दक्षता और जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए इन सुधारों के महत्व पर बल।

स्रोत: The Indian Express

Uttar Pradesh PCS (UPPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा ‘तारीख पे तारीख’ की स्थिति को लेकर उठाई गई चिंताओं के संदर्भ में, उत्तर प्रदेश में न्यायिक प्रणाली में विलंब के प्रमुख कारणों में निम्नलिखित में से कौन सा कारक शामिल नहीं है?

  1. अदालतों में न्यायाधीशों की कमी
  2. वादी-पक्षकारों द्वारा बार-बार तारीख मांगना
  3. डिजिटल न्यायालय प्रणाली का पूर्णतः कार्यान्वयन
  4. अपराधियों द्वारा न्यायिक प्रक्रिया का जानबूझकर विलंब करना

उत्तर: डिजिटल न्यायालय प्रणाली का पूर्णतः कार्यान्वयन — डिजिटल न्यायालय प्रणाली उत्तर प्रदेश में न्यायिक विलंब का कारण नहीं है, बल्कि इसे विलंब कम करने के उपाय के रूप में देखा जाता है।

Mains: उत्तर प्रदेश में न्यायिक विलंब की समस्या को दूर करने हेतु राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का मूल्यांकन कीजिए। साथ ही, न्यायिक प्रणाली में पारदर्शिता एवं दक्षता बढ़ाने के लिए सुझाव प्रस्तुत कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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