02 Nov आदिवासी छात्रों की शिक्षा: पहुँच और उपलब्धि के बीच की खाई पाटना
✎ पहुँच (Access) नामांकन और भवनों से मापी जाती है, पर उपलब्धि (Achievement) तभी संभव है जब छात्र की सक्रिय सहभागिता और सामाजिक समर्थन सुनिश्चित हो।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र I — भारतीय समाज (अनुसूचित जनजातियों की सामाजिक संरचना और शैक्षिक स्थिति) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन एवं सामाजिक न्याय (अनुसूचित जनजातियों हेतु संवैधानिक प्रावधान, शिक्षा क्षेत्र की नीतियाँ और राज्य स्तरीय कल्याण पहल)
- Prelims: अनुच्छेद 46 (राज्य-नीति का निदेशक तत्व), अनुच्छेद 342 (अनुसूचित जनजातियों की सूची), अनुच्छेद 21क (निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार), अनुच्छेद 275(1) (राज्यों को अनुदान), पाँचवीं अनुसूची (अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन), जनजातीय उप-योजना (Tribal Sub-Plan), एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय (Eklavya Model Residential Schools), शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (Right to Education Act, 2009)
- Essay: पहुँच पर्याप्त नहीं, सहभागिता और सार्थक अधिगम ही शिक्षा की वास्तविक कसौटी है, शैक्षिक समावेशन में सामाजिक पूँजी और विद्यालय की संस्थागत संस्कृति की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: पहुँच (Access) नामांकन और भवनों से मापी जाती है, पर उपलब्धि (Achievement) तभी संभव है जब छात्र की सक्रिय सहभागिता और सामाजिक समर्थन सुनिश्चित हो।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल (Keralam) सरकार की सामूहिक अध्ययन केंद्र (Community Study Centres) पहल पर द हिंदू में प्रकाशित एक विश्लेषणात्मक लेख ने यह प्रश्न उठाया है कि जनजातीय छात्रों की शिक्षा में केवल नामांकन, भवन और पास प्रतिशत जैसे संकेतकों से वास्तविक प्रगति का आकलन पर्याप्त नहीं है। लेख के अनुसार यह पहल 2018 में आरंभ हुई और इसका उद्देश्य जनजातीय बच्चों की अधिगम-आवश्यकताओं को पूरा करना है। कासरगोड की एक जनजातीय बस्ती में इसके भौतिक घटक कंप्यूटर, अध्ययन सामग्री, विद्यालय समय के बाद खुला कक्ष और प्रति छात्र प्रतिदिन 20 रुपये का हल्का नाश्ता हैं। लेख का मुख्य तर्क यह है कि असली चुनौती यह जानना है कि असफल होने के बाद छात्र सहायता माँगने का आत्मविश्वास रखता है या नहीं, और यह संकेतक किसी सूची में दर्ज नहीं होता।
पृष्ठभूमि
- भारत में अनुसूचित जनजातियाँ अनेक सामाजिक-आर्थिक सूचकों, विशेषकर साक्षरता और उच्च शिक्षा में भागीदारी, में सामान्य जनसंख्या से अब भी पीछे हैं, जिसके कारण इन्हें शिक्षा में विशेष ध्यान देने की संवैधानिक और नीतिगत आवश्यकता बनी रहती है।
- 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा अनुच्छेद 21क जोड़ा गया, जिससे छह से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा मौलिक अधिकार बनी। इसे लागू करने के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 बनाया गया।
- अनुच्छेद 46 राज्य को अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की विशेष उन्नति का निर्देश देता है, जबकि अनुच्छेद 275(1) के अंतर्गत केंद्र राज्यों को जनजातीय कल्याण हेतु सहायता अनुदान देता है।
- केरल में सामूहिक अध्ययन केंद्र अनुसूचित जनजाति विकास विभाग के अंतर्गत चलते हैं, जो इस बात का उदाहरण है कि राज्य स्तर पर विशिष्ट सामाजिक समूहों के लिए सहायक ढाँचे कैसे विकसित किए जाते हैं।
- नीति-निर्माण में प्रायः नामांकन, विद्यालय भवनों और परीक्षा परिणामों जैसे इनपुट और आउटपुट संकेतकों पर बल रहता है, जबकि छात्रों की सहभागिता और विद्यालय से उनके संबंध जैसे प्रक्रियात्मक पहलू अपेक्षाकृत कम मापे जाते हैं।
सामूहिक अध्ययन केंद्र क्या है?
- सामूहिक अध्ययन केंद्र (Community Study Centres) केरल सरकार की एक पहल है, जो 2018 में जनजातीय बच्चों के अधिगम संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आरंभ हुई।
- इसका संचालन अनुसूचित जनजाति विकास विभाग द्वारा किया जाता है और ये केंद्र जनजातीय बस्तियों के निकट स्थापित किए जाते हैं।
- केंद्रों में कंप्यूटर, अध्ययन सामग्री और ऐसा कक्ष होता है जो विद्यालय समय के बाद भी खुला रहता है, ताकि छात्र घर की सीमित सुविधाओं से बाहर पढ़ाई कर सकें।
- इस मॉडल का मूल सिद्धांत यह है कि शिक्षा की सफलता केवल संसाधनों की उपलब्धता से नहीं, बल्कि छात्र के आत्मविश्वास और सहभागिता से तय होती है।
- लेख के अनुसार असफलता के बाद पुनः प्रयास करना और शिक्षक या संस्था से सहायता माँगना व्यक्तिगत इच्छाशक्ति भर नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों के माध्यम से बनने वाला व्यवहार है।
- लेख यह भी इंगित करता है कि वर्तमान शैक्षिक व्यवस्था प्रतिस्पर्धी व्यक्तिवाद पर आधारित है, जो सामूहिक सांस्कृतिक मूल्यों वाले समुदायों के छात्रों के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है।
- नीतिगत दृष्टि से इसका निहितार्थ यह है कि नामांकन और पास प्रतिशत के साथ सहभागिता और प्रतिधारण (Retention) जैसे प्रक्रिया-संकेतकों को भी मूल्यांकन में शामिल किया जाए।
- यह पहल राज्य स्तरीय सहायक ढाँचे का उदाहरण है, जो एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय जैसी केंद्रीय योजनाओं और अन्य स्थानीय उपायों के साथ पूरक भूमिका निभा सकती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| सामुदायिक अध्ययन केंद्र (Community Study Centres) | केरल सरकार की वह पहल जो 2018 से अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) के बच्चों की अध्ययन संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए चलाई जा रही है |
| भौतिक सुविधाएँ | कंप्यूटर, शिक्षण सामग्री और विद्यालय के समय के बाद भी खुला रहने वाला कक्ष, जिससे पहुँच की व्यावहारिक बाधाएँ कम होती हैं |
| सहभागिता पर बल | केवल नामांकन और भौतिक ढाँचे के बजाय सीखने की प्रक्रिया में छात्र की सक्रिय भागीदारी को केंद्र में रखना |
| अनौपचारिक सहायता-तंत्र | विफलता के बाद भी छात्र को शिक्षक या मार्गदर्शक से सहायता माँगने का आत्मविश्वास देने वाला सामाजिक परिवेश |
| प्रति छात्र व्यय | हल्के जलपान पर प्रति छात्र प्रतिदिन ₹20 का व्यय, जो उपस्थिति और निरंतर जुड़ाव बढ़ाने का एक व्यावहारिक साधन है |
महत्व
सामाजिक न्याय
- अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए शिक्षा को केवल सुलभ बनाना पर्याप्त नहीं, उसे उपलब्धि तक पहुँचाना भी आवश्यक है; यही सामाजिक न्याय का वास्तविक मापदंड है
- सहायता-केंद्र छात्र को विफलता के बाद भी लौटने और प्रश्न पूछने का साहस देकर शिक्षा में बने रहने की संभावना बढ़ाते हैं
शैक्षिक नीति
- नीति-निर्माण में नामांकन, भवन-क्षेत्र, उपकरण और उत्तीर्णता प्रतिशत जैसे मापदंड प्रमुख रहे हैं; सहभागिता को भी इसमें शामिल करना आवश्यक है
- सीखने के परिणामों को मापने के लिए केवल परीक्षा-परिणाम के बजाय छात्र के जुड़ाव और आत्मविश्वास जैसे गुणात्मक संकेतकों पर विचार किया जा सकता है
प्रशासनिक
- विद्यालय-आधारित व्यवस्था के साथ समुदाय-स्तरीय संस्थाएँ जोड़ने से सेवा-वितरण का दायरा विस्तृत होता है
- जनजातीय विभाग द्वारा संचालित केंद्र यह दिखाते हैं कि विभिन्न विभागों के बीच समन्वित कार्यान्वयन से परिणाम सुधर सकते हैं
चुनौतियाँ
1. पहुँच और सहभागिता का अंतर
- नामांकन हो जाने के बाद भी छात्र शिक्षण-सामग्री और अवसरों का उपयोग करने में सक्षम न हो, तो पहुँच उपलब्धि में नहीं बदलती
- नीतियाँ प्रायः पहुँच को ही मापती हैं, इसलिए सहभागिता की कमी प्रशासनिक आँकड़ों में दिखाई नहीं देती
यूपीएससी लिंक: शिक्षा का अधिकार; सामाजिक न्याय हेतु शिक्षा नीति
2. प्रतिस्पर्धी व्यक्तिवाद का दबाव
- वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा को पुरस्कृत करती है, जबकि सामुदायिक सहयोग पर आधारित सीखने की संस्कृति कम विकसित है
- इससे वे छात्र पीछे छूट जाते हैं जिनके परिवेश में अकेले प्रयास करने के बजाय सामूहिक सहायता अधिक उपयोगी होती है
यूपीएससी लिंक: शिक्षा में सामाजिक संरचना और समावेशन
3. सामाजिक संबंधों पर निर्भरता
- विफलता के बाद आगे बढ़ने की इच्छा केवल व्यक्तिगत इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों से निर्मित होती है
- जहाँ विद्यालय और शिक्षक का व्यवहार दूरी या उपेक्षा का हो, वहाँ छात्र सहायता माँगने से पीछे हट जाते हैं
यूपीएससी लिंक: अनुसूचित जनजातियों की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति
4. मूल्यांकन-आधारित मापन की सीमा
- उत्तीर्णता प्रतिशत और नामांकन-आँकड़े आवश्यक हैं, परंतु वे छात्र के सीखने की गुणवत्ता और आत्मविश्वास को पूरी तरह नहीं दर्शाते
- केवल परिणाम-केंद्रित मूल्यांकन से वे उपाय छूट जाते हैं जो सहभागिता बढ़ाते हैं
यूपीएससी लिंक: शासन में निष्पादन-मूल्यांकन और प्रशासनिक सुधार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| नामांकन बनाम सहभागिता | नामांकन बढ़ने के बावजूद सीखने में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित न होना |
| असफलता के बाद का व्यवहार | विफल छात्र को सहायता माँगने पर प्रोत्साहन मिलेगा या दूरी, यह अनदेखा रह जाना |
| प्रतिस्पर्धी संरचना | व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा पर आधारित मूल्यांकन-प्रणाली में सामूहिक सहायता का स्थान सीमित होना |
| मापदंडों की सीमा | भवन, उपकरण और उत्तीर्णता प्रतिशत जैसे संकेतकों पर अधिक निर्भरता, गुणात्मक परिणामों की उपेक्षा |
| स्थायित्व | सामुदायिक केंद्रों को निरंतर संसाधन, प्रशिक्षित सहायक और स्थानीय सहभागिता की आवश्यकता |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- सामुदायिक अध्ययन केंद्र (Community Study Centres), केरल: अनुसूचित जनजाति विकास विभाग द्वारा संचालित, जो अनुसूचित जनजाति के छात्रों की अध्ययन-आवश्यकताओं के लिए 2018 से चल रहा है
आगे की राह
- नीति-मापदंडों में नामांकन और उत्तीर्णता प्रतिशत के साथ छात्र-सहभागिता और आत्मविश्वास जैसे गुणात्मक संकेतक जोड़े जाएँ
- विद्यालय के शिक्षकों को विफल छात्रों से संवाद का ऐसा तरीका अपनाने का प्रशिक्षण दिया जाए जो दूरी के बजाय सहायता का भाव बढ़ाए
- सामुदायिक अध्ययन केंद्रों को विद्यालय के पाठ्यक्रम और परीक्षा-पद्धति से समन्वित किया जाए, ताकि वे केवल पूरक न रहकर सीखने का अभिन्न भाग बनें
- केंद्रों के संचालन में स्थानीय समुदाय और अभिभावकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, जिससे उनका स्वामित्व और स्थायित्व बढ़े
- सहयोगी अधिगम (Collaborative Learning) की पद्धतियों को विद्यालय स्तर पर अपनाया जाए, ताकि प्रतिस्पर्धी व्यक्तिवाद के दबाव में कमी आए
- विभिन्न विभागों, जैसे शिक्षा और अनुसूचित जनजाति विकास विभाग, के बीच नियमित समन्वय और साझा निगरानी व्यवस्था बनाई जाए
- सफल केंद्रों के अनुभवों का दस्तावेजीकरण कर उन्हें अन्य क्षेत्रों के लिए मानक मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत किया जाए
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जनजातीय शिक्षा · शैक्षिक समावेशन · पहुंच और उपलब्धि · सामुदायिक अध्ययन केंद्र · शिक्षा का अधिकार · समावेशी शिक्षा · सामाजिक-सांस्कृतिक कारक · राष्ट्रीय शिक्षा नीति · वंचित समूह · मानव संसाधन विकास
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21क (Article 21A): शिक्षा का मौलिक अधिकार, पहुँच का संवैधानिक आधार
- अनुच्छेद 46 (Article 46): अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक हितों का संवर्धन
- अनुच्छेद 15(4) (Article 15(4)): अनुसूचित जनजातियों हेतु विशेष उपबंध की शक्ति
अवधारणा प्रवाह
शिक्षा तक पहुँच: विद्यालय नामांकन, भवन और मूलभूत संसाधनों की उपलब्धता → सहभागिता की कमी: नामांकित छात्र भी संसाधनों का उपयोग करने में सक्षम नहीं हो पाता → असफलता और दूरी: परीक्षा में विफलता के बाद सहायता माँगने का आत्मविश्वास घट जाता है → सामाजिक संबंधों की भूमिका: सहायक परिवेश से छात्र में आगे बढ़ने की इच्छा और सहभागिता जागती है → सामुदायिक अध्ययन केंद्र: खुला, सुसज्जित और सहायक स्थान सहभागिता को व्यवहार में बदलता है → उपलब्धि में रूपांतरण: निरंतर सहभागिता से सीखने के परिणाम और शैक्षिक उपलब्धि में सुधार होता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 46 राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने का निर्देश देता है।
2. शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009, 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है।
3. केरल सरकार द्वारा शुरू किए गए ‘सामुदायिक अध्ययन केंद्र’ (Community Study Centres) का उद्देश्य जनजातीय छात्रों की सीखने की आवश्यकताओं का समर्थन करना है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 46 राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों का हिस्सा है और यह अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की विशेष सावधानी से देखभाल करने का निर्देश देता है। कथन 2 सही है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act), 2009, 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है। कथन 3 सही है। केरल सरकार ने 2018 में जनजातीय समुदायों के बच्चों की सीखने की जरूरतों को पूरा करने के लिए सामुदायिक अध्ययन केंद्र (Samoohya Patana Muri) नामक पहल शुरू की थी।
Q2. अभिकथन (A): जनजातीय छात्रों के लिए केवल शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करना उनकी शैक्षिक उपलब्धि की गारंटी नहीं देता है।
कारण (R): शैक्षिक नीतियों को अक्सर नामांकन और बुनियादी ढांचे जैसे मात्रात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, न कि सीखने की प्रक्रिया में छात्रों की सक्रिय भागीदारी पर।
- A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि लेख में इस बात पर जोर दिया गया है कि केवल पहुंच से उपलब्धि सुनिश्चित नहीं होती है, जब तक कि छात्रों की सक्रिय भागीदारी न हो। कारण (R) भी सही है क्योंकि नीतियां अक्सर नामांकन और बुनियादी ढांचे जैसे ‘इन्वेंट्री’ पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जैसा कि लेख में बताया गया है, और यह सक्रिय भागीदारी की कमी के लिए एक कारण है। इसलिए, R, A का सही स्पष्टीकरण है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ जनजातीय छात्रों के लिए शिक्षा तक पहुंच और शैक्षिक उपलब्धि के बीच के अंतर को पाटने में सामुदायिक अध्ययन केंद्रों जैसी पहलों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 जनजातीय शिक्षा के समक्ष चुनौतियों का समाधान कैसे करती है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** जनजातीय शिक्षा के महत्व और पहुंच बनाम उपलब्धि के बीच के अंतर को संक्षेप में बताएं।
2. **सामुदायिक अध्ययन केंद्रों की भूमिका:**
* केरल के ‘सामुदायिक अध्ययन केंद्र’ (Samoohya Patana Muri) का उदाहरण देते हुए उनकी कार्यप्रणाली (कंप्यूटर, शिक्षण सामग्री, परामर्श, सहायता) का उल्लेख करें।
* ये केंद्र कैसे सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं को दूर करते हैं, आत्मविश्वास बढ़ाते हैं, और सीखने में निरंतरता सुनिश्चित करते हैं, इस पर प्रकाश डालें।
* इनकी सीमाओं पर भी चर्चा करें (जैसे व्यक्तिगत ध्यान की आवश्यकता, व्यापक कवरेज की चुनौती)।
3. **राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और जनजातीय शिक्षा:**
* NEP 2020 के उन प्रावधानों का उल्लेख करें जो जनजातीय शिक्षा से संबंधित हैं, जैसे: बहुभाषी शिक्षा पर जोर, स्थानीय भाषाओं में शिक्षण सामग्री, विशेष शिक्षा क्षेत्र (Special Education Zones) का निर्माण, आवासीय विद्यालयों (जैसे एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय) का विस्तार, सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों (SEDGs) के लिए लक्षित हस्तक्षेप।
* NEP 2020 कैसे पहुंच के साथ-साथ गुणवत्ता और समावेशिता पर भी ध्यान केंद्रित करती है, इसे स्पष्ट करें।
4. **चुनौतियां और आगे का मार्ग:**
* जनजातीय शिक्षा में शेष चुनौतियों (जैसे शिक्षकों की कमी, बुनियादी ढांचे का अभाव, सांस्कृतिक संवेदनशीलता की कमी) को संक्षिप्त में बताएं।
* इन पहलों को और प्रभावी बनाने के लिए नीतिगत सुझाव दें (जैसे सामुदायिक भागीदारी बढ़ाना, शिक्षकों का प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता)।
5. **निष्कर्ष:** एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें जो जनजातीय छात्रों के लिए समावेशी और न्यायसंगत शिक्षा सुनिश्चित करने हेतु समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दे।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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