07 Oct संयुक्त राष्ट्र में भारत ने ओआईसी के बयान पर दिया करारा जवाब: आतंकवादियों से पीड़ित और अपराधी में अंतर नहीं
✎ भारत ने संयुक्त राष्ट्र में OIC की जम्मू और कश्मीर पर की गई टिप्पणियों को खारिज करते हुए सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ अपनी कार्रवाई का बचाव किया और OIC को 'पीड़ित और अपराधी के बीच अंतर करने में असमर्थ' बताया।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा
- Prelims: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA), आतंकवाद-रोधी उपाय, जम्मू और कश्मीर, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK), इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC), सीमा पार आतंकवाद
- Essay: अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका, आतंकवाद का वैश्विक परिदृश्य और भारत की चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत ने संयुक्त राष्ट्र में OIC की जम्मू और कश्मीर पर की गई टिप्पणियों को खारिज करते हुए सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ अपनी कार्रवाई का बचाव किया और OIC को ‘पीड़ित और अपराधी के बीच अंतर करने में असमर्थ’ बताया।
यह खबर चर्चा में क्यों?
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की छठी समिति में ‘अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद को खत्म करने के उपायों’ पर चर्चा के दौरान, भारत ने इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) द्वारा जम्मू और कश्मीर तथा पाकिस्तान में आतंकवादी ढाँचे के खिलाफ भारत की कार्रवाई पर की गई टिप्पणियों को दृढ़ता से खारिज कर दिया। भारत ने OIC पर ‘पीड़ित और अपराधी के बीच अंतर करने में असमर्थ’ होने का आरोप लगाया।
पृष्ठभूमि
- OIC ने अपने बयान में जम्मू और कश्मीर का उल्लेख किया था और पाकिस्तान में आतंकवादी ढाँचे के खिलाफ भारत की कार्रवाई को ‘अनुचित हमले’ बताया था।
- भारत ने स्पष्ट किया कि उसकी कार्रवाई पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू और कश्मीर (PoK) से संचालित होने वाले सीमा पार आतंकवाद (Cross-border terrorism) के खिलाफ केंद्रित और मापी गई प्रतिक्रिया थी।
- भारत ने जोर देकर कहा कि उसे अपने लोगों को सीमा पार आतंकवाद से बचाने का अधिकार है, जो दशकों से भारत के लिए एक कड़वी वास्तविकता रही है।
- भारत ने OIC को पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले क्षेत्रों, विशेष रूप से रावलकोट में, जहाँ मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी।
- OIC ने अपने बयान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) के जम्मू और कश्मीर पर प्रस्तावों का भी उल्लेख किया था।
इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) क्या है?
- OIC 57 सदस्य देशों का एक अंतर-सरकारी संगठन (Inter-governmental organization) है, जो मुस्लिम दुनिया की सामूहिक आवाज का प्रतिनिधित्व करता है।
- यह संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के बाद दूसरा सबसे बड़ा अंतर-सरकारी संगठन है।
- इसका उद्देश्य मुस्लिम दुनिया के हितों की रक्षा और सुरक्षा करना तथा अंतर्राष्ट्रीय शांति और सद्भाव को बढ़ावा देना है।
- OIC की स्थापना 1969 में रबात, मोरक्को में हुई थी, जब अल-अक्सा मस्जिद पर आगजनी के बाद मुस्लिम देशों के नेताओं ने एकजुट होने का फैसला किया था।
- इसका मुख्यालय जेद्दा, सऊदी अरब में स्थित है।
- भारत OIC का सदस्य नहीं है, लेकिन 2019 में भारत को OIC विदेश मंत्रियों की परिषद के 46वें सत्र में ‘गेस्ट ऑफ ऑनर’ के रूप में आमंत्रित किया गया था।
- OIC अक्सर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन करता रहा है, जिसे भारत ने लगातार खारिज किया है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| भारत का कड़ा रुख | भारत ने संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद के मुद्दे पर अपनी दृढ़ स्थिति को स्पष्ट किया है, विशेषकर सीमा पार आतंकवाद के संबंध में। |
| OIC की टिप्पणी | इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) ने जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान में आतंकी बुनियादी ढाँचे के खिलाफ भारत की कार्रवाई पर टिप्पणी की, जिसे भारत ने अस्वीकार कर दिया। |
| पीड़ित और अपराधी के बीच अंतर | भारत ने OIC पर आरोप लगाया कि वह ‘पीड़ित और अपराधी के बीच अंतर करने में असमर्थ’ है, जिससे आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भ्रम पैदा होता है। |
| आतंकवादी बुनियादी ढाँचे पर कार्रवाई | भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoK) में आतंकवादी बुनियादी ढाँचे के खिलाफ अपनी ‘केंद्रित और मापी गई’ कार्रवाई को उचित ठहराया। |
| जम्मू-कश्मीर पर भारत की संप्रभुता | भारत ने जम्मू-कश्मीर को अपना अभिन्न अंग बताते हुए OIC के ‘अनुचित संदर्भ’ को खारिज किया और अपनी संप्रभुता पर जोर दिया। |
महत्व
अंतर्राष्ट्रीय संबंध और कूटनीति
- यह घटना संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारत की सक्रिय कूटनीति और आतंकवाद के मुद्दे पर उसके दृढ़ रुख को दर्शाती है।
- यह भारत के लिए वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति को स्पष्ट करने और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का समर्थन जुटाने का अवसर प्रदान करती है।
- OIC की टिप्पणी को खारिज करना भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा
- यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को उजागर करता है, विशेषकर सीमा पार आतंकवाद और पाकिस्तान से उत्पन्न होने वाले खतरों के संबंध में।
- यह भारत के लोगों की रक्षा के अधिकार को दोहराता है और आतंकवाद में लिप्त होने के परिणामों के बारे में चेतावनी देता है।
क्षेत्रीय स्थिरता
- यह घटना दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आतंकवाद के खतरों को सामने लाती है और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर बल देती है।
- पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में मानवाधिकारों के उल्लंघन और अवैध कब्जे पर भारत का जोर क्षेत्रीय मुद्दों पर उसके दृष्टिकोण को दर्शाता है।
चुनौतियाँ
1. सीमा पार आतंकवाद
- पाकिस्तान से लगातार सीमा पार आतंकवाद भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है।
- आतंकवादी समूहों द्वारा हमलों की योजना बनाना और उन्हें अंजाम देना भारत के लिए एक स्थायी खतरा है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद
2. अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर गलत जानकारी का मुकाबला
- OIC जैसे संगठनों द्वारा जम्मू-कश्मीर पर गलत या भ्रामक बयानबाजी का मुकाबला करना भारत के लिए एक कूटनीतिक चुनौती है।
- आतंकवाद के मुद्दे पर ‘पीड़ित और अपराधी’ के बीच अंतर करने में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के कुछ हिस्सों की विफलता एक चिंता का विषय है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, कूटनीति
3. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में मानवाधिकार
- PoK में मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन और लोगों को बुनियादी अधिकारों से वंचित करना एक मानवीय और राजनीतिक चुनौती है।
- इस क्षेत्र में अवैध कब्जे और हिंसा के मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाना भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, मानवाधिकार
4. आतंकवाद के वित्तपोषण का मुकाबला
- आतंकवादी बुनियादी ढाँचे को नष्ट करने और आतंकवाद के वित्तपोषण के स्रोतों को बाधित करने के लिए निरंतर प्रयास की आवश्यकता है।
- यह सुनिश्चित करना कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ प्रभावी ढंग से कार्य करे, एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद का वित्तपोषण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| सीमा पार आतंकवाद | पाकिस्तान से लगातार आतंकवादी हमले और घुसपैठ भारत की सुरक्षा के लिए खतरा। |
| अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर गलत जानकारी | जम्मू-कश्मीर पर OIC जैसे संगठनों द्वारा भ्रामक बयानबाजी का मुकाबला करना। |
| पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में मानवाधिकार | PoK में मानवाधिकारों के उल्लंघन और लोगों को बुनियादी अधिकारों से वंचित करना। |
| आतंकवाद का वित्तपोषण | आतंकवादी बुनियादी ढाँचे को नष्ट करने और उनके वित्तपोषण के स्रोतों को बाधित करने की चुनौती। |
| वैश्विक आतंकवाद विरोधी सहयोग की कमी | कुछ देशों द्वारा आतंकवाद के मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाने में विफलता। |
आगे की राह
- आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत और एकीकृत वैश्विक प्रतिक्रिया के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना।
- संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों पर आतंकवाद के मुद्दे पर भारत की स्थिति को लगातार और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना।
- सीमा पार आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए खुफिया जानकारी साझा करने और सुरक्षा सहयोग को बढ़ाना।
- पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में मानवाधिकारों के उल्लंघन और अवैध कब्जे के मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाना जारी रखना।
- आतंकवाद के वित्तपोषण और आतंकवादी विचारधारा के प्रसार का मुकाबला करने के लिए ठोस उपाय करना।
- आतंकवाद के ‘पीड़ित और अपराधी’ के बीच स्पष्ट अंतर करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को शिक्षित करना और संवेदनशील बनाना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद · सीमा पार आतंकवाद · संयुक्त राष्ट्र महासभा · जम्मू और कश्मीर · भारत की संप्रभुता · आतंकवाद का वित्तपोषण · आतंकवाद विरोधी कानून · राष्ट्रीय सुरक्षा · कूटनीतिक प्रतिक्रिया · अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 51’: ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना’}
अवधारणा प्रवाह
OIC ने जम्मू-कश्मीर पर टिप्पणी की → भारत ने OIC की टिप्पणी को खारिज किया → भारत ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी कार्रवाई को उचित ठहराया → भारत ने OIC पर ‘पीड़ित और अपराधी’ में अंतर न करने का आरोप लगाया → भारत ने अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर दिया
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की छठी समिति कानूनी मुद्दों से संबंधित है।
2. भारत ने पाकिस्तान अधिकृत जम्मू और कश्मीर (PoK) में मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा उठाया है।
3. इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) एक अंतर-सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना 1969 में हुई थी।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि UNGA की छठी समिति वास्तव में कानूनी मुद्दों से संबंधित है। कथन 2 सही है क्योंकि भारत ने PoK में मानवाधिकारों के उल्लंघन और अवैध कब्जे का मुद्दा उठाया है। कथन 3 भी सही है क्योंकि OIC की स्थापना 1969 में हुई थी और यह एक अंतर-सरकारी संगठन है।
Q2. अभिकथन (A): भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के जम्मू और कश्मीर पर दिए गए बयानों को ‘पीड़ित और अपराधी के बीच अंतर करने में असमर्थ’ बताया है।
कारण (R): OIC ने भारत द्वारा पाकिस्तान में आतंकवादी बुनियादी ढाँचे के खिलाफ की गई कार्रवाइयों पर टिप्पणी की थी, जिसे भारत सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ अपनी आत्मरक्षा मानता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, जैसा कि समाचार में बताया गया है। कारण (R) भी सही है क्योंकि OIC ने भारत की आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों पर टिप्पणी की थी, जिसे भारत ने सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ अपनी आत्मरक्षा के रूप में देखा। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है क्योंकि OIC की टिप्पणियों के कारण ही भारत ने उन्हें ‘पीड़ित और अपराधी के बीच अंतर करने में असमर्थ’ बताया।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से निपटने में भारत की कूटनीतिक चुनौतियों और रणनीतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारत की स्थिति कितनी प्रभावी रही है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद को परिभाषित करें और भारत पर इसके प्रभाव का संक्षिप्त उल्लेख करें।
2. **कूटनीतिक चुनौतियाँ:**
* सीमा पार आतंकवाद (Cross-border terrorism) से निपटना।
* कुछ देशों द्वारा आतंकवाद को ‘राज्य नीति के उपकरण’ के रूप में उपयोग करना।
* आतंकवाद की परिभाषा पर अंतर्राष्ट्रीय सहमति का अभाव।
* आतंकवाद के वित्तपोषण (Terror financing) और सुरक्षित पनाहगाहों (Safe havens) पर कार्रवाई की कमी।
* कुछ अंतर्राष्ट्रीय संगठनों (जैसे OIC) द्वारा पक्षपातपूर्ण टिप्पणियाँ।
3. **भारत की रणनीतियाँ:**
* द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों पर आतंकवाद के मुद्दे को उठाना।
* ‘नो मनी फॉर टेरर’ (No Money for Terror) जैसे वैश्विक पहलों का समर्थन।
* संयुक्त राष्ट्र में व्यापक अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद अभिसमय (Comprehensive Convention on International Terrorism – CCIT) के लिए दबाव।
* खुफिया जानकारी साझा करना और क्षमता निर्माण।
* आत्मरक्षा के अधिकार का प्रयोग (जैसे सर्जिकल स्ट्राइक)।
4. **संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थिति की प्रभावशीलता:**
* **सफलताएँ:** आतंकवाद विरोधी प्रस्तावों को पारित कराने में भूमिका, वैश्विक आतंकवाद विरोधी ढाँचे को मजबूत करना, आतंकवाद के वित्तपोषण पर ध्यान केंद्रित करना।
* **सीमाएँ:** CCIT को अंतिम रूप देने में विफलता, कुछ देशों द्वारा वीटो शक्ति का दुरुपयोग, मानवाधिकारों के बहाने आतंकवाद को उचित ठहराने के प्रयासों का सामना।
* हाल के उदाहरण (जैसे OIC की टिप्पणी पर भारत की प्रतिक्रिया) का उल्लेख करें।
5. **निष्कर्ष:** भारत की सतत कूटनीतिक प्रयासों की आवश्यकता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के महत्व पर बल दें।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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