07 Oct भारत के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की आर्कटिक सर्कल असेंबली में भागीदारी
✎ आर्कटिक सर्कल असेंबली आर्कटिक क्षेत्र के भविष्य पर चर्चा करने और सहयोग को बढ़ावा देने वाला एक महत्वपूर्ण वैश्विक मंच है, जिसमें भारत की सक्रिय भागीदारी इस क्षेत्र में उसकी बढ़ती रणनीतिक रुचि को दर्शाती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध | GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- Prelims: आर्कटिक सर्कल असेंबली, आर्कटिक परिषद, आर्कटिक क्षेत्र, भारत की आर्कटिक नीति, हिमाद्री अनुसंधान स्टेशन, उत्तरी ध्रुव
- Essay: बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की विदेश नीति की भूमिका, जलवायु परिवर्तन और ध्रुवीय क्षेत्रों का भू-राजनीतिक महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: आर्कटिक सर्कल असेंबली आर्कटिक क्षेत्र के भविष्य पर चर्चा करने और सहयोग को बढ़ावा देने वाला एक महत्वपूर्ण वैश्विक मंच है, जिसमें भारत की सक्रिय भागीदारी इस क्षेत्र में उसकी बढ़ती रणनीतिक रुचि को दर्शाती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
विदेश राज्य मंत्री (के.वी.एस.) ने 8 से 10 अक्टूबर, 2026 तक रेक्जाविक, आइसलैंड में आयोजित आर्कटिक सर्कल असेंबली में भाग लिया। यह भागीदारी आर्कटिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती रुचि और इस महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
पृष्ठभूमि
- आर्कटिक क्षेत्र पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के चारों ओर स्थित है और इसमें आर्कटिक महासागर, कनाडा, ग्रीनलैंड (डेनमार्क), आइसलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीडन, फिनलैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका (अलास्का) के कुछ हिस्से शामिल हैं।
- जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक क्षेत्र में तेजी से बर्फ पिघल रही है, जिससे नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच आसान हो रही है, जिसने इस क्षेत्र के भू-राजनीतिक और आर्थिक महत्व को बढ़ा दिया है।
- भारत ने 2013 में आर्कटिक परिषद (Arctic Council) में पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त किया, जो आर्कटिक राज्यों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने वाला एक उच्च-स्तरीय अंतर-सरकारी मंच है।
- भारत ने 2008 में नॉर्वे के स्वालबार्ड में अपना पहला आर्कटिक अनुसंधान स्टेशन ‘हिमाद्री’ स्थापित किया, जो आर्कटिक जलवायु, समुद्र विज्ञान, जीव विज्ञान और भूविज्ञान पर अनुसंधान करता है।
- भारत ने 2022 में अपनी ‘आर्कटिक नीति’ जारी की, जिसका शीर्षक ‘भारत और आर्कटिक: सतत जुड़ाव के लिए एक रोडमैप’ है, जो आर्कटिक क्षेत्र में भारत के वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरणीय संरक्षण, आर्थिक सहयोग और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के उद्देश्यों को रेखांकित करती है।
- आर्कटिक सर्कल असेंबली आर्कटिक मुद्दों पर चर्चा के लिए एक व्यापक मंच है, जिसमें सरकारों, व्यवसायों, शिक्षाविदों, पर्यावरणविदों और स्वदेशी समुदायों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
आर्कटिक सर्कल असेंबली क्या है?
- आर्कटिक सर्कल असेंबली आर्कटिक क्षेत्र से संबंधित मुद्दों पर चर्चा और सहयोग के लिए दुनिया का सबसे बड़ा वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय जमावड़ा है।
- यह एक खुला मंच है जो आर्कटिक परिषद के बाहर विभिन्न हितधारकों को एक साथ लाता है, जिसमें आर्कटिक और गैर-आर्कटिक देशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
- इसका उद्देश्य आर्कटिक के भविष्य पर चर्चा करने और समाधान विकसित करने के लिए एक मंच प्रदान करना है, जिसमें जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीति, आर्थिक विकास और स्वदेशी लोगों के अधिकार जैसे विषय शामिल हैं।
- असेंबली की स्थापना 2013 में आइसलैंड के पूर्व राष्ट्रपति ओलाफुर रैग्नार ग्रिमसन और आर्कटिक इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष एलिसिया नेल्सन द्वारा की गई थी।
- यह प्रतिवर्ष आइसलैंड की राजधानी रेक्जाविक में आयोजित की जाती है और इसमें दुनिया भर से हजारों प्रतिभागी शामिल होते हैं।
- यह मंच आर्कटिक क्षेत्र में भारत जैसे पर्यवेक्षक देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है ताकि वे अपनी अनुसंधान गतिविधियों, नीतिगत दृष्टिकोणों और सहयोग की संभावनाओं को प्रस्तुत कर सकें।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| आर्कटिक परिषद में भारत की भूमिका | भारत आर्कटिक परिषद (Arctic Council) का एक पर्यवेक्षक देश है, जो आर्कटिक क्षेत्र के शासन और विकास में सक्रिय रूप से भाग लेता है। यह भारत को इस महत्वपूर्ण ध्रुवीय क्षेत्र में अपनी वैज्ञानिक और रणनीतिक उपस्थिति बनाए रखने में सक्षम बनाता है। |
| आर्कटिक क्षेत्र का भू-राजनीतिक महत्व | आर्कटिक क्षेत्र में विशाल प्राकृतिक संसाधन (तेल, गैस, खनिज) और नए शिपिंग मार्ग (उत्तरी समुद्री मार्ग) मौजूद हैं, जो इसे वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघलने से इसकी पहुंच बढ़ रही है। |
| भारत की आर्कटिक नीति | भारत ने ‘इंडियाज आर्कटिक पॉलिसी: नर्चरिंग ए सस्टेनेबल एंड कोलेबोरेटिव फ्यूचर’ शीर्षक से अपनी आर्कटिक नीति जारी की है। यह नीति वैज्ञानिक अनुसंधान, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक और मानव विकास तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर केंद्रित है। |
| वैज्ञानिक अनुसंधान और ध्रुवीय अध्ययन | भारत ने आर्कटिक में ‘हिमाद्री’ नामक एक अनुसंधान स्टेशन स्थापित किया है। यह स्टेशन जलवायु परिवर्तन, समुद्र विज्ञान, ग्लेशियोलॉजी और वायुमंडलीय विज्ञान पर महत्वपूर्ण डेटा एकत्र करता है, जो वैश्विक जलवायु मॉडलिंग के लिए आवश्यक है। |
| ऊर्जा सुरक्षा | आर्कटिक क्षेत्र में अनुमानित रूप से दुनिया के अप्रयुक्त तेल और गैस संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा है। भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को देखते हुए, आर्कटिक में ऊर्जा अन्वेषण और सहयोग भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का एक महत्वपूर्ण घटक है। |
महत्व
सामरिक महत्व
- आर्कटिक क्षेत्र में भारत की उपस्थिति वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में अपनी स्थिति को मजबूत करती है, खासकर जब चीन जैसे अन्य देश भी इस क्षेत्र में अपनी रुचि बढ़ा रहे हैं।
- उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route) के खुलने से वैश्विक व्यापार मार्गों में क्रांति आ सकती है, जिससे स्वेज नहर पर निर्भरता कम होगी और भारत के लिए यूरोप तक पहुंचने का समय और लागत कम होगी।
वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व
- आर्कटिक में जलवायु परिवर्तन की दर वैश्विक औसत से दोगुनी है, जिससे समुद्री स्तर में वृद्धि और चरम मौसमी घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है। भारत का अनुसंधान इस वैश्विक घटना को समझने में मदद करता है।
- आर्कटिक पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन भारत को हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने और मानसून पैटर्न पर पड़ने वाले प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने में सहायता करता है, क्योंकि दोनों ध्रुवीय क्षेत्र आपस में जुड़े हुए हैं।
आर्थिक महत्व
- आर्कटिक में मछली पकड़ने, पर्यटन और खनिज निष्कर्षण जैसे नए आर्थिक अवसर उभर रहे हैं। भारत इन क्षेत्रों में सहयोग और निवेश के अवसरों का पता लगा सकता है।
- आर्कटिक में तेल और गैस के विशाल भंडार भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, जिससे ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम होगी।
चुनौतियाँ
1. भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
- आर्कटिक क्षेत्र में विभिन्न देशों (रूस, अमेरिका, चीन) के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय दावों के कारण भारत के लिए अपनी उपस्थिति बनाए रखना और हितों की रक्षा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
- आर्कटिक परिषद में सदस्य देशों के बीच मतभेद और वीटो पावर का उपयोग भारत के पर्यवेक्षक की भूमिका को सीमित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध: भारत और आर्कटिक
2. पर्यावरणीय संवेदनशीलता
- आर्कटिक एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है। किसी भी आर्थिक गतिविधि या शिपिंग से तेल रिसाव, प्रदूषण और जैव विविधता को नुकसान का खतरा रहता है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघलने से नए अवसर पैदा होते हैं, लेकिन साथ ही समुद्री अम्लीकरण और स्थानीय समुदायों के विस्थापन जैसी पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी बढ़ती हैं।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी: जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
3. तकनीकी और लॉजिस्टिकल बाधाएँ
- आर्कटिक में अनुसंधान और संचालन के लिए अत्यधिक विशिष्ट और महंगे उपकरणों की आवश्यकता होती है, जैसे आइसब्रेकर और ध्रुवीय-श्रेणी के जहाज।
- कठोर जलवायु परिस्थितियाँ, दूरस्थ स्थान और सीमित बुनियादी ढाँचा आर्कटिक में वैज्ञानिक और आर्थिक गतिविधियों को अंजाम देने में बड़ी लॉजिस्टिकल चुनौतियाँ पेश करते हैं।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान और प्रौद्योगिकी: ध्रुवीय अनुसंधान
4. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का अभाव
- आर्कटिक परिषद में सदस्य देशों के बीच सहयोग में कमी या भू-राजनीतिक तनाव भारत के लिए इस क्षेत्र में अपनी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में बाधा डाल सकता है।
- आर्कटिक शासन के लिए कोई व्यापक, बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय संधि नहीं है, जिससे क्षेत्रीय दावों और संसाधनों के बंटवारे को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध: अंतर्राष्ट्रीय संगठन और संधियाँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा | आर्कटिक में रूस, चीन और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा भारत के लिए अपनी स्वतंत्र नीति को बनाए रखने और क्षेत्रीय सहयोग में बाधा डाल सकती है। |
| पर्यावरणीय जोखिम | आर्कटिक में तेल और गैस अन्वेषण, शिपिंग तथा खनन जैसी आर्थिक गतिविधियों से संवेदनशील ध्रुवीय पारिस्थितिकी तंत्र को अपरिवर्तनीय क्षति का खतरा है। |
| आधारभूत संरचना का अभाव | आर्कटिक में अनुसंधान, अन्वेषण और वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए आवश्यक बंदरगाहों, संचार प्रणालियों और आपातकालीन सेवाओं जैसे बुनियादी ढांचे की कमी है। |
| स्थानीय समुदायों पर प्रभाव | आर्कटिक में बढ़ते मानव हस्तक्षेप से स्वदेशी समुदायों की पारंपरिक जीवन शैली, संस्कृति और आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। |
| जलवायु परिवर्तन के तीव्र प्रभाव | आर्कटिक में बर्फ पिघलने की तेज दर वैश्विक समुद्री स्तर में वृद्धि और चरम मौसमी घटनाओं को बढ़ा रही है, जिससे भारत जैसे तटीय देशों पर सीधा असर पड़ेगा। |
आगे की राह
- आर्कटिक क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान को मजबूत करना, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन, समुद्र विज्ञान और ग्लेशियोलॉजी के क्षेत्रों में, ताकि वैश्विक जलवायु मॉडलिंग में योगदान दिया जा सके।
- आर्कटिक परिषद के सदस्य और पर्यवेक्षक देशों के साथ बहुपक्षीय सहयोग बढ़ाना, विशेष रूप से स्थायी विकास, पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक आदान-प्रदान के क्षेत्रों में।
- आर्कटिक में तेल, गैस और खनिजों जैसे संसाधनों के स्थायी अन्वेषण और उपयोग के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों और सर्वोत्तम प्रथाओं का पालन करना।
- उत्तरी समुद्री मार्ग जैसे नए शिपिंग मार्गों के खुलने से उत्पन्न होने वाले आर्थिक अवसरों का पता लगाना, साथ ही पर्यावरणीय जोखिमों को कम करने के लिए आवश्यक सुरक्षा उपायों को लागू करना।
- आर्कटिक में स्वदेशी समुदायों के अधिकारों और हितों का सम्मान करना, और उनकी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को क्षेत्रीय विकास और अनुसंधान प्रयासों में एकीकृत करना।
- आर्कटिक में भारत की उपस्थिति को मजबूत करने के लिए आवश्यक तकनीकी क्षमताओं और बुनियादी ढांचे में निवेश करना, जैसे कि ध्रुवीय-श्रेणी के जहाज और अनुसंधान सुविधाएं।
- एक व्यापक और अद्यतन आर्कटिक नीति विकसित करना जो भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक, वैज्ञानिक और आर्थिक हितों को दर्शाती हो, और इसे नियमित रूप से संशोधित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
आर्कटिक परिषद · आर्कटिक क्षेत्र · भारत की आर्कटिक नीति · उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र · जलवायु परिवर्तन · भू-रणनीतिक महत्व · वैज्ञानिक अनुसंधान · पर्यावरणीय संरक्षण · सतत विकास · अंतर्राष्ट्रीय सहयोग · आर्कटिक सर्कल असेंबली · भारत का पर्यवेक्षक दर्जा
अवधारणा प्रवाह
आर्कटिक सर्कल असेंबली में भारत की भागीदारी → आर्कटिक क्षेत्र में भारत के रणनीतिक हित → जलवायु परिवर्तन और ध्रुवीय अनुसंधान का महत्व → नए शिपिंग मार्गों और ऊर्जा संसाधनों के अवसर → भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और पर्यावरणीय चुनौतियाँ → भारत की आर्कटिक नीति और भविष्य की रणनीति
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. आर्कटिक परिषद (Arctic Council) एक उच्च-स्तरीय अंतर-सरकारी मंच है जो आर्कटिक राज्यों और आर्कटिक के स्वदेशी लोगों के बीच सहयोग को बढ़ावा देता है।
2. भारत आर्कटिक परिषद का एक स्थायी सदस्य है।
3. आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन की दर वैश्विक औसत से धीमी है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। आर्कटिक परिषद आर्कटिक राज्यों और स्वदेशी लोगों के बीच सहयोग के लिए एक प्रमुख मंच है। कथन 2 गलत है। भारत आर्कटिक परिषद का स्थायी सदस्य नहीं, बल्कि एक पर्यवेक्षक (Observer) देश है। कथन 3 गलत है। आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन की दर वैश्विक औसत से काफी अधिक है, जिससे यह क्षेत्र तेजी से गर्म हो रहा है।
Q2. आर्कटिक क्षेत्र के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. आर्कटिक क्षेत्र में पृथ्वी के अधिकांश मीठे पानी का भंडार है।
2. आर्कटिक क्षेत्र में तेल, गैस और खनिजों के विशाल भंडार मौजूद हैं।
3. आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री मार्ग खुलने से वैश्विक व्यापार पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
सही उत्तर का चयन कीजिए:
- केवल 1
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — कथन 1 सही है। आर्कटिक क्षेत्र में ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों के रूप में पृथ्वी के मीठे पानी का एक बड़ा हिस्सा मौजूद है। कथन 2 सही है। आर्कटिक क्षेत्र में तेल, प्राकृतिक गैस और विभिन्न खनिजों के विशाल अप्रयुक्त भंडार होने का अनुमान है। कथन 3 सही है। आर्कटिक में बर्फ पिघलने से नए समुद्री मार्ग (जैसे उत्तरी समुद्री मार्ग) खुल रहे हैं, जो वैश्विक शिपिंग दूरी और समय को कम कर सकते हैं, जिससे व्यापार पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ आर्कटिक क्षेत्र के भू-रणनीतिक और आर्थिक महत्व पर चर्चा कीजिए। भारत की आर्कटिक नीति इस क्षेत्र में उसके हितों को कैसे संबोधित करती है? (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय में आर्कटिक क्षेत्र का संक्षिप्त परिचय और उसके बढ़ते महत्व का उल्लेख करें।
मुख्य भाग को दो भागों में विभाजित करें:
1. आर्कटिक क्षेत्र का भू-रणनीतिक और आर्थिक महत्व:
– भू-रणनीतिक महत्व: नए समुद्री मार्ग (उत्तरी समुद्री मार्ग), सैन्य उपस्थिति, संसाधनों पर नियंत्रण, वैश्विक शक्ति संतुलन पर प्रभाव।
– आर्थिक महत्व: तेल, गैस, खनिज भंडार, मत्स्य पालन, पर्यटन, वैज्ञानिक अनुसंधान के अवसर।
– जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: बर्फ पिघलने से उत्पन्न अवसर और चुनौतियाँ।
2. भारत की आर्कटिक नीति:
– भारत के हित: वैज्ञानिक अनुसंधान (हिमाद्री स्टेशन), जलवायु परिवर्तन का अध्ययन (हिमालय पर प्रभाव), ऊर्जा सुरक्षा, खनिज संसाधन, समुद्री मार्ग।
– नीति के स्तंभ: वैज्ञानिक अनुसंधान और सहयोग, जलवायु और पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक और मानव विकास, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और शासन।
– भारत का पर्यवेक्षक दर्जा और आर्कटिक परिषद में भूमिका।
निष्कर्ष में, भारत के लिए आर्कटिक क्षेत्र के दीर्घकालिक महत्व और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: Ministry of External Affairs
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
Related guides on our sites
- Anthropology VS PSIR
- Best PSIR optional coaching
- Best PSIR optional coaching online
- Best PSIR optional teacher
- भारत के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की आर्कटिक सर्कल असेंबली में भागीदारी - October 7, 2026
- ओडिशा में MMJM मिशन: पीवीटीजी परिवारों को सरकारी मंजूरी का इंतजार - October 7, 2026
- AAI Tells Calcutta HC: Bankra Masjid Land Belongs to Centre - October 7, 2026

No Comments