पाबित्रा मार्गेरिटा की सामोआ, कुक द्वीप और नाउरू की यात्रा: भारत के रणनीतिक संबंधों की नई दिशा

पाबित्रा मार्गेरिटा की सामोआ, कुक द्वीप और नाउरू की यात्रा: भारत के रणनीतिक संबंधों की नई दिशा

पाबित्रा मार्गेरिटा की सामोआ, कुक द्वीप और नाउरू की यात्रा: भारत के रणनीतिक संबंधों की नई दिशा

पाबित्रा मार्गेरिटा की सामोआ, कुक द्वीप और नाउरू की यात्रा: भारत के रणनीतिक संबंधों की नई दिशा — विदेश राज्य मंत्री श्री पबित्रा मार्गेरिटा की विदेश यात्रा (16–
आरेख: विदेश राज्य मंत्री श्री पबित्रा मार्गेरिटा की विदेश यात्रा (16–22 अक्टूबर 2026)

✎ FIPIC (2014, सूवा; 14 प्रशांत द्वीपीय देश) के तहत भारत की प्रशांत कूटनीति का विस्तार: सामोआ, कुक द्वीप समूह (न्यूज़ीलैंड के साथ मुक्त साहचर्य) और नौरू (सबसे छोटा गणराज्य) की यात्रा जलवायु-अनुकूलन, विकास सहयोग और हिन्द-प्रशांत…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध: भारत और उसके पड़ोस के बाहर के क्षेत्रीय समूह, भारत के हितों पर विकसित और विकासशील देशों की नीतियों का प्रभाव  |  GS Paper II — द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह तथा भारत से जुड़े करार  |  GS Paper III — पर्यावरण: जलवायु परिवर्तन, समुद्र-स्तर में वृद्धि और लघु द्वीपीय देशों की संवेदनशीलता
  • Prelims: प्रशांत द्वीप सहयोग मंच (FIPIC), प्रशांत द्वीपीय देश (PICs), लघु द्वीपीय विकासशील देश (SIDS), हिन्द-प्रशांत महासागर पहल (IPOI), एक्ट ईस्ट नीति, प्रशांत द्वीप मंच (Pacific Islands Forum), नौरू (Naoero) — विश्व का सबसे छोटा गणराज्य, कुक द्वीप समूह — न्यूज़ीलैंड के साथ मुक्त साहचर्य, राष्ट्रमंडल (Commonwealth), विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ)
  • Essay: लघु द्वीपीय देशों के साथ साझेदारी: छोटे राष्ट्र, बड़े महासागर और भारत की भूमिका, दक्षिण-दक्षिण सहयोग: विकासशील देशों की आवाज़ के रूप में भारत की कूटनीति

त्वरित पुनरावृत्ति: FIPIC (2014, सूवा; 14 प्रशांत द्वीपीय देश) के तहत भारत की प्रशांत कूटनीति का विस्तार: सामोआ, कुक द्वीप समूह (न्यूज़ीलैंड के साथ मुक्त साहचर्य) और नौरू (सबसे छोटा गणराज्य) की यात्रा जलवायु-अनुकूलन, विकास सहयोग और हिन्द-प्रशांत दृष्टिकोण से जुड़ी है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

विदेश मंत्रालय (MEA) की विज्ञप्ति के अनुसार विदेश राज्य मंत्री एवं वस्त्र राज्य मंत्री श्री पबित्रा मार्गेरिटा 16 से 22 अक्टूबर, 2026 तक प्रशांत महासागर क्षेत्र के तीन देशों की यात्रा करेंगे। ये देश हैं सामोआ स्वतंत्र राज्य (Independent State of Samoa), कुक द्वीप समूह (Cook Islands) और नौरू गणराज्य (Republic of Naoero, अंग्रेज़ी में Nauru)। तीनों प्रशांत द्वीप सहयोग मंच (FIPIC) के सदस्य हैं, इसलिए यह यात्रा भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ और हिन्द-प्रशांत दृष्टिकोण के तहत प्रशांत द्वीपीय देशों से जुड़ाव को आगे बढ़ाने की कड़ी है। उपलब्ध स्रोत में केवल यात्रा की घोषणा है; वार्ताओं के परिणाम और समझौतों की जानकारी मंत्रालय की बाद की विज्ञप्तियों से ही स्पष्ट होगी।

पृष्ठभूमि

  • प्रशांत द्वीप सहयोग मंच (Forum for India-Pacific Islands Cooperation – FIPIC) की शुरुआत 2014 में फ़िजी के सूवा में प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान हुई। इसमें 14 प्रशांत द्वीपीय देश शामिल हैं: कुक द्वीप समूह, फ़िजी, किरिबाती, मार्शल द्वीप समूह, माइक्रोनेशिया, नौरू, नियू, पलाऊ, पापुआ न्यू गिनी, सामोआ, सोलोमन द्वीप समूह, टोंगा, तुवालु और वनुआटु।
  • FIPIC का दूसरा शिखर सम्मेलन 2015 में जयपुर में हुआ। तीसरा शिखर सम्मेलन मई 2023 में पापुआ न्यू गिनी के पोर्ट मोरेस्बी में भारत और पापुआ न्यू गिनी की सह-मेज़बानी में हुआ। इसमें स्वास्थ्य, जलवायु-अनुकूलन, क्षमता निर्माण और सूचना-प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग के लिए कार्ययोजना घोषित की गई।
  • भारत प्रशांत द्वीप मंच (Pacific Islands Forum) का संवाद भागीदार है। भारत इन देशों को अनुदान, तकनीकी सहायता और भारत-संयुक्त राष्ट्र विकास भागीदारी कोष (India-UN Development Partnership Fund) के माध्यम से छोटी सामुदायिक परियोजनाओं में सहयोग देता है।
  • ये देश लघु द्वीपीय विकासशील देश (Small Island Developing States – SIDS) की श्रेणी में आते हैं। समुद्र-स्तर में वृद्धि, चक्रवात और खारे जल के प्रवेश से इन्हें जलवायु-संकट का सबसे अधिक ख़तरा है। इसलिए जलवायु-वित्त और आपदा-सहनीय अवसंरचना इनकी मुख्य प्राथमिकताएँ हैं।
  • इन छोटे देशों के पास विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) हैं, जिनमें मत्स्य संसाधन और समुद्री खनिज संभावनाएँ हैं। साथ ही संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर प्रत्येक देश का एक मत होता है। इसी कारण हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अनेक शक्तियाँ इनसे संबंध बढ़ा रही हैं और भारत भी अपनी भागीदारी का विस्तार कर रहा है।
  • मार्गेरिटा विदेश राज्य मंत्री के साथ वस्त्र राज्य मंत्री भी हैं। इसलिए हस्तशिल्प, हथकरघा और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्क के अवसर भी चर्चा के विषय हो सकते हैं। यह अनुमान है, स्रोत में इसकी पुष्टि नहीं है।

भारत की प्रशांत द्वीपीय नीति और यात्रा वाले तीन देश: क्या है यह साझेदारी?

  • सामोआ स्वतंत्र राज्य (राजधानी: आपिया): 1962 में न्यूज़ीलैंड से स्वतंत्र हुआ पॉलिनेशियाई संसदीय लोकतंत्र है। यह राष्ट्रमंडल और संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है तथा FIPIC में शामिल है। जलवायु-संवेदनशीलता इसकी प्रमुख चिंता है।
  • कुक द्वीप समूह (राजधानी: अवारुआ): यह न्यूज़ीलैंड के साथ ‘मुक्त साहचर्य’ (Free Association) में स्वशासित राज्य है। इसके नागरिक न्यूज़ीलैंड के नागरिक हैं। यह संयुक्त राष्ट्र का पूर्ण सदस्य नहीं है, फिर भी FIPIC का सदस्य है। यह दर्शाता है कि भारत का प्रशांत जुड़ाव संयुक्त राष्ट्र सदस्यता से परे भी है।
  • नौरू गणराज्य (Naoero): यह क्षेत्रफल में विश्व का सबसे छोटा गणराज्य और वेटिकन व मोनाको के बाद तीसरा सबसे छोटा देश है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 21 वर्ग किमी है। फ़ॉस्फ़ेट खनन ने इसकी अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों को प्रभावित किया है। यह राष्ट्रमंडल का सदस्य है और इसकी वास्तविक राजधानी यारेन है।
  • एक्ट ईस्ट नीति और हिन्द-प्रशांत दृष्टिकोण: दक्षिण-पूर्व एशिया से आगे प्रशांत द्वीपीय क्षेत्र तक संपर्क बढ़ाना भारत की नीति का विस्तार है। भारत इसे समावेशी, नियम-आधारित और मुक्त हिन्द-प्रशांत के अपने दृष्टिकोण से जोड़ता है। इस नीति का एक अंग हिन्द-प्रशांत महासागर पहल (IPOI, 2019) है।
  • सहयोग के प्रमुख क्षेत्र: स्वास्थ्य (जन औषधि केंद्र, डायलिसिस इकाइयाँ और चिकित्सा सहायता), जलवायु-अनुकूलन और आपदा-सहनीयता, नवीकरणीय ऊर्जा, क्षमता निर्माण (ITEC छात्रवृत्तियाँ), सूचना-प्रौद्योगिकी, कृषि और नीली अर्थव्यवस्था। 2023 की FIPIC कार्ययोजना में फ़िजी में सुपर-स्पेशियलिटी हृदय अस्पताल जैसी घोषणाएँ भी शामिल थीं।
  • भारत की विशिष्ट पद्धति: भारत दक्षिण-दक्षिण सहयोग की भावना से माँग-आधारित और शर्तरहित सहायता का दावा करता है। इसमें भारत स्वयं को विकासशील देशों की आवाज़ और ‘ग्लोबल साउथ’ के साझेदार के रूप में प्रस्तुत करता है।
  • चुनौतियाँ: भौगोलिक दूरी, सीमित सीधी हवाई और समुद्री संपर्क-सुविधा, भारतीय मिशनों की सीमित संख्या, और अन्य बड़ी शक्तियों के अधिक संसाधन व उपस्थिति। इसलिए छोटी, त्वरित प्रभाव वाली परियोजनाओं और नियमित मंत्री-स्तरीय संपर्क का महत्त्व बढ़ जाता है।
  • परीक्षा-दृष्टि: उत्तर में इस यात्रा को केवल द्विपक्षीय कूटनीति तक सीमित न रखें। इसे SIDS की जलवायु-चिंताओं, भारत की महासागरीय नीति और बहुपक्षीय मंचों पर समर्थन जुटाने के संदर्भ में विश्लेषित करें।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
यात्रा का स्वरूप: विदेश तथा वस्त्र राज्यमंत्री की 16–22 अक्टूबर 2026 की बहु-देशीय यात्रा समोआ, कुक द्वीप समूह और नाउरू (Naoero) की यह एक ही क्रम में की गई यात्रा प्रशांत द्वीपीय देशों के प्रति भारत की सतत कूटनीतिक पहुँच दर्शाती है। मंत्रालय की विज्ञप्ति के उपलब्ध अंश में कार्यक्रम का ब्योरा नहीं है, इसलिए नीचे का विश्लेषण संरचनात्मक और स्थिर पाठ्यक्रम पर आधारित है।
तीन भिन्न राजनीतिक स्थितियाँ समोआ और नाउरू संप्रभु राज्य हैं। कुक द्वीप समूह न्यूज़ीलैंड के साथ ‘मुक्त साहचर्य’ (Free Association) में एक स्वशासी देश है और उसकी विदेश नीति का दायरा अलग तरह का है। इसलिए भारत को प्रत्येक देश के साथ अलग राजनयिक ढाँचे में संवाद करना पड़ता है।
लघु द्वीपीय विकासशील राज्य (SIDS) का समूह तीनों देश छोटे, दूरस्थ और जलवायु-संवेदनशील हैं। भारत की ‘वैश्विक दक्षिण’ (Global South) की साझेदारी का केंद्र यही देश हैं। संयुक्त राष्ट्र और जलवायु वार्ताओं में इनके मत का भी उतना ही महत्त्व है जितना बड़े देशों के मत का।
भारत-प्रशांत द्वीप सहयोग मंच (FIPIC) का ढाँचा FIPIC की शुरुआत 2014 में सुवा (फिजी) में हुई थी और इसका तीसरा शिखर सम्मेलन 2023 में पोर्ट मोरेस्बी (पापुआ न्यू गिनी) में हुआ। प्रशांत देशों के साथ भारत का अधिकांश संवाद इसी मंच के अंतर्गत होता है, और मंत्री-स्तरीय यात्राएँ उसकी निरंतरता बनाए रखती हैं।
विदेश मामलों और वस्त्र का संयुक्त प्रभार राज्यमंत्री के पास दोनों विभाग हैं, इसलिए हथकरघा, वस्त्र और शिल्प जैसे लोक-केंद्रित क्षेत्रों को कूटनीति में शामिल करने का अवसर मिलता है। प्रशांत देशों में परंपरागत वस्त्र और शिल्प की भी अपनी पहचान है।
हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) दृष्टिकोण हिंद महासागर से आगे प्रशांत तक की समुद्री पहुँच इस दृष्टिकोण का हिस्सा है। नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था, नील अर्थव्यवस्था और आपदा सहनीयता इसके प्रमुख आयाम हैं।

महत्व

सामरिक महत्त्व

  • प्रशांत द्वीपीय देशों के विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) मत्स्य, खनिज और समुद्री मार्गों के कारण सामरिक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। इनके साथ संबंध भारत के हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण को विस्तार देते हैं।
  • इस क्षेत्र में बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। नाउरू ने जनवरी 2024 में ताइवान के बजाय चीन को मान्यता दी, और कुक द्वीप समूह के चीन के साथ 2025 के समझौतों पर न्यूज़ीलैंड से मतभेद उभरे। इस परिदृश्य में भारत स्वयं को विकास-साझेदार के रूप में प्रस्तुत करता है, किसी गुट के सदस्य के रूप में नहीं।
  • ‘पूर्व की ओर कार्रवाई नीति’ (Act East Policy) का भौगोलिक दायरा दक्षिण-पूर्व एशिया से आगे प्रशांत तक पहुँचता है।

बहुपक्षीय और कूटनीतिक महत्त्व

  • संयुक्त राष्ट्र में प्रत्येक देश का एक मत होता है। प्रशांत के छोटे देशों का समर्थन सुरक्षा परिषद में सुधार और अन्य बहुपक्षीय मुद्दों पर भारत के लिए उपयोगी है।
  • समोआ राष्ट्रमंडल (Commonwealth) का सदस्य है और उसने 2024 में राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक की मेज़बानी की। राष्ट्रमंडल का साझा मंच भारत के लिए संवाद का एक और माध्यम है।
  • जलवायु न्याय, ‘साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व’ और जलवायु वित्त जैसे विषयों पर भारत और SIDS के हित काफ़ी हद तक मिलते हैं, जिससे वार्ताओं में साझा रुख बन सकता है।

आर्थिक और विकासात्मक महत्त्व

  • भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग (ITEC) कार्यक्रम के अंतर्गत क्षमता-निर्माण और प्रशिक्षण के माध्यम से भारत छोटे देशों में ‘मानव संसाधन’ का निवेश कर सकता है।
  • नील अर्थव्यवस्था (Blue Economy), मत्स्य-पालन, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वास्थ्य और सूचना-प्रौद्योगिकी में सहयोग की संभावनाएँ हैं।
  • हथकरघा, वस्त्र और हस्तशिल्प के क्षेत्र में पारस्परिक व्यापार और प्रदर्शनियों से भारतीय कारीगरों को नए बाज़ार मिल सकते हैं, हालाँकि इस क्षेत्र का आकार अभी सीमित है।

जलवायु और आपदा संबंधी महत्त्व

  • समुद्र-स्तर में वृद्धि, चक्रवात और प्रवाल-क्षरण से ये देश अस्तित्वगत संकट का सामना करते हैं। भारत का अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और आपदा-सह अवसंरचना हेतु गठबंधन (CDRI) इनके लिए प्रासंगिक मंच हैं।
  • भारत की आपदा-राहत क्षमता और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का अनुभव प्रशांत देशों के काम आ सकता है।

चुनौतियाँ

1. भौगोलिक दूरी और संपर्क की कमी

  • भारत से प्रशांत द्वीपों तक सीधी हवाई और समुद्री संपर्क-व्यवस्था बहुत सीमित है। इससे व्यापार, पर्यटन और आपसी संपर्क की लागत बढ़ जाती है।
  • अधिकांश देशों में भारतीय मिशन सीमित हैं या दूसरे देशों में स्थित मिशनों से सह-मान्यता पर निर्भर हैं, जिससे रोज़मर्रा की कूटनीतिक उपस्थिति कमज़ोर रहती है।

2. बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा

  • चीन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की इस क्षेत्र में गहरी उपस्थिति है और वे सहायता, ऋण तथा सुरक्षा समझौतों में भारत से कहीं अधिक संसाधन लगाते हैं।
  • भारत की प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता सीमित है, इसलिए उसे अपनी विशिष्ट पेशकश — क्षमता-निर्माण, किफ़ायती तकनीक और बिना शर्त साझेदारी — पर ज़ोर देना होगा।

3. जलवायु संवेदनशीलता और वित्त की कमी

  • इन देशों की आजीविका और अस्तित्व जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है, पर जलवायु वित्त तक उनकी पहुँच कठिन और जटिल है।
  • भारत स्वयं विकासशील देश है, इसलिए वह सीमित वित्तीय सहायता ही दे सकता है; अनुदान और रियायती ऋण की मात्रा पर सीमाएँ हैं।

4. सीमित आर्थिक आकार और व्यापार की संभावनाएँ

  • तीनों देशों की जनसंख्या और अर्थव्यवस्था बहुत छोटी है, इसलिए द्विपक्षीय व्यापार का परिमाण सीमित रहता है।
  • नाउरू जैसे देश की अर्थव्यवस्था फॉस्फेट खनन के ह्रास और बाहरी आय पर निर्भर रही है, जिससे दीर्घकालिक विविधीकरण कठिन है।

5. कूटनीतिक संवेदनशीलता और संप्रभुता के अलग-अलग स्तर

  • कुक द्वीप समूह की न्यूज़ीलैंड के साथ मुक्त साहचर्य की व्यवस्था के कारण भारत को ऐसा संवाद रखना पड़ता है जो उसके स्वशासी दर्जे का सम्मान करे और न्यूज़ीलैंड की संवेदनशीलताओं का भी ध्यान रखे।
  • क्षेत्रीय संस्थाओं, जैसे प्रशांत द्वीप मंच (Pacific Islands Forum), के भीतर की प्राथमिकताओं के साथ भारत की पहलों का समन्वय आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
संपर्क सीधी उड़ानों और नौवहन की कमी से व्यापार और लोगों का आवागमन महँगा रहता है।
संसाधन भारत की विकास-सहायता क्षमता अन्य बड़ी शक्तियों की तुलना में सीमित है।
सामरिक प्रतिस्पर्धा बड़ी शक्तियों के प्रभाव के कारण छोटे देशों के साथ संबंधों में संतुलन साधना कठिन है।
जलवायु जोखिम समुद्र-स्तर में वृद्धि और चक्रवात जैसे खतरों से निपटने के लिए पर्याप्त वित्त और तकनीक का अभाव है।
मिशन-उपस्थिति सह-मान्यता पर आधारित व्यवस्था में निरंतर संवाद और प्रवासी भारतीयों से संपर्क कमज़ोर पड़ता है।
अनुवर्तन यात्राओं में हुई घोषणाओं को समयबद्ध परियोजनाओं में बदलने की क्षमता की चुनौती बनी रहती है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • भारत-प्रशांत द्वीप सहयोग मंच (Forum for India-Pacific Islands Cooperation – FIPIC): 2014 में शुरू, प्रशांत के 14 द्वीपीय देशों के साथ भारत के सहयोग का मुख्य ढाँचा; समोआ, कुक द्वीप समूह और नाउरू इसके अंतर्गत आते हैं।
  • भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग (Indian Technical and Economic Cooperation – ITEC) कार्यक्रम: साझेदार देशों के अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण और क्षमता-निर्माण।
  • भारत-संयुक्त राष्ट्र विकास साझेदारी कोष (India-UN Development Partnership Fund): विकासशील देशों, विशेषकर SIDS में परियोजनाओं के लिए भारत द्वारा पोषित कोष।
  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance) और आपदा-सह अवसंरचना हेतु गठबंधन (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure): जलवायु अनुकूलन में सहयोग के मंच। (टिप्पणी: ये सभी प्रासंगिक ढाँचे हैं; उपलब्ध विज्ञप्ति में इस यात्रा के दौरान इनकी किसी विशिष्ट घोषणा का उल्लेख नहीं है।)

आगे की राह

  • FIPIC के अंतर्गत की गई घोषणाओं की समयबद्ध समीक्षा के लिए नियमित मंत्री-स्तरीय और अधिकारी-स्तरीय अनुवर्तन तंत्र बनाया जाए।
  • ITEC, छात्रवृत्तियों और कौशल प्रशिक्षण का विस्तार किया जाए, ताकि भारत की सबसे मज़बूत पेशकश — मानव संसाधन विकास — और सशक्त हो।
  • जलवायु अनुकूलन, सौर ऊर्जा, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और तटीय अवसंरचना पर ISA तथा CDRI के माध्यम से ठोस परियोजनाएँ चलाई जाएँ।
  • नील अर्थव्यवस्था, सतत मत्स्य-पालन और समुद्री अनुसंधान में सहयोग बढ़ाया जाए, जिसमें EEZ की निगरानी में क्षमता-निर्माण भी शामिल हो।
  • संपर्क सुधारने के लिए क्षेत्रीय नौवहन और हवाई सेवाओं पर विचार किया जाए तथा राजनयिक मिशनों की उपस्थिति धीरे-धीरे मज़बूत की जाए।
  • हथकरघा, वस्त्र और हस्तशिल्प के लिए प्रदर्शनियाँ और बाज़ार-संपर्क के अवसर बनाए जाएँ, तथा स्वास्थ्य सेवा, किफ़ायती औषधि और डिजिटल सेवाओं में सहयोग बढ़ाया जाए।
  • प्रत्येक देश की राजनीतिक स्थिति और क्षेत्रीय संवेदनशीलताओं का सम्मान करते हुए, माँग-आधारित और पारदर्शी साझेदारी का मॉडल अपनाया जाए, जो किसी बड़ी शक्ति के विरुद्ध न होकर विकासोन्मुख हो।
  • बहुपक्षीय मंचों पर जलवायु न्याय और SIDS की चिंताओं पर समन्वित रुख अपनाया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

प्रशांत द्वीप देश (Pacific Island Countries) · भारत-प्रशांत द्वीप सहयोग मंच (FIPIC) · हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) · एक्ट ईस्ट नीति · विशाल महासागरीय राज्य (Large Ocean States) · विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) · जलवायु संवेदनशीलता एवं समुद्र-स्तर वृद्धि · दक्षिण-दक्षिण सहयोग · क्षमता निर्माण एवं विकास साझेदारी · बहुपक्षीय मंचों में समर्थन · MoS-स्तरीय कूटनीति · प्रशांत द्वीप मंच (Pacific Islands Forum)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 51 — अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और सहयोग का संवर्धन
  • अनुच्छेद 253 — अंतर्राष्ट्रीय करारों के पालन हेतु विधि-निर्माण
  • सातवीं अनुसूची, संघ सूची, प्रविष्टि 10 और 14 — विदेश मामले, संधियाँ

अवधारणा प्रवाह

प्रशांत के छोटे द्वीपीय देशों का सामरिक, जलवायु और आर्थिक महत्त्व बढ़ना  →  भारत की हिंद-प्रशांत और ‘पूर्व की ओर कार्रवाई’ नीति का प्रशांत तक विस्तार  →  FIPIC जैसे मंचों के माध्यम से मंत्री-स्तरीय यात्राएँ और संवाद  →  समोआ, कुक द्वीप समूह और नाउरू के साथ विकास-सहयोग, क्षमता-निर्माण और जलवायु साझेदारी  →  छोटे देशों में भारत की साख बढ़ना और बहुपक्षीय मंचों पर समर्थन का आधार बनना  →  बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और ‘वैश्विक दक्षिण’ की भूमिका का सुदृढ़ होना

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत-प्रशांत द्वीप सहयोग मंच (FIPIC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस मंच की शुरुआत 2014 में फिजी के सुवा में प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान हुई।
2. इसमें 14 प्रशांत द्वीप देश शामिल हैं, जिनमें समोआ, कुक द्वीप समूह और नाउरू (नाओरू) भी हैं।
3. ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड इस मंच के पूर्ण सदस्य हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: FIPIC की शुरुआत नवंबर 2014 में सुवा (फिजी) में हुई। कथन 2 सही है: इसमें 14 प्रशांत द्वीप देश हैं, जिनमें ये तीनों भी हैं। कथन 3 गलत है: ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड FIPIC के सदस्य नहीं हैं, वे प्रशांत द्वीप मंच (PIF) के सदस्य हैं। अतः केवल दो कथन सही हैं।

Q2. स्तंभ-I (देश) को स्तंभ-II (विवरण) से सुमेलित कीजिए:
स्तंभ-I: (a) समोआ (b) कुक द्वीप समूह (c) नाउरू
स्तंभ-II: 1. न्यूज़ीलैंड के साथ मुक्त साहचर्य में स्वशासित राज्य 2. विश्व का सबसे छोटा गणराज्य 3. 1962 में न्यूज़ीलैंड के न्यास-शासन से स्वतंत्र हुआ पॉलिनेशियाई राज्य

  1. (a)-3, (b)-1, (c)-2
  2. (a)-1, (b)-3, (c)-2
  3. (a)-2, (b)-1, (c)-3
  4. (a)-3, (b)-2, (c)-1

उत्तर: (a)-3, (b)-1, (c)-2 — समोआ 1962 में स्वतंत्र हुआ, वह पॉलिनेशिया में है और पहले न्यूज़ीलैंड के प्रशासन में था। कुक द्वीप समूह न्यूज़ीलैंड के साथ मुक्त साहचर्य में स्वशासित है। नाउरू क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा गणराज्य है। अतः सही मेल (a)-3, (b)-1, (c)-2 है।

Q3. अभिकथन (A): प्रशांत द्वीप देश भारत की हिंद-प्रशांत नीति के लिए सामरिक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
कारण (R): क्षेत्रफल में छोटे होने पर भी ये देश विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्रों वाले ‘विशाल महासागरीय राज्य’ हैं और बहुपक्षीय मंचों में उनका एक-एक मत होता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किंतु R गलत है
  4. A गलत है, किंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — A सही है: प्रशांत क्षेत्र हिंद-प्रशांत की भौगोलिक और सामरिक निरंतरता का अंग है। R भी सही है: ये देश विशाल समुद्री क्षेत्र पर अधिकार रखते हैं और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों में एक देश-एक मत का लाभ पाते हैं। यही कारण भारत के लिए इनका महत्त्व समझाता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ प्रशांत द्वीप देश हिंद-प्रशांत भू-राजनीति में परिधि से केंद्र की ओर आ रहे हैं। समोआ, कुक द्वीप समूह और नाउरू जैसे देशों में मंत्री-स्तरीय यात्राओं के संदर्भ में भारत की प्रशांत द्वीप कूटनीति का परीक्षण कीजिए तथा मूल्यांकन कीजिए कि यह इन देशों की जलवायु संवेदनशीलता और विकास आवश्यकताओं को किस सीमा तक संबोधित करती है। (15 Marks)

रूपरेखा: भूमिका: अक्टूबर 2026 में विदेश एवं वस्त्र राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरीटा की समोआ, कुक द्वीप समूह और नाउरू (नाओरू) की यात्रा। यह भारत की प्रशांत पहुँच का उदाहरण है, जिसमें छोटे और दूरस्थ देश भी शामिल हैं। भाग 1 (क्यों महत्त्वपूर्ण): (i) ये विशाल महासागरीय राज्य हैं जिनके EEZ बहुत बड़े हैं; मत्स्य और समुद्री संसाधन इनमें आते हैं। (ii) संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों में एक देश-एक मत; भारत को समर्थन मिलता है (सुरक्षा परिषद सुधार, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे विषयों पर)। (iii) हिंद-प्रशांत की सामरिक निरंतरता और इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती उपस्थिति के बीच विविध साझेदारियों की चाह। (iv) एक्ट ईस्ट नीति, SAGAR/MAHASAGAR तथा हिंद-प्रशांत महासागर पहल (IPOI, 2019) से जुड़ाव। भाग 2 (भारत के साधन): FIPIC (2014 सुवा; 2015 जयपुर; 2023 पोर्ट मोरेस्बी, 14 देश); PIF में संवाद साझेदारी; भारत-संयुक्त राष्ट्र विकास साझेदारी कोष; ITEC छात्रवृत्तियाँ और क्षमता निर्माण; स्वास्थ्य, सस्ती दवाएँ, डिजिटल और सौर सहयोग; अनुदान-आधारित, माँग-आधारित ‘उच्च प्रभाव सामुदायिक परियोजनाएँ’। भाग 3 (मूल्यांकन): सफलताएँ: बिना शर्त की साझेदारी, दक्षिण-दक्षिण सहयोग की छवि, जलवायु न्याय पर साझा रुख। सीमाएँ: भौगोलिक दूरी, सीमित मिशन-संख्या और संसाधन, चीन तथा ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड-अमेरिका की तुलना में कम वित्तीय पैमाना, परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी, जलवायु वित्त (हानि एवं क्षति) में सीमित योगदान। आगे की राह: स्थायी राजनयिक उपस्थिति बढ़ाना, आपदा-रोधी अवसंरचना और आपदा प्रबंधन सहयोग (CDRI), नीली अर्थव्यवस्था, दिशा-निर्देशित दीर्घकालिक परियोजना-वित्त, तथा क्षेत्रीय संगठनों के साथ समन्वय। निष्कर्ष: संतुलित, विकास-केंद्रित और संप्रभुता-सम्मानकारी साझेदारी।

स्रोत: Ministry of External Affairs


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