14 Oct तमिलनाडु पुलिस आरएसएस, द्रविड़ कड़गम मार्च की अनुमति क्यों नहीं दे रही: मद्रास हाईकोर्ट
✎ अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्वक सभा का अधिकार देता है और 19(3) लोक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन की अनुमति देता है; पुलिस सभी संगठनों के प्रति तटस्थ रहकर मार्ग-समय जैसी शर्तें लगा सकती है, पर मनमाना पूर्ण निषेध नहीं कर…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19), युक्तियुक्त निर्बंधन, न्यायिक समीक्षा और रिट क्षेत्राधिकार | GS Paper II — संघवाद और राज्य की शक्तियाँ: पुलिस एवं लोक व्यवस्था (राज्य सूची), कार्यपालिका की विवेकाधीन शक्ति पर न्यायिक नियंत्रण | GS Paper II — शासन: पुलिस सुधार, कानून-व्यवस्था प्रबंधन में निष्पक्षता और जवाबदेही | GS Paper IV — नीतिशास्त्र: लोक सेवा में निष्पक्षता, तटस्थता और अधिकार बनाम व्यवस्था का द्वंद्व
- Prelims: अनुच्छेद 19(1)(क), 19(1)(ख) और 19(1)(ग), अनुच्छेद 19(3): सभा के अधिकार पर निर्बंधन, लोक व्यवस्था (Public Order) — राज्य सूची की प्रविष्टि 1, पुलिस — राज्य सूची की प्रविष्टि 2, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163, पुलिस अधिनियम, 1861, अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता, रामलीला मैदान घटना बनाम गृह सचिव, भारत संघ (2012), हिम्मत लाल के. शाह बनाम पुलिस आयुक्त, अहमदाबाद (1973), मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018)
- Essay: लोकतंत्र में असहमति और जुलूस का अधिकार: स्वतंत्रता और लोक व्यवस्था में संतुलन, कानून के समक्ष समानता और राज्य की तटस्थता: संगठनों और विचारधाराओं के प्रति समान व्यवहार
त्वरित पुनरावृत्ति: अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्वक सभा का अधिकार देता है और 19(3) लोक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन की अनुमति देता है; पुलिस सभी संगठनों के प्रति तटस्थ रहकर मार्ग-समय जैसी शर्तें लगा सकती है, पर मनमाना पूर्ण निषेध नहीं कर सकती, और इसकी समीक्षा अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन ने 14 अक्टूबर 2026 को एक रिट याचिका (आपराधिक) की सुनवाई के दौरान प्रश्न उठाया कि तमिलनाडु पुलिस पथ संचलन (Route March), मोटरसाइकिल रैली जैसे आयोजनों के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), द्रविड़ कषगम (DK) या राजनीतिक दलों को सत्तारूढ़ सरकार चाहे जो भी हो, अनुमति क्यों नहीं देती। याचिका में 18 अक्टूबर, 25 अक्टूबर और 1 नवंबर 2026 को राज्य के विभिन्न स्थानों पर पथ संचलन की अनुमति माँगी गई थी, जिसके बाद सार्वजनिक सभाएँ भी प्रस्तावित हैं। राज्य के महाधिवक्ता ने कहा कि प्रस्तावित मार्ग ऐसे आयोजनों के अनुकूल नहीं हैं और त्योहारों के मौसम में आम जनता को असुविधा होगी। न्यायालय ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं को राज्य के लोक अभियोजक से मिलकर तिथि, समय और स्थान का समाधान निकालने तथा 15 अक्टूबर को न्यायालय को सूचित करने का निर्देश दिया। यह मामला शांतिपूर्वक सभा के मौलिक अधिकार और राज्य की लोक व्यवस्था बनाए रखने की ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन का उदाहरण है।
पृष्ठभूमि
- अनुच्छेद 19(1)(ख) प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्वक और निरायुध सभा करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 19(3) के अंतर्गत भारत की संप्रभुता और अखंडता तथा लोक व्यवस्था के हित में इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन (Reasonable Restrictions) लगाए जा सकते हैं।
- संविधान की सातवीं अनुसूची में ‘लोक व्यवस्था’ और ‘पुलिस’ राज्य सूची के विषय हैं। इसलिए जुलूस, रैली और सभा की अनुमति देने या न देने का प्रारंभिक निर्णय राज्य की पुलिस और प्रशासन के पास रहता है।
- जुलूस और सभाओं का नियमन पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 30 तथा राज्यों के अपने पुलिस कानूनों के अंतर्गत होता है। निषेधाज्ञा के लिए पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 का प्रयोग होता था, जिसका स्थान अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163 ने ले लिया है।
- रामलीला मैदान घटना (2012) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि शांतिपूर्वक सभा और प्रदर्शन का अधिकार मौलिक अधिकार है, जिसे केवल विधि द्वारा और युक्तियुक्त आधार पर ही सीमित किया जा सकता है। हिम्मत लाल के. शाह (1973) में न्यायालय ने कहा कि अनुमति-व्यवस्था में पुलिस को मनमानी शक्ति नहीं दी जा सकती।
- मज़दूर किसान शक्ति संगठन (2018) में न्यायालय ने माना कि विरोध का अधिकार महत्त्वपूर्ण है, किंतु इसे नियमन के अधीन रखकर नागरिकों के आवागमन तथा अन्य अधिकारों के साथ संतुलित करना होगा।
- तमिलनाडु में पथ संचलन की अनुमति को लेकर 2022-23 में भी विवाद हुआ था, जो उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय तक पहुँचा। उसमें शर्तों के साथ अनुमति देने के उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को बनाए रखा गया। न्यायालयों का सामान्य रुख यह रहा है कि आशंका के आधार पर सीधा इनकार करने के बजाय मार्ग, समय और शर्तों के नियमन से संतुलन साधा जाए।
सभा और जुलूस का अधिकार तथा पुलिस की अनुमति-शक्ति क्या है?
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्वक और बिना शस्त्र के एकत्र होने का अधिकार देता है। जुलूस, पथ संचलन और रैली इसी अधिकार के विस्तार के रूप में देखे जाते हैं, परंतु यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है।
- निर्बंधन के आधार: अनुच्छेद 19(3) के अनुसार केवल भारत की संप्रभुता और अखंडता तथा लोक व्यवस्था के हित में विधि द्वारा युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं। निर्बंधन विधि-सम्मत, आनुपातिक और कारणयुक्त होना चाहिए।
- पुलिस की भूमिका: पुलिस सार्वजनिक सड़कों पर जुलूस के लिए अनुमति देती है और मार्ग, समय, ध्वनि-स्तर तथा भीड़ की सीमा जैसी शर्तें लगा सकती है। वह किसी जुलूस को पूरी तरह रोकने का निर्णय तभी ले सकती है जब ठोस और तात्कालिक खतरे की युक्तियुक्त आशंका हो।
- विवेकाधीन शक्ति की सीमा: न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि अनुमति देने या न देने का आधार वस्तुनिष्ठ और लिखित होना चाहिए। अनुच्छेद 14 के अनुसार किसी संगठन के साथ विचारधारा के आधार पर भेदभाव नहीं हो सकता, और समान परिस्थितियों में सभी के साथ समान व्यवहार अपेक्षित है।
- न्यायिक समीक्षा: अनुमति अस्वीकार होने पर नागरिक या संगठन अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकता है। न्यायालय यह जाँचता है कि इनकार के कारण उचित हैं या नहीं और प्रायः शर्तों के साथ अनुमति देकर संतुलन बनाता है।
- संतुलन का सिद्धांत: एक ओर सभा की स्वतंत्रता है, दूसरी ओर आम जनता के आवागमन, त्योहारों की भीड़, सांप्रदायिक सौहार्द और सुरक्षा के हित हैं। इसलिए मार्ग, तिथि और समय में परिवर्तन जैसे कम प्रतिबंधात्मक उपाय पूर्ण निषेध से बेहतर माने जाते हैं।
- इस प्रकरण की स्थिति: न्यायालय की मौखिक टिप्पणियाँ अंतिम निर्णय नहीं होतीं। न्यायालय ने पक्षकारों को आपसी चर्चा से तिथि, समय और स्थान तय करने को कहा है, और अंतिम आदेश आगामी सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगा।
- शासन का पहलू: पुलिस सुधारों की दृष्टि से अनुमति-प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और राजनीतिक रूप से तटस्थ होनी चाहिए। इससे जनता का विश्वास बढ़ता है और अनावश्यक मुकदमेबाजी घटती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| मामले की प्रकृति | RSS के उत्तर तमिलनाडु सचिव ने मद्रास उच्च न्यायालय में रिट याचिका (आपराधिक) दायर की। इसमें 18 और 25 अक्टूबर तथा 1 नवंबर, 2026 को राज्य के विभिन्न स्थानों पर पथ संचलन की अनुमति माँगी गई है। संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी कर सकता है। |
| न्यायालय की मौखिक टिप्पणी | न्यायमूर्ति ने पूछा कि सरकार चाहे जो हो, पुलिस RSS, द्रविड़ कषगम (DK) या राजनीतिक दलों के पथ संचलन और बाइक रैली को अनुमति क्यों नहीं देती। यह सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी है, अंतिम निर्णय नहीं। इसमें प्रशासनिक कार्रवाई की एकरूपता और निष्पक्षता का प्रश्न निहित है। |
| राज्य का पक्ष | महाधिवक्ता के अनुसार प्रस्तावित मार्ग ऐसे आयोजन के अनुकूल नहीं हैं। त्योहारों के मौसम में आम जनता को असुविधा होगी। यह लोक व्यवस्था और यातायात प्रबंधन से जुड़ा तर्क है। |
| न्यायालय का मध्यस्थता-जैसा मार्ग | न्यायालय ने याचिकाकर्ता को राज्य लोक अभियोजक से मिलकर तिथि, समय और स्थान तय करने को कहा, और परिणाम अगले दिन बताने का निर्देश दिया। इस तरह अधिकार और प्रतिबंध के बीच व्यावहारिक संतुलन खोजा जा रहा है। |
| याचिका में प्रस्तावित स्वरूप | निर्धारित गणवेश, संगीत-वादक दल और उसके बाद सार्वजनिक सभाएँ प्रस्तावित हैं। इससे आयोजन का आकार और सार्वजनिक सड़कों पर प्रभाव तय होता है, जिसके आधार पर पुलिस शर्तें लगाती है। |
| व्यापक संवैधानिक प्रश्न | शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और राज्य की पुलिस-शक्ति आमने-सामने हैं। साथ ही विचारधारा के आधार पर भेदभाव-रहित व्यवहार (अनुच्छेद 14) का प्रश्न भी उठता है। |
महत्व
संवैधानिक एवं विधिक महत्त्व
- अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना शस्त्र एकत्र होने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 19(3) संप्रभुता, अखंडता और लोक व्यवस्था के हित में इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन की अनुमति देता है।
- यह मामला दिखाता है कि अनुमति-व्यवस्था निर्बंधन का साधन तो है, पर वह अधिकार को पूरी तरह समाप्त करने का साधन नहीं बन सकती।
- अनुच्छेद 14 के अनुसार राज्य को समान परिस्थिति वाले संगठनों के साथ एक-सा व्यवहार करना चाहिए। उसे विचारधारा के आधार पर भेद नहीं करना चाहिए।
- अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की भूमिका यह सुनिश्चित करना है कि प्रशासनिक विवेक मनमाना न हो।
प्रशासनिक एवं शासन संबंधी महत्त्व
- पुलिस और लोक व्यवस्था राज्य सूची (सातवीं अनुसूची, प्रविष्टि 1 और 2) के विषय हैं। इसलिए जुलूसों और रैलियों के नियमन का दायित्व राज्य सरकार और उसकी पुलिस पर है।
- अनुमति देने या न देने के निर्णय में पारदर्शी, लिखित और कारण-सहित आदेश की परंपरा शासन की जवाबदेही बढ़ाती है।
- त्योहारों के मौसम में भीड़ और यातायात का प्रबंधन स्थानीय प्रशासन की वास्तविक चुनौती है। न्यायालय का दृष्टिकोण इसे अधिकार के साथ संतुलित करने का है।
लोकतांत्रिक एवं सामाजिक महत्त्व
- खुली और शांतिपूर्ण सार्वजनिक गतिविधि बहुलवादी लोकतंत्र की पहचान है। इसमें विभिन्न विचारधाराओं के संगठनों को समान अवसर मिलना चाहिए।
- निष्पक्ष और पूर्वानुमेय अनुमति-प्रक्रिया से सरकार बदलने पर भी नीति में निरंतरता बनी रहती है। इससे संस्थाओं पर जनविश्वास बढ़ता है।
- सांप्रदायिक या वैचारिक तनाव की आशंका वाले क्षेत्रों में शर्तों के साथ अनुमति देना सहिष्णुता और विधि के शासन, दोनों के अनुरूप माना जाता है।
चुनौतियाँ
1. अधिकार और लोक व्यवस्था का संतुलन
- शांतिपूर्ण सभा का अधिकार निरपेक्ष नहीं है। पुलिस को टकराव, यातायात अवरोध या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका का आकलन करना पड़ता है।
- केवल आशंका के आधार पर पूर्ण अस्वीकृति असंगत निर्बंधन मानी जा सकती है। इसलिए न्यायालय प्रायः शर्तों के साथ अनुमति का मार्ग अपनाते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: मौलिक अधिकार; अनुच्छेद 19(1)(b) एवं 19(3)
2. विवेकाधिकार का मनमाना प्रयोग
- अनुमति देने का अधिकार पुलिस के पास होने से निर्णय संगठन की विचारधारा या राजनीतिक संदर्भ से प्रभावित होने का संदेह रहता है।
- एक जैसे आयोजनों पर भिन्न निर्णय अनुच्छेद 14 की समानता की कसौटी पर प्रश्न खड़े करते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: विधि के समक्ष समता; प्रशासनिक विवेक की न्यायिक समीक्षा
3. औपनिवेशिक पुलिस-विधियों की विरासत
- जुलूसों और सभाओं के नियमन के प्रावधान पुलिस अधिनियम, 1861 जैसी औपनिवेशिक विधियों में निहित हैं। उनमें व्यापक विवेकाधिकार है और स्पष्ट मानदंड कम हैं।
- समय-सीमा और अस्वीकृति के कारण बताने की बाध्यता का अभाव अनिश्चितता पैदा करता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: पुलिस सुधार; GS-4: प्रशासन में पारदर्शिता
4. सार्वजनिक सुविधा और त्योहारी भीड़
- त्योहारों के दौरान बाज़ारों और धार्मिक आयोजनों के कारण सड़कों पर पहले से भारी दबाव रहता है। इसलिए मार्ग और समय का चयन संवेदनशील होता है।
- आम नागरिकों के आवागमन के अधिकार और संगठनों की अभिव्यक्ति के अधिकार में तालमेल बैठाना कठिन है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन; नगरीय प्रबंधन और भीड़-नियंत्रण
5. न्यायिक टिप्पणियों की सीमा
- सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियाँ बाध्यकारी निर्णय नहीं होतीं। अंतिम आदेश का स्वरूप तथ्यों और शर्तों पर निर्भर करेगा।
- तुलनात्मक उदाहरण (अन्य क्षेत्र या देश) न्यायिक निर्णय का आधार नहीं हो सकते, क्योंकि लोक व्यवस्था का आकलन स्थानीय परिस्थितियों पर टिका होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: न्यायपालिका की भूमिका; रिट क्षेत्राधिकार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अनुमति की प्रक्रिया | स्पष्ट समय-सीमा और लिखित कारण न होने से अनिश्चितता और अनावश्यक मुकदमेबाज़ी होती है। |
| समानता का प्रश्न | अलग-अलग संगठनों के आवेदनों पर असमान निर्णय से निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होता है। |
| लोक व्यवस्था | सांप्रदायिक या वैचारिक टकराव की आशंका से पुलिस अतिरिक्त सतर्कता बरतती है। |
| सार्वजनिक असुविधा | त्योहारी मौसम में यातायात और बाज़ार प्रभावित होते हैं। |
| शस्त्र संबंधी शर्त | अनुच्छेद 19(1)(b) ‘बिना शस्त्र’ की शर्त पर चलता है। इसलिए आयोजन में कोई भी वस्तु शस्त्र की श्रेणी में आती है या नहीं, यह स्पष्ट रहना चाहिए। |
| न्यायिक निगरानी | बार-बार न्यायालय के हस्तक्षेप से प्रशासनिक निर्णय-प्रक्रिया में विश्वास घटता है। |
आगे की राह
- जुलूस, पथ संचलन और रैलियों की अनुमति के लिए स्पष्ट, एकसमान और प्रकाशित मानक प्रक्रिया बने, जिसमें आवेदन के निपटारे की समय-सीमा तय हो।
- अस्वीकृति का आदेश लिखित और कारण-सहित हो, ताकि प्रभावित पक्ष उसे न्यायालय में चुनौती दे सके।
- पूर्ण निषेध के बजाय आनुपातिकता के सिद्धांत पर मार्ग, समय, भीड़ की सीमा और यातायात-व्यवस्था जैसी शर्तें लगाई जाएँ।
- सभी संगठनों और राजनीतिक दलों के प्रति दृष्टिकोण विचारधारा-निरपेक्ष हो, ताकि अनुच्छेद 14 का पालन सुनिश्चित हो।
- आयोजकों और पुलिस के बीच आयोजन से पूर्व संवाद की संस्थागत व्यवस्था हो, जैसा न्यायालय ने इस मामले में सुझाया है।
- औपनिवेशिक पुलिस-विधियों में आवश्यक सुधार हों, ताकि अनुमति की शक्तियाँ आधुनिक संवैधानिक मानकों के अनुरूप हों।
- त्योहारों के दौरान वैकल्पिक मार्ग, स्वयंसेवकों और पुलिस बल की संतुलित तैनाती से सार्वजनिक सुविधा सुरक्षित रखी जाए।
- उच्चतम न्यायालय के निर्णयों में निर्धारित सिद्धांतों (जैसे रामलीला मैदान मामला, 2012) पर पुलिस अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन की स्वतंत्रता — अनुच्छेद 19(1)(b) · युक्तियुक्त निर्बंधन — अनुच्छेद 19(3) · लोक व्यवस्था (Public Order) — राज्य सूची की प्रविष्टि 1 · BNSS की धारा 163 (पूर्व में CrPC की धारा 144) · पूर्व-अनुमति की व्यवस्था बनाम निरंकुश विवेकाधिकार · आनुपातिकता का सिद्धांत (Doctrine of Proportionality) · विचारधारा-निरपेक्ष (Viewpoint-neutral) विनियमन · समय, स्थान और रीति पर नियंत्रण · अनुच्छेद 14 — प्रशासनिक कार्रवाई में समानता और अनुचित भेदभाव का निषेध · न्यायिक समीक्षा और रिट अधिकारिता (अनुच्छेद 226) · पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 30 — जुलूसों का विनियमन · विरोध का अधिकार बनाम सार्वजनिक सुविधा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 19(1)(b) — शांतिपूर्ण, निःशस्त्र सभा का अधिकार
- अनुच्छेद 19(3) — सभा पर युक्तियुक्त निर्बंधन के आधार
- अनुच्छेद 19(1)(a) — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ाव
- अनुच्छेद 19(1)(c) — संगठन या संघ बनाने का अधिकार
- अनुच्छेद 14 — विधि के समक्ष समता, भेदभाव-निषेध
- अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट-अधिकारिता
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची प्रविष्टि 1 और 2 — लोक व्यवस्था तथा पुलिस
अवधारणा प्रवाह
संगठन द्वारा पथ संचलन और रैलियों की अनुमति हेतु पुलिस को आवेदन → पुलिस द्वारा अनुमति न देना, मार्ग और त्योहारी भीड़ को कारण बताना → अनुमति न मिलने पर अनुच्छेद 226 के अंतर्गत मद्रास उच्च न्यायालय में रिट याचिका → न्यायालय की टिप्पणी: विचारधारा-निरपेक्ष और एकसमान व्यवहार का प्रश्न (अनुच्छेद 14) → अनुच्छेद 19(1)(b) बनाम 19(3): अधिकार और लोक व्यवस्था का संतुलन → लोक अभियोजक के साथ तिथि, समय और स्थान पर परामर्श का निर्देश → शर्तों के साथ अनुमति या तर्कसंगत अस्वीकृति का न्यायिक निर्णय
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. शांतिपूर्ण सम्मेलन और जुलूसों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 19(1)(b) भारत में रहने वाले सभी व्यक्तियों को, नागरिक और गैर-नागरिक दोनों को, शांतिपूर्वक और निरायुध एकत्र होने का अधिकार देता है।
2. अनुच्छेद 19(3) के अंतर्गत भारत की संप्रभुता और अखंडता तथा लोक व्यवस्था के हित में इस अधिकार पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं।
3. ‘लोक व्यवस्था’ संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची का विषय है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 19(1)(b) का अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 19(3) में संप्रभुता, अखंडता और लोक व्यवस्था के आधार पर निर्बंधन का प्रावधान है। कथन 3 सही है: लोक व्यवस्था राज्य सूची की प्रविष्टि 1 है। इसलिए केवल दो कथन सही हैं।
Q2. अभिकथन (A): सार्वजनिक मार्गों पर जुलूस या रैली निकालने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(b) के अंतर्गत निरपेक्ष नहीं है और राज्य उसके समय, स्थान और रीति को विनियमित कर सकता है।
कारण (R): अनुच्छेद 19(3) लोक व्यवस्था के हित में सम्मेलन की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन की अनुमति देता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, किंतु R गलत है
- A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में माना है कि सार्वजनिक स्थानों पर सम्मेलन का अधिकार विनियमन के अधीन है। इस विनियमन का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 19(3) है, इसलिए R, A की सही व्याख्या करता है। किंतु निर्बंधन युक्तियुक्त और आनुपातिक होने चाहिए, और पुलिस का निरंकुश विवेकाधिकार मान्य नहीं है।
Q3. निम्नलिखित वादों को उनके प्रतिपादित सिद्धांतों से सुमेलित कीजिए:
वाद — सिद्धांत
A. बाबूलाल पाराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1961) — 1. CrPC की धारा 144 को युक्तियुक्त निर्बंधन मानकर वैध ठहराया गया
B. हिम्मतलाल के. शाह बनाम पुलिस आयुक्त, अहमदाबाद (1973) — 2. सार्वजनिक सड़कों पर सभा की अनुमति देने या न देने में पुलिस के निरंकुश विवेकाधिकार को अमान्य ठहराया गया
C. अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) — 3. धारा 144 के आदेश तर्कसंगत और आनुपातिक होने चाहिए और न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं
D. अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (2020) — 4. विरोध के नाम पर सार्वजनिक मार्गों पर अनिश्चितकाल तक कब्ज़ा नहीं किया जा सकता
सही सुमेलन चुनिए:
- A-1, B-2, C-3, D-4
- A-2, B-1, C-3, D-4
- A-1, B-2, C-4, D-3
- A-3, B-2, C-1, D-4
उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — बाबूलाल पाराटे में धारा 144 की संवैधानिकता बरकरार रखी गई। हिम्मतलाल शाह में सभा के लिए अनुमति देने में निरंकुश विवेकाधिकार को अमान्य किया गया, जबकि विनियमन की शक्ति मान्य रही। अनुराधा भसीन में धारा 144 के आदेशों पर आनुपातिकता और न्यायिक समीक्षा की कसौटी लगाई गई। अमित साहनी (शाहीन बाग़) में सार्वजनिक मार्गों पर अनिश्चितकालीन कब्ज़े को अनुचित माना गया।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ “शांतिपूर्ण सम्मेलन और जुलूस की स्वतंत्रता तथा लोक व्यवस्था बनाए रखने की राज्य की शक्ति के बीच संतुलन संवैधानिक विवेक की कसौटी है।” हाल में मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष जुलूसों (रूट मार्च) की अनुमति के प्रकरण के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि अनुमति देने की प्रक्रिया को विचारधारा-निरपेक्ष और आनुपातिक बनाने के लिए कौन-से उपाय अपनाए जा सकते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: भूमिका: पृष्ठभूमि संक्षेप में दें। मद्रास उच्च न्यायालय ने पूछा कि संगठनों, राजनीतिक दलों या किसी भी सरकार के काल में जुलूस और रैली की अनुमति पुलिस क्यों नहीं देती। राज्य का पक्ष था कि प्रस्तावित मार्ग उपयुक्त नहीं हैं और त्योहारी मौसम में जनता को असुविधा होगी। न्यायालय ने तिथि, समय और स्थान पर पक्षकारों को आपसी चर्चा का निर्देश दिया। किसी संगठन के पक्ष या विपक्ष में टिप्पणी न करें।
1. संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का अधिकार देता है, जो केवल नागरिकों को प्राप्त है। अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(c) के साथ इसका संबंध बताएँ। अनुच्छेद 19(3) संप्रभुता, अखंडता और लोक व्यवस्था के आधार पर युक्तियुक्त निर्बंधन की अनुमति देता है। लोक व्यवस्था राज्य सूची की प्रविष्टि 1 है, अतः पुलिस की शक्ति राज्य के पास है।
2. कानूनी साधन: पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 30 और राज्य के समकक्ष पुलिस कानून, जिनमें जुलूसों के विनियमन और लाइसेंस की व्यवस्था है। BNSS की धारा 163 (पूर्व CrPC धारा 144) के आपातकालीन आदेश भी इसमें आते हैं। उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट अधिकारिता का उल्लेख करें।
3. न्यायिक सिद्धांत: बाबूलाल पाराटे (1961) और मधु लिमये (1971) में धारा 144 की वैधता बरकरार रखी गई। हिम्मतलाल शाह (1973) में विनियमन मान्य रहा, किंतु निरंकुश विवेकाधिकार अमान्य ठहराया गया। रामलीला मैदान घटना (2012) में सभा और विरोध के अधिकार की मूलभूत प्रकृति स्वीकारी गई। मज़दूर किसान शक्ति संगठन (2018) में विरोध के स्थान का विनियमन हुआ। अनुराधा भसीन (2020) में आनुपातिकता और तर्कसंगत आदेश की कसौटी लगी। अमित साहनी (2020) में सार्वजनिक मार्गों के अनिश्चितकालीन अवरोध की सीमा तय हुई।
4. समालोचना (संतुलित विवेचन): एक पक्ष यह है कि त्योहार, यातायात, संवेदनशील मार्ग और खुफिया सूचना जैसे आधारों पर समय, स्थान और रीति का नियंत्रण वैध है। दूसरा पक्ष यह है कि बार-बार अस्वीकृति या अस्पष्ट आधार पर अस्वीकृति अनुच्छेद 19(1)(b) को निष्प्रभावी करती है। अनुच्छेद 14 के अनुसार समान स्थिति वाले आयोजकों से समान व्यवहार होना चाहिए। पूरी तरह रोक की जगह शर्तों के साथ अनुमति कम प्रतिबंधात्मक उपाय है। अनुमति के लिए आवेदन करने वालों से भी अपेक्षा है कि वे निरायुध और शांतिपूर्ण रहें तथा शर्तों का पालन करें।
5. सुधार के उपाय: अनुमति के लिए स्पष्ट समय-सीमा वाली और ऑनलाइन प्रक्रिया बनाई जाए। अस्वीकृति के लिखित और तर्कसंगत कारण दिए जाएँ और अपील की व्यवस्था हो। वैकल्पिक मार्ग या समय सुझाने की प्रक्रिया हो, जैसा न्यायालय ने पक्षकारों की बैठक के निर्देश में किया। संगठन के विचार की जगह वस्तुनिष्ठ मानदंड जैसे भीड़ का आकार, मार्ग की क्षमता और पूर्व इतिहास आधार बनें। आयोजकों पर उत्तरदायित्व तय हो और पुलिस को संवेदनशीलता का प्रशिक्षण मिले। पुलिस सुधारों पर प्रकाश सिंह मामले (2006) के निर्देश भी प्रासंगिक हैं।
निष्कर्ष: विनियमन होना चाहिए, निषेध नहीं। जब तक निर्णय आनुपातिक, तर्कसंगत और विचारधारा-निरपेक्ष हैं, लोक व्यवस्था और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता दोनों की रक्षा हो सकती है।
स्रोत: The Hindu
Tamil Nadu PCS (TNPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: तमिलनाडु पुलिस द्वारा आरएसएस, द्रविड़ कषगम जैसे संगठनों द्वारा मार्ग यात्राओं की अनुमति देने से इनकार करने के संबंध में मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कारण सर्वाधिक उपयुक्त है?
- तमिलनाडु पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 30 के अंतर्गत पुलिस आयुक्त को मार्ग यात्राओं पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार है।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(बी) के अंतर्गत शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार सभी नागरिकों को प्राप्त है, अतः पुलिस अनुमति देने के लिए बाध्य है।
- तमिलनाडु सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार केवल राजनीतिक दलों को ही मार्ग यात्राओं की अनुमति दी जाती है।
- उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि पुलिस को मार्ग यात्राओं की अनुमति देने से इनकार करने का कोई वैधानिक आधार नहीं है।
उत्तर: तमिलनाडु पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 30 के अंतर्गत पुलिस आयुक्त को मार्ग यात्राओं पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार है। — तमिलनाडु पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 30 पुलिस आयुक्त को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए मार्ग यात्राओं पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार प्रदान करती है।
Mains: तमिलनाडु पुलिस द्वारा आरएसएस, द्रविड़ कषगम जैसे संगठनों द्वारा आयोजित मार्ग यात्राओं को अनुमति देने से इनकार करने के संबंध में मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में, पुलिस द्वारा मार्ग यात्राओं पर नियंत्रण रखने के वैधानिक एवं संवैधानिक आधार की विवेचना कीजिए। साथ ही, इस संदर्भ में पुलिस प्रशासन एवं नागरिकों के अधिकारों के मध्य संतुलन स्थापित करने के उपाय सुझाइए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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