27 Oct आईसीएआर-एमजीआईएफआरआई ने ‘खेत बचाओ अभियान 2026’ से कृषि में क्रांति की शुरुआत
✎ मृदा परीक्षण आधारित संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक पुनर्चक्रण और दलहनी अंतरवर्ती फसलें मृदा स्वास्थ्य, लागत-दक्षता और सतत उत्पादन की कुंजी हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — कृषि (फसल प्रतिरूप, मृदा स्वास्थ्य और उर्वरक प्रबंधन, कृषि अनुसंधान की भूमिका) | GS Paper III — पर्यावरण एवं सतत विकास (संसाधनों का कुशल उपयोग, जैविक पुनर्चक्रण)
- Prelims: आईसीएआर (ICAR) — कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के अधीन स्वायत्त शीर्ष निकाय, मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (Soil Health Card Scheme) — मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व संस्तुति, नाइट्रोजन स्थिरीकरण और दलहनी फसलें (राइज़ोबियम सहजीवन), मृदा में जैविक कार्बन और मृदा संरचना का संबंध, अंतरवर्तीय खेती (Intercropping) और फलदार बागों में फसल विविधीकरण, पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (Nutrient Based Subsidy — NBS), NPK उर्वरकों का संतुलित अनुपात और पोषक तत्वों का असंतुलन, बिहार में आम और लीची का उत्पादन
- Essay: उर्वरक-निर्भर कृषि से पोषक तत्व-कुशल कृषि की ओर: हरित क्रांति की सीमाएँ और आगे का मार्ग, मृदा स्वास्थ्य सुरक्षा ही खाद्य एवं पोषण सुरक्षा का आधार है
त्वरित पुनरावृत्ति: मृदा परीक्षण आधारित संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक पुनर्चक्रण और दलहनी अंतरवर्ती फसलें मृदा स्वास्थ्य, लागत-दक्षता और सतत उत्पादन की कुंजी हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
आईसीएआर-महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-MGIFRI), मोतिहारी, बिहार ने 27 अक्टूबर 2026 को पूर्वी चंपारण के मेहसी प्रखंड के कोठिया हरिराम गांव में खेत बचाओ अभियान 2026 के अंतर्गत किसान जागरूकता एवं क्षेत्रीय संवाद कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें 29 किसानों और प्रतिभागियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग, फसल अवशेष, गोबर की खाद और कंपोस्ट जैसे जैविक संसाधनों के पुनर्चक्रण, तथा आम और लीची के बागों में अंतरवर्तीय खेती और दलहनी फसलों की संभावनाओं पर चर्चा हुई। यह समाचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संस्थान-आधारित प्रसार (extension) की उस प्रक्रिया को दर्शाता है जिसमें वैज्ञानिक सिफारिशें सीधे किसानों तक पहुँचाई जाती हैं और लागत घटाने, मृदा की उर्वरता बनाए रखने तथा आय के स्रोत बढ़ाने पर बल दिया जाता है।
पृष्ठभूमि
- हरित क्रांति के बाद उर्वरकों का उपयोग तेज़ी से बढ़ा, किंतु कई क्षेत्रों में नाइट्रोजन की अधिकता और फॉस्फोरस-पोटाश की कमी से पोषक तत्वों का असंतुलन तथा मृदा की जैविक गुणवत्ता में गिरावट देखी गई।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना वर्ष 2015 में आरंभ हुई, जिसके अंतर्गत मृदा के नमूनों के परीक्षण के आधार पर किसानों को पोषक तत्व प्रबंधन की संस्तुति दी जाती है।
- बिहार का उत्तरी मैदान गंगा और उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित जलोढ़ मृदा से बना है, जो उपजाऊ है; पूर्वी चंपारण सहित यह क्षेत्र आम और लीची की खेती के लिए जाना जाता है।
- चंपारण सत्याग्रह (1917) के कारण इस क्षेत्र का ऐतिहासिक महत्व है, और संस्थान का नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखा गया है।
- आईसीएआर अनुसंधान और प्रसार के माध्यम से राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के साथ मिलकर वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को किसानों तक पहुँचाता है।
मृदा स्वास्थ्य, संतुलित उर्वरक उपयोग और अंतरवर्तीय खेती क्या है?
- मृदा स्वास्थ्य से तात्पर्य मृदा की उस क्षमता से है जिसके द्वारा वह पौधों को पोषक तत्व, जल और वायु उपलब्ध कराकर उत्पादकता बनाए रखती है। इसका मूल्यांकन मृदा परीक्षण से होता है।
- संतुलित उर्वरक उपयोग का अर्थ है नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश (NPK) तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों को फसल की आवश्यकता और मृदा परीक्षण परिणाम के अनुसार देना, ताकि अपव्यय, लागत और पर्यावरणीय हानि घटे।
- पोषक तत्व पुनर्चक्रण में फसल अवशेष, गिरी हुई पत्तियाँ, गोबर की खाद और कंपोस्ट जैसे जैविक स्रोतों को मृदा में वापस लाया जाता है, जिससे जैविक पदार्थ और मृदा संरचना में सुधार होता है।
- दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को राइज़ोबियम जीवाणुओं की सहायता से मृदा में स्थिर करती हैं, इसलिए फलदार बागों में अंतरवर्ती फसल के रूप में उनका महत्व है।
- अंतरवर्तीय खेती में मुख्य फसल (जैसे फलदार वृक्ष) के बीच अल्पकालिक फसलें उगाई जाती हैं। वृक्षों की आयु और छत्र विस्तार के अनुसार उपयुक्त फसल का चुनाव किया जाता है, जिससे भूमि उपयोग की दक्षता बढ़ती है।
- फसल विविधीकरण से एक ही फसल पर निर्भरता घटती है और किसानों की आय के स्रोत बढ़ते हैं, जो जलवायु-अनुकूल कृषि का भी एक घटक है।
- पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) व्यवस्था के अंतर्गत कुछ उर्वरकों पर सरकार द्वारा सब्सिडी दी जाती है, इसलिए संतुलित उपयोग से सार्वजनिक व्यय और किसान की लागत दोनों पर प्रभाव पड़ता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| कार्यक्रम का स्वरूप | आईसीएआर-एमजीआईएफआरआई (ICAR-MGIFRI) द्वारा पूर्वी चंपारण (बिहार) के मेहसी प्रखंड में आयोजित किसान जागरूकता एवं क्षेत्रीय संवाद कार्यक्रम, जिसमें 29 किसानों और प्रतिभागियों ने भाग लिया। यह वैज्ञानिक और कृषक के बीच प्रत्यक्ष संवाद का मॉडल है, न कि कोई वित्तीय सहायता योजना। |
| मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन | उर्वरक की मात्रा मृदा परीक्षण के परिणाम, फसल की आवश्यकता और बाग की परिस्थिति के आधार पर तय करने पर बल। इससे पोषक तत्वों का असंतुलन घटता है और उर्वरक-दक्षता बढ़ती है। |
| पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण | फसल अवशेष, गिरी हुई पत्तियाँ, गोबर की खाद और कंपोस्ट जैसे स्थानीय जैविक संसाधनों का उपयोग। इससे मृदा में जैविक पदार्थ बढ़ते हैं, संरचना सुधरती है और बाहरी आदानों पर निर्भरता घटती है। |
| आम एवं लीची आधारित फल-प्रणाली | पूर्वी चंपारण जैसे आम और लीची उत्पादक क्षेत्र में फलदार बागों का सतत प्रबंधन। जैविक और खनिज उर्वरकों का संतुलित संयोजन इस प्रणाली की दीर्घकालिक उत्पादकता का आधार है। |
| फलदार बागों में अंतरवर्ती खेती | बाग की आयु, वृक्षों के छत्र विस्तार और मौसमी नमी के अनुसार दलहनी तथा अन्य अनुकूल फसलें उगाना। इससे भूमि-उपयोग दक्षता बढ़ती है और किसानों की आय के स्रोत विविध होते हैं। |
महत्व
कृषि-पारिस्थितिक महत्व
- मृदा स्वास्थ्य को दीर्घकालिक उर्वरता का आधार मानकर उत्पादन की निरंतरता सुनिश्चित करना।
- जैविक पदार्थ और मृदा संरचना में सुधार से जल-धारण क्षमता और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है।
- बागों में अंतरवर्ती खेती से भूमि का अधिक कुशल उपयोग होता है।
आर्थिक महत्व
- अंधाधुंध उर्वरक उपयोग से खेती की लागत बढ़ती है; संतुलित उपयोग से लागत नियंत्रित होती है।
- दलहनी अंतरवर्ती फसलों से किसानों को बागों के साथ अतिरिक्त आय का अवसर मिलता है।
- आर्थिक रूप से व्यवहार्य दृष्टिकोण फल-आधारित कृषि की लाभप्रदता बढ़ाने में सहायक है।
पर्यावरणीय महत्व
- उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग से पोषक तत्वों का बहाव और भूजल प्रदूषण का खतरा रहता है; संतुलित उपयोग इसे घटाता है।
- फसल अवशेषों और जैविक सामग्री का पुनर्चक्रण अपशिष्ट प्रबंधन और मृदा कार्बनिक कार्बन के संरक्षण से जुड़ा है।
- पर्यावरण-सततता की दृष्टि जलवायु-अनुकूल कृषि की ओर संक्रमण का व्यावहारिक रूप है।
प्रशासनिक और अनुसंधान-विस्तार महत्व
- कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के अंतर्गत आने वाले ICAR-MGIFRI द्वारा अनुसंधान-परिणामों को खेत स्तर तक ले जाने का प्रयास।
- वैज्ञानिक और कृषक के बीच संवाद से किसानों के अनुभव अनुसंधान की प्राथमिकताओं को दिशा दे सकते हैं।
चुनौतियाँ
1. उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग और पोषक असंतुलन
- परंपरागत मात्रा के आधार पर उर्वरक डालने से लागत बढ़ती है और मृदा में पोषक तत्वों का असंतुलन पैदा होता है।
- मृदा परीक्षण की सीमित पहुँच के कारण किसान अनुमान के आधार पर उर्वरक का चयन करते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: कृषि, मृदा संरक्षण और सतत कृषि
2. मृदा स्वास्थ्य के आंकड़ों की स्थानीय उपलब्धता
- मृदा परीक्षण के परिणाम किसान तक समय पर और समझने योग्य रूप में पहुँचना आवश्यक है।
- परीक्षण परिणामों को उर्वरक-सिफारिश में बदलने के लिए कृषि-स्तर की तकनीकी क्षमता चाहिए।
यूपीएससी लिंक: GS-3: कृषि, विस्तार सेवाएँ और तकनीकी हस्तांतरण
3. जैविक संसाधनों की उपलब्धता और प्रबंधन
- फसल अवशेषों का खेत में ही उपयोग अक्सर जलाने या चारे के रूप में बाधित होता है।
- कंपोस्ट और गोबर की खाद बनाने की प्रक्रिया में समय, श्रम और सुविधा की कमी आती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पर्यावरण, जैविक खेती और अपशिष्ट प्रबंधन
4. फलदार बागों में अंतरवर्ती खेती की सीमाएँ
- वृक्षों के बढ़ते छत्र से नीचे की फसल को प्रकाश और नमी कम मिलती है, इसलिए फसल का चयन सावधानी से करना होता है।
- मौसमी नमी की अनिश्चितता और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फसलों की उपलब्धता चुनौती बनी रहती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: फसल विविधीकरण और भूमि-उपयोग
5. छोटे किसानों की पहुँच और आय-स्थिरता
- कार्यक्रम में सीमित संख्या में प्रतिभागी शामिल होने से व्यापक विस्तार की चुनौती स्पष्ट होती है।
- फल-आधारित कृषि में बाजार-मूल्य का उतार-चढ़ाव आय की स्थिरता को प्रभावित करता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: कृषि विपणन और किसान आय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| उर्वरक का असंतुलित उपयोग | लागत में वृद्धि, मृदा के पोषक संतुलन में गिरावट और उत्पादकता में अस्थिरता। |
| मृदा परीक्षण की पहुँच | परीक्षण परिणाम समय पर न मिलने से उर्वरक-सिफारिश का वैज्ञानिक आधार कमजोर पड़ता है। |
| जैविक अवशेषों का प्रबंधन | फसल अवशेषों को जलाने की प्रवृत्ति से मृदा में जैविक पदार्थ घटते हैं और वायु प्रदूषण बढ़ता है। |
| बागों में अंतरवर्ती फसल का चयन | छत्र के नीचे कम प्रकाश और नमी के कारण गलत फसल चुनने से उपज और आय दोनों प्रभावित हो सकते हैं। |
| विस्तार सेवाओं का दायरा | प्रत्यक्ष संवाद का प्रभाव सीमित रहता है, जब तक व्यापक और नियमित विस्तार तंत्र न हो। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- खेत बचाओ अभियान 2026 (Khet Bachao Abhiyan 2026)
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (Soil Health Card Scheme)
आगे की राह
- मृदा परीक्षण को नियमित बनाकर परिणामों के आधार पर उर्वरक-सिफारिश को खेत स्तर तक पहुँचाना चाहिए।
- पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण के लिए कंपोस्ट और गोबर की खाद बनाने की व्यावहारिक सुविधाएँ गाँव स्तर पर विकसित करनी चाहिए।
- फसल अवशेषों के खेत में उपयोग को प्रोत्साहित किया जाए और उनके जलाने से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए।
- आम और लीची के बागों के लिए आयु और छत्र-विस्तार के अनुसार अंतरवर्ती फसलों की स्थानीय सूची तैयार की जाए।
- दलहनी अंतरवर्ती फसलों के लिए बीज, बाजार और खरीद की व्यवस्था सुनिश्चित कर आय-स्थिरता बढ़ानी चाहिए।
- कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य कृषि विभाग के बीच समन्वय से विस्तार सेवाओं का दायरा बढ़ाया जाए।
- फल-आधारित कृषि में मूल्य-संवर्धन और प्रसंस्करण को बढ़ावा देकर बाजार-जोखिम कम किया जाए।
- किसानों के अनुभव और चुनौतियों को अनुसंधान की प्राथमिकताओं में शामिल कर स्थानीय समाधान विकसित किए जाएँ।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन · संतुलित उर्वरक उपयोग · सतत बागवानी · पोषक तत्व पुनर्चक्रण · फसल विविधीकरण · अंतरवर्तीय खेती · जैविक संसाधन · कृषि उत्पादकता · जलवायु-अनुकूल कृषि · किसान जागरूकता कार्यक्रम
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 48: कृषि का आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से संगठन
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण संरक्षण और सुधार का राज्य-दायित्व
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची प्रविष्टि 14: कृषि विषय की राज्य-जिम्मेदारी
अवधारणा प्रवाह
मृदा परीक्षण से मृदा में पोषक तत्वों की वास्तविक स्थिति का पता चलता है। → परीक्षण-परिणाम और फसल की आवश्यकता के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग तय होता है। → फसल अवशेष, पत्तियाँ, गोबर की खाद और कंपोस्ट के पुनर्चक्रण से मृदा में जैविक पदार्थ बढ़ते हैं। → बढ़ा हुआ जैविक पदार्थ मृदा संरचना और पोषक तत्वों की उपलब्धता सुधारता है। → फलदार बागों में उपयुक्त अंतरवर्ती फसलों से भूमि-उपयोग और आय के स्रोत विविध होते हैं। → संसाधनों की कुशल खपत से उत्पादन-लागत घटती है और पर्यावरणीय दबाव कम होता है। → सतत उत्पादन और आर्थिक व्यवहार्यता से किसानों की आत्मनिर्भरता और जलवायु-अनुकूल आजीविका मजबूत होती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. खेत बचाओ अभियान 2026 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य, संतुलित उर्वरक उपयोग और निरंतर बागवानी प्रबंधन को बढ़ावा देना है।
2. यह अभियान केवल रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को हतोत्साहित करता है और जैविक खेती पर पूर्णतः केंद्रित है।
3. कार्यक्रम में आम और लीची के बागों में अंतरवर्तीय खेती तथा फसल विविधीकरण पर जोर दिया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि अभियान का मुख्य उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग और सतत बागवानी को बढ़ावा देना है। कथन 2 गलत है क्योंकि अभियान संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर देता है, जिसमें जैविक संसाधनों के साथ खनिज उर्वरकों का संतुलित उपयोग भी शामिल है, न कि केवल जैविक खेती पर पूर्ण ध्यान। कथन 3 सही है क्योंकि कार्यक्रम में फलदार बागों में अंतरवर्तीय खेती और फसल विविधीकरण की संभावनाओं पर प्रकाश डाला गया।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से मृदा स्वास्थ्य में सुधार और बाहरी संसाधनों पर निर्भरता कम करने में सहायक हो सकता/सकते है/हैं?
1. फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण
2. गोबर की खाद का उपयोग
3. कंपोस्ट का प्रयोग
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — फसल अवशेषों, गोबर की खाद और कंपोस्ट जैसे जैविक संसाधनों का पुनर्चक्रण मृदा में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने, मृदा की संरचना और पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार करने तथा बाहरी संसाधनों पर निर्भरता कम करने में सहायक होता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और सतत बागवानी पद्धतियाँ कृषि उत्पादकता तथा किसानों की आय में वृद्धि के लिए किस प्रकार महत्वपूर्ण हैं? खेत बचाओ अभियान 2026 के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: मृदा स्वास्थ्य और सतत बागवानी का संक्षिप्त परिचय दें तथा कृषि में इनके महत्व को रेखांकित करें।
2. मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन का महत्व:
क. पोषक तत्व उपलब्धता और उपयोग दक्षता: मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग।
ख. जैविक पदार्थ और मृदा संरचना: फसल अवशेष, गोबर की खाद, कंपोस्ट का पुनर्चक्रण।
ग. रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में कमी: लागत प्रभावी और पर्यावरण अनुकूल पद्धतियाँ।
3. सतत बागवानी पद्धतियों का महत्व:
क. फसल विविधीकरण: आम और लीची जैसे बागों में अंतरवर्तीय खेती (दलहनी फसलें)।
ख. संसाधन उपयोग दक्षता: भूमि और जल संसाधनों का कुशल उपयोग।
ग. आय के अतिरिक्त स्रोत: किसानों के लिए आर्थिक स्थिरता।
घ. जलवायु-अनुकूल कृषि: चरम मौसम की घटनाओं के प्रति लचीलापन।
4. खेत बचाओ अभियान 2026 का संदर्भ:
क. अभियान के उद्देश्य: संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, पोषक तत्व पुनर्चक्रण, फसल विविधीकरण और बागों का सतत प्रबंधन।
ख. आईसीएआर-एमजीआईएफआरआई की भूमिका: किसान जागरूकता और क्षेत्रीय संवाद कार्यक्रम।
ग. पूर्वी चंपारण में प्रभाव: आम और लीची उत्पादक क्षेत्रों में किसानों की आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करना।
5. चुनौतियाँ और आगे की राह: किसानों के अनुभवों और चुनौतियों का उल्लेख, नीतिगत समर्थन और अनुसंधान की आवश्यकता।
6. निष्कर्ष: मृदा स्वास्थ्य और सतत बागवानी के समग्र लाभों को संक्षेप में प्रस्तुत करें तथा दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि में इनकी भूमिका पर बल दें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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