एनईईटी विकलांगता मामला: उच्च न्यायालय ने फिर से चिकित्सा मूल्यांकन का आदेश दिया

NEET disability case: HC orders fresh medical assessment — labelled illustration

एनईईटी विकलांगता मामला: उच्च न्यायालय ने फिर से चिकित्सा मूल्यांकन का आदेश दिया

✎ दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन के लिए एक व्यापक कानून है, जो 21 निर्दिष्ट दिव्यांगताओं को मान्यता देता है, जिसमें थैलेसीमिया भी शामिल है, और समावेशी समाज सुनिश्चित करने के…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य, शिक्षा, सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप  |  GS Paper II — भारतीय संविधान — महत्त्वपूर्ण प्रावधान, न्यायिक समीक्षा
  • Prelims: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, निर्दिष्ट दिव्यांगताएँ, थैलेसीमिया, NEET, उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार, मेडिकल असेसमेंट बोर्ड
  • Essay: समावेशी समाज का निर्माण: चुनौतियाँ और समाधान, कानून का शासन और न्यायिक सक्रियता: एक विश्लेषण

त्वरित पुनरावृत्ति: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन के लिए एक व्यापक कानून है, जो 21 निर्दिष्ट दिव्यांगताओं को मान्यता देता है, जिसमें थैलेसीमिया भी शामिल है, और समावेशी समाज सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न प्रावधान करता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

ओडिशा उच्च न्यायालय ने NEET की एक उम्मीदवार को थैलेसीमिया ट्रेट (Thalassemia Trait) के कारण दिव्यांगता का दर्जा देने से इनकार करने वाली मेडिकल असेसमेंट बोर्ड की रिपोर्ट को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत थैलेसीमिया को एक निर्दिष्ट दिव्यांगता के रूप में मान्यता देने पर जोर दिया और DMET को चार दिनों के भीतर उम्मीदवार की दिव्यांगता प्रतिशत का आकलन करने के लिए एक नया बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया। यह निर्णय दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा और समावेशी शिक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

  • एक NEET उम्मीदवार ने थैलेसीमिया ट्रेट के कारण 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करते हुए दिव्यांग श्रेणी में आवेदन किया था।
  • एक मेडिकल बोर्ड ने शुरू में राय दी कि उसकी स्थिति से कोई महत्त्वपूर्ण कार्यात्मक दिव्यांगता (functional disability) नहीं होती है।
  • उम्मीदवार ने इस निष्कर्ष को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
  • DMET द्वारा प्रस्तुत नवीनतम मेडिकल असेसमेंट बोर्ड की रिपोर्ट में कहा गया था कि थैलेसीमिया ट्रेट एक लक्षणहीन वाहक अवस्था है जिसमें महत्त्वपूर्ण कार्यात्मक दिव्यांगता नहीं होती है, और इसलिए यह दिव्यांगता प्रमाण पत्र के लिए निर्धारित मानदंडों को पूरा नहीं करती है।
  • उच्च न्यायालय ने पाया कि बोर्ड ने अपने आकलन को केवल कार्यात्मक या लोकोमोटर दिव्यांगता (locomotor disability) तक सीमित रखा, जबकि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की अनुसूची में थैलेसीमिया को ‘रक्त विकार’ के तहत एक निर्दिष्ट दिव्यांगता के रूप में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।
  • न्यायालय ने बोर्ड के निष्कर्ष को अधिनियम के विपरीत मानते हुए रद्द कर दिया और नए सिरे से आकलन का आदेश दिया।

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) क्या है?

  • यह अधिनियम दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UN Convention on the Rights of Persons with Disabilities) के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए अधिनियमित किया गया था।
  • यह अधिनियम दिव्यांग व्यक्तियों (PWD) के अधिकारों और गरिमा की सुरक्षा, संरक्षण और संवर्धन के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
  • यह अधिनियम दिव्यांगता की 21 श्रेणियों को ‘निर्दिष्ट दिव्यांगताएँ’ (specified disabilities) के रूप में मान्यता देता है, जिसमें थैलेसीमिया जैसे रक्त विकार भी शामिल हैं।
  • यह ‘बेंचमार्क दिव्यांगता’ (benchmark disability) की अवधारणा को परिभाषित करता है, जिसका अर्थ है कम से कम 40 प्रतिशत की निर्दिष्ट दिव्यांगता। बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्ति विभिन्न सरकारी योजनाओं और लाभों के लिए पात्र होते हैं।
  • अधिनियम शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक भवनों तक पहुँच, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समानता और गैर-भेदभाव सुनिश्चित करता है।
  • यह दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सरकारी प्रतिष्ठानों में आरक्षण का प्रावधान करता है।
  • अधिनियम में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों के उल्लंघन के मामलों को संबोधित करने के लिए विशेष न्यायालयों के गठन का भी प्रावधान है।
  • यह अधिनियम दिव्यांगता के आकलन और प्रमाणन के लिए एक मानकीकृत प्रक्रिया स्थापित करता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 यह अधिनियम दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन सुनिश्चित करता है, जिसमें थैलेसीमिया जैसी विशिष्ट दिव्यांगताएँ शामिल हैं।
विशिष्ट दिव्यांगताएँ अधिनियम की अनुसूची में थैलेसीमिया को ‘रक्त विकार’ के रूप में एक विशिष्ट दिव्यांगता के रूप में मान्यता दी गई है, जो कार्यात्मक दिव्यांगता से परे है।
चिकित्सा मूल्यांकन बोर्ड यह बोर्ड दिव्यांगता प्रतिशत का आकलन करने के लिए जिम्मेदार है, लेकिन इसे अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप कार्य करना होता है।
न्यायिक समीक्षा उच्च न्यायालयों के पास ऐसे प्रशासनिक निर्णयों की समीक्षा करने की शक्ति है जो कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं, जैसा कि इस मामले में देखा गया।
NEET प्रवेश प्रक्रिया यह राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा है जो चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित की जाती है, जिसमें दिव्यांग व्यक्तियों के लिए आरक्षण का प्रावधान है।

महत्व

सामाजिक महत्व

  • यह निर्णय दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा को मजबूत करता है, विशेषकर उन लोगों के लिए जिनकी दिव्यांगता स्पष्ट रूप से कार्यात्मक नहीं दिखती है लेकिन कानून द्वारा मान्यता प्राप्त है।
  • यह सुनिश्चित करता है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत मान्यता प्राप्त सभी दिव्यांगताओं को प्रवेश प्रक्रियाओं और अन्य लाभों में उचित सम्मान मिले।

न्यायिक महत्व

  • यह न्यायिक सक्रियता का एक उदाहरण है जहां न्यायपालिका ने एक प्रशासनिक निकाय के त्रुटिपूर्ण निर्णय को ठीक किया है, जिससे कानून का सही क्रियान्वयन सुनिश्चित हुआ है।
  • यह मामला चिकित्सा मूल्यांकन बोर्डों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है कि उन्हें दिव्यांगता का आकलन करते समय दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रावधानों का सख्ती से पालन करना चाहिए।

शासनिक महत्व

  • यह निर्णय सरकारी एजेंसियों और मूल्यांकन बोर्डों को दिव्यांगता के कानूनी दायरे और उसके निहितार्थों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगा।
  • यह दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने में सहायक होगा, जिससे योग्य उम्मीदवारों को उनके अधिकार मिल सकें।

चुनौतियाँ

1. दिव्यांगता की परिभाषा और आकलन

  • चिकित्सा बोर्डों द्वारा दिव्यांगता की परिभाषा को केवल कार्यात्मक या लोकोमोटर दिव्यांगता तक सीमित रखना, जबकि कानून में अन्य प्रकार की दिव्यांगताओं को भी मान्यता प्राप्त है।
  • थैलेसीमिया जैसी ‘अदृश्य’ दिव्यांगताओं का सही आकलन करने में विशेषज्ञता और संवेदनशीलता की कमी।

2. कानूनों का क्रियान्वयन

  • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 जैसे कानूनों के प्रावधानों को जमीनी स्तर पर सही ढंग से लागू करने में प्रशासनिक निकायों की विफलता।
  • कानून के तहत मान्यता प्राप्त विशिष्ट दिव्यांगताओं के बारे में मूल्यांकनकर्ताओं के बीच जागरूकता की कमी।

3. समयबद्धता और प्रक्रियात्मक दक्षता

  • प्रवेश प्रक्रिया के दौरान दिव्यांगता आकलन में देरी, जिससे छात्रों को अनावश्यक मानसिक तनाव और अवसर खोने का जोखिम होता है।
  • अपीलीय प्रक्रियाओं में लगने वाला समय, जो छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।

4. चिकित्सा शिक्षा में समावेशिता

  • चिकित्सा पाठ्यक्रमों में दिव्यांग छात्रों के लिए समावेशी वातावरण और उचित सुविधाओं की कमी।
  • दिव्यांग छात्रों के लिए आरक्षण नीति के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधाएँ।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
दिव्यांगता की संकीर्ण व्याख्या चिकित्सा बोर्डों द्वारा दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में परिभाषित व्यापक दिव्यांगता श्रेणियों को अनदेखा करना।
कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन अधिनियम की अनुसूची में थैलेसीमिया को विशिष्ट दिव्यांगता के रूप में मान्यता दिए जाने के बावजूद, इसे अस्वीकृत करना।
प्रवेश प्रक्रिया में बाधा गलत मूल्यांकन के कारण योग्य दिव्यांग उम्मीदवारों को NEET जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में उनके अधिकारों से वंचित करना।
प्रशासनिक अक्षमता चिकित्सा मूल्यांकन बोर्डों द्वारा कानून की सही व्याख्या करने और उसे लागू करने में विफलता।
न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता प्रशासनिक त्रुटियों को सुधारने के लिए बार-बार न्यायपालिका पर निर्भरता, जो व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाती है।

आगे की राह

  • चिकित्सा मूल्यांकन बोर्डों के सदस्यों के लिए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और उसकी अनुसूची में परिभाषित विशिष्ट दिव्यांगताओं पर व्यापक प्रशिक्षण और संवेदीकरण कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
  • दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को मानकीकृत किया जाए ताकि अधिनियम के प्रावधानों का सभी बोर्डों द्वारा समान रूप से पालन किया जा सके।
  • थैलेसीमिया जैसी रक्त विकारों से संबंधित दिव्यांगता के आकलन के लिए विशेष दिशानिर्देश और प्रोटोकॉल विकसित किए जाएँ, जो केवल कार्यात्मक दिव्यांगता पर केंद्रित न हों।
  • दिव्यांगता आकलन और प्रमाणन प्रक्रिया को समयबद्ध और पारदर्शी बनाया जाए, विशेषकर प्रवेश परीक्षाओं के दौरान, ताकि छात्रों को अनावश्यक देरी का सामना न करना पड़े।
  • अपीलीय तंत्र को मजबूत और सुलभ बनाया जाए ताकि उम्मीदवार गलत निर्णयों के खिलाफ शीघ्रता से अपील कर सकें।
  • सरकार को दिव्यांगता के विभिन्न रूपों के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाने चाहिए, जिससे समाज में अधिक समावेशिता आ सके।
  • चिकित्सा शिक्षा संस्थानों को दिव्यांग छात्रों के लिए आवश्यक सुविधाओं और सहायक प्रौद्योगिकियों को सुनिश्चित करना चाहिए ताकि वे बिना किसी बाधा के अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 · निर्दिष्ट दिव्यांगताएँ · थैलेसीमिया · चिकित्सा मूल्यांकन बोर्ड · उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार · न्यायिक समीक्षा · संवैधानिक अधिकार · समानता का अधिकार · NEET प्रवेश प्रक्रिया · समावेशी शिक्षा

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘कानून के समक्ष समानता’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 15’, ‘note’: ‘भेदभाव का प्रतिषेध’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 16’, ‘note’: ‘लोक नियोजन में अवसर की समानता’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}

अवधारणा प्रवाह

NEET उम्मीदवार थैलेसीमिया के साथ दिव्यांगता प्रमाण पत्र प्रस्तुत करता है।  →  चिकित्सा मूल्यांकन बोर्ड थैलेसीमिया को कार्यात्मक दिव्यांगता न मानकर अस्वीकृत करता है।  →  उम्मीदवार उच्च न्यायालय में बोर्ड के निर्णय को चुनौती देता है।  →  उच्च न्यायालय दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की अनुसूची का उल्लेख करता है।  →  अधिनियम में थैलेसीमिया को विशिष्ट दिव्यांगता के रूप में मान्यता प्राप्त है।  →  उच्च न्यायालय बोर्ड के निर्णय को रद्द करता है और नए मूल्यांकन का आदेश देता है।  →  नया बोर्ड अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार दिव्यांगता प्रतिशत का आकलन करेगा।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) थैलेसीमिया को एक निर्दिष्ट दिव्यांगता के रूप में मान्यता देता है।
2. यह अधिनियम केंद्र सरकार को दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है।
3. अधिनियम के तहत, दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी करने का अधिकार केवल राज्य सरकारों के पास है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की अनुसूची में थैलेसीमिया को रक्त विकार के तहत एक निर्दिष्ट दिव्यांगता के रूप में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। कथन 2 भी सही है क्योंकि अधिनियम केंद्र सरकार को नियमों के माध्यम से कार्यान्वयन सुनिश्चित करने का अधिकार देता है। कथन 3 गलत है क्योंकि दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी करने के लिए सक्षम प्राधिकारी केंद्र और राज्य दोनों सरकारों द्वारा अधिसूचित किए जा सकते हैं, और यह केवल राज्य सरकारों तक सीमित नहीं है।

Q2. अभिकथन (A): उच्च न्यायालयों के पास प्रशासनिक निर्णयों की न्यायिक समीक्षा करने की शक्ति है, जिसमें चिकित्सा मूल्यांकन बोर्डों द्वारा दिए गए निर्णय भी शामिल हैं।
कारण (R): भारत में न्यायिक समीक्षा की शक्ति संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है। उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार प्राप्त है, जिसके तहत वे प्रशासनिक निर्णयों की वैधता और संवैधानिकता की समीक्षा कर सकते हैं। चिकित्सा मूल्यांकन बोर्डों के निर्णय भी इसके दायरे में आते हैं। कारण (R) भी सही है। केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक समीक्षा को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा घोषित किया था। चूंकि न्यायिक समीक्षा की शक्ति के कारण ही उच्च न्यायालय प्रशासनिक निर्णयों की समीक्षा कर पाते हैं, इसलिए R, A की सही व्याख्या है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत ‘निर्दिष्ट दिव्यांगताओं’ की अवधारणा की व्याख्या कीजिए। हाल ही में NEET प्रवेश से संबंधित उड़ीसा उच्च न्यायालय के निर्णय के संदर्भ में, दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों के प्रभावी कार्यान्वयन में न्यायिक हस्तक्षेप की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act, 2016) का संक्षिप्त परिचय और इसका उद्देश्य।
2. **निर्दिष्ट दिव्यांगताएँ:** अधिनियम की धारा 2(s) और अनुसूची के तहत ‘निर्दिष्ट दिव्यांगताओं’ की अवधारणा को विस्तार से समझाएँ। इसमें शामिल विभिन्न श्रेणियों (जैसे रक्त विकार, न्यूरोलॉजिकल स्थितियाँ) का उल्लेख करें और थैलेसीमिया को रक्त विकार के रूप में शामिल करने पर विशेष ध्यान दें।
3. **न्यायिक हस्तक्षेप की भूमिका:**
* **उड़ीसा उच्च न्यायालय का निर्णय:** NEET मामले में उच्च न्यायालय के निर्णय का विवरण दें, जिसमें चिकित्सा मूल्यांकन बोर्ड द्वारा थैलेसीमिया को कार्यात्मक दिव्यांगता तक सीमित रखने की त्रुटि को उजागर किया गया और अधिनियम के तहत इसकी वैधानिक मान्यता पर जोर दिया गया।
* **न्यायिक समीक्षा का महत्व:** बताएं कि कैसे न्यायिक समीक्षा (अनुच्छेद 226 और 32) दिव्यांग व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों (समानता का अधिकार, गरिमा का अधिकार) की रक्षा करती है।
* **कार्यान्वयन में बाधाएँ:** प्रशासनिक निकायों द्वारा अधिनियम की गलत व्याख्या या अपर्याप्त कार्यान्वयन जैसी बाधाओं को उजागर करें।
* **सकारात्मक प्रभाव:** न्यायिक हस्तक्षेप से नीतिगत सुधार, जागरूकता में वृद्धि और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समावेशी अवसरों के निर्माण पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों पर चर्चा करें।
* **सीमाएँ/चुनौतियाँ:** न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं पर भी संक्षिप्त चर्चा करें, जैसे कि प्रत्येक मामले में हस्तक्षेप की आवश्यकता, न्यायिक सक्रियता की बहस, और प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता।
4. **निष्कर्ष:** दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा और समावेशी समाज के निर्माण में विधायी प्रावधानों और न्यायिक सक्रियता के सहजीवी संबंध पर बल देते हुए निष्कर्ष दें।

स्रोत: orissapost.com


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