09 Aug कृष्णा जल नीति पर YSRCP का तीखा हमला: किसानों को क्यों मिल रही नाराज़गी?

✎ कृष्णा नदी जल विवाद भारत में अंतर-राज्यीय जल प्रबंधन की जटिलताओं और कृषि नीतियों के महत्व को उजागर करता है, जहाँ संवैधानिक प्रावधानों और न्यायाधिकरणों के माध्यम से जल बंटवारे का प्रयास किया जाता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान और राजव्यवस्था: संघवाद, अंतर-राज्यीय जल विवाद, केंद्र-राज्य संबंध | GS Paper III — अर्थव्यवस्था: कृषि, सिंचाई, जल संसाधन प्रबंधन, फसल पैटर्न
- Prelims: कृष्णा नदी, अंतर-राज्यीय जल विवाद, कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT), जलयुक्त शिवार योजना, खरीफ फसल, श्रीशैलम बांध, जुराला परियोजना, पट्टिसीमा परियोजना
- Essay: भारत में जल प्रबंधन की चुनौतियाँ और समाधान, कृषि संकट और सरकारी नीतियां: एक आलोचनात्मक विश्लेषण
त्वरित पुनरावृत्ति: कृष्णा नदी जल विवाद भारत में अंतर-राज्यीय जल प्रबंधन की जटिलताओं और कृषि नीतियों के महत्व को उजागर करता है, जहाँ संवैधानिक प्रावधानों और न्यायाधिकरणों के माध्यम से जल बंटवारे का प्रयास किया जाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
YSRCP (युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी) के महासचिव एम.वी.एस. नागि रेड्डी ने आंध्र प्रदेश सरकार की कृष्णा नदी के पानी के उपयोग और कृषि नीतियों की आलोचना की है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सूखाग्रस्त क्षेत्रों और कृष्णा डेल्टा में सिंचाई के लिए उपलब्ध कृष्णा जल का उपयोग करने में विफल रही है, और किसानों को खरीफ मौसम में धान की खेती न करने की सलाह दे रही है, जबकि डेल्टा क्षेत्र में धान प्रमुख आर्थिक गतिविधि है।
पृष्ठभूमि
- कृष्णा नदी भारत की प्रमुख नदियों में से एक है, जो महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्यों से होकर बहती है।
- कृष्णा नदी जल विवाद इन चारों राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर लंबे समय से चला आ रहा है, जिसके समाधान के लिए कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (Krishna Water Disputes Tribunal – KWDT) का गठन किया गया है।
- कृष्णा डेल्टा आंध्र प्रदेश का एक महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र है, जहाँ धान, गन्ना और जलीय कृषि (aquaculture) प्रमुख फसलें और आर्थिक गतिविधियाँ हैं।
- सिंचाई परियोजनाओं जैसे जुराला परियोजना, श्रीशैलम जलाशय, पुलीचिंतला परियोजना, हंड्री-नीवा और मुचुमर्री लिफ्ट योजनाएं कृष्णा बेसिन में जल प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- राज्य सरकारें अक्सर जल उपलब्धता, वर्षा पैटर्न और फसल विविधीकरण (crop diversification) को ध्यान में रखते हुए किसानों को फसल पैटर्न पर सलाह देती हैं।
- पट्टिसीमा लिफ्ट सिंचाई परियोजना गोदावरी नदी के पानी को कृष्णा नदी बेसिन में मोड़ने के लिए डिज़ाइन की गई एक महत्वपूर्ण परियोजना है, जिसका उद्देश्य कृष्णा डेल्टा की सिंचाई आवश्यकताओं को पूरा करना है।
- न्यूनतम ड्रॉडाउन स्तर (Minimum Drawdown Level – MDDL) वह न्यूनतम जल स्तर है जिस पर जलाशय से पानी निकाला जा सकता है, खासकर बिजली उत्पादन या सिंचाई के लिए।
अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत, संसद कानून द्वारा किसी भी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान कर सकती है।
- संसद ने इस शक्ति का प्रयोग करते हुए नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 (River Boards Act, 1956) और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State Water Disputes Act, 1956) अधिनियमित किए हैं।
- अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 केंद्र सरकार को किसी भी राज्य के अनुरोध पर जल विवादों के समाधान के लिए एक न्यायाधिकरण (Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है।
- इन न्यायाधिकरणों के निर्णय अंतिम और संबंधित राज्यों के लिए बाध्यकारी होते हैं, और इन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय का कोई क्षेत्राधिकार नहीं होता है।
- जल विवादों के मुख्य कारण नदी बेसिन राज्यों के बीच पानी की उपलब्धता, उपयोग पैटर्न, ऐतिहासिक अधिकार और नई सिंचाई/बिजली परियोजनाओं का निर्माण होते हैं।
- कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT-I और KWDT-II) कृष्णा नदी के जल बंटवारे से संबंधित प्रमुख न्यायाधिकरण हैं, जिन्होंने विभिन्न राज्यों के लिए जल आवंटन निर्धारित किए हैं।
- जल एक राज्य सूची का विषय है, लेकिन अंतर-राज्यीय नदी जल का प्रबंधन और विनियमन संघ सूची के तहत संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
- ये विवाद अक्सर राज्यों के बीच राजनीतिक तनाव और कृषि संकट का कारण बनते हैं, जिससे किसानों की आजीविका पर सीधा असर पड़ता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कृष्णा नदी जल बंटवारा | यह अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों और उनके समाधान के महत्व को दर्शाता है। |
| जुराला, श्रीशैलम, पुलिचंतला परियोजनाएँ | ये जल भंडारण और सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे हैं, जो कृषि उत्पादकता को प्रभावित करते हैं। |
| हैंड्री-नीवा और मुचुमर्री लिफ्ट योजनाएँ | ये सूखा-प्रवण क्षेत्रों में जल पहुँचाने और क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने में सहायक हैं। |
| खरीफ मौसम में धान की खेती | यह क्षेत्र की प्रमुख आर्थिक गतिविधि है और किसानों की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण है। |
| पट्टिसीमा परियोजना | यह गोदावरी जल को कृष्णा डेल्टा तक पहुँचाकर जल सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करती है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- कृष्णा डेल्टा क्षेत्र में धान, गन्ना और जलीय कृषि प्रमुख आर्थिक गतिविधियाँ हैं, जो लाखों किसानों की आजीविका का आधार हैं।
- जल की अनुपलब्धता या देरी से कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होती है और खाद्य सुरक्षा को खतरा होता है।
सामाजिक महत्व
- जल वितरण से संबंधित नीतियाँ सीधे तौर पर किसानों, विशेषकर बटाईदारों के जीवन को प्रभावित करती हैं, जिन्होंने खेती में निवेश किया होता है।
- जल की कमी से कृषि संकट गहराता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ सकती है।
प्रशासनिक एवं नीतिगत महत्व
- यह घटना अंतर-राज्यीय जल विवादों के प्रबंधन और राज्य सरकारों की जल नीति निर्माण की क्षमता पर प्रकाश डालती है।
- जल संसाधनों का कुशल उपयोग और वितरण सुनिश्चित करना सरकारों के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है, खासकर जब विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकताएँ टकराती हों।
पर्यावरणीय महत्व
- नदी जल का अत्यधिक दोहन या अनुचित प्रबंधन पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ सकता है, जिससे नदी के निचले इलाकों और डेल्टा क्षेत्रों की जैव विविधता प्रभावित हो सकती है।
- जल संरक्षण और सतत उपयोग की नीतियाँ दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता के लिए आवश्यक हैं।
चुनौतियाँ
1. अंतर-राज्यीय जल विवाद
- कृष्णा नदी जल बंटवारा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों के बीच एक दीर्घकालिक विवाद का विषय रहा है।
- विभिन्न राज्यों द्वारा जल के उपयोग पर अलग-अलग दावे और प्राथमिकताएँ विवादों को जन्म देती हैं, जिससे जल संसाधनों का कुशल प्रबंधन बाधित होता है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध
2. जल संसाधनों का कुप्रबंधन
- उपलब्ध जल का समय पर और उचित वितरण न होना, विशेषकर सिंचाई के लिए, कृषि संकट को जन्म देता है।
- पेयजल और सिंचाई की आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना एक चुनौती है, खासकर जब जलाशयों में जल स्तर कम हो।
यूपीएससी लिंक: जल संसाधन प्रबंधन, कृषि नीतियाँ
3. कृषि संकट और किसान आजीविका
- किसानों को खरीफ मौसम में धान की खेती न करने की सलाह देना उनकी पारंपरिक आजीविका पर सीधा प्रभाव डालता है।
- जल की कमी के कारण फसलें खराब होने से किसानों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है, जिससे ग्रामीण ऋणग्रस्तता बढ़ सकती है।
यूपीएससी लिंक: कृषि मुद्दे, ग्रामीण अर्थव्यवस्था
4. बुनियादी ढाँचे का इष्टतम उपयोग
- लिफ्ट सिंचाई योजनाओं और अन्य परियोजनाओं (जैसे हैंड्री-नीवा, मुचुमर्री) का पूरा उपयोग न होना सूखा-प्रवण क्षेत्रों में जल की कमी को बढ़ाता है।
- परियोजनाओं के निर्माण के बावजूद, उनके संचालन और रखरखाव में चुनौतियाँ उनके उद्देश्य को विफल कर सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: बुनियादी ढाँचा विकास, क्षेत्रीय असंतुलन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| कृष्णा जल का अपर्याप्त उपयोग | राज्य सरकार पर आरोप है कि वह उपलब्ध जल का उपयोग सूखा-प्रवण क्षेत्रों और कृष्णा डेल्टा में सिंचाई के लिए नहीं कर रही है। |
| धान की खेती पर प्रतिबंध | किसानों को खरीफ में धान की खेती न करने की सलाह दी गई, जबकि यह डेल्टा क्षेत्र की मुख्य आर्थिक गतिविधि है। |
| जल परियोजनाओं में देरी | आंध्र प्रदेश द्वारा हैंड्री-नीवा और मुचुमर्री लिफ्ट योजनाओं से जल छोड़ने में देरी का आरोप, जबकि तेलंगाना अपनी योजनाओं से जल ले रहा है। |
| पुलिचंतला परियोजना का जल प्रबंधन | पुलिचंतला में 29 TMC जल होने के बावजूद, इसे जून 2027 तक पेयजल के लिए आरक्षित रखने के निर्णय पर सवाल उठाया गया। |
| किसानों पर वित्तीय बोझ | हजारों बटाईदारों ने खेती में निवेश किया है, और जल की अनुपलब्धता से उन्हें भारी नुकसान होगा। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- हैंड्री-नीवा लिफ्ट सिंचाई योजना
- मुचुमर्री लिफ्ट सिंचाई योजना
- भीमा-I लिफ्ट सिंचाई योजना
- भीमा-II लिफ्ट सिंचाई योजना
- नेटमपाडु लिफ्ट सिंचाई योजना
- कोइलसागर लिफ्ट सिंचाई योजना
- कलवाकुर्थी लिफ्ट सिंचाई योजना
- पट्टिसीमा लिफ्ट सिंचाई परियोजना
- पुलिचंतला परियोजना
आगे की राह
- अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान के लिए संबंधित राज्यों के बीच प्रभावी संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना।
- जल संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन और वितरण के लिए एक व्यापक नीति विकसित करना, जिसमें पेयजल और सिंचाई की आवश्यकताओं के बीच संतुलन हो।
- कृष्णा डेल्टा और सूखा-प्रवण क्षेत्रों में किसानों को समय पर और पर्याप्त जल उपलब्ध कराना सुनिश्चित करना।
- लिफ्ट सिंचाई योजनाओं और अन्य जल परियोजनाओं का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए उनके संचालन और रखरखाव में सुधार करना।
- कृषि विविधीकरण (crop diversification) को बढ़ावा देना और किसानों को वैकल्पिक फसलों के लिए सहायता प्रदान करना, जो कम जल का उपयोग करती हों।
- जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए सूक्ष्म सिंचाई (micro-irrigation) तकनीकों को प्रोत्साहित करना।
- जल भंडारण क्षमता बढ़ाने और भूजल पुनर्भरण (groundwater recharge) के उपायों को लागू करना।
- जल से संबंधित निर्णयों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना ताकि किसानों का विश्वास बना रहे।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अंतर-राज्यीय जल विवाद · कृष्णा नदी जल विवाद · जल प्रबंधन · सिंचाई परियोजनाएँ · फसल विविधीकरण · कृषि संकट · राज्य नीति · संघवाद · जल संसाधन · नदी घाटी परियोजनाएँ · कृषि अर्थव्यवस्था · खाद्य सुरक्षा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: “राज्य सूची में ‘जल’ का विषय”}
अवधारणा प्रवाह
कृष्णा नदी में जल की उपलब्धता → राज्यों द्वारा जल का दावा और उपयोग → सिंचाई परियोजनाओं (जैसे लिफ्ट योजनाएँ) का संचालन → कृष्णा डेल्टा में किसानों को जल की आपूर्ति → धान की खेती और कृषि उत्पादन → किसानों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कृष्णा नदी प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी सबसे बड़ी पूर्व-प्रवाहित नदी है।
2. श्रीशैलम परियोजना कृष्णा नदी पर स्थित एक बहुउद्देशीय परियोजना है।
3. कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT) का गठन अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही नहीं है। कृष्णा नदी प्रायद्वीपीय भारत की तीसरी सबसे बड़ी पूर्व-प्रवाहित नदी है, गोदावरी और महानदी के बाद। कथन 2 और 3 सही हैं। श्रीशैलम परियोजना कृष्णा नदी पर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सीमा पर स्थित है। KWDT का गठन 1969 में अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सी लिफ्ट सिंचाई योजनाएँ कृष्णा नदी के जल का उपयोग करती हैं, जैसा कि समाचार में उल्लेख किया गया है?
1. भीमा-I
2. भीमा-II
3. नेट्टमपाडु
4. कोइलसागर
5. कलवाकुर्ती
सही विकल्प का चयन करें:
- केवल 1, 2 और 3
- केवल 2, 3 और 4
- केवल 1, 3, 4 और 5
- 1, 2, 3, 4 और 5
उत्तर: 1, 2, 3, 4 और 5 — समाचार में स्पष्ट रूप से तेलंगाना द्वारा भीमा-I, भीमा-II, नेट्टमपाडु, कोइलसागर और कलवाकुर्ती लिफ्ट सिंचाई योजनाओं के माध्यम से कृष्णा जल खींचने का उल्लेख किया गया है।
Q3. अभिकथन (A): अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद भारत में संघवाद के लिए एक चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए संसद को कानून बनाने का अधिकार देता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद राज्यों के बीच तनाव पैदा करते हैं और सहकारी संघवाद को बाधित करते हैं, जिससे यह संघवाद के लिए एक चुनौती बन जाता है। अनुच्छेद 262 संसद को ऐसे विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, जो इन विवादों को हल करने के लिए एक संवैधानिक तंत्र प्रदान करता है। इस प्रकार, R, A की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के मूल कारणों का परीक्षण कीजिए। कृष्णा नदी जल विवाद के संदर्भ में, इन विवादों के समाधान में संवैधानिक और संस्थागत तंत्रों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का संक्षिप्त परिचय और उनकी व्यापकता।
2. **मूल कारण:**
* **भौगोलिक कारक:** नदियों का कई राज्यों से होकर गुजरना, बेसिन क्षेत्र में असमान वर्षा।
* **ऐतिहासिक कारक:** औपनिवेशिक काल के समझौते और रियासतकालीन संधियाँ।
* **जनसांख्यिकीय और आर्थिक कारक:** बढ़ती जनसंख्या, कृषि, औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण जल की बढ़ती मांग।
* **राजनीतिक कारक:** राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, वोट बैंक की राजनीति, क्षेत्रीय पहचान।
* **कानूनी और संस्थागत अस्पष्टता:** जल को राज्य सूची का विषय बनाना, केंद्र की सीमित भूमिका।
* **जलवायु परिवर्तन:** वर्षा पैटर्न में बदलाव, सूखे और बाढ़ की बढ़ती आवृत्ति।
3. **कृष्णा नदी जल विवाद का संदर्भ:**
* **शामिल राज्य:** महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना।
* **विवाद के मुद्दे:** जल का बँटवारा, परियोजनाओं की ऊँचाई, लिफ्ट सिंचाई योजनाओं का संचालन, डेल्टा क्षेत्रों की आवश्यकताएँ।
* **वर्तमान स्थिति:** YSRCP द्वारा कृष्णा डेल्टा में धान की खेती के लिए जल की कमी और सरकार की नीति की आलोचना का उल्लेख।
4. **संवैधानिक और संस्थागत तंत्रों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन:**
* **संवैधानिक प्रावधान:** अनुच्छेद 262 (संसद को कानून बनाने का अधिकार), अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956।
* **संस्थागत तंत्र:**
* **नदी जल विवाद न्यायाधिकरण (RWDTs):** जैसे कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT-I, KWDT-II)। उनकी स्थापना, कार्यप्रणाली और निर्णयों का उल्लेख।
* **अंतर-राज्यीय परिषद (अनुच्छेद 263):** राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करने में इसकी भूमिका।
* **केंद्रीय जल आयोग (CWC):** तकनीकी विशेषज्ञता और डेटा संग्रह में भूमिका।
* **प्रभावशीलता का मूल्यांकन (सकारात्मक और नकारात्मक):**
* **सकारात्मक:** विवादों को हल करने के लिए एक कानूनी ढाँचा प्रदान करना, न्यायाधिकरणों द्वारा कुछ हद तक जल बँटवारे का समाधान।
* **नकारात्मक:** न्यायाधिकरणों के निर्णयों को लागू करने में देरी, राज्यों द्वारा निर्णयों को चुनौती देना, राजनीतिकरण, डेटा की कमी या विवादित डेटा, तकनीकी जटिलताएँ, जलवायु परिवर्तन के नए आयामों को संबोधित करने में अक्षमता।
5. **निष्कर्ष:** अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान के लिए एक एकीकृत, वैज्ञानिक और सहयोगात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल, जिसमें जल को राष्ट्रीय संसाधन के रूप में देखना और स्थायी जल प्रबंधन प्रथाओं को अपनाना शामिल हो।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

No Comments