13 Oct केन-बेतवा लिंक परियोजना: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने केंद्र-राज्य सरकार से मांगा जवाब

✎ केन-बेतवा लिंक परियोजना: केन का अधिशेष जल बेतवा में भेजने वाली पहली नदी जोड़ो परियोजना; दौधन बाँध से पन्ना बाघ अभयारण्य और केन घड़ियाल अभयारण्य पर प्रभाव को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य से दो सप्ताह में जवाब…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण: पर्यावरण प्रभाव आकलन, जैव-विविधता संरक्षण, संरक्षित क्षेत्र, वन्यजीव आवास | GS Paper III — अवसंरचना एवं जल संसाधन: सिंचाई, नदी जोड़ो कार्यक्रम | GS Paper II — शासन एवं न्यायपालिका: जनहित याचिका, अनुच्छेद 226, कार्यपालिका की जवाबदेही | GS Paper I — भूगोल: भारत की नदी प्रणालियाँ, बुंदेलखंड का जल संकट एवं सूखा
- Prelims: केन-बेतवा लिंक परियोजना और दौधन बाँध, राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (NWDA), पन्ना बाघ अभयारण्य, केन घड़ियाल अभयारण्य, केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC), राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की स्थायी समिति, वन सलाहकार समिति (FAC), पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), जनहित याचिका और अनुच्छेद 226, राष्ट्रीय जल विकास परिप्रेक्ष्य योजना, 1980
- Essay: विकास बनाम पर्यावरण: सतत विकास की कसौटी पर बड़ी अवसंरचना परियोजनाएँ, जल संकट का समाधान: नदियों को जोड़ना या जल-प्रबंधन में सुधार?
त्वरित पुनरावृत्ति: केन-बेतवा लिंक परियोजना: केन का अधिशेष जल बेतवा में भेजने वाली पहली नदी जोड़ो परियोजना; दौधन बाँध से पन्ना बाघ अभयारण्य और केन घड़ियाल अभयारण्य पर प्रभाव को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य से दो सप्ताह में जवाब माँगा है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ (मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायाधीश विवेक जैन) ने केन-बेतवा लिंक परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों से जुड़ी जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। न्यायालय ने केंद्र से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (Central Empowered Committee) की रिपोर्ट पेश करने को कहा है। साथ ही रिपोर्ट में बताई गई कथित अनियमितताओं, सर्वोच्च न्यायालय में चल रही कार्यवाही की स्थिति और राज्य सरकार की अब तक की कार्रवाई की जानकारी माँगी है। याचिका के अनुसार परियोजना से पन्ना बाघ अभयारण्य का आधे से अधिक भाग डूब क्षेत्र में आ सकता है। वन सलाहकार समिति की रिपोर्ट के आधार पर लगभग 60 लाख पेड़ कटने का अनुमान बताया गया है। केन घड़ियाल अभयारण्य पर पड़ने वाले प्रभाव के अध्ययन और 2017 की पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठाए गए हैं। ये याचिकाकर्ता के दावे हैं, जिन पर न्यायालय ने अभी कोई निर्णय नहीं दिया है।
पृष्ठभूमि
- नदी जोड़ो की अवधारणा का आधार राष्ट्रीय जल विकास परिप्रेक्ष्य योजना (National Perspective Plan, 1980) है। इसके अंतर्गत जल-अधिशेष बेसिनों से जल-अभाव वाले बेसिनों में पानी पहुँचाने की परिकल्पना है। राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (National Water Development Agency) की स्थापना 1982 में हुई और वह इन परियोजनाओं की व्यवहार्यता का अध्ययन करता है।
- केन-बेतवा लिंक परियोजना प्रायद्वीपीय घटक की पहली नदी जोड़ो परियोजना है, जिसे क्रियान्वयन के चरण में पहुँचाया गया। इसमें केन नदी का अधिशेष जल बेतवा बेसिन में भेजा जाएगा। दोनों नदियाँ यमुना की सहायक नदियाँ हैं और बुंदेलखंड से होकर बहती हैं।
- केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश की सरकारों के बीच 22 मार्च 2021 को समझौता-ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए। दिसंबर 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने परियोजना को स्वीकृति दी। 25 दिसंबर 2024 को खजुराहो में परियोजना की आधारशिला रखी गई। इसके क्रियान्वयन के लिए केन-बेतवा लिंक परियोजना प्राधिकरण का गठन किया गया।
- केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति का गठन सर्वोच्च न्यायालय ने वन और वन्यजीव संबंधी टी.एन. गोदावर्मन मामले की निगरानी के लिए किया था। यह समिति वन भूमि के उपयोग-परिवर्तन जैसे मामलों में न्यायालय को तथ्यात्मक रिपोर्ट देती है। परियोजना पर इस समिति की रिपोर्ट में पर्यावरणीय चिंताएँ दर्ज होने का उल्लेख याचिका में किया गया है।
- परियोजना का बड़ा भाग पन्ना बाघ अभयारण्य के भीतर आता है। इस अभयारण्य में बाघ विलुप्त होने के बाद 2009 से पुनर्स्थापन कार्यक्रम चलाया गया और इसे संरक्षण की सफल कहानी माना जाता है। इसीलिए इसकी वन भूमि के डूबने का मुद्दा संवेदनशील है।
- बुंदेलखंड क्षेत्र बार-बार पड़ने वाले सूखे और जल संकट के लिए जाना जाता है। परियोजना के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यही है। दूसरी ओर पर्यावरणविद् और याचिकाकर्ता जैव-विविधता की क्षति तथा जलवैज्ञानिक आँकड़ों की पर्याप्तता पर प्रश्न उठाते हैं।
केन-बेतवा लिंक परियोजना क्या है?
- उद्देश्य: केन नदी बेसिन के अधिशेष जल को लगभग 221 किलोमीटर लंबी लिंक नहर के माध्यम से बेतवा बेसिन में पहुँचाना। इससे मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई, पेयजल और विद्युत उत्पादन की सुविधा बढ़ाई जानी है।
- मुख्य घटक: छतरपुर जिले में केन नदी पर दौधन बाँध, केन-बेतवा लिंक नहर, लोअर ओर बाँध, कोठा बैराज और बीना कॉम्प्लेक्स परियोजना। दौधन बाँध के साथ जलविद्युत तथा सौर ऊर्जा घटक भी प्रस्तावित हैं।
- लाभ का दावा: सरकारी अनुमानों के अनुसार लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर वार्षिक सिंचाई मध्य प्रदेश में और लगभग 2.51 लाख हेक्टेयर उत्तर प्रदेश में होगी। लगभग 62 लाख लोगों को पेयजल मिलने की बात कही गई है।
- लागत और वित्त पोषण: परियोजना की अनुमानित लागत लगभग ₹44,605 करोड़ (2020-21 के मूल्य स्तर पर) है, जिसमें केंद्र सरकार का बड़ा अनुदान शामिल है। शेष भार दोनों राज्य वहन करेंगे।
- पर्यावरणीय चिंताएँ: बाँध के डूब क्षेत्र में पन्ना बाघ अभयारण्य की वन भूमि आती है, जिससे वनों की कटाई, बाघ, तेंदुआ और गिद्ध जैसे वन्यजीवों के आवास का नष्ट होना और वन्यजीव गलियारों का बाधित होना संभावित है। निचले प्रवाह में केन घड़ियाल अभयारण्य पर जल-प्रवाह घटने का भी प्रश्न है।
- प्रक्रियागत प्रश्न: याचिका में 2017 की पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट की प्रामाणिकता, स्वतंत्र जलवैज्ञानिक अध्ययन की माँग की अनदेखी और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति द्वारा घड़ियाल अभयारण्य के पर्याप्त अध्ययन के अभाव पर प्रश्न उठाए गए हैं।
- संवैधानिक और विधिक आधार: अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार माना गया है। अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण संरक्षण का निर्देश देता है और अनुच्छेद 51A(g) नागरिकों का मौलिक कर्तव्य निर्धारित करता है। संबंधित कानून हैं: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और वन संरक्षण संबंधी अधिनियम। उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत जनहित याचिका सुनता है।
- न्यायिक दृष्टि: सर्वोच्च न्यायालय ने सतत विकास, एहतियाती सिद्धांत और लोक न्यास सिद्धांत को पर्यावरण कानून का भाग माना है। इसलिए ऐसी परियोजनाओं में निर्णय लेते समय आर्थिक लाभ के साथ पारिस्थितिकीय क्षति का वैज्ञानिक आकलन आवश्यक माना जाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| नदी जोड़ो कार्यक्रम में स्थान | राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (1980) के अंतर्गत नदियों को जोड़ने की पहली परियोजना। यह अधिशेष जल वाले बेसिन से जलाभाव वाले बेसिन में पानी पहुँचाने के मॉडल की कसौटी है। इसकी सफलता या विफलता का असर अन्य लिंक परियोजनाओं पर पड़ेगा। |
| मुख्य संरचनाएँ | केन नदी पर दौधन बाँध (लगभग 77 मीटर ऊँचा) और लगभग 221 किमी लंबी लिंक नहर, जिसमें एक सुरंग भी है। नहर केन का जल बेतवा बेसिन तक ले जाती है। दोनों नदियाँ यमुना की सहायक नदियाँ हैं। |
| लाभार्थी क्षेत्र | बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के ज़िले, जैसे छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, बाँदा, महोबा, झाँसी और ललितपुर। यह क्षेत्र बार-बार सूखे और जल संकट से जूझता है। |
| अनुमानित लाभ और लागत | लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर वार्षिक सिंचाई, लगभग 62 लाख लोगों को पेयजल, 103 MW जलविद्युत और 27 MW सौर ऊर्जा। लागत लगभग ₹44,605 करोड़ (2020-21 मूल्य स्तर), जिसमें केंद्र की सहायता लगभग ₹39,317 करोड़ है। |
| संस्थागत ढाँचा | केंद्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच 2021 में समझौता-ज्ञापन हुआ। परियोजना का क्रियान्वयन विशेष प्रयोजन इकाई ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना प्राधिकरण’ करती है। राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (NWDA) ने व्यवहार्यता अध्ययन और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की। |
| पर्यावरणीय संवेदनशीलता | डूब क्षेत्र में पन्ना व्याघ्र आरक्षित क्षेत्र का एक भाग आता है। निचले प्रवाह में केन घड़ियाल अभयारण्य स्थित है। इसी कारण परियोजना पर विकास और संरक्षण का विवाद बना हुआ है, जो अब उच्च न्यायालय में जनहित याचिका के रूप में है। |
महत्व
आर्थिक एवं कृषि संबंधी
- वर्षा-आश्रित बुंदेलखंड में सिंचाई का विस्तार होने से फसल उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ सकती है।
- रबी में सुनिश्चित सिंचाई से फसल-विविधीकरण और कृषि आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
- जलविद्युत और सौर ऊर्जा घटकों से स्वच्छ ऊर्जा की क्षमता बढ़ेगी।
- निर्माण कार्य और बाद में कृषि-गतिविधियों से स्थानीय रोज़गार के अवसर बन सकते हैं, जिससे पलायन घट सकता है।
सामाजिक एवं पेयजल संबंधी
- लगभग 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य है, जिससे गर्मियों में होने वाली जल-किल्लत कम होगी।
- जल सुरक्षा से महिलाओं का पानी ढोने में लगने वाला समय घटेगा और स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार संभव है।
रणनीतिक एवं जल-प्रबंधन संबंधी
- यह अंतर-बेसिन जल अंतरण के मॉडल की व्यावहारिक परीक्षा है और भविष्य की लिंक परियोजनाओं का आधार बनेगी।
- जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की अनिश्चितता बढ़ रही है। ऐसे में भंडारण और अंतरण अवसंरचना सूखे के प्रति सहनशीलता बढ़ा सकती है।
- यह अंतर-राज्यीय सहयोग का उदाहरण है, क्योंकि जल-बँटवारे पर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच सहमति बनी है।
शासन एवं न्यायिक दृष्टि से
- मामला दिखाता है कि बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं में पर्यावरणीय मंज़ूरी की प्रक्रिया की न्यायिक जाँच हो सकती है।
- उच्च न्यायालय द्वारा केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) की रिपोर्ट मँगाना पारदर्शिता और जवाबदेही की ओर कदम है।
- ‘सतत विकास’ के सिद्धांत की परीक्षा होती है, जिसमें विकास और पारिस्थितिकी का संतुलन बनाना होता है।
चुनौतियाँ
1. जैव विविधता और वन्यजीव आवास की क्षति
- याचिका के अनुसार पन्ना व्याघ्र आरक्षित क्षेत्र का बड़ा भाग डूब क्षेत्र में आएगा। सरकारी आकलन इससे कम क्षेत्र बताते हैं, इसलिए यह विवाद का विषय है।
- बाघ, तेंदुआ और गिद्ध जैसी प्रजातियों के आवास और आवागमन के पारंपरिक गलियारे बाधित होने की आशंका है।
- पन्ना में बाघों की पुनर्स्थापना 2009 के बाद की गई थी। यह एक संरक्षण उपलब्धि है, जिसे क्षति पहुँच सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: संरक्षण, जैव विविधता, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972, प्रोजेक्ट टाइगर
2. निचले प्रवाह में घड़ियाल अभयारण्य पर प्रभाव
- याचिका के अनुसार CEC ने चिंता जताई है कि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने केन घड़ियाल अभयारण्य पर प्रभाव का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया।
- बाँध के बाद नदी के प्रवाह में बदलाव से घड़ियाल के प्रजनन-स्थल और बालू-तटों पर असर पड़ सकता है।
- घड़ियाल अति संकटग्रस्त (Critically Endangered) प्रजाति है, इसलिए पारिस्थितिक प्रवाह (E-flow) का आकलन ज़रूरी है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: नदी पारिस्थितिकी, पारिस्थितिक प्रवाह, संकटग्रस्त प्रजातियाँ
3. पर्यावरण प्रभाव आकलन की विश्वसनीयता
- याचिकाकर्ता ने 2017 की पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) रिपोर्ट की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाए हैं और तथ्यात्मक त्रुटियों का आरोप लगाया है।
- स्वतंत्र जलवैज्ञानिक अध्ययन की माँग पर विचार न किए जाने का आरोप है।
- पुराने आँकड़ों पर आधारित आकलन से केन को ‘अधिशेष’ मानने की धारणा कमज़ोर पड़ सकती है, खासकर जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में।
यूपीएससी लिंक: GS-3: EIA अधिसूचना 2006, पर्यावरणीय शासन, पारदर्शिता
4. वनों की कटाई और प्रतिपूरक वनीकरण
- वन सलाहकार समिति की रिपोर्ट के हवाले से याचिका में लगभग 60 लाख पेड़ कटने का अनुमान बताया गया है।
- प्रतिपूरक वनीकरण से प्राकृतिक वन की पारिस्थितिक सेवाओं की पूरी भरपाई प्रायः नहीं हो पाती।
- कार्बन अवशोषण क्षमता और स्थानीय जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: वन संरक्षण, प्रतिपूरक वनीकरण निधि अधिनियम 2016, जलवायु परिवर्तन
5. विस्थापन और पुनर्वास
- डूब क्षेत्र के गाँवों के निवासी विस्थापित होंगे, जिनमें अनेक आदिवासी और वनाश्रित समुदाय हैं।
- आजीविका की हानि और पुनर्वास की गुणवत्ता पर पूर्व की बड़ी बाँध परियोजनाओं में भी विवाद रहे हैं।
- वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत ग्राम सभा की सहमति का प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: GS-2/3: विस्थापन, वन अधिकार अधिनियम, भूमि अधिग्रहण में पुनर्वास
6. जल-बँटवारा और संघीय समन्वय
- मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच जल-बँटवारे की शर्तों का सतत पालन आवश्यक है।
- जल राज्य सूची का विषय है, पर अंतर-राज्यीय नदियों में केंद्र की भूमिका भी है। इसलिए समन्वय की जटिलता बनी रहती है।
- लागत वृद्धि और समय-सीमा में विलंब से परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता घट सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संघवाद, अंतर-राज्यीय जल विवाद, अनुच्छेद 262
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| व्याघ्र आरक्षित क्षेत्र का डूबना | याचिका के अनुसार पन्ना का आधे से अधिक भाग डूब सकता है। आवास-विखंडन और गलियारों के बाधित होने से बाघ संरक्षण को क्षति पहुँच सकती है। |
| घड़ियाल अभयारण्य | निचले प्रवाह के प्रभाव का पर्याप्त अध्ययन न होने की चिंता। प्रवाह-परिवर्तन से प्रजनन-स्थल प्रभावित हो सकते हैं। |
| EIA रिपोर्ट (2017) | तथ्यात्मक त्रुटियों का आरोप और स्वतंत्र जलवैज्ञानिक अध्ययन का अभाव। निर्णय-प्रक्रिया की वैज्ञानिक विश्वसनीयता पर प्रश्न। |
| वृक्षों की कटाई | लगभग 60 लाख पेड़ों का अनुमान (याचिका के अनुसार)। प्रतिपूरक वनीकरण से प्राकृतिक वन की पूर्ति कठिन। |
| जल-उपलब्धता की धारणा | केन के ‘अधिशेष’ होने की धारणा जलवायु-परिवर्तन में अनिश्चित। बुंदेलखंड में पहले से सूखा और जल संकट। |
| सामाजिक प्रभाव | डूब क्षेत्र के गाँवों का विस्थापन और आजीविका की हानि। पुनर्वास की पर्याप्तता का प्रश्न। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perspective Plan, 1980): नदियों को जोड़ने की इस दीर्घकालिक योजना के अंतर्गत केन-बेतवा पहली परियोजना है।
- राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (National Water Development Agency, NWDA): लिंक परियोजनाओं के अध्ययन और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने वाली संस्था।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana): सिंचाई विस्तार का व्यापक ढाँचा, जिसके उद्देश्य परियोजना के सिंचाई लक्ष्य से मेल खाते हैं।
- प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger, 1973): पन्ना व्याघ्र आरक्षित क्षेत्र इसी के अंतर्गत संरक्षित है।
- प्रतिपूरक वनीकरण निधि अधिनियम, 2016 (Compensatory Afforestation Fund Act): वन-भूमि के गैर-वानिकी उपयोग पर क्षतिपूर्ति के लिए।
आगे की राह
- केंद्रीय सशक्त समिति की रिपोर्ट की सिफ़ारिशों का सार्वजनिक और पारदर्शी परीक्षण हो, ताकि उठाई गई आपत्तियों का समाधान तथ्यों के आधार पर हो सके।
- स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्थाओं से केन-बेतवा बेसिन का नया जलवैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए, जिसमें जलवायु-परिवर्तन के परिदृश्य शामिल हों।
- केन घड़ियाल अभयारण्य के लिए पारिस्थितिक प्रवाह (E-flow) का स्पष्ट मानक तय हो और बाँध संचालन में उसका पालन बाध्यकारी हो।
- वन्यजीव गलियारों की पहचान और संरक्षण के लिए शमन योजना बने, जैसे अंडरपास और वैकल्पिक आवास का विकास, और उसकी निगरानी स्वतंत्र एजेंसी करे।
- प्रतिपूरक वनीकरण स्थानीय प्रजातियों से और उपग्रह-आधारित निगरानी के साथ हो, ताकि उसकी गुणवत्ता और उत्तरजीविता सुनिश्चित रहे।
- विस्थापित परिवारों के पुनर्वास में ग्राम सभा की सहमति, उचित मुआवज़ा और आजीविका-पुनर्स्थापन को प्राथमिकता मिले।
- सूक्ष्म सिंचाई, जल-संचयन और भूजल पुनर्भरण जैसे पूरक उपायों को साथ अपनाया जाए, ताकि बुंदेलखंड की जल सुरक्षा केवल एक परियोजना पर निर्भर न रहे।
- न्यायिक प्रक्रिया में समय पर और तथ्यपूर्ण जवाब देकर राज्य और केंद्र दोनों परियोजना की वैधता और पारदर्शिता को सुदृढ़ करें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
नदी-अंतर्संयोजन (River Interlinking) · अंतर-बेसिन जल अंतरण · पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) · पन्ना बाघ अभयारण्य और डूब क्षेत्र · केन घड़ियाल अभयारण्य एवं निचले प्रवाह (Downstream) का पारिस्थितिकी तंत्र · वन्यजीव गलियारे और आवास विखंडन · केंद्रीय अधिकार-प्राप्त समिति (CEC) · राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति · जनहित याचिका और न्यायिक समीक्षा · अनुच्छेद 21 और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार · बुंदेलखंड का जल संकट · सतत विकास और एहतियाती सिद्धांत (Precautionary Principle)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21 — स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार, जीवन के अधिकार में निहित
- अनुच्छेद 48A — राज्य द्वारा पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण
- अनुच्छेद 51A(g) — नागरिकों का प्राकृतिक पर्यावरण-संरक्षण का कर्तव्य
- अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता, जनहित याचिका
- अनुच्छेद 262 — अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन
- सातवीं अनुसूची: राज्य सूची की प्रविष्टि 17 और संघ सूची की प्रविष्टि 56 — जल और अंतर-राज्यीय नदियाँ
अवधारणा प्रवाह
बुंदेलखंड में सूखा और जल संकट, जबकि केन में अधिशेष जल का अनुमान → केन से बेतवा तक जल-अंतरण के लिए दौधन बाँध और लिंक नहर की योजना → पन्ना व्याघ्र आरक्षित क्षेत्र के डूबने, पेड़ों की कटाई और घड़ियाल अभयारण्य पर प्रभाव की आशंका → EIA रिपोर्ट और वन्यजीव मंज़ूरी की प्रक्रिया पर प्रश्न, CEC की चिंताएँ → जनहित याचिका के माध्यम से मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती → न्यायालय द्वारा केंद्र और राज्य से CEC रिपोर्ट व की गई कार्रवाई पर जवाब तलब → जवाब और न्यायिक समीक्षा के आधार पर विकास और संरक्षण के संतुलन का निर्णय
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. केन-बेतवा लिंक परियोजना के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. केन और बेतवा दोनों नदियाँ यमुना की सहायक नदियाँ हैं।
2. परियोजना के प्रमुख घटक दौधन बाँध का निर्माण पन्ना बाघ अभयारण्य के क्षेत्र में प्रस्तावित है।
3. केंद्रीय अधिकार-प्राप्त समिति (CEC) संसद के अधिनियम द्वारा गठित एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना विशेष रूप से इसी परियोजना के लिए की गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: केन और बेतवा दोनों यमुना में मिलती हैं। कथन 2 सही है: दौधन बाँध केन नदी पर छतरपुर (मध्य प्रदेश) में पन्ना बाघ अभयारण्य के क्षेत्र में प्रस्तावित है। कथन 3 गलत है: CEC का गठन वर्ष 2002 में उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3(3) के अंतर्गत अधिसूचना द्वारा हुआ। वह वन और वन्यजीव संबंधी मामलों में न्यायालय की सहायता करती है और संसद के किसी अधिनियम से नहीं बनी।
Q2. अभिकथन (A): अंतर-बेसिन जल अंतरण परियोजनाएँ निचले प्रवाह के नदी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए चिंता का विषय बन सकती हैं।
कारण (R): ऊपरी भाग में जल के अंतरण से निचले क्षेत्र में प्रवाह घटता है, जिससे घड़ियाल जैसी नदी-आश्रित प्रजातियों के आवास, यानी गहरे जलकुंड और रेतीले तट, प्रभावित हो सकते हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, किंतु R गलत है
- A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — प्रवाह में कमी नदी के भौतिक आवास और जल की गुणवत्ता को बदल देती है। इसी कारण घड़ियाल जैसी प्रजातियाँ संकट में आ सकती हैं, जो रेतीले तटों और गहरे जलकुंडों पर निर्भर हैं। यही बात केन घड़ियाल अभयारण्य पर पड़ने वाले प्रभाव के आकलन की माँग का आधार है। अतः R, A की सही व्याख्या करता है।
Q3. भारतीय संविधान में जल से संबंधित विषयों की स्थिति के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
- जल पूर्णतः संघ सूची का विषय है और राज्यों को इस पर कोई अधिकार नहीं है
- जल राज्य सूची की प्रविष्टि 17 का विषय है, किंतु यह संघ सूची की प्रविष्टि 56 के अधीन है, जो संसद को अंतर-राज्यीय नदियों के विनियमन का अधिकार देती है
- जल समवर्ती सूची का विषय है और केंद्र-राज्य दोनों को समान अधिकार हैं
- अनुच्छेद 262 के अंतर्गत अंतर-राज्यीय जल विवादों का निर्णय सीधे उच्चतम न्यायालय करता है
उत्तर: जल राज्य सूची की प्रविष्टि 17 का विषय है, किंतु यह संघ सूची की प्रविष्टि 56 के अधीन है, जो संसद को अंतर-राज्यीय नदियों के विनियमन का अधिकार देती है — जल राज्य सूची की प्रविष्टि 17 में है, पर संघ सूची की प्रविष्टि 56 के तहत संसद अंतर-राज्यीय नदियों के विनियमन का अधिकार रखती है। अनुच्छेद 262 के अंतर्गत संसद अंतर-राज्यीय जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए विधि बना सकती है और ऐसे विवादों में न्यायालयों का क्षेत्राधिकार वर्जित कर सकती है। इसी के तहत अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 बना।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ केन-बेतवा लिंक परियोजना बुंदेलखंड की जल-सुरक्षा के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपाय मानी जाती है, किंतु पन्ना बाघ अभयारण्य और केन घड़ियाल अभयारण्य पर इसके प्रभाव को लेकर यह न्यायिक जाँच के घेरे में है। परियोजना के विकासात्मक औचित्य तथा पारिस्थितिक चिंताओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी बताइए कि पर्यावरणीय मंजूरी की मौजूदा संस्थागत प्रक्रिया इन चिंताओं के समाधान में कितनी सक्षम है। (15 Marks)
रूपरेखा: भूमिका (2-3 पंक्तियाँ): राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (1980) के अंतर्गत राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (NWDA) की पहल; केन-बेतवा पहली अंतर-बेसिन परियोजना है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच जल-बँटवारे का समझौता 2021 में हुआ था। शिलान्यास दिसंबर 2024 में हुआ।
(क) विकासात्मक पक्ष:
1. बुंदेलखंड में बार-बार सूखा और जल संकट।
2. सरकारी आँकड़ों के अनुसार लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर वार्षिक सिंचाई, लगभग 62 लाख लोगों को पेयजल, और जलविद्युत तथा सौर ऊर्जा का घटक।
3. केंद्र द्वारा परियोजना लागत में प्रमुख वित्तीय सहायता।
(ख) पारिस्थितिक पक्ष (याचिका और CEC की चिंताओं सहित):
1. दौधन बाँध से पन्ना बाघ अभयारण्य के बड़े भाग का डूब क्षेत्र में आना। डूब का अनुपात विवादित है: याचिकाकर्ता आधे से अधिक बताते हैं, जबकि सरकारी दस्तावेजों में अलग आँकड़े हैं। इसका उल्लेख संतुलन के साथ करें।
2. वन सलाहकार समिति की रिपोर्ट के आधार पर लगभग 60 लाख पेड़ों की कटाई का अनुमान।
3. बाघ, तेंदुआ और गिद्ध के आवास का नष्ट होना तथा गलियारों में बाधा।
4. निचले प्रवाह में केन घड़ियाल अभयारण्य पर प्रभाव, जबकि घड़ियाल अत्यंत संकटग्रस्त प्रजाति है।
5. वर्ष 2017 की पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट की विश्वसनीयता और स्वतंत्र जलवैज्ञानिक अध्ययन का अभाव।
6. CEC की रिपोर्ट में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति के आकलन को अपर्याप्त बताया जाना।
7. मूल्यांकन के लिए बाघ पुनर्स्थापन की सफलता का उदाहरण दिया जा सकता है।
(ग) संस्थागत और विधिक ढाँचा:
1. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और EIA अधिसूचना, 2006।
2. वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के अंतर्गत वन सलाहकार समिति।
3. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 5A–5B (राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड और उसकी स्थायी समिति) तथा संरक्षित क्षेत्रों की सीमा-परिवर्तन संबंधी प्रावधान।
4. अनुच्छेद 21, 48A और 51A(g) तथा एहतियाती सिद्धांत और सतत विकास (वेल्लोर नागरिक कल्याण मंच, 1996 और एम.सी. मेहता मामलों से)।
5. टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद मामला, जिसमें उच्चतम न्यायालय की निगरानी में CEC कार्यरत है।
6. अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार। इस मामले में उच्च न्यायालय ने रिपोर्ट और कार्रवाई की स्थिति माँगी है। ध्यान रहे कि उच्चतम न्यायालय में चल रही कार्यवाही का प्रश्न भी जुड़ा है।
(घ) मूल्यांकन और आगे की राह:
1. स्वतंत्र जलवैज्ञानिक अध्ययन और पारदर्शी क्षतिपूर्ति वनीकरण।
2. सूक्ष्म सिंचाई, जल-संचयन और भूजल पुनर्भरण जैसे वैकल्पिक उपाय।
3. निचले प्रवाह के लिए पारिस्थितिक प्रवाह (E-flow) का निर्धारण।
4. वन्यजीव गलियारों का संरक्षण और निगरानी की स्वतंत्र व्यवस्था।
निष्कर्ष: विकास और संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं हैं। संतुलित और साक्ष्य-आधारित निर्णय ही सतत विकास का मार्ग है।
स्रोत: amarujala.com
Madhya Pradesh PCS (MPPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: केन-बेतवा लिंक परियोजना के संबंध में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और राज्य सरकार से कितने समय में जवाब मांगा है?
- 1 सप्ताह
- 2 सप्ताह
- 1 माह
- 15 दिन
उत्तर: 2 सप्ताह — मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने केन-बेतवा लिंक परियोजना पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार से दो सप्ताह में जवाब मांगा है।
Mains: केन-बेतवा लिंक परियोजना के पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभावों का विश्लेषण करते हुए, मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उठाए जाने वाले संभावित उपायों पर चर्चा कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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