11 Sep केरल के मालापुरम में आदिवासी बस्ती: 2019 की बाढ़ के सात साल बाद भी प्लास्टिक के तंबुओं में जीवन
✎ केरल में 2019 की बाढ़ के सात साल बाद भी जनजातीय परिवारों का अस्थायी आश्रयों में रहना, भारत में आपदा विस्थापन और कमजोर समुदायों के लिए प्रभावी पुनर्वास की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय समाज, सामाजिक सशक्तिकरण, भूगोल (आपदाएँ) | GS Paper II — कल्याणकारी योजनाएँ, कमजोर वर्ग, जनजातीय कल्याण | GS Paper III — आपदा प्रबंधन, पर्यावरण
- Prelims: जनजातीय समुदाय, आपदा विस्थापन, पुनर्वास, आपदा प्रबंधन अधिनियम, अनुसूचित जनजाति, Paniya जनजाति
- Essay: भारत में जनजातीय समुदायों के समक्ष चुनौतियाँ और उनका समाधान, आपदा प्रबंधन: तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्वास की चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: केरल में 2019 की बाढ़ के सात साल बाद भी जनजातीय परिवारों का अस्थायी आश्रयों में रहना, भारत में आपदा विस्थापन और कमजोर समुदायों के लिए प्रभावी पुनर्वास की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल के मलप्पुरम जिले में वानियामपुझा जनजातीय बस्ती के पनिया (Paniya) जनजाति के दो दर्जन से अधिक परिवार 2019 की बाढ़ के सात साल बाद भी अस्थायी प्लास्टिक शेड में रहने को मजबूर हैं। बाढ़ ने उनके घरों को नष्ट कर दिया था और उन्हें मुख्य भूमि से जोड़ने वाले पुल भी बह गए थे, जिसके कारण उन्हें दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में शरण लेनी पड़ी। यह घटना भारत में आपदा विस्थापन और जनजातीय समुदायों के पुनर्वास से संबंधित चुनौतियों को उजागर करती है।
पृष्ठभूमि
- अगस्त 2019 में, चालियार नदी में आई बाढ़ ने मलप्पुरम जिले की वानियामपुझा जनजातीय बस्ती के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था, जिससे कई घर नष्ट हो गए थे।
- बाढ़ के कारण बस्ती को मुख्य भूमि से जोड़ने वाले पुल भी बह गए, जिससे यह क्षेत्र शेष दुनिया से कट गया।
- बस्ती को अब रहने के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया गया है, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा बना हुआ है।
- लगभग 26 जनजातीय परिवार, जिनमें कुल 161 सदस्य शामिल हैं, तब से प्लास्टिक की चादरों से बने अस्थायी आश्रयों में रह रहे हैं।
- इन परिवारों को बिजली, सुरक्षित स्वच्छता सुविधाओं और जंगली जानवरों के खतरे जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
- सात साल बाद एक नया पुल तैयार है।
भारत में जनजातीय समुदायों का विस्थापन और पुनर्वास
- जनजातीय समुदाय (Tribal communities) अक्सर प्राकृतिक आपदाओं, विकास परियोजनाओं और संघर्षों के कारण विस्थापन का सामना करते हैं।
- भारत का संविधान (Constitution of India) अनुच्छेद 46 के तहत अनुसूचित जातियों और जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने तथा उन्हें सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से बचाने का प्रावधान करता है।
- आपदा प्रबंधन अधिनियम (Disaster Management Act), 2005, आपदाओं के प्रभावी प्रबंधन के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है, जिसमें प्रभावित लोगों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
- जनजातीय मामलों का मंत्रालय (Ministry of Tribal Affairs) जनजातीय समुदायों के समग्र विकास और कल्याण के लिए विभिन्न योजनाएँ और कार्यक्रम लागू करता है, जिनमें आवास और बुनियादी ढाँचा विकास शामिल है।
- पुनर्वास (Rehabilitation) में न केवल नए घर उपलब्ध कराना शामिल है, बल्कि आजीविका के अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक-सांस्कृतिक एकीकरण भी सुनिश्चित करना होता है।
- जनजातीय समुदायों के विस्थापन के मामलों में, उनकी पारंपरिक भूमि और वन अधिकारों का संरक्षण एक महत्वपूर्ण पहलू है, जैसा कि वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act), 2006 में उल्लिखित है।
- पुनर्वास परियोजनाओं में अक्सर देरी, अपर्याप्त धन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे विस्थापित लोगों की पीड़ा बढ़ जाती है।
- Paniya जनजाति केरल और तमिलनाडु में पाई जाने वाली एक प्रमुख अनुसूचित जनजाति है, जो मुख्य रूप से कृषि श्रमिक और वन उत्पादों पर निर्भर हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| केरल के मलप्पुरम जिले में बाढ़ | 2019 में आई बाढ़ ने वानियमपुझा आदिवासी बस्ती को बुरी तरह प्रभावित किया, जिससे कई घर नष्ट हो गए और निवासियों को विस्थापित होना पड़ा। |
| आदिवासी परिवारों का विस्थापन | पनिया जनजाति के 26 परिवार सात साल बाद भी अस्थायी प्लास्टिक शेड में रहने को मजबूर हैं, जो उनकी असुरक्षित स्थिति को दर्शाता है। |
| बुनियादी सुविधाओं का अभाव | बस्ती में बिजली, सुरक्षित शौचालय और उचित आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। |
| मुख्य भूमि से कटाव | बाढ़ ने पुलों को बहा दिया था, जिससे मुख्य भूमि से संपर्क टूट गया था। नया पुल बनने के बावजूद, ऊपरी बस्तियों के लिए समस्याएँ बनी हुई हैं। |
| वन्यजीवों से खतरा | जंगली हाथियों और तेंदुओं की आवाजाही से निवासियों को लगातार खतरा बना रहता है, खासकर रात में। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह घटना भारत में जनजातीय समुदायों की भेद्यता और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति उनकी संवेदनशीलता को उजागर करती है।
- यह विस्थापित समुदायों के पुनर्वास और उन्हें बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने में सरकारी तंत्र की चुनौतियों को दर्शाती है।
- आदिवासी महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण और शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देती है।
पर्यावरणीय महत्व
- जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमी घटनाओं (जैसे बाढ़) के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है, जो हाशिए पर पड़े समुदायों को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं।
- वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व की चुनौतियों और मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावना को रेखांकित करती है।
शासन और नीतिगत महत्व
- आपदा प्रबंधन (Disaster Management) और पुनर्वास नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।
- जनजातीय कल्याण योजनाओं और भूमि अधिकारों के संरक्षण के महत्व को दर्शाती है, विशेष रूप से आपदा प्रभावित क्षेत्रों में।
- स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकारों की जवाबदेही और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर देती है।
चुनौतियाँ
1. पुनर्वास और आवास का अभाव
- बाढ़ के सात साल बाद भी आदिवासी परिवार अस्थायी प्लास्टिक शेड में रह रहे हैं, क्योंकि उनके पुराने गाँव को रहने योग्य घोषित नहीं किया गया है।
- सुरक्षित और स्थायी आवास की कमी उन्हें लगातार असुरक्षा और कठिनाइयों में धकेल रही है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, आपदा प्रबंधन
2. बुनियादी सुविधाओं की अनुपलब्धता
- बस्ती में बिजली का अभाव है, जिससे रात में अंधेरा रहता है और दैनिक जीवन प्रभावित होता है।
- महिलाओं को शौच के लिए झाड़ियों में जाना पड़ता है, जिससे उनकी गरिमा और सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लगता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, शासन
3. कनेक्टिविटी और पहुँच की समस्या
- बाढ़ से पुल बह जाने के बाद मुख्य भूमि से संपर्क टूट गया था, जिससे आपातकालीन सेवाओं और दैनिक आवश्यकताओं तक पहुँच मुश्किल हो गई थी।
- नया पुल बनने के बावजूद, ऊपरी बस्तियों के लिए अभी भी कनेक्टिविटी की समस्या बनी हुई है।
यूपीएससी लिंक: बुनियादी ढाँचा, आपदा प्रबंधन
4. मानव-वन्यजीव संघर्ष
- वन्यजीवों, जैसे हाथी और तेंदुए, की बस्ती में आवाजाही से निवासियों को लगातार खतरा बना रहता है, खासकर बच्चों और पशुधन के लिए।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण, आपदा प्रबंधन
5. स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुँच
- गर्भवती महिलाओं और बीमार व्यक्तियों को नदी पार करने में कठिनाई होती है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुँच बाधित होती है।
- बच्चों को स्कूल जाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे उनकी शिक्षा प्रभावित होती है।
यूपीएससी लिंक: मानव संसाधन, सामाजिक न्याय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| स्थायी आवास का अभाव | आदिवासी परिवार सात साल बाद भी प्लास्टिक शेड में रह रहे हैं, जो उनके जीवन की असुरक्षा को दर्शाता है। |
| बुनियादी सुविधाओं की कमी | बिजली, सुरक्षित शौचालय और स्वच्छ पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। |
| मुख्य भूमि से कटाव | बाढ़ से पुलों के नष्ट होने के कारण आवागमन में भारी कठिनाई हुई, जिससे आपातकालीन सेवाओं तक पहुँच बाधित हुई। |
| वन्यजीवों से खतरा | जंगली हाथियों और तेंदुओं की आवाजाही से निवासियों को लगातार जान-माल का खतरा बना रहता है। |
| पुनर्वास में देरी | बाढ़ के सात साल बाद भी प्रभावी पुनर्वास और स्थायी समाधान का अभाव है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G)
- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM)
- जनजातीय उप-योजना (Tribal Sub-Plan)
आगे की राह
- बाढ़ प्रभावित आदिवासी परिवारों के लिए तत्काल सुरक्षित और स्थायी आवास का निर्माण किया जाए।
- बस्ती में बिजली, सुरक्षित पेयजल और स्वच्छ शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
- मुख्य भूमि से कनेक्टिविटी में सुधार के लिए स्थायी पुलों और सड़कों का निर्माण किया जाए, विशेषकर ऊपरी बस्तियों के लिए।
- आपदा प्रबंधन योजनाओं में जनजातीय समुदायों की विशिष्ट आवश्यकताओं को शामिल किया जाए और उन्हें आपदा प्रतिरोधी बनाया जाए।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए प्रभावी उपाय किए जाएँ, जैसे कि सौर ऊर्जा से चलने वाली बाड़ और जागरूकता कार्यक्रम।
- स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं तक पहुँच में सुधार के लिए मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयाँ और आवासीय विद्यालय स्थापित किए जाएँ।
- जनजातीय समुदायों के भूमि अधिकारों का संरक्षण किया जाए और उन्हें पुनर्वास प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
- स्थानीय प्रशासन और गैर-सरकारी संगठनों के बीच समन्वय स्थापित कर पुनर्वास और विकास कार्यों में तेजी लाई जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जनजातीय विस्थापन · आपदा प्रबंधन · पुनर्वास नीतियां · आवास का अधिकार · वन अधिकार अधिनियम · संवेदनशीलता और समावेशिता · स्थानीय शासन · जलवायु परिवर्तन के प्रभाव · सामाजिक न्याय · मानवीय सुरक्षा · पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम (PESA) · आजीविका सुरक्षा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 38’, ‘note’: ‘राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 46’, ‘note’: ‘अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक, आर्थिक हितों की अभिवृद्धि’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243G’, ‘note’: ‘पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
- {‘article’: ‘पांचवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों का प्रशासन’}
अवधारणा प्रवाह
2019 में केरल के मलप्पुरम में बाढ़ आई। → वानियमपुझा आदिवासी बस्ती के घर नष्ट हुए, लोग विस्थापित हुए। → सात साल बाद भी परिवार अस्थायी प्लास्टिक शेड में रह रहे हैं। → बुनियादी सुविधाओं (बिजली, शौचालय) और कनेक्टिविटी का अभाव है। → पुनर्वास में देरी और सरकारी योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन की चुनौती। → जनजातीय समुदायों के जीवन की गुणवत्ता और मानवाधिकारों का उल्लंघन। → आपदा प्रबंधन और जनजातीय कल्याण नीतियों में सुधार की आवश्यकता।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के अलावा किसी भी राज्य में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित है।
2. वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006) व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें विस्थापित जनजातियों के पुनर्वास का प्रावधान भी शामिल है।
3. पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम (PESA), 1996 का उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय समुदायों को स्वशासन का अधिकार प्रदान करना है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। पाँचवीं अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के अलावा अन्य राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित है। कथन 2 सही है। वन अधिकार अधिनियम, 2006 जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करता है और इसमें विस्थापन के मामलों में पुनर्वास के कुछ प्रावधान भी शामिल हैं। कथन 3 सही है। PESA अधिनियम का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय समुदायों को सशक्त बनाना और उन्हें स्वशासन का अधिकार देना है।
Q2. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) के तहत, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का अध्यक्ष कौन होता है?
- भारत के राष्ट्रपति
- भारत के प्रधानमंत्री
- केंद्रीय गृह मंत्री
- केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री
उत्तर: भारत के प्रधानमंत्री — आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अनुसार, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का अध्यक्ष भारत का प्रधानमंत्री होता है। यह प्राधिकरण देश में आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करने के लिए जिम्मेदार है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ केरल के मलप्पुरम जिले में जनजातीय समुदायों के विस्थापन और पुनर्वास में देरी की हालिया घटना भारत में आपदा प्रबंधन और जनजातीय अधिकारों से संबंधित चुनौतियों को उजागर करती है। इस संदर्भ में, भारत में आपदा-प्रेरित विस्थापन से प्रभावित जनजातीय समुदायों के पुनर्वास में आने वाली प्रमुख चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही, इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए सरकार द्वारा उठाए जा सकने वाले प्रभावी कदमों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: केरल के मलप्पुरम में जनजातीय विस्थापन की घटना का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए आपदा-प्रेरित विस्थापन की समस्या को रेखांकित करें।
2. मुख्य भाग:
क. पुनर्वास में प्रमुख चुनौतियाँ:
i. भूमि अधिकार और वन अधिकार अधिनियम (FRA) का अपर्याप्त कार्यान्वयन।
ii. सांस्कृतिक संवेदनशीलता का अभाव और पारंपरिक आजीविका का नुकसान।
iii. पुनर्वास स्थलों पर बुनियादी सुविधाओं (बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा) की कमी।
iv. धीमी नौकरशाही प्रक्रियाएँ और धन की कमी।
v. जनजातीय समुदायों की कमजोर सामाजिक-आर्थिक स्थिति और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी का अभाव।
vi. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत पुनर्वास पर अपर्याप्त ध्यान।
ख. प्रभावी कदम:
i. वन अधिकार अधिनियम (FRA) और PESA अधिनियम का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना।
ii. जनजातीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के साथ पुनर्वास योजनाएँ तैयार करना।
iii. पुनर्वास स्थलों पर स्थायी आजीविका के अवसर और बुनियादी ढाँचा प्रदान करना।
iv. आपदा प्रबंधन योजनाओं में जनजातीय समुदायों की विशिष्ट आवश्यकताओं को शामिल करना।
v. त्वरित और पारदर्शी पुनर्वास प्रक्रियाएँ सुनिश्चित करना।
vi. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से पर्याप्त धन का आवंटन।
vii. जनजातीय मामलों के मंत्रालय और अन्य संबंधित मंत्रालयों के बीच समन्वय बढ़ाना।
3. निष्कर्ष: समावेशी और संवेदनशील पुनर्वास नीतियों के महत्व पर बल देते हुए, जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा और उनके गरिमापूर्ण जीवन को सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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