17 Sep गृहमंत्रालय ने ठुकराया दारा सिंह का रिहाई निवेदन, जानिए पूरा मामला
✎ क्षमादान की शक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 (राष्ट्रपति) और अनुच्छेद 161 (राज्यपाल) के तहत कार्यपालिका को न्यायिक निर्णयों की समीक्षा करने और सजा को कम करने, निलंबित करने या माफ करने का अधिकार देती है, जिसका प्रयोग…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान — महत्त्वपूर्ण प्रावधान, संशोधन, बुनियादी संरचना | GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली
- Prelims: क्षमादान शक्ति, अनुच्छेद 72, अनुच्छेद 161, दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC), आजीवन कारावास, अग्रिम रिहाई, सर्वोच्च न्यायालय
- Essay: भारत में न्यायपालिका की भूमिका और कार्यप्रणाली, क्षमादान की शक्ति: संवैधानिक संतुलन और मानवाधिकार
त्वरित पुनरावृत्ति: क्षमादान की शक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 (राष्ट्रपति) और अनुच्छेद 161 (राज्यपाल) के तहत कार्यपालिका को न्यायिक निर्णयों की समीक्षा करने और सजा को कम करने, निलंबित करने या माफ करने का अधिकार देती है, जिसका प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर किया जाता है और यह न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
ओडिशा सरकार ने रवींद्र पाल उर्फ दारा सिंह की क्षमादान याचिका को खारिज कर दिया है, जो 1999 में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। दारा सिंह ने 2024 में सर्वोच्च न्यायालय का रुख कर अपनी समयपूर्व रिहाई की मांग की थी, जिसमें उसने तर्क दिया था कि वह 24 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है और अपने कृत्य पर पश्चाताप कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने ओडिशा सरकार को इस याचिका पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था, जिसके बाद राज्य सरकार ने यह फैसला लिया।
पृष्ठभूमि
- जनवरी 1999 में, दारा सिंह के नेतृत्व में एक भीड़ ने ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों को उस समय जला दिया था जब वे अपनी स्टेशन वैगन में सो रहे थे।
- 2003 में, CBI अदालत ने दारा सिंह को दोषी ठहराया और उसे मौत की सजा सुनाई।
- 2005 में, ओडिशा उच्च न्यायालय ने उसकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।
- 2011 में, सर्वोच्च न्यायालय ने ओडिशा उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा।
- दारा सिंह ने 2024 में सर्वोच्च न्यायालय में समयपूर्व रिहाई के लिए याचिका दायर की थी।
- सर्वोच्च न्यायालय ने ओडिशा सरकार को दारा सिंह की क्षमादान याचिका पर निर्णय लेने के लिए कहा था।
- ओडिशा सरकार ने अब इस क्षमादान याचिका को खारिज कर दिया है, जिसकी जानकारी उसने सर्वोच्च न्यायालय को दी है।
- याचिकाकर्ता को इस निर्णय को चुनौती देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है।
- दारा सिंह 25 साल से अधिक समय से जेल में है।
क्षमादान की शक्ति क्या है?
- भारत के संविधान में राष्ट्रपति और राज्यपालों को क्षमादान की शक्ति प्रदान की गई है।
- राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति अनुच्छेद 72 के तहत आती है, जबकि राज्यपाल की शक्ति अनुच्छेद 161 के तहत आती है।
- ये शक्तियाँ कार्यपालिका को न्यायिक निर्णयों की समीक्षा करने और कुछ विशेष परिस्थितियों में सजा को कम करने, निलंबित करने या माफ करने का अधिकार देती हैं।
- क्षमादान (Pardon): यह सजा और दोषसिद्धि दोनों को पूरी तरह से समाप्त कर देता है, अपराधी को सभी दंडों, दंडादेशों और अयोग्यताओं से मुक्त कर देता है।
- लघुकरण (Commutation): यह सजा के स्वरूप को बदलकर हल्की सजा में बदल देता है, जैसे मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलना।
- परिहार (Remission): यह सजा की अवधि को कम करता है, लेकिन सजा के स्वरूप को नहीं बदलता है, जैसे 10 साल के कारावास को 5 साल करना।
- विराम (Respite): यह कुछ विशेष परिस्थितियों (जैसे गर्भावस्था या शारीरिक अक्षमता) के कारण मूल रूप से दी गई सजा को कम करता है।
- प्रविलंबन (Reprieve): यह किसी सजा (विशेषकर मृत्युदंड) के अस्थायी निलंबन का आदेश है, ताकि अपराधी क्षमादान या लघुकरण के लिए आवेदन कर सके।
- क्षमादान की शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर किया जाता है, न कि राष्ट्रपति या राज्यपाल के व्यक्तिगत विवेक पर।
- सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में क्षमादान की शक्ति के प्रयोग के संबंध में दिशानिर्देश स्थापित किए हैं, जिसमें कहा गया है कि इसका प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता है और यह न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| दोषसिद्धि | अदालत द्वारा किसी व्यक्ति को अपराध का दोषी ठहराया जाना। |
| सजा | दोषसिद्धि के बाद न्यायालय द्वारा निर्धारित दंड। |
| मृत्युदंड | सबसे गंभीर अपराधों के लिए दी जाने वाली सर्वोच्च सजा। |
| आजीवन कारावास | दोषी व्यक्ति को उसके शेष जीवनकाल के लिए जेल में रखने की सजा। |
| सजा में छूट (Remission) | सरकार या राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा दोषी की सजा की अवधि को कम करना। |
| समयपूर्व रिहाई | दोषी को उसकी पूरी सजा अवधि समाप्त होने से पहले जेल से रिहा करना। |
महत्व
न्यायिक प्रक्रिया और मानवाधिकार
- यह मामला न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं और दोषियों के मानवाधिकारों के बीच संतुलन को दर्शाता है।
- यह दर्शाता है कि गंभीर अपराधों में भी दोषियों को अपनी सजा में छूट या समयपूर्व रिहाई के लिए आवेदन करने का अधिकार है, भले ही उनके अपराध की प्रकृति कितनी भी जघन्य क्यों न हो।
क्षमादान शक्तियों का प्रयोग
- यह मामला राज्य सरकारों की क्षमादान शक्तियों (remission powers) के प्रयोग से संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों को उजागर करता है।
- यह दर्शाता है कि इन शक्तियों का प्रयोग मनमाना नहीं हो सकता और इसे कानून के सिद्धांतों तथा स्थापित दिशानिर्देशों के अनुसार किया जाना चाहिए।
न्यायिक समीक्षा का महत्व
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्य सरकार के निर्णय की समीक्षा करने का अधिकार न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के सिद्धांत को पुष्ट करता है।
- यह सुनिश्चित करता है कि कार्यपालिका द्वारा लिए गए निर्णय संवैधानिक सिद्धांतों और कानूनी प्रक्रियाओं के अनुरूप हों।
चुनौतियाँ
1. क्षमादान शक्तियों का विवेकपूर्ण उपयोग
- राज्य सरकारों द्वारा क्षमादान शक्तियों का उपयोग करते समय निष्पक्षता और विवेक बनाए रखना एक चुनौती है।
- यह सुनिश्चित करना कि ऐसे निर्णय राजनीतिक दबाव या अन्य बाहरी प्रभावों से मुक्त हों, महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान-संघवाद, राज्य कार्यपालिका
2. न्यायिक प्रक्रिया में देरी
- दोषियों द्वारा बार-बार अपील और याचिकाओं के कारण न्यायिक प्रक्रिया में देरी हो सकती है, जिससे मामलों का निपटान लंबा खिंचता है।
- यह पीड़ितों के लिए न्याय की प्रतीक्षा को भी बढ़ा सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय न्यायपालिका-संरचना और कार्यप्रणाली
3. सार्वजनिक धारणा और न्याय
- गंभीर अपराधों में दोषियों की रिहाई की याचिकाओं पर सार्वजनिक राय अक्सर विभाजित होती है, जिससे न्यायपालिका और सरकार पर दबाव बनता है।
- न्याय के सिद्धांतों को बनाए रखते हुए सार्वजनिक भावनाओं को संतुलित करना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: शासन-पारदर्शिता और जवाबदेही
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| क्षमादान याचिका का अस्वीकरण | राज्य सरकार के निर्णय की वैधता और औचित्य पर सवाल। |
| दोषी की समयपूर्व रिहाई की मांग | गंभीर अपराधों में न्याय के सिद्धांतों और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन। |
| न्यायिक समीक्षा का दायरा | कार्यपालिका के क्षमादान संबंधी निर्णयों में न्यायपालिका के हस्तक्षेप की सीमा। |
| पीड़ितों के अधिकार | दोषियों की रिहाई के निर्णयों में पीड़ितों के दृष्टिकोण और भावनाओं को शामिल करना। |
आगे की राह
- क्षमादान शक्तियों के प्रयोग के लिए स्पष्ट और पारदर्शी दिशानिर्देश स्थापित किए जाने चाहिए, जो सभी राज्यों में समान रूप से लागू हों।
- क्षमादान याचिकाओं पर निर्णय लेते समय पीड़ितों के अधिकारों और उनके पुनर्वास पर भी विचार किया जाना चाहिए।
- न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने और मामलों के त्वरित निपटान के लिए आवश्यक सुधार किए जाने चाहिए।
- न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) का सम्मान करते हुए, न्यायिक समीक्षा के दायरे को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए।
- जेल सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए ताकि दोषियों के पुनर्वास और समाज में उनके पुनः एकीकरण को बढ़ावा मिल सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
क्षमादान शक्तियाँ · अनुच्छेद 72 · अनुच्छेद 161 · राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति · राज्यपाल की क्षमादान शक्ति · न्यायिक समीक्षा · मृत्युदंड · आजीवन कारावास · दंडादेश का लघुकरण · परिहार · विराम · प्रविलंबन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 72’: ‘राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति’, ‘अनुच्छेद 161’: ‘राज्यपाल की क्षमादान शक्ति’, ‘अनुच्छेद 142’: ‘सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ण न्याय के आदेश’}
अवधारणा प्रवाह
ग्रेहम स्टेंस हत्याकांड में दोषी को आजीवन कारावास की सजा → दोषी द्वारा समयपूर्व रिहाई/सजा में छूट की याचिका → ओडिशा सरकार द्वारा याचिका को अस्वीकृत करना → दोषी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में अपील → सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्य सरकार के निर्णय की समीक्षा
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों के पास क्षमादान की शक्ति है।
2. राज्यपाल मृत्युदंड को क्षमा कर सकते हैं।
3. क्षमादान की शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति और अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल के पास क्षमादान की शक्ति है। कथन 2 गलत है। राज्यपाल मृत्युदंड को क्षमा नहीं कर सकते, केवल राष्ट्रपति ही ऐसा कर सकते हैं। राज्यपाल मृत्युदंड को निलंबित, लघुकरण या परिहार कर सकते हैं। कथन 3 सही है। राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों अपनी क्षमादान शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर करते हैं।
Q2. भारत के संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमादान शक्ति के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही नहीं है/हैं?
1. राज्यपाल किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार कर सकते हैं।
2. राज्यपाल मृत्युदंड को क्षमा कर सकते हैं।
3. राज्यपाल की क्षमादान शक्ति का न्यायिक समीक्षा नहीं किया जा सकता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 2 और 3 — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 161 राज्यपाल को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार की शक्ति देता है। कथन 2 गलत है। राज्यपाल मृत्युदंड को क्षमा नहीं कर सकते, यह शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास है (अनुच्छेद 72)। कथन 3 गलत है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान शक्तियों का न्यायिक समीक्षा किया जा सकता है, हालांकि यह सीमित आधारों पर होता है।
Q3. निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प ‘दंडादेश के लघुकरण’ (Commutation) की सही परिभाषा देता है?
- दंड को पूरी तरह से समाप्त करना।
- दंड की प्रकृति को कम कठोर दंड में बदलना।
- दंड की अवधि को कम करना लेकिन उसकी प्रकृति में बदलाव किए बिना।
- किसी विशेष परिस्थिति के कारण दंड को अस्थायी रूप से निलंबित करना।
उत्तर: दंड की प्रकृति को कम कठोर दंड में बदलना। — दंडादेश का लघुकरण (Commutation) का अर्थ है दंड की प्रकृति को कम कठोर दंड में बदलना, जैसे मृत्युदंड को आजीवन कारावास में या कठोर कारावास को साधारण कारावास में बदलना।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान शक्तियों की तुलना कीजिए। क्या इन शक्तियों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है? हाल के न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** भारत के संविधान के अनुच्छेद 72 (राष्ट्रपति) और अनुच्छेद 161 (राज्यपाल) के तहत क्षमादान शक्तियों का संक्षिप्त परिचय।
2. **तुलनात्मक विश्लेषण:**
* **समानताएँ:** दोनों मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं; दोनों को क्षमा, प्रविलंबन, विराम और परिहार की शक्ति प्राप्त है।
* **अंतर:**
* **मृत्युदंड:** राष्ट्रपति मृत्युदंड को क्षमा कर सकते हैं, जबकि राज्यपाल नहीं। राज्यपाल केवल मृत्युदंड को निलंबित, लघुकरण या परिहार कर सकते हैं।
* **सैन्य न्यायालय:** राष्ट्रपति सैन्य न्यायालयों द्वारा दिए गए दंड के संबंध में भी क्षमादान कर सकते हैं, राज्यपाल के पास यह शक्ति नहीं है।
* **क्षेत्राधिकार:** राष्ट्रपति की शक्ति पूरे भारत में लागू होती है, जबकि राज्यपाल की शक्ति राज्य के कानूनों के तहत दिए गए दंड तक सीमित है।
3. **न्यायिक समीक्षा:**
* **मूल सिद्धांत:** प्रारंभ में यह माना जाता था कि क्षमादान शक्ति की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
* **न्यायिक विकास:** सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में स्पष्ट किया है कि इन शक्तियों का न्यायिक समीक्षा किया जा सकता है।
* **महत्वपूर्ण वाद:**
* **मारू राम बनाम भारत संघ (1980):** न्यायालय ने कहा कि क्षमादान शक्ति का प्रयोग मनमाने ढंग से, तर्कहीन या दुर्भावनापूर्ण तरीके से नहीं किया जा सकता।
* **केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989):** न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रपति को याचिकाकर्ता के साथ मौखिक सुनवाई करने की आवश्यकता नहीं है।
* **ई. पून्नम्मा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1995):** न्यायालय ने कहा कि क्षमादान शक्ति के प्रयोग में देरी के आधार पर न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
* **शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ (2014):** मृत्युदंड के मामलों में अत्यधिक देरी को क्षमादान का आधार माना गया।
* **राजीव गांधी हत्या मामले के दोषियों की रिहाई (2022):** सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए दोषियों को रिहा किया, जिसमें राज्य सरकार की क्षमादान याचिका पर निर्णय लेने में देरी भी एक कारक थी।
* **समीक्षा के आधार:** मनमानी, दुर्भावना, असंबद्ध विचारों पर आधारित निर्णय, प्रासंगिक तथ्यों पर विचार न करना, अप्रासंगिक तथ्यों पर विचार करना, अत्यधिक देरी।
4. **निष्कर्ष:** क्षमादान शक्तियाँ कार्यपालिका के महत्वपूर्ण उपकरण हैं, लेकिन संवैधानिक सिद्धांतों और न्याय के हित में इनकी न्यायिक समीक्षा आवश्यक है ताकि मनमानी को रोका जा सके और विधि के शासन को बनाए रखा जा सके।
स्रोत: The Hindu
Odisha PCS (OPSC (OAS)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: ग्राहम स्टेन्स हत्या मामले में दोषी ठहराए गए दारा सिंह की पैरोल याचिका पर ओडिशा सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत तर्कों के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सत्य है?
- ओडिशा सरकार ने दारा सिंह की पैरोल याचिका का समर्थन करते हुए न्यायालय को बताया कि उसने समाज में सुधार किया है।
- ओडिशा सरकार ने दारा सिंह की पैरोल याचिका का विरोध करते हुए न्यायालय को बताया कि उसने समाज में कोई सुधार नहीं किया है।
- ओडिशा सरकार ने इस मामले में कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है।
- ओडिशा सरकार ने दारा सिंह की पैरोल याचिका का समर्थन करते हुए न्यायालय को बताया कि उसने समाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उत्तर: ओडिशा सरकार ने दारा सिंह की पैरोल याचिका का विरोध करते हुए न्यायालय को बताया कि उसने समाज में कोई सुधार नहीं किया है। — ओडिशा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में दारा सिंह की पैरोल याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि उसने समाज में कोई सुधार नहीं किया है।
Mains: ग्राहम स्टेन्स हत्या मामले में ओडिशा सरकार द्वारा दारा सिंह की पैरोल याचिका के विरोध के कानूनी एवं सामाजिक आधार पर चर्चा कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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