डीएमके ने खोलने से इनकार किया परिसीमन बिल पर अपना रुख; दक्षिण के राज्यों को मिलेगा क्या लाभ?

'संसद में बिल आने के बाद तय होगी रणनीति': परिसीमन पर DMK ने नहीं खोले पत्ते; दक्षिण के राज्यों को क्या मिलेगा? — diagram

डीएमके ने खोलने से इनकार किया परिसीमन बिल पर अपना रुख; दक्षिण के राज्यों को मिलेगा क्या लाभ?

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परिसीमन प्रक्रिया

✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण है, जिसका उद्देश्य 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को बनाए रखना है, लेकिन यह जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना  |  GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ  |  GS Paper II — संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय
  • Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, जनसंख्या नियंत्रण, लोकसभा सीटें, राज्य विधानसभा सीटें
  • Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ और भविष्य, जनसंख्या नियंत्रण और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण है, जिसका उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखना है, लेकिन यह जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, संसद में प्रस्तावित परिसीमन विधेयक 2026 को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। तमिलनाडु की विपक्षी पार्टी DMK (द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम) ने इस विधेयक पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि वे संसद में बिल का आधिकारिक मसौदा आने के बाद ही अंतिम निर्णय लेंगे। पार्टी ने पिछली बार परिसीमन का विरोध किया था और केंद्र सरकार को कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी सौंपे थे। दक्षिण भारतीय राज्यों में यह आशंका बनी हुई है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, जबकि केंद्र सरकार इन आशंकाओं को निराधार बता रही है।

पृष्ठभूमि

  • परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय वाले निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण।
  • भारत में परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के समान वर्गों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान करना है।
  • संविधान के अनुच्छेद 82 (Article 82) के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाती है।
  • अनुच्छेद 170 (Article 170) राज्यों को विधानसभा सीटों के पुनर्समायोजन का अधिकार देता है।
  • भारत में अब तक चार बार (1952, 1963, 1973 और 2002) परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है।
  • वर्तमान में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया है, जिसे 2026 तक के लिए फ्रीज कर दिया गया था।

परिसीमन क्या है?

  • परिसीमन का शाब्दिक अर्थ है ‘सीमाओं का निर्धारण’। भारत के संदर्भ में, यह लोकसभा और राज्य विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या में हुए परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या को यथासंभव समान करना है, ताकि ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत का पालन हो सके।
  • परिसीमन का कार्य एक उच्च-स्तरीय निकाय, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा किया जाता है, जिसे भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है।
  • परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  • यह प्रक्रिया जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए चिंता का विषय बन गई है, क्योंकि जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण से उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
परिसीमन का आधार यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो, जिससे ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ का सिद्धांत कायम रहे।
जनसंख्या परिवर्तन जनसंख्या वृद्धि और वितरण में बदलाव के कारण निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को समायोजित करता है।
संसदीय प्रतिनिधित्व राज्यों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में लोकसभा में सीटें आवंटित करता है।
पिछला स्थगन 1971 की जनगणना के आधार पर 2002 में परिसीमन को 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया गया था ताकि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित न किया जाए।
दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएँ कम जनसंख्या वृद्धि वाले दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि नए परिसीमन से लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व घट जाएगा।

महत्व

राजनीतिक महत्व

  • परिसीमन लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की निष्पक्षता सुनिश्चित करता है, जिससे प्रत्येक नागरिक के वोट का समान मूल्य बना रहता है।
  • यह राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति के संतुलन को प्रभावित करता है, विशेषकर लोकसभा में सीटों के आवंटन के संबंध में।
  • दक्षिणी राज्यों की चिंताएँ संघवाद (Federalism) और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के मुद्दों को उजागर करती हैं, जो केंद्र-राज्य संबंधों को प्रभावित कर सकती हैं।

संवैधानिक महत्व

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 (Article 82) और 170 (Article 170) परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) के गठन और उसके कार्यों का प्रावधान करते हैं।
  • यह प्रक्रिया संविधान में निहित समानता के सिद्धांत (Principle of Equality) को बनाए रखने के लिए आवश्यक है, जहाँ सभी निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग समान जनसंख्या हो।

सामाजिक महत्व

  • परिसीमन के माध्यम से अनुसूचित जाति (Scheduled Castes) और अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) के लिए सीटों का आरक्षण सुनिश्चित किया जाता है, जिससे इन समुदायों का उचित प्रतिनिधित्व हो सके।
  • यह विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों की आवाज़ को संसद तक पहुँचाने में मदद करता है, जिससे समावेशी शासन (Inclusive Governance) को बढ़ावा मिलता है।

चुनौतियाँ

1. जनसंख्या नियंत्रण बनाम प्रतिनिधित्व

  • दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे उनकी जनसंख्या वृद्धि दर धीमी रही है।
  • यदि परिसीमन केवल वर्तमान जनसंख्या के आधार पर होता है, तो इन राज्यों को लोकसभा में कम सीटें मिल सकती हैं, जो उनके जनसंख्या नियंत्रण प्रयासों के लिए एक प्रकार का ‘दंड’ होगा।

2. संघवाद पर प्रभाव

  • दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि कम प्रतिनिधित्व से राष्ट्रीय नीतियों और निर्णयों में उनकी आवाज़ कमज़ोर पड़ जाएगी।
  • यह केंद्र और राज्यों के बीच विश्वास और सहयोग को प्रभावित कर सकता है, जिससे संघवाद की भावना को ठेस पहुँच सकती है।

3. राजनीतिक असंतोष

  • परिसीमन के परिणामस्वरूप सीटों के पुनर्वितरण से विभिन्न राजनीतिक दलों और क्षेत्रीय नेताओं के बीच असंतोष बढ़ सकता है।
  • यह राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय संतुलन के लिए चुनौतियाँ खड़ी कर सकता है।

4. संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता

  • परिसीमन के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता हो सकती है, विशेषकर यदि सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है या आधार वर्ष बदला जाता है।
  • संशोधन प्रक्रिया में राजनीतिक सहमति प्राप्त करना एक चुनौती हो सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जनसंख्या नियंत्रण दक्षिणी राज्यों को लगता है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण उन्हें कम संसदीय सीटें मिलेंगी।
प्रतिनिधित्व का ह्रास आबादी के आधार पर परिसीमन से दक्षिणी राज्यों का लोकसभा में आनुपातिक प्रतिनिधित्व घट सकता है।
संघीय संतुलन यह केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है और संघीय ढांचे को प्रभावित कर सकता है।
राजनीतिक असंतोष सीटों के पुनर्वितरण से क्षेत्रीय दलों और राज्यों के बीच राजनीतिक विरोध बढ़ सकता है।
संवैधानिक प्रावधान परिसीमन के लिए संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव की आवश्यकता हो सकती है, जो एक जटिल प्रक्रिया है।

आगे की राह

  • परिसीमन के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी कार्यप्रणाली विकसित की जाए, जिसमें सभी हितधारकों की राय ली जाए।
  • जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के हितों की रक्षा के लिए वैकल्पिक मापदंडों पर विचार किया जाए, जैसे कि विकास सूचकांक या भौगोलिक क्षेत्र।
  • केंद्र सरकार को दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए सक्रिय संवाद और परामर्श स्थापित करना चाहिए।
  • एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सकता है जो परिसीमन के विभिन्न मॉडलों और उनके संभावित प्रभावों का अध्ययन करे।
  • संसद में विधेयक पेश करने से पहले सभी राजनीतिक दलों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया जाए ताकि आम सहमति बन सके।
  • यदि सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है, तो यह सुनिश्चित किया जाए कि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व आनुपातिक रूप से कम न हो।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

परिसीमन आयोग · जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व · संसदीय निर्वाचन क्षेत्र · संघवाद · राज्यों का प्रतिनिधित्व · लोकसभा सीटें · संवैधानिक संशोधन · दक्षिण भारतीय राज्य · समान प्रतिनिधित्व · जनसांख्यिकीय लाभांश

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 82: संसद द्वारा परिसीमन
  • अनुच्छेद 170: विधानसभाओं का परिसीमन
  • अनुच्छेद 330: लोकसभा में SC/ST आरक्षण
  • अनुच्छेद 332: विधानसभाओं में SC/ST आरक्षण

अवधारणा प्रवाह

जनसंख्या वृद्धि और वितरण में परिवर्तन  →  परिसीमन आयोग का गठन (अनुच्छेद 82/170)  →  निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्रचना  →  लोकसभा/विधानसभा सीटों का पुनर्वितरण  →  प्रतिनिधित्व में बदलाव (विशेषकर दक्षिणी राज्यों के लिए)  →  राजनीतिक और संघीय संतुलन पर प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. परिसीमन आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में परिसीमन आयोग का गठन केवल संसद के अधिनियम द्वारा किया जाता है।
2. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
3. आयोग के आदेश भारत के राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किए जाने के बाद लागू होते हैं।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि परिसीमन आयोग का गठन संसद द्वारा अधिनियमित परिसीमन अधिनियम के तहत किया जाता है, न कि केवल संसद के अधिनियम द्वारा। कथन 2 सही है क्योंकि परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती ताकि परिसीमन प्रक्रिया में देरी न हो। कथन 3 सही है क्योंकि आयोग के आदेश भारत के राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किए जाने के बाद लागू होते हैं।

Q2. परिसीमन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

  1. जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्वितरण करना।
  2. राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों का समान वितरण सुनिश्चित करना।
  3. केंद्र सरकार की शक्तियों को बढ़ाना।
  4. स्थानीय स्वशासन को मजबूत करना।

उत्तर: जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्वितरण करना। — परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना है ताकि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो और सभी नागरिकों को समान प्रतिनिधित्व मिल सके।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में परिसीमन की अवधारणा और इसके संवैधानिक प्रावधानों की विवेचना कीजिए। क्या जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने वाले दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व पर परिसीमन का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: परिसीमन की परिभाषा और इसका उद्देश्य (समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना)।
2. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 82 (संसद द्वारा परिसीमन अधिनियम) और अनुच्छेद 170 (राज्यों में विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन)।
3. परिसीमन आयोग: इसकी संरचना, शक्तियाँ और कार्य (न्यायिक समीक्षा से बाहर)।
4. परिसीमन का इतिहास: 1952, 1963, 1973 और 2002 के परिसीमन आयोग। 2026 तक सीटों के फ्रीज का उल्लेख।
5. दक्षिणी राज्यों की चिंताएँ: जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त करने वाले राज्यों को कम प्रतिनिधित्व मिलने की आशंका। जनसांख्यिकीय लाभांश और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन का मुद्दा।
6. केंद्र सरकार का रुख: सरकार के दावे कि नए मॉडल से दक्षिणी राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी पर बुरा असर नहीं पड़ेगा।
7. समालोचनात्मक विश्लेषण: संघवाद, समान प्रतिनिधित्व, और जनसंख्या नियंत्रण के प्रोत्साहन के बीच संतुलन की आवश्यकता। इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों के विचार।
8. निष्कर्ष: एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें जो जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को पुरस्कृत करे और साथ ही सभी राज्यों के उचित प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करे।

स्रोत: amarujala.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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