डीएमके ने खोले परिसीमन बिल पर अपने पत्ते, दक्षिण के राज्यों को मिलेगा क्या? जानिए पूरी रणनीति

'संसद में बिल आने के बाद तय होगी रणनीति': परिसीमन पर DMK ने नहीं खोले पत्ते; दक्षिण के राज्यों को क्या मिलेगा? — diagram

डीएमके ने खोले परिसीमन बिल पर अपने पत्ते, दक्षिण के राज्यों को मिलेगा क्या? जानिए पूरी रणनीति

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परिसीमन प्रक्रिया

✎ परिसीमन का उद्देश्य 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को सुनिश्चित करना है, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को प्रतिनिधित्व में कमी की आशंका है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, संघवाद, संसद और राज्य विधायिका  |  GS Paper II — केंद्र-राज्य संबंध
  • Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, जनसंख्या नियंत्रण, लोकसभा सीटें, राज्य विधानसभा सीटें
  • Essay: भारतीय संघवाद में जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व का भविष्य, समानता बनाम प्रतिनिधित्व: परिसीमन की चुनौती

त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन का उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करना है, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को प्रतिनिधित्व में कमी की आशंका है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

तमिलनाडु की विपक्षी पार्टी DMK ने आगामी परिसीमन विधेयक पर अपना रुख स्पष्ट करने से इनकार कर दिया है, यह कहते हुए कि वे संसद में विधेयक का आधिकारिक मसौदा आने के बाद ही अंतिम निर्णय लेंगे। पार्टी ने पिछली बार परिसीमन का विरोध किया था और केंद्र सरकार को कुछ महत्वपूर्ण सुझाव सौंपे थे। DMK का कहना है कि वे विधेयक के प्रत्येक प्रावधान का बारीकी से अध्ययन करेंगे और देखेंगे कि उनके पुराने सुझावों को इसमें शामिल किया गया है या नहीं। यह घटनाक्रम परिसीमन को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को फिर से उजागर करता है, जहां उन्हें आशंका है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण से उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों का परिसीमन (Delimitation) प्रत्येक जनगणना के बाद किया जाता है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना है।
  • संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाती है, जबकि अनुच्छेद 170 राज्यों को विधानसभा सीटों के परिसीमन का अधिकार देता है।

परिसीमन क्या है?

  • परिसीमन का अर्थ है किसी देश या एक विधायी निकाय वाले प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण या पुनःनिर्धारण करना।
  • इसका मुख्य उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करना है, ताकि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो।
  • दक्षिण भारतीय राज्यों को यह चिंता है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण आगामी परिसीमन में उनकी लोकसभा सीटों की संख्या कम हो सकती है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
परिसीमन का आधार जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन। यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में लगभग समान जनसंख्या हो, जिससे ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ का सिद्धांत कायम रहे।
प्रतिनिधित्व का पुनर्संतुलन जनसंख्या वृद्धि के अनुसार राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व में बदलाव आता है। जिन राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर कम रही है, उन्हें प्रतिनिधित्व में कमी का डर है।
लोकसभा सीटों में प्रस्तावित वृद्धि अप्रैल 2026 के विधायी पैकेज में लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव है। यह बढ़ती जनसंख्या और मतदाताओं की संख्या को समायोजित करने के लिए आवश्यक है।
दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएँ दक्षिण के राज्यों को आशंका है कि कम जनसंख्या वृद्धि दर के कारण उनका संसदीय प्रतिनिधित्व घट जाएगा, जिससे उनकी राजनीतिक शक्ति कम हो सकती है।
DMK का रुख DMK ने विधेयक के अंतिम मसौदे का इंतजार करने का फैसला किया है। पार्टी अपने पुराने सुझावों को शामिल किए जाने और विधेयक के प्रत्येक पहलू का अध्ययन करने के बाद ही अपना अंतिम रुख तय करेगी।

महत्व

राजनीतिक महत्व

  • परिसीमन का सीधा प्रभाव राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व और केंद्र में उनकी राजनीतिक सौदेबाजी की शक्ति पर पड़ता है।
  • यह संघवाद (Federalism) के सिद्धांत को प्रभावित करता है, क्योंकि जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों को दंडित किए जाने की आशंका है।
  • विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने राज्यों के हितों की रक्षा के लिए परिसीमन पर अलग-अलग रुख अपनाते हैं, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।

सामाजिक महत्व

  • परिसीमन का उद्देश्य विभिन्न सामाजिक समूहों और क्षेत्रों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, जिससे समावेशी शासन को बढ़ावा मिले।
  • यदि परिसीमन से किसी क्षेत्र विशेष का प्रतिनिधित्व घटता है, तो वहाँ के लोगों में उपेक्षा और अलगाव की भावना बढ़ सकती है।

संवैधानिक महत्व

  • परिसीमन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत अनिवार्य है, जो प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों के समायोजन का प्रावधान करते हैं।
  • यह ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को बनाए रखने के लिए आवश्यक है, ताकि सभी नागरिकों के वोटों का मूल्य समान रहे।

चुनौतियाँ

1. जनसंख्या नियंत्रण बनाम प्रतिनिधित्व

  • जिन दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें डर है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से उनका संसदीय प्रतिनिधित्व घट जाएगा।
  • यह उन राज्यों के लिए एक तरह का ‘दंड’ माना जा रहा है जिन्होंने राष्ट्रीय हित में जनसंख्या नियंत्रण नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया।

2. संघीय संतुलन पर प्रभाव

  • यदि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घटता है और उत्तरी राज्यों का बढ़ता है, तो केंद्र सरकार में दक्षिणी राज्यों की आवाज कमजोर हो सकती है।
  • यह केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है और क्षेत्रीय असंतुलन को बढ़ा सकता है।

3. राजनीतिक सहमति का अभाव

  • परिसीमन एक संवेदनशील मुद्दा है जिस पर विभिन्न राज्यों और राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति बनाना मुश्किल होता है।
  • विधेयक के मसौदे पर DMK जैसे दलों का विरोध दर्शाता है कि इस पर व्यापक राजनीतिक विचार-विमर्श और सहमति की आवश्यकता है।

4. निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन

  • निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करते समय भौगोलिक निरंतरता, प्रशासनिक इकाइयों और संचार की सुविधा जैसे कारकों को ध्यान में रखना एक जटिल कार्य है।
  • इससे कुछ मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है, जिससे मतदाताओं और प्रतिनिधियों दोनों के लिए नई चुनौतियाँ पैदा हो सकती हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जनसंख्या आधारित परिसीमन कम जनसंख्या वृद्धि वाले दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घटने की आशंका, जिससे उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में नुकसान हो सकता है।
संघीय असंतुलन उत्तरी राज्यों के बढ़ते प्रतिनिधित्व से केंद्र सरकार में दक्षिणी राज्यों की आवाज कमजोर होने का डर, जिससे क्षेत्रीय असमानता बढ़ सकती है।
राजनीतिक विरोध विभिन्न राजनीतिक दलों और राज्यों के बीच परिसीमन के तरीकों और परिणामों पर असहमति, जिससे विधायी प्रक्रिया में बाधा आ सकती है।
पुराने सुझावों का समावेश DMK जैसे दल यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके पूर्व में दिए गए सुझावों को नए विधेयक में शामिल किया जाए, अन्यथा वे विरोध कर सकते हैं।
लोकसभा सीटों की वृद्धि सीटों की संख्या में प्रस्तावित वृद्धि (543 से 816) के बावजूद, दक्षिणी राज्यों को अपनी आनुपातिक हिस्सेदारी बनाए रखने पर संदेह है।

आगे की राह

  • परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) को एक निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी चाहिए, जिसमें सभी राज्यों की चिंताओं को सुना जाए।
  • जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों के हितों की रक्षा के लिए वैकल्पिक मापदंडों या क्षतिपूर्ति तंत्रों पर विचार किया जाना चाहिए।
  • विधेयक के मसौदे पर व्यापक राजनीतिक विचार-विमर्श और आम सहमति बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए, जिसमें सभी हितधारकों को शामिल किया जाए।
  • परिसीमन के प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि दक्षिणी राज्यों की आशंकाओं को दूर किया जा सके।
  • लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्गठन में भौगोलिक निरंतरता, प्रशासनिक इकाइयों और सांस्कृतिक एकरूपता जैसे कारकों को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
  • परिसीमन प्रक्रिया को संवैधानिक प्रावधानों और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत के अनुरूप बनाए रखा जाना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

परिसीमन आयोग · अनुच्छेद 82 · जनसंख्या प्रतिनिधित्व · संसदीय सीटें · संघवाद · दक्षिण भारतीय राज्य · लोकसभा · विधानसभा · जनसंख्या नियंत्रण · समान प्रतिनिधित्व · राजनीतिक प्रतिनिधित्व · संवैधानिक प्रावधान

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘विधानसभा सीटों का परिसीमन’}

अवधारणा प्रवाह

जनसंख्या वृद्धि और वितरण में बदलाव  →  संसदीय प्रतिनिधित्व में असमानता  →  परिसीमन विधेयक का प्रस्ताव  →  राज्यों (विशेषकर दक्षिण) की प्रतिनिधित्व घटने की चिंता  →  राजनीतिक दलों द्वारा विधेयक का मूल्यांकन  →  संसद में विधेयक पर बहस और पारित होना  →  नए निर्वाचन क्षेत्रों का गठन और प्रतिनिधित्व का पुनर्संतुलन

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है।
2. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन को वर्ष 2000 तक के लिए स्थगित कर दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। कथन 3 गलत है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने सीटों के परिसीमन को वर्ष 2000 तक के लिए स्थगित कर दिया था, लेकिन 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने इसे 2026 तक बढ़ा दिया।

Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. परिसीमन आयोग के अध्यक्ष भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त होते हैं।
2. आयोग के आदेशों को राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित किए जाने के बाद ही लागू किया जा सकता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2

उत्तर: न तो 1 और न ही 2 — कथन 1 गलत है। परिसीमन आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश अध्यक्ष होते हैं, न कि मुख्य चुनाव आयुक्त। मुख्य चुनाव आयुक्त पदेन सदस्य होते हैं। कथन 2 गलत है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है और उन्हें राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में परिसीमन की प्रक्रिया और इसके संवैधानिक आधारों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या आपको लगता है कि वर्तमान परिसीमन मॉडल दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: परिसीमन की परिभाषा और उद्देश्य (समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना) से शुरुआत करें।
2. संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 170 का उल्लेख करें, जो संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देते हैं।
3. परिसीमन आयोग: इसकी संरचना (सेवानिवृत्त SC न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त, संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त) और कार्यप्रणाली (जनसंख्या के आधार पर सीटों का आवंटन, भौगोलिक अखंडता) का वर्णन करें।
4. आलोचनात्मक परीक्षण: परिसीमन के स्थगन (42वें और 84वें संशोधन) और जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों के लिए दक्षिण भारतीय राज्यों को ‘दंडित’ किए जाने की आशंका पर चर्चा करें।
5. दक्षिण भारतीय राज्यों पर प्रभाव: इस बात पर चर्चा करें कि जनसंख्या वृद्धि दर कम होने के कारण इन राज्यों की सीटें कम हो सकती हैं, जिससे उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आ सकती है। केंद्र सरकार के दावों (आनुपातिक हिस्सेदारी पर कोई बुरा असर नहीं) का भी उल्लेख करें।
6. संघवाद पर प्रभाव: संघवाद और राज्यों के बीच विश्वास के मुद्दे पर इसके संभावित प्रभाव का विश्लेषण करें।
7. निष्कर्ष: एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें, जिसमें प्रतिनिधित्व के सिद्धांत और जनसंख्या नियंत्रण के प्रोत्साहन के बीच सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया हो।

स्रोत: amarujala.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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