17 Aug नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मुहिम: संविधान संशोधन पर जोर, क्या भारत पर होगा असर?

✎ नेपाल में हिंदू राष्ट्र की बहाली की मांग, संविधान के अनुच्छेद 4 से 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द हटाने पर केंद्रित है, जिसका भारत-नेपाल संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध | GS Paper II — भारतीय संविधान – महत्वपूर्ण प्रावधान | GS Paper I — भारतीय विरासत और संस्कृति
- Prelims: नेपाल का संविधान, अनुच्छेद 4, धर्मनिरपेक्षता, संघीय गणराज्य, भारत-नेपाल संबंध, राजतंत्र, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (राप्रपा), विश्व हिंदू परिषद (VHP) नेपाल
- Essay: भारत-नेपाल संबंध: सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक आयाम, धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत और समकालीन चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: नेपाल में हिंदू राष्ट्र की बहाली की मांग, संविधान के अनुच्छेद 4 से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने पर केंद्रित है, जिसका भारत-नेपाल संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की बहाली की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) नेपाल और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (राप्रपा) जैसे संगठन नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 4 से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने और देश को ‘सनातन धर्म-सापेक्ष हिंदू राष्ट्र’ के रूप में पुनर्स्थापित करने पर जोर दे रहे हैं। यह मांग ऐसे समय में उठाई गई है जब नेपाल सरकार संविधान के विभिन्न प्रावधानों में बदलाव के लिए सुझाव एकत्र कर रही है।
पृष्ठभूमि
- नेपाल 2015 में लागू हुए अपने संविधान के बाद एक धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य (Secular Federal Democratic Republic) बन गया था।
- इससे पहले, नेपाल एक हिंदू राष्ट्र था, जिसमें राजतंत्र (Monarchy) की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
- माओवादी विद्रोह और लंबे राजनीतिक संक्रमण के बाद, नेपाल ने एक नया संविधान अपनाया जिसने देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया।
- संविधान के अनुच्छेद 4 में नेपाल को ‘धर्मनिरपेक्ष’ राज्य के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसका अर्थ है धार्मिक, सांस्कृतिक स्वतंत्रता सहित सनातन काल से चली आ रही सभी धर्मों की रक्षा।
- वर्तमान में, नेपाल सरकार संविधान संशोधन के लिए सुझाव जुटा रही है, जिसमें 308 में से 245 धाराओं में बदलाव के सुझाव दिए गए हैं।
- हिंदू राष्ट्र समर्थक संगठन इस प्रक्रिया को अपनी मांग को सांविधानिक बहस में शामिल कराने के अवसर के रूप में देख रहे हैं।
भारत-नेपाल संबंध और धर्मनिरपेक्षता का महत्व
- भारत और नेपाल के बीच ‘रोटी-बेटी’ का संबंध रहा है, जो गहरे सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक बंधनों पर आधारित है। दोनों देशों के बीच खुली सीमा और लोगों के बीच आवाजाही इन संबंधों का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
- भारत स्वयं एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, जहाँ संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था। भारतीय धर्मनिरपेक्षता सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान (सर्वधर्म समभाव) के सिद्धांत पर आधारित है।
- नेपाल में धर्मनिरपेक्षता की स्थिति में बदलाव का भारत पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों में धार्मिक और सामाजिक सद्भाव पर।
- भारत की विदेश नीति ‘पड़ोसी पहले’ (Neighbourhood First) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके तहत नेपाल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। नेपाल की आंतरिक स्थिरता और राजनीतिक व्यवस्था भारत के लिए चिंता का विषय रही है।
- नेपाल में हिंदू राष्ट्र की बहाली की मांग भारत में कुछ वर्गों द्वारा समर्थन प्राप्त कर सकती है, जबकि अन्य इसे धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ मान सकते हैं, जिससे घरेलू स्तर पर भी बहस छिड़ सकती है।
- भारत और नेपाल दोनों दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) के सदस्य हैं, और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए दोनों देशों के बीच मजबूत और स्थिर संबंध आवश्यक हैं।
- नेपाल में राजतंत्र की बहाली की मांग भी हिंदू राष्ट्र की मांग के साथ उठाई जा रही है, जो नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था में बड़े बदलाव ला सकती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा | नेपाल के संविधान की धारा-4 से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने की मांग, जिससे देश की पहचान पर बहस छिड़ गई है। |
| हिंदू राष्ट्र की पुनर्स्थापना | समर्थक नेपाल को ‘सनातन धर्म-सापेक्ष हिंदू राष्ट्र’ के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, जिसमें हिंदू, बौद्ध और किरात परंपराएं शामिल हों। |
| संवैधानिक संशोधन प्रक्रिया | नेपाल सरकार संविधान के विभिन्न प्रावधानों में बदलाव के लिए सुझाव मांग रही है, जिसे हिंदू राष्ट्र समर्थकों ने अपनी मांग उठाने का अवसर माना है। |
| राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (राप्रपा) की भूमिका | यह पार्टी हिंदू राष्ट्र, राजसंस्था और संघीय व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को संविधान संशोधन की बहस में शामिल करने पर जोर दे रही है। |
| धार्मिक स्वतंत्रता का प्रस्ताव | प्रस्तावित मॉडल में धार्मिक स्वतंत्रता बनाए रखने की बात भी कही जा रही है, ताकि सभी धर्मों को स्वतंत्रता मिल सके। |
महत्व
भू-राजनीतिक महत्व
- नेपाल में धार्मिक पहचान से जुड़ा यह मुद्दा भारत के लिए भी भू-राजनीतिक संवेदनशीलता रखता है, क्योंकि दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं।
- नेपाल की आंतरिक स्थिरता और उसकी धार्मिक पहचान में बदलाव का क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत-नेपाल संबंधों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।
सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व
- यह मुद्दा नेपाल के बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज में धार्मिक सहिष्णुता और पहचान के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
- सनातन परंपरा में बौद्ध और किरात धर्मों को शामिल करने का प्रस्ताव नेपाल की विविध धार्मिक विरासत को एकीकृत करने का प्रयास है।
संवैधानिक और लोकतांत्रिक महत्व
- संविधान की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति में बदलाव की मांग नेपाल के लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
- यह बहस दर्शाती है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से भी राष्ट्रीय पहचान और राज्य के स्वरूप पर गंभीर विमर्श हो सकता है।
चुनौतियाँ
1. धार्मिक सद्भाव और अल्पसंख्यक अधिकार
- धर्मनिरपेक्षता से हटकर हिंदू राष्ट्र बनने से नेपाल में धार्मिक अल्पसंख्यकों (जैसे बौद्ध, मुस्लिम, ईसाई) के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं।
- इससे विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच सामाजिक सद्भाव और सह-अस्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय समाज, सामाजिक न्याय, शासन
2. संवैधानिक स्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्य
- संविधान की मूल संरचना में बदलाव की मांग नेपाल की संवैधानिक स्थिरता के लिए चुनौती है, खासकर 2015 में लागू हुए संविधान के संदर्भ में।
- यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही राष्ट्रीय पहचान को बदलने के प्रयासों को दर्शाता है, जिससे भविष्य में अन्य मूलभूत सिद्धांतों पर भी बहस छिड़ सकती है।
यूपीएससी लिंक: राजव्यवस्था, शासन, संविधान
3. अंतर्राष्ट्रीय संबंध और कूटनीति
- नेपाल के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप में बदलाव से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में उसकी छवि और अन्य देशों के साथ उसके संबंधों पर असर पड़ सकता है।
- भारत के लिए, नेपाल में इस तरह के बदलाव से द्विपक्षीय संबंधों में नई जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं, खासकर सीमावर्ती क्षेत्रों में।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, भारत के पड़ोसी
4. संघीय व्यवस्था पर प्रभाव
- राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (राप्रपा) द्वारा संघीय व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को भी संविधान संशोधन की बहस में शामिल करने की मांग से नेपाल की संघीय संरचना पर भी दबाव पड़ सकता है।
- यह विकेंद्रीकरण और क्षेत्रीय स्वायत्तता के सिद्धांतों को प्रभावित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: राजव्यवस्था, संघवाद
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| धर्मनिरपेक्षता का उन्मूलन | धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों और पहचान पर संभावित खतरा, सामाजिक ध्रुवीकरण का जोखिम। |
| संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया | संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कमजोर करने की संभावना, राजनीतिक अस्थिरता। |
| सामाजिक सद्भाव | विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच तनाव और संघर्ष की आशंका, राष्ट्रीय एकता पर नकारात्मक प्रभाव। |
| भारत-नेपाल संबंध | नेपाल की आंतरिक धार्मिक पहचान में बदलाव से भारत के साथ सांस्कृतिक, राजनीतिक और सुरक्षा संबंधों में जटिलताएं। |
| अंतर्राष्ट्रीय छवि | धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य से हिंदू राष्ट्र बनने पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर नेपाल की छवि पर असर। |
आगे की राह
- नेपाल सरकार को सभी हितधारकों, विशेषकर धार्मिक अल्पसंख्यकों और नागरिक समाज संगठनों के साथ व्यापक परामर्श करना चाहिए।
- संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया को पारदर्शी और समावेशी बनाना चाहिए, ताकि सभी वर्गों की आवाज सुनी जा सके।
- धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों को बनाए रखते हुए, राष्ट्रीय पहचान पर बहस को लोकतांत्रिक दायरे में रखना चाहिए।
- भारत और नेपाल के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को मजबूत करने के लिए संवाद और सहयोग के रास्ते खुले रखने चाहिए।
- किसी भी संवैधानिक बदलाव से पहले उसके दीर्घकालिक सामाजिक, राजनीतिक और भू-राजनीतिक प्रभावों का गहन विश्लेषण किया जाना चाहिए।
- नेपाल को अपनी बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक विरासत का सम्मान करते हुए एक ऐसा मॉडल विकसित करना चाहिए जो सभी समुदायों को स्वीकार्य हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
धर्मनिरपेक्षता · संविधान संशोधन · संघवाद · धार्मिक स्वतंत्रता · राज्य की पहचान · लोकतांत्रिक गणराज्य · सांस्कृतिक बहुलता · मौलिक अधिकार · पड़ोसी देशों से संबंध · अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 4 (नेपाल का संविधान)’, ‘note’: ‘धर्मनिरपेक्षता से संबंधित प्रावधान’}
अवधारणा प्रवाह
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग तेज → संविधान की धारा-4 से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाने का प्रस्ताव → सरकार द्वारा संवैधानिक संशोधन हेतु सुझावों का आमंत्रण → विभिन्न संगठनों द्वारा हिंदू राष्ट्र की मांग को संवैधानिक बहस में शामिल करना → नेपाल की धर्मनिरपेक्ष पहचान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर बहस
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नेपाल का संविधान 2015 में लागू हुआ था, जिसके बाद यह एक धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बना।
2. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, जिसमें सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता शामिल है।
3. विश्व हिंदू परिषद (VHP) नेपाल ने नेपाल सरकार को संविधान की धारा-4 से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने का प्रस्ताव दिया है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। नेपाल का वर्तमान संविधान 2015 में लागू हुआ था, जिसने नेपाल को धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। कथन 2 सही है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है। कथन 3 सही है। समाचार के अनुसार, VHP नेपाल ने संविधान की धारा-4 से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने का सुझाव दिया है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा भारतीय संविधान का भाग नहीं है, जो धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है?
- प्रस्तावना
- मौलिक अधिकार
- राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत
- आपातकालीन प्रावधान
उत्तर: आपातकालीन प्रावधान — भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा गया था। मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25-28) और राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP) धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को मजबूत करते हैं। आपातकालीन प्रावधान (भाग XVIII) धर्मनिरपेक्षता से सीधे संबंधित नहीं हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर प्रकाश डालते हुए, नेपाल में ‘हिंदू राष्ट्र’ की मांग और इसके संभावित संवैधानिक तथा सामाजिक प्रभावों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को संक्षेप में परिभाषित करें, विशेष रूप से भारत और नेपाल के संदर्भ में। नेपाल के 2015 के संविधान द्वारा अपनाई गई धर्मनिरपेक्ष स्थिति का उल्लेख करें।
2. **’हिंदू राष्ट्र’ की मांग के कारण:** नेपाल में ‘हिंदू राष्ट्र’ की मांग के पीछे के प्रमुख कारणों पर चर्चा करें, जैसे कि ऐतिहासिक पहचान, सांस्कृतिक विरासत और राजनीतिक दलों (जैसे राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी) की भूमिका।
3. **संविधान संशोधन की मांग:** संविधान की धारा-4 से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने और ‘सनातन धर्म-सापेक्ष हिंदू राष्ट्र’ के रूप में पुनर्स्थापना के प्रस्तावों का उल्लेख करें।
4. **संभावित संवैधानिक प्रभाव:**
* धर्मनिरपेक्षता से विचलन के निहितार्थ।
* अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों पर प्रभाव।
* धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों पर असर।
* संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की प्रकृति में बदलाव।
5. **संभावित सामाजिक प्रभाव:**
* धार्मिक सद्भाव और सामाजिक ताने-बाने पर असर।
* धार्मिक पहचान आधारित ध्रुवीकरण की संभावना।
* बौद्ध, किरात और अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं के साथ संबंधों पर प्रभाव।
6. **आलोचनात्मक विश्लेषण:** धार्मिक स्वतंत्रता बनाए रखने के साथ ‘सनातन सांस्कृतिक पहचान’ के मॉडल के प्रस्तावों का मूल्यांकन करें। क्या यह वास्तव में सभी धर्मों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगा या बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देगा?
7. **निष्कर्ष:** नेपाल के लिए आगे का रास्ता, जिसमें संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक समावेशिता और क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया जाए।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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