30 Jul यूपीएससी के लिए महत्वपूर्ण: भारत के जलमग्न सांस्कृतिक धरोहरों का अन्वेषण 2030 तक


मानचित्र व माइंड-मैप: Underwater Cultural Heritage Sites in India
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय विरासत और संस्कृति | GS Paper I — इतिहास | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
- Prelims: अंतर्जलीय पुरातत्व, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), समुद्री पुरातत्व, द्वारका, पूमपुहार, सांस्कृतिक विरासत संरक्षण, राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान
- Essay: सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण: अतीत से भविष्य तक की यात्रा, भारत की समुद्री विरासत और उसका रणनीतिक महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत की अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत में जलमग्न स्थल और कलाकृतियाँ शामिल हैं, जिनका अन्वेषण और संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण तथा अन्य संस्थानों द्वारा किया जा रहा है, जो देश के समृद्ध समुद्री इतिहास और प्राचीन सभ्यताओं को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग द्वारका, बेट द्वारका (गुजरात), महाबलीपुरम (तमिलनाडु) और कराईकल (पुदुचेरी) में अनुसंधान एवं अन्वेषण गतिविधियाँ चला रहा है। इसके अतिरिक्त, भारत सरकार ने तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग और राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (National Institute of Oceanography) को भी विभिन्न स्थलों पर पानी के नीचे खुदाई/अन्वेषण के लिए लाइसेंस प्रदान किए हैं, जो भारत की समृद्ध अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत (Underwater Cultural Heritage) के संरक्षण और अन्वेषण के प्रयासों को रेखांकित करता है।
पृष्ठभूमि
- भारत एक विशाल तटरेखा और समृद्ध समुद्री इतिहास वाला देश है, जिसमें कई प्राचीन बंदरगाह, व्यापार मार्ग और जलमग्न शहर शामिल हैं।
- अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत में जलमग्न स्थल, जहाज के मलबे, कलाकृतियाँ और अन्य मानव निर्मित अवशेष शामिल होते हैं जो पानी के नीचे पाए जाते हैं।
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग की स्थापना भारत की समुद्री और अंतर्जलीय पुरातात्विक संपदा की पहचान, दस्तावेजीकरण और संरक्षण के उद्देश्य से की गई थी।
- द्वारका जैसे स्थल, जिनका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, अंतर्जलीय पुरातत्व के लिए विशेष महत्व रखते हैं, क्योंकि वे पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों को जोड़ने का प्रयास करते हैं।
- समुद्री पुरातत्व केंद्र, राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) भी भारत में समुद्री पुरातत्व अनुसंधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर कार्य कर रही हैं, जैसा कि तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग को आवंटित बजट और लाइसेंस से स्पष्ट होता है।
अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत क्या है?
- अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत (UCH) का तात्पर्य उन सभी मानव निर्मित अवशेषों से है जो किसी समय पानी के नीचे रहे हों या जानबूझकर पानी में डुबो दिए गए हों।
- इसमें जलमग्न शहर, बंदरगाह संरचनाएँ, जहाज के मलबे, विमान, कलाकृतियाँ और अन्य पुरातात्विक स्थल शामिल हैं जो झीलों, नदियों, समुद्रों या महासागरों के नीचे पाए जाते हैं।
- यह विरासत प्राकृतिक प्रक्रियाओं जैसे समुद्र के स्तर में वृद्धि, भूकंप या सुनामी, या मानवीय गतिविधियों जैसे युद्ध या दुर्घटनाओं के कारण जलमग्न हो सकती है।
- अंतर्जलीय पुरातत्व (Underwater Archaeology) वह वैज्ञानिक अनुशासन है जो इन जलमग्न स्थलों और कलाकृतियों का अध्ययन करता है, उनकी पहचान करता है, खुदाई करता है और उन्हें संरक्षित करता है।
- यह हमें प्राचीन सभ्यताओं, व्यापार मार्गों, समुद्री प्रौद्योगिकी और पर्यावरणीय परिवर्तनों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है।
- भारत में, विशेष रूप से गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और पुदुचेरी के तटीय क्षेत्रों में समृद्ध अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत मौजूद है, जिसमें पौराणिक द्वारका और ऐतिहासिक पूमपुहार जैसे स्थल शामिल हैं।
- इस विरासत के संरक्षण में तकनीकी चुनौतियाँ शामिल हैं, जैसे पानी के नीचे खुदाई की जटिलता, संरक्षण की आवश्यकता और समुद्री पर्यावरण के प्रभाव से बचाव।
- यूनेस्को (UNESCO) का 2001 का अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर कन्वेंशन (Convention on the Protection of the Underwater Cultural Heritage) इस क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और मानकों के लिए एक महत्वपूर्ण ढाँचा प्रदान करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग (Underwater Archaeology Department) | भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India – ASI) का एक विशेष विभाग, जो जलमग्न सांस्कृतिक विरासत के अनुसंधान और संरक्षण के लिए समर्पित है। |
| अनुसंधान और अन्वेषण गतिविधियाँ | द्वारका, बेट द्वारका (गुजरात), महाबलीपुरम (तमिलनाडु) और कराईकल (पुदुचेरी) जैसे प्रमुख स्थलों पर चल रही हैं, जो भारत की समृद्ध समुद्री इतिहास को उजागर करती हैं। |
| लाइसेंस प्रदान करना | भारत सरकार द्वारा तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग और राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (National Institute of Oceanography – NIO) को पूमपुहार, बेट द्वारका, छारी और गंगाता बेट में जलमग्न खुदाई के लिए लाइसेंस दिए गए हैं, जिससे विभिन्न संस्थाओं की भागीदारी सुनिश्चित होती है। |
| बजट आवंटन | ASI के अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग को 2025-26 में ₹75.40 लाख और 2026-27 में ₹66.50 लाख आवंटित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग को ₹7 करोड़ और NIO को ₹20 लाख का बजट मिला है, जो इस क्षेत्र में बढ़ते निवेश को दर्शाता है। |
| प्रशिक्षण कार्यक्रम | ASI द्वारा पुरातत्वविदों को जलमग्न स्थलों के सर्वेक्षण और खुदाई के लिए प्रशिक्षित करने हेतु विशेष कार्यक्रम शुरू किया गया है, जो मानव संसाधन विकास के लिए महत्वपूर्ण है। |
| चिह्नित स्थल (2030 तक) | द्वारका, बेट द्वारका, विजय दुर्ग (महाराष्ट्र), जंजीरा (महाराष्ट्र), कराईकल और महाबलीपुरम जैसे स्थलों को 2030 तक जलमग्न अन्वेषण/खुदाई के लिए चिन्हित किया गया है, जो भविष्य की कार्ययोजना को दर्शाता है। |
महत्व
सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व
- भारत की समृद्ध समुद्री विरासत और प्राचीन सभ्यताओं के साक्ष्य उजागर होते हैं, जो देश के इतिहास की गहरी समझ प्रदान करते हैं।
- जलमग्न शहरों और बंदरगाहों की खोज से प्राचीन व्यापार मार्गों, नौवहन तकनीकों और तटीय समुदायों के जीवन शैली पर प्रकाश पड़ता है।
- यह अनुसंधान भारत के सांस्कृतिक मानचित्र को विस्तृत करता है और विश्व मंच पर इसकी ऐतिहासिक पहचान को मजबूत करता है।
पर्यटन और आर्थिक क्षमता
- जलमग्न स्थलों का विकास स्कूबा डाइविंग और समुद्री पर्यटन को बढ़ावा दे सकता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।
- यह अद्वितीय पर्यटन अनुभव प्रदान कर सकता है, जिससे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है।
- समुद्री पुरातत्व से संबंधित अनुसंधान और संरक्षण गतिविधियों से रोजगार के नए अवसर सृजित हो सकते हैं।
वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति
- जलमग्न अन्वेषण के लिए उन्नत सोनार, रिमोट सेंसिंग और रोबोटिक तकनीकों का उपयोग समुद्री विज्ञान और इंजीनियरिंग में नवाचार को बढ़ावा देता है।
- यह समुद्री भूविज्ञान, जलवायु परिवर्तन और समुद्र स्तर में परिवर्तन के प्रभावों पर महत्वपूर्ण डेटा प्रदान करता है।
- पुरातत्वविदों और समुद्री वैज्ञानिकों के बीच सहयोग अंतःविषय अनुसंधान को प्रोत्साहित करता है।
संरक्षण और प्रबंधन
- जलमग्न सांस्कृतिक विरासत स्थलों की पहचान और दस्तावेजीकरण उनके संरक्षण के लिए पहला कदम है, जो उन्हें क्षरण और लूटपाट से बचाता है।
- इन स्थलों का अध्ययन भविष्य की पीढ़ियों के लिए इस अनमोल विरासत को सुरक्षित रखने में मदद करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने से समुद्री विरासत के प्रभावी प्रबंधन में सहायता मिलती है।
चुनौतियाँ
1. तकनीकी बाधाएँ
- गहरे पानी में खुदाई और अन्वेषण के लिए विशेष उपकरणों और अत्यधिक कुशल कर्मियों की आवश्यकता होती है।
- समुद्री वातावरण की कठोरता (जैसे उच्च दबाव, कम दृश्यता, मजबूत धाराएँ) अनुसंधान गतिविधियों को जटिल बनाती है।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण और नई प्रौद्योगिकी का विकास।
2. मानव संसाधन की कमी
- जलमग्न पुरातत्व में प्रशिक्षित पुरातत्वविदों, गोताखोरों और समुद्री वैज्ञानिकों की संख्या सीमित है।
- इस विशिष्ट क्षेत्र में विशेषज्ञता विकसित करने के लिए व्यापक प्रशिक्षण और अनुभव की आवश्यकता होती है।
यूपीएससी लिंक: मानव संसाधन का विकास; कौशल विकास।
3. वित्तीय और बजटीय सीमाएँ
- जलमग्न पुरातत्व अभियान अत्यंत महंगे होते हैं, जिसमें विशेष उपकरण, रसद और कर्मियों का खर्च शामिल होता है।
- आवंटित बजट अक्सर विशाल तटीय रेखा और संभावित स्थलों की संख्या के अनुपात में अपर्याप्त हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: सरकारी बजट; संसाधनों का संग्रहण।
4. संरक्षण और सुरक्षा
- जलमग्न स्थलों को प्राकृतिक क्षरण, समुद्री जीवों और मानवजनित गतिविधियों (जैसे अवैध मछली पकड़ना, प्रदूषण) से खतरा होता है।
- खुदाई किए गए कलाकृतियों के संरक्षण के लिए विशेष प्रयोगशालाओं और तकनीकों की आवश्यकता होती है, क्योंकि वे पानी से बाहर आने पर तेजी से खराब हो सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: भारत की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण; पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण।
5. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
- समुद्र के बढ़ते स्तर और समुद्री धाराओं में बदलाव जलमग्न स्थलों को और अधिक गहराई में धकेल सकते हैं या उन्हें नुकसान पहुँचा सकते हैं।
- समुद्री अम्लीकरण और अन्य पर्यावरणीय परिवर्तन कलाकृतियों के संरक्षण को प्रभावित कर सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: जलवायु परिवर्तन; पर्यावरण पर प्रभाव।
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| तकनीकी विशेषज्ञता | जलमग्न अन्वेषण के लिए उन्नत सोनार, रिमोट सेंसिंग और रोबोटिक तकनीकों के संचालन में विशेषज्ञता की कमी। |
| उच्च लागत | जलमग्न पुरातत्व अभियानों की अत्यधिक वित्तीय लागत, जिसमें विशेष उपकरण, रसद और कर्मियों का खर्च शामिल है। |
| संरक्षण की चुनौतियाँ | जलमग्न कलाकृतियों को पानी से बाहर निकालने के बाद उनके तेजी से क्षरण को रोकना और उनका उचित संरक्षण सुनिश्चित करना। |
| पर्यावरणीय कारक | समुद्री वातावरण की कठोरता (उच्च दबाव, कम दृश्यता, मजबूत धाराएँ) और समुद्री जीवों से होने वाला नुकसान। |
| मानव संसाधन विकास | जलमग्न पुरातत्व में प्रशिक्षित पुरातत्वविदों और गोताखोरों की संख्या में वृद्धि और उनके कौशल का उन्नयन। |
| कानूनी ढाँचा | जलमग्न सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए एक मजबूत और व्यापक कानूनी ढाँचे की आवश्यकता। |
आगे की राह
- जलमग्न पुरातत्व में अनुसंधान और अन्वेषण गतिविधियों के लिए बजटीय आवंटन में निरंतर वृद्धि की जाए।
- पुरातत्वविदों, गोताखोरों और समुद्री वैज्ञानिकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम और क्षमता निर्माण पहलें शुरू की जाएँ।
- उन्नत जलमग्न अन्वेषण तकनीकों और उपकरणों के विकास तथा अधिग्रहण में निवेश किया जाए।
- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के साथ सहयोग को बढ़ावा दिया जाए, ताकि विशेषज्ञता और सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान हो सके।
- जलमग्न सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति और कानूनी ढाँचा विकसित किया जाए।
- समुद्री पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जलमग्न स्थलों को विकसित किया जाए, जिससे स्थानीय समुदायों के लिए आर्थिक अवसर सृजित हों।
- जन जागरूकता अभियान चलाए जाएँ ताकि लोग भारत की समृद्ध समुद्री विरासत के महत्व को समझें और उसके संरक्षण में सहयोग करें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत · भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) · समुद्री पुरातत्व · सांस्कृतिक विरासत संरक्षण · जलमग्न स्थल · पुरातत्व अन्वेषण · सांस्कृतिक पर्यटन · समुद्री इतिहास · विरासत प्रबंधन · पुरातत्व प्रशिक्षण
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 49’, ‘note’: ‘राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A (च)’, ‘note’: ‘समन्वित संस्कृति की रक्षा का कर्तव्य’}
अवधारणा प्रवाह
जलमग्न सांस्कृतिक विरासत स्थलों की पहचान और दस्तावेजीकरण। → विशेषज्ञ टीमों द्वारा जलमग्न अन्वेषण और खुदाई। → प्राप्त कलाकृतियों का संरक्षण और विश्लेषण। → ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का मूल्यांकन। → संरक्षण रणनीतियों और पर्यटन विकास योजनाओं का निर्माण। → जन जागरूकता और शिक्षा के माध्यम से विरासत का प्रचार।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग वर्तमान में द्वारका और बेट द्वारका में अनुसंधान और अन्वेषण गतिविधियाँ चला रहा है।
2. भारत सरकार ने पूमपुहार (तमिलनाडु) में पानी के नीचे खुदाई के लिए राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान को लाइसेंस प्रदान किया है।
3. विजय दुर्ग और जंजीरा महाराष्ट्र में स्थित जलमग्न अन्वेषण/खुदाई के लिए चिन्हित स्थल हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि ASI का अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग द्वारका और बेट द्वारका में अनुसंधान कर रहा है। कथन 2 गलत है क्योंकि पूमपुहार में खुदाई के लिए तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग को लाइसेंस दिया गया है, न कि राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान को। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान को बेट द्वारका, छारी और गंगाता बेट के लिए लाइसेंस मिला है। कथन 3 सही है क्योंकि विजय दुर्ग और जंजीरा दोनों महाराष्ट्र में स्थित हैं और 2030 तक जलमग्न अन्वेषण/खुदाई के लिए चिन्हित स्थलों में शामिल हैं।
Q2. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I (जलमग्न स्थल)
A. द्वारका
B. पूमपुहार
C. कराईकल
D. विजय दुर्ग
सूची-II (राज्य/केंद्र शासित प्रदेश)
1. तमिलनाडु
2. गुजरात
3. महाराष्ट्र
4. पुदुचेरी
कूट:
A B C D
(a) 2 1 4 3
(b) 1 2 3 4
(c) 2 4 1 3
(d) 3 1 4 2
- (a)
- (b)
- (c)
- (d)
उत्तर: (a) — द्वारका गुजरात में है। पूमपुहार तमिलनाडु में है। कराईकल पुदुचेरी में है। विजय दुर्ग महाराष्ट्र में है। इसलिए सही मिलान A-2, B-1, C-4, D-3 है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत की अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत (Underwater Cultural Heritage) के संरक्षण और अन्वेषण के महत्व पर चर्चा कीजिए। इस संदर्भ में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और अन्य संबंधित संस्थानों द्वारा किए जा रहे प्रयासों का मूल्यांकन कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय में अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत की परिभाषा और उसके महत्व का संक्षिप्त उल्लेख। मुख्य भाग में, अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और अन्वेषण के महत्व पर विस्तार से चर्चा करें, जिसमें ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और पर्यटन संबंधी पहलुओं को शामिल किया जाए। इसके बाद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग, तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग और राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान जैसे प्रमुख संस्थानों द्वारा किए जा रहे विशिष्ट प्रयासों (जैसे द्वारका, बेट द्वारका, पूमपुहार, महाबलीपुरम, कराईकल, विजय दुर्ग, जंजीरा में अनुसंधान, बजट आवंटन, प्रशिक्षण कार्यक्रम) का मूल्यांकन करें। चुनौतियों और आगे की राह पर भी संक्षेप में प्रकाश डालें। निष्कर्ष में, भारत की समृद्ध समुद्री विरासत को संरक्षित करने के लिए समन्वित प्रयासों के महत्व को दोहराएं।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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