लखनऊ में श्रम संहिताओं पर राज्य स्तरीय क्षमता विकास कार्यक्रम संपन्न

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श्रम संहिताओं का कार्यान्वयनकेंद्र द्वारा संहिता प2019-2020राज्य द्वारा नियम बनानअनुपालन सरलकेंद्र-राज्य समन्वयकार्यान्वयन सफलता
श्रम संहिताओं का कार्यान्वयन

✎ चार श्रम संहिताएँ 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समेकित करती हैं; श्रम समवर्ती सूची का विषय होने से केंद्र संहिताएँ बनाता है और राज्य नियम बनाकर उनका कार्यान्वयन करते हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन (संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध, सामाजिक क्षेत्र की योजनाएँ और तंत्र)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (श्रम बाजार, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और औपचारिकीकरण)
  • Prelims: समवर्ती सूची (Concurrent List) — प्रविष्टि 22, 23 और 24 (श्रम कल्याण, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार), चार श्रम संहिताएँ: वेतन संहिता, 2019; औद्योगिक संबंध संहिता, 2020; सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020; व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020, ई-श्रम पोर्टल और असंगठित श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस (UAN), प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना (PM-SYM) — स्वैच्छिक पेंशन योजना, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) की वैधानिक स्थिति, भवन एवं अन्य सन्निर्माण कामगार (BOCW) के कल्याण हेतु उपकर, गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए एग्रीगेटर अंशदान, राज्य नीति के निदेशक तत्व — अनुच्छेद 43 (निर्वाह मजदूरी) और अनुच्छेद 42
  • Essay: श्रम सुधार में श्रमिक संरक्षण और उद्यमशीलता की लचीलेपन के बीच संतुलन, असंगठित और गिग अर्थव्यवस्था में सामाजिक सुरक्षा का विस्तार: सहकारी संघवाद की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: चार श्रम संहिताएँ 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समेकित करती हैं; श्रम समवर्ती सूची का विषय होने से केंद्र संहिताएँ बनाता है और राज्य नियम बनाकर उनका कार्यान्वयन करते हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम विभाग ने 26 और 27 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में संयुक्त रूप से ‘श्रम संवाद’ नामक दो दिवसीय राज्य स्तरीय क्षमता विकास और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। इसका उद्देश्य नियोक्ताओं, मानव संसाधन, विधिक और वित्तीय पेशेवरों को नई श्रम संहिताओं और उनके अंतर्गत बनाए गए नियमों से परिचित कराना था। कार्यक्रम में केंद्रीय और राज्य स्तर के अधिकारियों के साथ EPFO, ESIC और श्रम कल्याण महानिदेशालय (DGLW) के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। पहले दिन भवन एवं अन्य सन्निर्माण कामगार कल्याण, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के अभिसरण और गिग तथा प्लेटफॉर्म श्रमिकों तक दायरे के विस्तार पर चर्चा हुई। दूसरे दिन चारों श्रम संहिताओं के अनुपालन, प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PMVBRY) और PM-SYM पर तकनीकी सत्र हुए। यह आयोजन नए कानून बनाने के बजाय मौजूदा संहिताओं के व्यावहारिक कार्यान्वयन और केंद्र-राज्य समन्वय पर केंद्रित था।

पृष्ठभूमि

  • भारत में श्रम से जुड़े लगभग 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार संहिताओं में समेकित किया गया, जिनमें से सभी 2019-2020 में पारित हुईं। उद्देश्य अनुपालन को सरल बनाना, कानूनी जटिलता घटाना और सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाना था।
  • संविधान की समवर्ती सूची में श्रम विषय होने के कारण केंद्र और राज्य दोनों इस पर विधि बना सकते हैं। व्यवहार में केंद्र संहिताएँ बनाता है, जबकि अधिकांश नियम राज्य सरकारें बनाती हैं। इसलिए कार्यान्वयन की सफलता केंद्र-राज्य समन्वय पर निर्भर करती है।
  • असंगठित श्रमिकों की पहचान और पंजीकरण के लिए ई-श्रम पोर्टल (2021) शुरू किया गया। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 ने पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को विधिक परिभाषा दी।
  • पूर्ववर्ती भवन एवं अन्य सन्निर्माण कामगार कानूनों के प्रावधान सामाजिक सुरक्षा संहिता में समाहित किए गए, जिससे निर्माण श्रमिकों के पंजीकरण, उपकर और कल्याण लाभ एक ढाँचे में आए।
  • EPFO (EPF अधिनियम, 1952) और ESIC (ESI अधिनियम, 1948) संगठित क्षेत्र में भविष्य निधि और स्वास्थ्य तथा बीमा लाभ के वैधानिक संस्थान हैं। सामाजिक सुरक्षा संहिता इनके दायरे को अन्य श्रमिक वर्गों तक विस्तारित करने की दिशा में है।

श्रम संहिताएँ क्या हैं?

  • श्रम संहिताएँ 29 पुराने केंद्रीय श्रम कानूनों को चार विषयगत संहिताओं में समेकित करती हैं: वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा, और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा।
  • वेतन संहिता, 2019 सार्वभौमिक न्यूनतम मजदूरी (Universal Minimum Wage) और ‘फ्लोर वेज’ (Floor Wage) की व्यवस्था करती है तथा वेतन की परिभाषा को एकरूप बनाती है।
  • औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 छंटनी, छँटनी-पूर्व अनुमति की सीमा, निश्चित अवधि के रोजगार, हड़ताल की पूर्व सूचना और औद्योगिक विवाद निपटान से संबंधित है।
  • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों सहित सभी श्रमिकों के लिए भविष्य निधि, बीमा, मातृत्व लाभ और वृद्धावस्था सुरक्षा के प्रावधान करती है।
  • व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता, 2020 कार्यस्थल की सुरक्षा, स्वास्थ्य मानकों, कार्य के घंटों और प्रवासी श्रमिकों से संबंधित है।
  • संविधान का अनुच्छेद 43 सभी श्रमिकों के लिए निर्वाह मजदूरी और शिष्ट जीवन स्तर सुनिश्चित करने का निर्देश देता है, जबकि अनुच्छेद 42 कार्य की न्यायोचित और मानवीय दशाओं तथा प्रसूति सहायता से जुड़ा है। ये राज्य नीति के निदेशक तत्व हैं, जो न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं हैं।
  • केंद्र सरकार के स्तर पर श्रम एवं रोजगार मंत्रालय नीति-निर्माण करता है, जबकि EPFO, ESIC और DGLW जैसी संस्थाएँ इसके तहत लाभ-वितरण और प्रशासन चलाती हैं।
  • PM-SYM (2019) असंगठित श्रमिकों के लिए स्वैच्छिक और अंशदायी पेंशन योजना है, जिसमें केंद्र सरकार भी समान योगदान देती है; इसे श्रम कल्याण महानिदेशालय के माध्यम से लागू किया जाता है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
चार श्रम संहिताएँ वेतन संहिता, 2019; औद्योगिक संबंध संहिता, 2020; सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020; और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020 मिलकर 29 केंद्रीय श्रम कानूनों का समेकन करती हैं। इससे अनुपालन की जटिलता घटाने का लक्ष्य है।
संविधान की समवर्ती सूची का विषय श्रम और सामाजिक सुरक्षा समवर्ती सूची में आते हैं, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों कानून बनाते हैं और नियम तय करते हैं। राज्य स्तर पर नियम-निर्माण और कार्यान्वयन ही व्यावहारिक प्रभाव तय करता है।
सामाजिक सुरक्षा का विस्तार सामाजिक सुरक्षा संहिता में असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों की परिभाषा और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा लाभों का प्रावधान है, जो पारंपरिक रोजगार संबंधों से बाहर के श्रमिकों तक पहुँच बढ़ाता है।
डिजिटल सेवा प्रदायगी ई-श्रम, श्रम सुविधा पोर्टल, समाधान पोर्टल और लेबर स्टैक जैसे मंच पंजीकरण, शिकायत निवारण और सेवा वितरण को तकनीक-सक्षम बनाने के साधन हैं।
भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार निर्माण क्षेत्र के श्रमिकों के पंजीकरण, उपकर और कल्याणकारी लाभों पर सत्र हुए। पूर्ववर्ती विशेष कानूनों के प्रावधान अब संहिताओं के ढाँचे में समाहित हैं।
बहु-हितधारक संवाद नियोक्ता, उद्योग प्रतिनिधि, विधिक, मानव संसाधन और वित्तीय पेशेवर, तथा केंद्रीय और राज्य अधिकारी एक मंच पर आए, जिससे नीति और व्यवहार के बीच की दूरी कम करने का प्रयास हुआ।

महत्व

आर्थिक

  • श्रम कानूनों के सरलीकरण से अनुपालन लागत और प्रक्रियागत बाधाएँ घटने की अपेक्षा है, जो औपचारिक रोजगार और उद्यम विस्तार में सहायक हो सकता है।
  • एकीकृत वेतन परिभाषा और समान वेतन संबंधी प्रावधान श्रम बाजार में पारदर्शिता बढ़ाते हैं।
  • औपचारिक क्षेत्र में पंजीकरण बढ़ने से राजकोषीय आधार और सामाजिक सुरक्षा निधियों का विस्तार संभव है।

सामाजिक

  • गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना बदलते रोजगार स्वरूप के लिए एक नीतिगत उत्तर है।
  • निर्माण और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए पंजीकरण आधारित कल्याण से लाभार्थियों तक पहुँच सुधर सकती है।
  • पेंशन, बीमा और भविष्य निधि जैसे लाभों का अभिसरण सामाजिक सुरक्षा की खंडित व्यवस्था को एकरूप बनाने का प्रयास है।

शासन और प्रशासनिक

  • केंद्र-राज्य समन्वय और राज्य-स्तरीय क्षमता निर्माण सहकारी संघवाद की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है।
  • डिजिटल मंच प्रशासनिक पारदर्शिता, डेटा साझाकरण और शिकायत निवारण को सुदृढ़ कर सकते हैं।
  • नियोक्ताओं और अधिकारियों के बीच संवाद नियम-पालन की संस्कृति और प्रवर्तन की स्पष्टता के लिए उपयोगी है।

चुनौतियाँ

1. नियम-निर्माण और राज्य स्तरीय एकरूपता

  • संहिताएँ केंद्रीय स्तर पर बनीं, पर उनके नियम और कार्यान्वयन राज्यों द्वारा होते हैं। राज्यों के बीच नियमों में अंतर से बहु-राज्य उद्यमों की अनुपालन जटिलता बढ़ सकती है।
  • श्रम प्रशासन में प्रशिक्षित मानव संसाधन और संस्थागत क्षमता की कमी कार्यान्वयन की गति को प्रभावित कर सकती है।

2. असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों का पंजीकरण और कवरेज

  • गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों की पहचान, नियोक्ता-कर्मचारी संबंध की अस्पष्टता और एग्रीगेटर के योगदान की व्यवस्था व्यावहारिक चुनौती है।
  • आधार-आधारित डेटा, मोबाइल पहुँच और डिजिटल साक्षरता के अभाव में बड़ी संख्या में श्रमिक पंजीकरण से बाहर रह सकते हैं।

3. सूक्ष्म और लघु उद्यमों पर अनुपालन भार

  • सूक्ष्म और लघु उद्यमों के पास सीमित विधिक और मानव संसाधन होते हैं, इसलिए नई प्रक्रियाओं का पालन उनके लिए कठिन हो सकता है।
  • रजिस्टर, रिटर्न और ऑनलाइन फाइलिंग की नई व्यवस्था छोटे नियोक्ताओं के लिए जागरूकता अभियानों और सरल प्रारूपों के बिना बोझ बन सकती है।

4. औद्योगिक संबंध और श्रमिक अधिकारों का संतुलन

  • औद्योगिक संबंध संहिता में हड़ताल, छंटनी और छटनी से जुड़े प्रावधानों पर नियोक्ता और श्रमिक संगठनों के दृष्टिकोण भिन्न हैं।
  • श्रमिक संगठन बनाने का अधिकार और सामूहिक सौदेबाज़ी की भूमिका लचीले श्रम बाज़ार की आवश्यकता के साथ संतुलित करनी होगी।

5. जागरूकता और सामाजिक सुरक्षा की वास्तविक पहुँच

  • कानून की व्यवस्था अच्छी होने के बावजूद लाभार्थियों की जानकारी सीमित रहे तो योजनाओं की वास्तविक पहुँच कम होती है।
  • कई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में अंशदान की नियमितता और लाभ की शर्तें श्रमिकों के लिए जटिल हो सकती हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
राज्यों में नियम-एकरूपता विभिन्न राज्यों के नियमों में अंतर से बहु-राज्य नियोक्ताओं के लिए अनुपालन जटिल होता है और बाज़ार में असमानता आ सकती है।
गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों का पंजीकरण रोजगार संबंध की अस्पष्टता और डेटा की कमी से कवरेज का लक्ष्य पूरा होना कठिन है।
डिजिटल अंतराल ऑनलाइन पंजीकरण और शिकायत तंत्र के लिए आवश्यक डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट पहुँच सभी श्रमिकों के पास नहीं है।
एमएसएमई पर अनुपालन भार सीमित संसाधनों वाले उद्यमों के लिए नई रिटर्न और रजिस्टर व्यवस्था अतिरिक्त प्रशासनिक बोझ बन सकती है।
श्रमिक अधिकार बनाम लचीलापन औद्योगिक संबंध संहिता के प्रावधानों पर श्रमिक संगठनों और नियोक्ताओं की अपेक्षाएँ अलग हैं, जिससे सहमति निर्माण चुनौतीपूर्ण है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (Pradhan Mantri Viksit Bharat Rozgar Yojana – PMVBRY)
  • प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना (Pradhan Mantri Shram Yogi Maandhan Yojana – PM-SYM)
  • ई-श्रम पोर्टल (e-Shram Portal)

आगे की राह

  • केंद्र और राज्य के बीच नियम-निर्माण में समन्वय बढ़ाकर प्रमुख प्रावधानों पर यथासंभव एकरूपता सुनिश्चित की जाए।
  • गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए सरल पंजीकरण, एग्रीगेटर योगदान की स्पष्ट प्रक्रिया और डेटा साझाकरण का ढाँचा विकसित किया जाए।
  • ई-श्रम और अन्य डिजिटल मंचों को बहुभाषी और ग्रामीण पहुँच के अनुकूल बनाया जाए तथा डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम चलाए जाएँ।
  • सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए नमूना प्रारूप, हेल्पडेस्क और चरणबद्ध अनुपालन की व्यवस्था की जाए।
  • श्रम प्रशासन के अधिकारियों और निरीक्षकों का नियमित क्षमता विकास किया जाए ताकि प्रवर्तन में एकरूपता आए।
  • नियोक्ताओं, श्रमिक संगठनों और विशेषज्ञों के साथ नियमित परामर्श तंत्र बनाया जाए, ताकि औद्योगिक संबंधों के प्रावधानों पर विश्वास बढ़े।
  • सामाजिक सुरक्षा लाभों की जानकारी स्थानीय भाषाओं में, पंचायत और श्रम कार्यालयों के माध्यम से व्यापक रूप से पहुँचाई जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

श्रम संहिताएँ · श्रमिक कल्याण · सामाजिक सुरक्षा · असंगठित क्षेत्र के श्रमिक · गिग श्रमिक · प्लेटफॉर्म श्रमिक · केंद्र-राज्य समन्वय · प्रौद्योगिकी-सक्षम सेवा प्रदायगी · श्रम सुधार · क्षमता विकास

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 19(1)(c): श्रमिक संघ बनाने का अधिकार
  • अनुच्छेद 43: श्रमिकों के लिए जीवनयापन योग्य मजदूरी
  • अनुच्छेद 43क: उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी
  • अनुच्छेद 41: काम, शिक्षा और लोक सहायता का अधिकार
  • सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची: श्रम, सामाजिक सुरक्षा और औद्योगिक विवाद

अवधारणा प्रवाह

कई पुराने केंद्रीय श्रम कानून अलग-अलग थे, जिससे अनुपालन और प्रशासन जटिल था।  →  चार श्रम संहिताओं के माध्यम से इन कानूनों को समेकित और सरलीकृत किया गया।  →  संहिताओं के अंतर्गत नियम राज्यों द्वारा बनाए और लागू किए जाते हैं, इसलिए केंद्र-राज्य समन्वय आवश्यक है।  →  डिजिटल मंचों (ई-श्रम, श्रम सुविधा पोर्टल, समाधान पोर्टल) से पंजीकरण, शिकायत निवारण और लाभ वितरण की प्रक्रिया तेज़ होने की अपेक्षा है।  →  जागरूकता और क्षमता विकास से नियोक्ता, पेशेवर और प्रशासन नियमों को व्यवहार में समझ और लागू कर पाते हैं।  →  सामाजिक सुरक्षा का विस्तार गिग, प्लेटफॉर्म और असंगठित श्रमिकों तक हो, तो औपचारिक रोजगार और सामाजिक सुरक्षा कवरेज दोनों बढ़ सकते हैं।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वेतन संहिता, 2019, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020 भारत में चार प्रमुख श्रम संहिताएँ हैं।
2. कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) भारत में सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने वाले प्रमुख निकाय हैं।
3. ई-श्रम पोर्टल असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का एक राष्ट्रीय डेटाबेस है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। ये चार संहिताएँ भारत में श्रम कानूनों के आधुनिकीकरण और सरलीकरण का प्रतिनिधित्व करती हैं। कथन 2 सही है। EPFO भविष्य निधि और पेंशन योजनाओं का प्रबंधन करता है, जबकि ESIC स्वास्थ्य बीमा और चिकित्सा लाभ प्रदान करता है। कथन 3 सही है। ई-श्रम पोर्टल असंगठित श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ने में मदद करता है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से डिजिटल प्लेटफॉर्म श्रम एवं रोजगार सेवाओं की प्रौद्योगिकी-सक्षम आपूर्ति से संबंधित है/हैं?
1. ई-श्रम
2. श्रम सुविधा पोर्टल
3. समाधान पोर्टल
4. लेबर स्टैक
सही विकल्प का चयन कीजिए:

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2, 3 और 4
  3. केवल 1, 3 और 4
  4. 1, 2, 3 और 4

उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — दिए गए सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म (ई-श्रम, श्रम सुविधा पोर्टल, समाधान पोर्टल और लेबर स्टैक) श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा श्रमिकों और नियोक्ताओं को विभिन्न सेवाएँ प्रदान करने के लिए विकसित किए गए हैं। ये प्लेटफॉर्म श्रम कानूनों के अनुपालन, शिकायत निवारण और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुँच को आसान बनाते हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में श्रम सुधारों के महत्व पर चर्चा कीजिए और नई श्रम संहिताओं के प्रमुख उद्देश्यों का विश्लेषण कीजिए। इन संहिताओं के प्रभावी कार्यान्वयन में केंद्र-राज्य समन्वय की भूमिका का भी मूल्यांकन कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय में श्रम सुधारों के महत्व और उनकी आवश्यकता पर प्रकाश डालें। मुख्य भाग में, नई श्रम संहिताओं (वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता) के प्रमुख उद्देश्यों, जैसे सरलीकरण, श्रमिकों के कल्याण, सामाजिक सुरक्षा के विस्तार और निवेश को बढ़ावा देने पर चर्चा करें। इसके बाद, इन संहिताओं के प्रभावी कार्यान्वयन में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण भूमिका का मूल्यांकन करें, जिसमें नियम बनाना, जागरूकता बढ़ाना और प्रौद्योगिकी का उपयोग शामिल है। निष्कर्ष में, श्रम सुधारों के समग्र प्रभाव और भविष्य की राह पर संक्षिप्त टिप्पणी करें।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)

Uttar Pradesh PCS (UPPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: उत्तर प्रदेश में आयोजित ‘श्रम संवाद’ कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य क्या था?

  1. A. श्रमिक कल्याण योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु क्षमता विकास एवं जागरूकता
  2. B. औद्योगिक क्षेत्र में विदेशी निवेश आकर्षित करना
  3. C. राज्य में नई श्रम संहिताओं का निर्माण करना
  4. D. श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि करना

उत्तर: A. श्रमिक कल्याण योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु क्षमता विकास एवं जागरूकता — कार्यक्रम का उद्देश्य श्रमिक कल्याण, सामाजिक सुरक्षा एवं श्रम संहिताओं के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु अधिकारियों एवं हितधारकों में क्षमता विकास एवं जागरूकता बढ़ाना था।

Mains: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित ‘श्रम संवाद’ कार्यक्रम के माध्यम से राज्य में श्रमिक कल्याण एवं सामाजिक सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने के लिए उठाए गए कदमों का वर्णन कीजिए। साथ ही, बताइए कि इस प्रकार के कार्यक्रमों से राज्य के श्रमिक वर्ग को किस प्रकार लाभ पहुंचेगा।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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