04 Aug वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका: सरकारी योजनाएं और कानूनी प्रावधान
✎ भारत में वन संरक्षण एक बहुआयामी दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें कानूनी ढाँचे, सरकारी योजनाएँ और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी शामिल है, जिसका उद्देश्य वनों का सतत प्रबंधन और जैव विविधता का संरक्षण करना है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंधन | GS Paper II — शासन, नीतियाँ और हस्तक्षेप
- Prelims: संयुक्त वन प्रबंधन समितियाँ (JFMC), पर्यावरण विकास समितियाँ (EDC), वन अधिकार अधिनियम, 2006, राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (GIM), क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA), नगर वन योजना, मिष्टी योजना (MISHTI), वन अग्नि पर राष्ट्रीय कार्य योजना, 2018, वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980, भारत की वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR)
- Essay: वन संरक्षण और सतत विकास में स्थानीय समुदायों की भूमिका, भारत में पर्यावरण नीति और कानून: चुनौतियाँ एवं समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत में वन संरक्षण एक बहुआयामी दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें कानूनी ढाँचे, सरकारी योजनाएँ और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी शामिल है, जिसका उद्देश्य वनों का सतत प्रबंधन और जैव विविधता का संरक्षण करना है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में वन संरक्षण योजनाओं और उनसे संबंधित सामुदायिक भागीदारी पर विस्तृत जानकारी दी। इस जानकारी में विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों, कानूनी ढाँचों और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भूमिका पर प्रकाश डाला गया, जो भारत में वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाने तथा उनके सतत प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
पृष्ठभूमि
- भारत में वन संरक्षण का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसमें पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का संगम है।
- स्वतंत्रता के बाद, वनों के अत्यधिक दोहन को रोकने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए कई कानून और नीतियाँ बनाई गईं।
- 1972 का वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम और 1980 का वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम इस दिशा में महत्वपूर्ण मील के पत्थर थे।
- स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन में शामिल करने की अवधारणा 1980 के दशक के अंत में संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) के माध्यम से उभरी।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 ने वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देकर वन संरक्षण में उनकी भूमिका को और सशक्त किया।
- जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता हानि की बढ़ती चिंताओं के कारण वन संरक्षण को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे में उच्च प्राथमिकता मिली है।
भारत में वन संरक्षण की प्रमुख पहलें और तंत्र
- वनों पर निर्भर समुदाय विभिन्न कार्यक्रमों और संस्थागत तंत्रों के माध्यम से वन संरक्षण और सतत वन प्रबंधन में सक्रिय रूप से शामिल हैं।
- सहभागी वन प्रबंधन को संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (JFMC) और पर्यावरण विकास समितियों (EDC) के माध्यम से बढ़ावा दिया जाता है, जो अवैध कटाई, वन अग्नि प्रबंधन और वृक्षारोपण जैसी गतिविधियों में भाग लेती हैं।
- अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 पात्र वनवासी समुदायों को वन अधिकार प्रदान करता है और ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार देता है।
- वन और वृक्ष आवरण बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (GIM), क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA), नगर वन योजना और तटीय आवास और मूर्त आय के लिए मैंग्रोव पहल (MISHTI) जैसी योजनाएँ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं।
- वन अग्नि पर राष्ट्रीय कार्य योजना, 2018 वन अग्नि की रोकथाम, पहचान, नियंत्रण और प्रबंधन के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करती है, जिसमें क्षमता निर्माण और सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया गया है।
- वन क्षेत्रों में खनन प्रस्तावों का मूल्यांकन वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम 1980, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के तहत निर्धारित वैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाता है।
- भारत की वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार, देश का वन और वृक्ष आवरण 8,27,356.95 वर्ग किलोमीटर है, जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत है, जिसमें 2021 की तुलना में 1445.81 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, संरक्षण आरक्षित क्षेत्र और सामुदायिक आरक्षित क्षेत्रों का एक नेटवर्क अधिसूचित किया गया है, जिनकी संख्या बढ़कर 1134 हो गई है, साथ ही 58 बाघ आरक्षित क्षेत्र और 33 हाथी आरक्षित क्षेत्र भी हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| सामुदायिक भागीदारी | संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (JFMC) और पर्यावरण विकास समितियों (EDC) के माध्यम से स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण में शामिल करना। |
| वन अधिकार अधिनियम, 2006 | पात्र वनवासी समुदायों को वन अधिकार प्रदान करना और ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन का अधिकार देना। |
| वन और वृक्ष आवरण में वृद्धि | भारत की वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार, कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत वन और वृक्ष आवरण है, जिसमें पिछली रिपोर्ट से वृद्धि हुई है। |
| संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क | वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों और आरक्षित क्षेत्रों का व्यापक नेटवर्क। |
| खनन प्रस्तावों का मूल्यांकन | वन क्षेत्रों में खनन प्रस्तावों का पर्यावरणीय और पारिस्थितिक प्रभावों के आधार पर वैधानिक मूल्यांकन। |
महत्व
पर्यावरण संरक्षण
- वन और वृक्ष आवरण में वृद्धि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और जैव विविधता के संरक्षण में सहायक है।
- संरक्षित क्षेत्रों का नेटवर्क वन्यजीवों के आवासों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है।
सामाजिक-आर्थिक विकास
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के माध्यम से वनवासी समुदायों को अधिकार प्रदान करना उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित करता है।
- सामुदायिक भागीदारी वन संसाधनों के सतत प्रबंधन को बढ़ावा देती है, जिससे स्थानीय समुदायों को लाभ होता है।
शासन और नीति
- विभिन्न योजनाओं और अधिनियमों के माध्यम से वन संरक्षण के लिए एक मजबूत कानूनी और संस्थागत ढाँचा प्रदान किया गया है।
- खनन और अवसंरचना परियोजनाओं के लिए वन भूमि के उपयोग को विनियमित करना पर्यावरणीय क्षति को कम करने में मदद करता है।
चुनौतियाँ
1. वन भूमि का गैर-वन उपयोग
- अवसंरचना परियोजनाओं और खनन जैसी गतिविधियों के लिए वन भूमि के डायवर्जन से वनों का विखंडन और क्षरण होता है।
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और प्रभावी निगरानी की कमी चुनौतियों को बढ़ा सकती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी: संरक्षण
2. वन अग्नि
- वन अग्नि से वनों को भारी नुकसान होता है, जैव विविधता नष्ट होती है और वायु प्रदूषण बढ़ता है।
- आधुनिक प्रौद्योगिकी और सामुदायिक भागीदारी के बावजूद, वन अग्नि प्रबंधन में चुनौतियाँ बनी हुई हैं, विशेषकर दूरदराज के क्षेत्रों में।
यूपीएससी लिंक: आपदा और आपदा प्रबंधन
3. वनवासी समुदायों के अधिकार
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन में अभी भी चुनौतियाँ हैं, जैसे अधिकारों की मान्यता में देरी और ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने में बाधाएँ।
- वन संरक्षण और समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना एक जटिल कार्य है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: कमजोर वर्गों का कल्याण
4. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
- जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे, बाढ़ और कीटों के प्रकोप जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं, जो वनों के स्वास्थ्य और उत्पादकता को प्रभावित करती हैं।
- वन पारिस्थितिकी प्रणालियों की अनुकूलन क्षमता को बढ़ाना एक महत्वपूर्ण चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी: जलवायु परिवर्तन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| वन भूमि का डायवर्जन | अवसंरचना और खनन परियोजनाओं के लिए वन भूमि का उपयोग वनों के विखंडन और पारिस्थितिक तंत्र के नुकसान का कारण बनता है। |
| वन अग्नि का प्रबंधन | वन अग्नि की रोकथाम, पता लगाने और नियंत्रण में चुनौतियाँ, जिससे वनों और जैव विविधता को भारी नुकसान होता है। |
| वन अधिकार अधिनियम का कार्यान्वयन | वनवासी समुदायों को वन अधिकारों की मान्यता में देरी और ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने में बाधाएँ। |
| जलवायु परिवर्तन के प्रभाव | बढ़ते सूखे, बाढ़ और कीटों के प्रकोप से वनों के स्वास्थ्य और लचीलेपन पर नकारात्मक प्रभाव। |
| संरक्षित क्षेत्रों पर दबाव | मानव-वन्यजीव संघर्ष और संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बढ़ती मानवीय गतिविधियों से वन्यजीवों और उनके आवासों पर दबाव। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (GIM)
- क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA)
- नगर वन योजना
- तटीय आवास और मूर्त आय के लिए मैंग्रोव पहल (MISHTI)
- वन अग्नि पर राष्ट्रीय कार्य योजना, 2018
- वन अग्नि रोकथाम एवं प्रबंधन (केंद्र प्रायोजित योजना)
आगे की राह
- वन भूमि के गैर-वन उपयोग को न्यूनतम करने और वैकल्पिक भूमि उपयोग विकल्पों को बढ़ावा देने के लिए कठोर नीतियाँ अपनाई जाएँ।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 का प्रभावी और समयबद्ध कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाए, जिससे वनवासी समुदायों को उनके अधिकार मिलें और वे वन संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
- वन अग्नि प्रबंधन प्रणालियों को और सुदृढ़ किया जाए, जिसमें उन्नत प्रौद्योगिकी, त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा दिया जाए।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के लिए वन पारिस्थितिकी प्रणालियों की अनुकूलन क्षमता बढ़ाने हेतु अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहित किया जाए।
- संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन को और अधिक प्रभावी बनाया जाए, जिसमें मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और पारिस्थितिक गलियारों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाए।
- वन संरक्षण और विकास योजनाओं में स्थानीय समुदायों की भागीदारी को और अधिक संस्थागत बनाया जाए, जिससे उनके पारंपरिक ज्ञान का उपयोग किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
वन संरक्षण योजनाएँ · संयुक्त वन प्रबंधन समितियाँ (JFMC) · वन अधिकार अधिनियम, 2006 · राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (GIM) · क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA) · नगर वन योजना · तटीय आवास और मूर्त आय के लिए मैंग्रोव पहल (MISHTI) · वन अग्नि पर राष्ट्रीय कार्य योजना, 2018 · वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 · भारत की वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR)
अवधारणा प्रवाह
वन संरक्षण योजनाएँ और अधिनियम → सामुदायिक भागीदारी और वन अधिकार → वन और वृक्ष आवरण में वृद्धि → जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण → सतत विकास और पारिस्थितिक संतुलन
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (JFMC) का गठन केंद्र सरकार द्वारा संरक्षित क्षेत्रों के आसपास किया जाता है।
2. अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन का अधिकार देता है।
3. राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (GIM) का उद्देश्य वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाना है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (JFMC) का गठन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। कथन 2 सही है, वन अधिकार अधिनियम, 2006 ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन का अधिकार देता है। कथन 3 भी सही है, राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (GIM) का उद्देश्य वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाना है।
Q2. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I (योजना/अधिनियम)
A. वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम
B. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम
C. वन अधिकार अधिनियम
D. राष्ट्रीय हरित भारत मिशन
सूची-II (मुख्य उद्देश्य)
1. वन भूमि के गैर-वन उद्देश्यों के लिए उपयोग का विनियमन
2. वन्य जीवों और उनके आवासों का संरक्षण
3. वनवासी समुदायों को वन अधिकार प्रदान करना
4. वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाना
कूट:
A B C D
- 1 2 3 4
- 2 1 4 3
- 3 4 1 2
- 4 3 2 1
उत्तर: 1 2 3 4 — सही सुमेलन इस प्रकार है: वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम – वन भूमि के गैर-वन उद्देश्यों के लिए उपयोग का विनियमन; वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम – वन्य जीवों और उनके आवासों का संरक्षण; वन अधिकार अधिनियम – वनवासी समुदायों को वन अधिकार प्रदान करना; राष्ट्रीय हरित भारत मिशन – वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाना।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका को रेखांकित करते हुए, सरकार द्वारा इस दिशा में किए गए प्रमुख प्रयासों और योजनाओं का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर में पहले वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका का महत्व समझाना चाहिए, जिसमें संयुक्त वन प्रबंधन समितियाँ (JFMC) और पर्यावरण विकास समितियाँ (EDC) जैसी संस्थाओं का उल्लेख हो। इसके बाद, अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 के प्रावधानों और ग्राम सभाओं की भूमिका पर विस्तार से चर्चा करें। दूसरे भाग में, सरकार द्वारा वन और वृक्ष आवरण बढ़ाने तथा वन भूमि को पुनर्स्थापित करने के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं जैसे राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (GIM), क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA), नगर वन योजना, MISHTI, और वन अग्नि पर राष्ट्रीय कार्य योजना, 2018 का उल्लेख करें। अंत में, इन प्रयासों की सफलता और चुनौतियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें, जिसमें भारत की वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) 2023 के आँकड़ों का संदर्भ भी शामिल हो।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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