30 Jul संसद के मानसून सत्र 2026: लोकसभा में सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने वाला विधेयक प्रस्तुत किया जाएगा
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना | GS Paper II — सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थाएँ | GS Paper II — न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली
- Prelims: सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), न्यायाधीशों की नियुक्ति, संसद की विधायी शक्ति, न्यायिक स्वतंत्रता, अनुच्छेद 124
- Essay: न्यायिक सक्रियता और न्यायिक संयम के बीच संतुलन, भारत में न्यायिक सुधारों की आवश्यकता और चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का उद्देश्य न्यायिक कार्यभार को कम करना और त्वरित न्याय सुनिश्चित करना है, जो संसद द्वारा सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन के माध्यम से किया जाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
संसद के मानसून सत्र 2026 के दौरान, लोकसभा में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पर विचार किया जाएगा और इसे पारित किया जाएगा। यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करके सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करने का प्रस्ताव करता है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) में कहा गया है कि भारत का एक सर्वोच्च न्यायालय होगा जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या निर्धारित नहीं करती, तब तक सात से अधिक अन्य न्यायाधीश नहीं होंगे।
- संविधान ने संसद को सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने की शक्ति प्रदान की है।
- प्रारंभ में, सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सहित 8 न्यायाधीश थे।
- समय-समय पर, संसद ने सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करके न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि की है।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का मुख्य कारण न्यायालयों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 क्या है?
- यह अधिनियम संसद द्वारा पारित किया गया था ताकि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को विनियमित किया जा सके।
- संविधान के अनुच्छेद 124(1) द्वारा प्रदत्त शक्ति का उपयोग करते हुए, संसद इस अधिनियम में संशोधन करके न्यायाधीशों की संख्या को बढ़ा या घटा सकती है।
- यह अधिनियम मुख्य न्यायाधीश के अलावा अन्य न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या निर्धारित करता है।
- अधिनियम में संशोधन के लिए साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित नहीं करता है।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का उद्देश्य न्यायपालिका पर बढ़ते कार्यभार को कम करना और न्यायिक प्रक्रिया को गति देना है।
- यह विधेयक न्याय और कानून मंत्री द्वारा लोकसभा में पेश किया जाएगा, जो सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करने का प्रयास करेगा।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि | सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन कर न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करना। |
| न्यायपालिका की दक्षता | बढ़ते मुकदमों के बोझ को कम करने और मामलों के त्वरित निपटान में सहायता। |
| न्याय तक पहुंच | न्यायिक प्रक्रिया को तेज करके नागरिकों के लिए न्याय तक पहुंच में सुधार। |
| विधायी प्रक्रिया | यह विधेयक लोकसभा में विधि एवं न्याय मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा और कैबिनेट द्वारा मई में अनुमोदित किया गया था। |
| संवैधानिक प्रावधान | संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत संसद को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने का अधिकार है। |
महत्व
न्यायिक प्रशासन
- सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या को कम करने में मदद मिलेगी, जिससे न्यायिक दक्षता में वृद्धि होगी।
- यह निर्णय न्यायपालिका पर बढ़ते कार्यभार को संबोधित करता है, जिससे न्यायाधीशों को प्रत्येक मामले पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा।
शासन और विधि
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी मामलों की सुनवाई के लिए अधिक पीठें (Benches) उपलब्ध होंगी।
- यह कदम न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी कार्यप्रणाली में सुधार के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
सामाजिक प्रभाव
- त्वरित न्याय से नागरिकों का न्यायपालिका में विश्वास बढ़ेगा और कानून के शासन को मजबूती मिलेगी।
- यह सुनिश्चित करेगा कि न्यायपालिका, जो लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, प्रभावी ढंग से कार्य करती रहे।
चुनौतियाँ
1. न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया
- कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) में सुधार की आवश्यकता पर बहस जारी है, जो न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित कर सके।
- न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से नियुक्ति प्रक्रिया पर और दबाव पड़ सकता है, जिससे रिक्तियों को भरने में देरी हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था – न्यायपालिका
2. बुनियादी ढाँचा और संसाधन
- अधिक न्यायाधीशों के लिए पर्याप्त न्यायिक और प्रशासनिक बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) की आवश्यकता होगी, जिसमें न्यायालय कक्ष, कर्मचारी और तकनीकी सहायता शामिल है।
- संसाधनों की कमी से न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाएगा।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था – न्यायपालिका का कार्यकरण
3. मामलों का प्रबंधन
- केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से ही लंबित मामलों की समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं होगा; मामलों के प्रबंधन और सुनवाई प्रक्रियाओं में सुधार भी आवश्यक है।
- तकनीकी नवाचारों (Technological Innovations) को अपनाना और वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution) तंत्रों को मजबूत करना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: शासन – ई-गवर्नेंस
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| लंबित मामलों का बोझ | सर्वोच्च न्यायालय में लाखों मामले लंबित हैं, जिससे न्याय मिलने में देरी होती है। |
| न्यायाधीशों की रिक्तियाँ | स्वीकृत पदों के बावजूद न्यायाधीशों के कई पद रिक्त रहते हैं, जिससे कार्यभार बढ़ता है। |
| न्यायिक नियुक्तियों में देरी | कॉलेजियम प्रणाली और सरकार के बीच गतिरोध के कारण नियुक्तियों में अक्सर देरी होती है। |
| बुनियादी ढाँचे की कमी | न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने पर पर्याप्त न्यायालय कक्ष, कर्मचारी और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होगी। |
| तकनीकी एकीकरण | न्यायिक प्रक्रियाओं में प्रौद्योगिकी के पूर्ण एकीकरण की धीमी गति। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026
- सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026
आगे की राह
- न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाने के लिए कॉलेजियम प्रणाली में सुधार किया जाना चाहिए।
- न्यायालयों के लिए आधुनिक बुनियादी ढाँचे और तकनीकी सहायता में निवेश बढ़ाया जाना चाहिए, जिसमें ई-कोर्ट परियोजना का विस्तार शामिल है।
- मामलों के प्रभावी प्रबंधन के लिए न्यायिक प्रक्रियाओं में सुधार किया जाना चाहिए, जिसमें डिजिटल फाइलिंग और सुनवाई शामिल है।
- वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्रों जैसे मध्यस्थता (Mediation) और सुलह (Conciliation) को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि न्यायालयों पर बोझ कम हो सके।
- न्यायिक प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि न्यायाधीशों को नवीनतम कानूनी विकास और प्रौद्योगिकी से अवगत कराया जा सके।
- सरकार और न्यायपालिका के बीच समन्वय को बेहतर बनाया जाना चाहिए ताकि न्यायिक सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 124: सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और गठन
- अनुच्छेद 124(1): संसद को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने का अधिकार
अवधारणा प्रवाह
सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों में वृद्धि → न्यायाधीशों पर बढ़ता कार्यभार → सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन का प्रस्ताव → न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करना → न्यायिक दक्षता में सुधार और त्वरित न्याय
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करता है।
2. भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या 34 है।
3. संसद के पास कानून द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 ही सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को विनियमित करता है। कथन 2 गलत है क्योंकि वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर अधिकतम 33 न्यायाधीशों का प्रावधान है, कुल 34। विधेयक इसे 38 करने का प्रस्ताव करता है। कथन 3 सही है क्योंकि संविधान संसद को कानून द्वारा न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का अधिकार देता है।
Q2. अभिकथन (A): संसद का मानसून सत्र 2026 में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पर विचार किया जा रहा है।
कारण (R): यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करने का प्रयास करता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि विधेयक पर मानसून सत्र में विचार किया जा रहा है। कारण (R) भी सही है क्योंकि विधेयक का उद्देश्य न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करना है। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या है क्योंकि विधेयक पर विचार करने का मुख्य कारण न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में न्यायिक कार्यभार को कम करने में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के महत्व का परीक्षण कीजिए। साथ ही, न्यायिक स्वतंत्रता पर ऐसे विस्तार के संभावित प्रभावों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के हालिया प्रस्ताव का संदर्भ दें और न्यायिक कार्यभार की समस्या का संक्षिप्त परिचय दें।
2. **न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का महत्व (कार्यभार कम करने के संदर्भ में):**
* **लंबित मामलों में कमी:** संख्या बढ़ने से अधिक पीठें गठित हो सकेंगी, जिससे लंबित मामलों का तेजी से निपटारा होगा।
* **त्वरित न्याय:** नागरिकों को समय पर न्याय मिलेगा, जो न्याय तक पहुंच के अधिकार के लिए महत्वपूर्ण है।
* **न्यायिक दक्षता में सुधार:** न्यायाधीशों पर व्यक्तिगत कार्यभार कम होगा, जिससे वे मामलों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर पाएंगे।
* **विशेषज्ञता का विकास:** विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ न्यायाधीशों को शामिल करने का अवसर मिल सकता है।
* **न्यायपालिका पर जनता का विश्वास:** त्वरित और प्रभावी न्याय से न्यायपालिका में जनता का विश्वास बढ़ेगा।
3. **न्यायिक स्वतंत्रता पर संभावित प्रभाव:**
* **सकारात्मक प्रभाव:**
* **कार्यकारी हस्तक्षेप में कमी:** यदि न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त हो, तो न्यायपालिका पर कार्यकारी दबाव कम हो सकता है।
* **विविध दृष्टिकोण:** अधिक न्यायाधीशों से न्यायिक निर्णयों में विविध दृष्टिकोण और विचारों का समावेश हो सकता है।
* **नकारात्मक/चुनौतियां:**
* **नियुक्ति प्रक्रिया पर दबाव:** न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया (कॉलेजियम प्रणाली) पर अधिक दबाव पड़ सकता है और इसमें पारदर्शिता की मांग बढ़ सकती है।
* **कार्यकारी प्रभाव का जोखिम:** यदि नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यकारी हस्तक्षेप बढ़ता है, तो न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
* **आंतरिक सामंजस्य:** अधिक न्यायाधीशों के बीच सर्वसम्मति बनाना या न्यायिक दर्शन में सामंजस्य बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
* **न्यायिक सक्रियता/संयम:** न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से न्यायिक सक्रियता या न्यायिक संयम के संतुलन पर बहस तेज हो सकती है।
4. **निष्कर्ष:** न्यायिक कार्यभार को कम करने के लिए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना एक आवश्यक कदम है, लेकिन यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि यह न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायपालिका की संस्थागत अखंडता को कमजोर न करे। नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार और पारदर्शिता जैसे अन्य उपायों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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