संसद ने क्यों बढ़ाई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या? जानिए कारण

Why has Parliament increased the number of Supreme Court judges? | Explained — concept mind map

संसद ने क्यों बढ़ाई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या? जानिए कारण

✎ सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 कर दिया है, जिसका मुख्य उद्देश्य लंबित मामलों को कम करना और…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली  |  GS Paper II — सरकार की नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय
  • Prelims: सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), संविधान पीठ, न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि, न्यायिक कार्यभार, लंबित मामले
  • Essay: न्यायपालिका में सुधार: चुनौतियाँ और समाधान, भारत में त्वरित न्याय की आवश्यकता और मार्ग

त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 कर दिया है, जिसका मुख्य उद्देश्य लंबित मामलों को कम करना और त्वरित न्याय सुनिश्चित करना है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

लोकसभा ने सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 (Supreme Court (Number of Judges) Amendment Bill, 2026) पारित किया है, जिसने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सहित 34 से बढ़ाकर 38 कर दिया है। यह विधेयक एक अध्यादेश का स्थान लेता है और इसका उद्देश्य न्यायालय में बढ़ते लंबित मामलों के बोझ को कम करना तथा त्वरित और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करना है।

पृष्ठभूमि

  • यह 2019 के बाद पहली बार है जब सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई गई है। 2019 में, संसद ने स्वीकृत संख्या को 31 से बढ़ाकर 34 न्यायाधीश किया था।
  • 1 जनवरी, 2026 तक, सर्वोच्च न्यायालय में 92,101 मामले लंबित थे, जो न्यायपालिका पर भारी कार्यभार का संकेत देते हैं।
  • 2025 में, न्यायालय को 75,410 नए मामले प्राप्त हुए, जबकि उसने 65,615 मामलों का निपटान किया, जिससे नए और निपटाए गए मामलों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर बना रहा।
  • सरकार ने न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि को लंबित मामलों से निपटने और न्यायालय की निपटान क्षमता में सुधार के लिए ‘सबसे आवश्यक और व्यवहार्य समाधानों में से एक’ बताया है।
  • इस वृद्धि से भारत के मुख्य न्यायाधीश को संवैधानिक कानून के महत्वपूर्ण प्रश्नों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए संविधान पीठों (Constitution Benches) का अधिक बार गठन करने में मदद मिलेगी।
  • संविधान पीठों में कम से कम पाँच न्यायाधीश होते हैं और वे संविधान की व्याख्या से संबंधित मामलों की सुनवाई करते हैं। वर्तमान कार्यभार के कारण ऐसी पीठों का गठन अक्सर मुश्किल होता है।

सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या और संबंधित प्रावधान

  • भारतीय संविधान (Indian Constitution) के अनुच्छेद 124(1) के तहत, सर्वोच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और जब तक संसद कानून द्वारा अधिक संख्या निर्धारित नहीं करती, तब तक सात से अधिक अन्य न्यायाधीश नहीं होंगे।
  • संसद को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने की शक्ति प्राप्त है। यह शक्ति सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 (Supreme Court (Number of Judges) Act, 1956) के माध्यम से प्रयोग की जाती है।
  • मूल रूप से, 1950 में सर्वोच्च न्यायालय में 8 न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या थी (एक मुख्य न्यायाधीश और सात अन्य न्यायाधीश)।
  • समय-समय पर, संसद ने इस अधिनियम में संशोधन करके न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि की है, जैसे कि 1956 में 10, 1960 में 13, 1977 में 17, 1986 में 25, 2009 में 30 और 2019 में 33 (मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त)।
  • न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का मुख्य उद्देश्य न्यायिक कार्यभार को कम करना, लंबित मामलों का तेजी से निपटान करना और न्याय तक पहुंच में सुधार करना है।
  • यह वृद्धि न्यायालय को अधिक पीठों का गठन करने और विशेष रूप से संविधान पीठों के मामलों की सुनवाई को सुव्यवस्थित करने में सक्षम बनाएगी।
  • हालांकि, कई कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना एक आवश्यक कदम है, लेकिन यह न्यायिक सुधारों का एक पूर्ण समाधान नहीं है; इसके साथ अन्य संरचनात्मक और प्रक्रियात्मक सुधारों की भी आवश्यकता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 की गई है, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) भी शामिल हैं।
अधिनियम में संशोधन यह परिवर्तन सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन के माध्यम से किया गया है।
पिछली वृद्धि यह 2019 के बाद पहली वृद्धि है, जब स्वीकृत संख्या 31 से बढ़ाकर 34 की गई थी।
उद्देश्य मामलों के बढ़ते बैकलॉग (लंबित मामले) को कम करना और त्वरित तथा प्रभावी न्याय सुनिश्चित करना।
संवैधानिक पीठों का गठन मुख्य न्यायाधीश को संवैधानिक कानून के महत्वपूर्ण प्रश्नों से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए अधिक बार संवैधानिक पीठों का गठन करने में सुविधा होगी।

महत्व

न्यायिक प्रशासन

  • न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से सर्वोच्च न्यायालय की मामलों को निपटाने की क्षमता बढ़ेगी, जिससे लंबित मामलों की संख्या में कमी आने की उम्मीद है।
  • यह भारत के मुख्य न्यायाधीश को संवैधानिक पीठों (कम से कम पाँच न्यायाधीशों वाली) का अधिक नियमित रूप से गठन करने में सक्षम बनाएगा, जो संविधान की व्याख्या से संबंधित महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करती हैं।

नागरिकों के लिए न्याय

  • त्वरित और प्रभावी न्याय की दिशा में एक कदम है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकार (Fundamental Right) के रूप में न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करता है।
  • मामलों के शीघ्र निपटान से न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास बढ़ेगा।

संवैधानिक महत्व

  • संवैधानिक पीठों के नियमित गठन से महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर स्पष्टता और निरंतरता सुनिश्चित होगी, जिससे संवैधानिक कानून का विकास होगा।
  • यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी कार्यप्रणाली की दक्षता को मजबूत करने में सहायक होगा।

चुनौतियाँ

1. लंबित मामलों का समाधान

  • केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना लंबित मामलों को पूरी तरह से हल करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है।
  • प्रक्रियात्मक देरी, अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा और न्यायिक रिक्तियों को भरने में देरी जैसे अन्य कारक भी लंबित मामलों में योगदान करते हैं।

2. न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी से स्वीकृत पदों के बावजूद रिक्तियाँ बनी रह सकती हैं।
  • कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) और सरकार के बीच संभावित मतभेद नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।

3. बुनियादी ढाँचा और सहायक कर्मचारी

  • अतिरिक्त न्यायाधीशों को समायोजित करने के लिए पर्याप्त न्यायिक बुनियादी ढाँचे (अदालत कक्ष, स्टाफ) और सहायक कर्मचारियों की आवश्यकता होगी।
  • इन संसाधनों की कमी से न्यायाधीशों की बढ़ी हुई संख्या का पूर्ण लाभ नहीं मिल पाएगा।

4. न्यायिक गुणवत्ता

  • मामलों के त्वरित निपटान पर अत्यधिक जोर देने से न्यायिक गुणवत्ता से समझौता हो सकता है।
  • न्यायाधीशों पर काम का अत्यधिक दबाव उनके निर्णयों की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
केवल संख्या में वृद्धि यह लंबित मामलों के मूल कारणों (जैसे प्रक्रियात्मक देरी, अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा) को संबोधित नहीं करती है।
न्यायाधीशों की रिक्तियाँ स्वीकृत संख्या बढ़ने के बावजूद, यदि रिक्तियों को समय पर नहीं भरा जाता है, तो समस्या बनी रहेगी।
बुनियादी ढाँचे की कमी अतिरिक्त न्यायाधीशों के लिए पर्याप्त अदालत कक्ष, स्टाफ और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होगी, जिसकी कमी एक बाधा बन सकती है।
न्यायिक प्रक्रिया में सुधार मामलों के प्रबंधन, सुनवाई की दक्षता और वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution) तंत्रों में सुधार के बिना, केवल संख्या बढ़ाना अपर्याप्त होगा।

आगे की राह

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाना चाहिए ताकि रिक्तियों को शीघ्रता से भरा जा सके।
  • न्यायिक बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने और आधुनिक बनाने में निवेश करना चाहिए, जिसमें अदालत कक्ष, प्रौद्योगिकी और सहायक कर्मचारी शामिल हों।
  • मामलों के प्रबंधन (Case Management) और सुनवाई की दक्षता में सुधार के लिए प्रक्रियात्मक सुधारों को लागू करना चाहिए।
  • वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्रों जैसे मध्यस्थता (Mediation), सुलह (Conciliation) और लोक अदालतों को बढ़ावा देना चाहिए ताकि न्यायालयों पर बोझ कम हो सके।
  • कानूनी शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देना चाहिए ताकि न्यायिक प्रणाली में गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन सुनिश्चित हो सके।
  • विशेषज्ञता वाले न्यायालयों (Specialised Courts) के गठन पर विचार करना चाहिए ताकि विशिष्ट प्रकार के मामलों का शीघ्र निपटान हो सके।
  • न्यायाधीशों के लिए निरंतर प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि वे बदलते कानूनी परिदृश्य के साथ तालमेल बिठा सकें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या · न्यायाधीशों की नियुक्ति · न्यायिक कार्यभार · लंबित मामले · संविधान पीठ · न्यायिक दक्षता · संसद की भूमिका · न्यायिक सुधार · न्यायपालिका की स्वतंत्रता · न्याय तक पहुंच

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 124’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और गठन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 145’, ‘note’: ‘न्यायालय के नियम और संवैधानिक पीठ’}

अवधारणा प्रवाह

सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या  →  न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या में वृद्धि की आवश्यकता महसूस की गई  →  संसद द्वारा सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पारित  →  सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़कर 38 हुई  →  मामलों के निपटान की क्षमता में वृद्धि और संवैधानिक पीठों का अधिक गठन  →  त्वरित न्याय और न्यायिक दक्षता में सुधार की उम्मीद

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि केवल संसद द्वारा कानून बनाकर की जा सकती है।
2. मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की कुल संख्या वर्तमान में 38 है।
3. संविधान पीठों का गठन केवल संवैधानिक कानून के महत्वपूर्ण प्रश्नों से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। संविधान के अनुच्छेद 124(1) के तहत, संसद कानून द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित कर सकती है। कथन 2 सही है। हालिया संशोधन के बाद, मुख्य न्यायाधीश सहित स्वीकृत संख्या 38 हो गई है। कथन 3 सही है। संविधान पीठें कम से कम पांच न्यायाधीशों से बनी होती हैं और संविधान की व्याख्या से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नों वाले मामलों की सुनवाई करती हैं।

Q2. अभिकथन (A): भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का एक प्रमुख कारण लंबित मामलों की बढ़ती संख्या है।
कारण (R): न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से सर्वोच्च न्यायालय को एक साथ अधिक मामलों की सुनवाई करने और मामलों के निपटान की दर में सुधार करने में मदद मिलेगी।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि सरकार ने लंबित मामलों की बढ़ती संख्या को न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का मुख्य कारण बताया है। कारण (R) भी सही है क्योंकि अधिक न्यायाधीशों से न्यायालय की क्षमता बढ़ेगी और मामलों के निपटान में तेजी आएगी। R, A की सही व्याख्या है क्योंकि लंबित मामलों को कम करने के लिए ही न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई गई है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के कारणों का परीक्षण कीजिए। क्या केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना न्यायिक कार्यभार को कम करने के लिए पर्याप्त है? समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. परिचय: सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में हालिया वृद्धि (34 से 38) और संबंधित विधेयक का उल्लेख।
2. वृद्धि के कारण (प्रथम भाग):
क. लंबित मामलों की बढ़ती संख्या (जनवरी 2026 तक 92,101 मामले)।
ख. मामलों के निपटान और दर्ज होने के बीच का अंतर।
ग. न्यायिक दक्षता में सुधार और कार्यभार को कम करना।
घ. संविधान पीठों के नियमित गठन को सुगम बनाना (संवैधानिक महत्व के मामलों की सुनवाई)।
3. क्या केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त है? (द्वितीय भाग का समालोचनात्मक विश्लेषण):
क. पक्ष में तर्क (आवश्यक कदम): अधिक न्यायाधीशों से सुनवाई क्षमता बढ़ेगी, विशेष पीठों का गठन आसान होगा।
ख. विपक्ष में तर्क (अपूर्ण समाधान): केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। अन्य संरचनात्मक और प्रक्रियात्मक सुधारों की आवश्यकता है, जैसे:
i. न्यायिक प्रक्रिया का डिजिटलीकरण और आधुनिकीकरण।
ii. वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्रों को मजबूत करना।
iii. निचली अदालतों में सुधार और रिक्तियों को भरना।
iv. न्यायिक अवकाशों को तर्कसंगत बनाना।
v. मामलों के वर्गीकरण और प्राथमिकता निर्धारण में सुधार।
vi. उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायाधीशों की कमी को दूर करना।
4. निष्कर्ष: न्यायिक कार्यभार को कम करने के लिए न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि एक आवश्यक कदम है, लेकिन यह एक व्यापक न्यायिक सुधार रणनीति का केवल एक हिस्सा है जिसमें प्रक्रियात्मक, संरचनात्मक और तकनीकी सुधार भी शामिल होने चाहिए।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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