20 Jul सीजेपी का संसद मार्च आज: केंद्र ने सीजेपी से किया संपर्क, जाने पूरा मामला
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: महत्वपूर्ण प्रावधान, कार्यप्रणाली, संघ एवं राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्य संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय। | GS Paper II — शासन व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्वपूर्ण पक्ष, नागरिक चार्टर, पारदर्शिता एवं जवाबदेही और संस्थागत तथा अन्य उपाय। | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा तथा कानून और व्यवस्था।
- Prelims: अनुच्छेद 19 (1)(a), अनुच्छेद 19 (1)(b), भारत का संविधान, विरोध प्रदर्शन का अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, धारा 163 BNSS, जंतर मंतर
- Essay: लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन की भूमिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: विरोध प्रदर्शन का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित प्रतिबंधों के अधीन है, जैसा कि धारा 163 BNSS जैसे कानूनों द्वारा लागू किया जा सकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कॉकराच जनता पार्टी (CJP) ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद के मानसून सत्र के पहले दिन ‘चलो संसद’ मार्च का आह्वान किया है। दिल्ली पुलिस ने इस मार्च के लिए कोई आधिकारिक अनुमति नहीं दी है और संसद भवन तथा इंडिया गेट के आसपास धारा 163 BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के तहत निषेधाज्ञा लागू है, जो चार या अधिक व्यक्तियों के जमावड़े पर प्रतिबंध लगाती है। यह घटनाक्रम विरोध प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता के बीच संतुलन के संबंध में महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी मुद्दों को उजागर करता है।
पृष्ठभूमि
- CJP केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रही है।
- कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जो इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा थे, भूख हड़ताल पर थे और उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
- CJP ने संसद के मानसून सत्र के पहले दिन ‘चलो संसद’ मार्च का आह्वान किया है।
- दिल्ली पुलिस के अनुसार, CJP ने इस मार्च के लिए कोई आधिकारिक अनुमति नहीं ली है।
- संसद सत्र के दौरान नई दिल्ली जिले, विशेषकर संसद भवन और इंडिया गेट के आसपास, धारा 163 BNSS के तहत निषेधाज्ञा लागू रहती है, जो चार या अधिक लोगों के जमावड़े और अनधिकृत रैलियों पर प्रतिबंध लगाती है।
- सोनम वांगचुक की पत्नी ने घोषणा की है कि यदि राजनीतिक नेता उनसे अस्पताल में मिलते हैं और शिक्षा जवाबदेही के मुद्दे को संसद सत्र में उठाने का आश्वासन देते हैं, तो वह अपनी भूख हड़ताल समाप्त कर देंगे।
विरोध प्रदर्शन का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) सभी नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्ण और निरायुध सम्मेलन का अधिकार देता है, जिसका अर्थ है बिना हथियारों के शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार।
- हालांकि, ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं और अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत राज्य द्वारा कुछ उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
- ये प्रतिबंध भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता या न्यायालय की अवमानना, मानहानि या किसी अपराध के लिए उकसाने के हितों में लगाए जा सकते हैं।
- सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) बनाए रखना राज्य का एक महत्वपूर्ण कार्य है, और इसके लिए पुलिस को कानून के तहत कुछ शक्तियाँ प्राप्त हैं।
- धारा 163 BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) एक ऐसा प्रावधान है जो सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका होने पर कुछ क्षेत्रों में लोगों के जमावड़े पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।
- विरोध प्रदर्शन का अधिकार लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग है, लेकिन इसे कानून के दायरे में और शांतिपूर्ण ढंग से प्रयोग किया जाना चाहिए।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से न्यायालय यह सुनिश्चित करते हैं कि सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध उचित और आनुपातिक हों, और वे मनमाने न हों।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| विरोध प्रदर्शन का अधिकार | लोकतंत्र में नागरिकों को अपनी असहमति व्यक्त करने और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने की अनुमति देता है। |
| शांतिपूर्ण सभा | संविधान द्वारा प्रदत्त एक मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(b)) है, बशर्ते यह शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के हो। |
| धारा 163, BNSS | सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और बड़े जमावड़ों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा लागू निषेधाज्ञा (Prohibitory Order) है। |
| संसद सत्र | कानून बनाने और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस करने के लिए विधायिका का मंच है, जिसके दौरान सुरक्षा व्यवस्था कड़ी होती है। |
| भूख हड़ताल | विरोध का एक अहिंसक तरीका है जिसका उपयोग अक्सर ध्यान आकर्षित करने और मांगों को मनवाने के लिए किया जाता है। |
महत्व
लोकतांत्रिक प्रक्रिया
- यह घटना नागरिकों के विरोध के अधिकार और सरकार की प्रतिक्रिया के बीच संतुलन को दर्शाती है।
- यह लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों की भूमिका और उनकी सीमाओं पर बहस को जन्म देती है।
कानून और व्यवस्था
- दिल्ली पुलिस द्वारा धारा 163, BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) का प्रयोग सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करता है।
- संसद सत्र के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना सांसदों की सुचारू आवाजाही और विधायी कार्यों को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
नागरिक समाज की भूमिका
- नागरिक समाज संगठन (Civil Society Organizations) और कार्यकर्ता सार्वजनिक जवाबदेही (Public Accountability) सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- भूख हड़ताल जैसे अहिंसक विरोध प्रदर्शनों का उपयोग सरकार का ध्यान आकर्षित करने और नीतिगत बदलावों को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।
चुनौतियाँ
1. विरोध प्रदर्शनों का प्रबंधन
- शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।
- बड़ी भीड़ को नियंत्रित करना और यह सुनिश्चित करना कि विरोध प्रदर्शन हिंसक न हों, पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा, शासन
2. संचार और संवाद
- विरोध करने वाले समूहों और सरकार के बीच प्रभावी संचार की कमी से गतिरोध और गलतफहमी पैदा हो सकती है।
- मांगों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करना और सरकार द्वारा उन पर विचार करना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: शासन, सामाजिक न्याय
3. कानूनी अनुपालन
- विरोध प्रदर्शनों के लिए आवश्यक अनुमति प्राप्त न करना कानूनी जटिलताओं और पुलिस कार्रवाई को जन्म दे सकता है।
- नागरिकों को विरोध प्रदर्शनों से संबंधित कानूनों और दिशानिर्देशों का पालन करना चाहिए।
यूपीएससी लिंक: संविधान, कानून और व्यवस्था
4. स्वास्थ्य और सुरक्षा
- भूख हड़ताल जैसे विरोध प्रदर्शनों में शामिल कार्यकर्ताओं के स्वास्थ्य की निगरानी करना और आवश्यक चिकित्सा सहायता प्रदान करना महत्वपूर्ण है।
- बड़े जमावड़ों में सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, शासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| विरोध प्रदर्शन का अधिकार बनाम सार्वजनिक व्यवस्था | लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान करते हुए कानून और व्यवस्था बनाए रखना। |
| अनाधिकृत मार्च | सुरक्षा जोखिम और यातायात व्यवधान, खासकर संसद सत्र के दौरान। |
| भूख हड़ताल का स्वास्थ्य प्रभाव | कार्यकर्ताओं के जीवन और स्वास्थ्य के लिए जोखिम, सरकार पर दबाव। |
| सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच संवादहीनता | समस्याओं का समाधान न होना और गतिरोध की स्थिति। |
| धारा 163, BNSS का उपयोग | विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए इसके संभावित दुरुपयोग की चिंता। |
आगे की राह
- सरकार और प्रदर्शनकारी समूहों के बीच रचनात्मक संवाद स्थापित किया जाना चाहिए ताकि मांगों पर विचार किया जा सके।
- विरोध प्रदर्शनों के लिए स्पष्ट और पारदर्शी दिशानिर्देश बनाए जाने चाहिए, जिनका पालन दोनों पक्षों द्वारा किया जाए।
- पुलिस को भीड़ नियंत्रण के लिए न्यूनतम बल का प्रयोग करना चाहिए और मानवाधिकारों का सम्मान सुनिश्चित करना चाहिए।
- नागरिक समाज संगठनों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के महत्व और कानूनी सीमाओं के बारे में जागरूकता फैलानी चाहिए।
- संसद को महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दों पर सार्थक बहस के लिए एक मंच के रूप में कार्य करना चाहिए, जिससे विरोध प्रदर्शनों की आवश्यकता कम हो।
- भूख हड़ताल जैसे गंभीर विरोध प्रदर्शनों में शामिल व्यक्तियों के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी और चिकित्सा सहायता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
विरोध प्रदर्शन का अधिकार · अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता · संसद का मानसून सत्र · जंतर मंतर · धारा 163 BNSS · शांतिपूर्ण सभा का अधिकार · नागरिक समाज · शिक्षा जवाबदेही · लोकतंत्र में विरोध · मौलिक अधिकार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 19(1)(a)’, ‘note’: ‘वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 19(1)(b)’, ‘note’: ‘शांतिपूर्ण और निरायुध सम्मेलन का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग → कॉकक्रोच जनता पार्टी (CJP) का विरोध प्रदर्शन → संसद मार्च की घोषणा (‘चलो संसद’ मार्च) → दिल्ली पुलिस द्वारा धारा 163, BNSS लागू → संसद सत्र के दौरान सुरक्षा व्यवस्था कड़ी → भूख हड़ताल और चिकित्सा निगरानी → सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच संभावित संवाद
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. भारत में विरोध प्रदर्शनों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है।
2. दिल्ली पुलिस द्वारा धारा 163 BNSS के तहत लगाए गए निषेधाज्ञा आदेश किसी भी प्रकार के सार्वजनिक प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते हैं।
3. विरोध प्रदर्शनों के आयोजन के लिए हमेशा सरकारी अनुमति की आवश्यकता होती है, भले ही वे शांतिपूर्ण हों।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है, जो विरोध प्रदर्शनों का आधार है। कथन 2 गलत है। धारा 163 BNSS (जो पहले CrPC की धारा 144 थी) कुछ प्रतिबंध लगाती है, लेकिन यह सभी प्रकार के सार्वजनिक प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है; यह चार या अधिक व्यक्तियों के जमावड़े, अनधिकृत रैलियों और हथियार ले जाने पर रोक लगाती है। कथन 3 गलत है। जबकि कुछ बड़े प्रदर्शनों के लिए अनुमति आवश्यक हो सकती है, छोटे और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए हमेशा पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है, हालांकि स्थानीय नियमों का पालन करना होता है।
Q2. भारत के संविधान के तहत, निम्नलिखित में से कौन-सा मौलिक अधिकार शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के अधिकार का समर्थन करता है?
- अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता
- अनुच्छेद 19(1)(a): वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 21: प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
- अनुच्छेद 32: संवैधानिक उपचारों का अधिकार
उत्तर: अनुच्छेद 19(1)(a): वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — अनुच्छेद 19(1)(a) वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, जिसमें विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से विचारों को व्यक्त करने का अधिकार भी शामिल है। अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है, जो विरोध प्रदर्शनों का एक अभिन्न अंग है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारतीय लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों के अधिकार के महत्व का विश्लेषण कीजिए। क्या शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर लगाए गए प्रतिबंध, जैसे कि धारा 163 BNSS के तहत, संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप हैं? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में, भारतीय लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों के महत्व को रेखांकित करें, जिसमें उन्हें वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) तथा शांतिपूर्वक एकत्र होने के अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(b)) के विस्तार के रूप में देखें। बताएं कि वे सरकार के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने, सार्वजनिक राय व्यक्त करने और नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करने में कैसे सहायक हैं। दूसरे भाग में, धारा 163 BNSS (पूर्व में CrPC की धारा 144) जैसे प्रतिबंधों की संवैधानिकता का विश्लेषण करें। बताएं कि ये प्रतिबंध सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और कानून-व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए लगाए जाते हैं, लेकिन इन्हें मनमाना नहीं होना चाहिए और ये आनुपातिकता के सिद्धांत का पालन करने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करें जिन्होंने इन प्रतिबंधों की वैधता और सीमाओं को स्पष्ट किया है। निष्कर्ष में, मौलिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दें।
स्रोत: Mint
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