23 Sep सुप्रीम कोर्ट का सीईसी नियुक्ति कानून पर विभाजित फैसला, संविधान पीठ को भेजने पर मतभेद
✎ सर्वोच्च न्यायालय का खंडित फैसला मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के नियंत्रण और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के बीच संतुलन से संबंधित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाता है, जिसे अब भारत के…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली; सरकार के मंत्रालय और विभाग; सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्ध-न्यायिक निकाय। | GS Paper II — लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ।
- Prelims: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC), चुनाव आयुक्त (EC), भारत का चुनाव आयोग (ECI), संविधान पीठ, अनुच्छेद 324, अनोप बरनवाल मामला, न्यायिक समीक्षा, आधारभूत संरचना
- Essay: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा भारतीय लोकतंत्र का भविष्य, संवैधानिक निकायों की स्वायत्तता और कार्यपालिका का हस्तक्षेप
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय का खंडित फैसला मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के नियंत्रण और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के बीच संतुलन से संबंधित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाता है, जिसे अब भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा संविधान पीठ को भेजने पर विचार किया जाएगा।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner – CEC) और चुनाव आयुक्तों (Election Commissioners – ECs) की नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संविधान पीठ (Constitution Bench) को भेजा जाना चाहिए या नहीं, इस पर एक खंडित फैसला (split verdict) सुनाया है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने बड़ी पीठ को भेजने की याचिका खारिज कर दी, जबकि न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने इसे संवैधानिक व्याख्या का एक महत्वपूर्ण प्रश्न मानते हुए संविधान पीठ को भेजने का समर्थन किया। इस मतभेद के कारण, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को इस मामले पर विचार करने के लिए कागजात भेजे गए हैं।
पृष्ठभूमि
- भारत का चुनाव आयोग (Election Commission of India – ECI) एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है जो भारत में संघ और राज्य चुनाव प्रक्रियाओं के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है।
- संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान करता है।
- मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। हालांकि, संविधान ने इन नियुक्तियों के लिए कोई विशिष्ट विधायी प्रक्रिया निर्धारित नहीं की है।
- संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 (Chief Election Commissioner and other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023) अधिनियमित किया। इस अधिनियम के तहत, चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (Union Cabinet Minister) शामिल हैं। इसमें CJI को बाहर कर दिया गया है।
- इस नए कानून को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है, जिसमें तर्क दिया गया है कि यह चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करता है क्योंकि इसमें CJI जैसे तटस्थ सदस्य को बाहर कर दिया गया है।
भारत का चुनाव आयोग (ECI) क्या है?
- भारत का चुनाव आयोग एक स्थायी और स्वतंत्र निकाय है जिसे भारत के संविधान द्वारा देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए स्थापित किया गया है।
- यह संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है।
- ECI में एक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दो चुनाव आयुक्त (ECs) होते हैं।
- इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, होता है।
- CEC को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया और आधार पर पद से हटाया जा सकता है। अन्य ECs को CEC की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
- चुनाव आयोग संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के कार्यालयों के चुनावों का संचालन करता है।
- यह राजनीतिक दलों को मान्यता देता है और उन्हें चुनाव चिह्न आवंटित करता है।
- यह चुनाव आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू करता है और चुनाव संबंधी विवादों का निपटारा करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति | भारत के चुनाव आयोग (ECI) की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण। |
| संवैधानिक पीठ को संदर्भित करने पर खंडित फैसला | यह दर्शाता है कि कानून की संवैधानिक वैधता पर न्यायाधीशों के बीच मतभेद हैं, जो एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न है। |
| अधिनियम, 2023 के तहत चयन समिति | प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं। यह कार्यपालिका के प्रभाव पर चिंताएं बढ़ाता है। |
| अनूप बरनवाल मामले का निर्णय | सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को कार्यपालिका के विशेष नियंत्रण से बचाने के सिद्धांतों को स्थापित किया था, जिसमें CJI को शामिल करने वाली एक ‘संक्रमणकालीन’ व्यवस्था का सुझाव दिया गया था। |
| न्यायाधीशों के बीच मतभेद | एक न्यायाधीश ने कहा कि अनूप बरनवाल मामले में सिद्धांत पहले ही तय हो चुके हैं, जबकि दूसरे ने ‘तटस्थ चयनकर्ता’ के बहिष्करण को एक नया संवैधानिक मुद्दा माना। |
महत्व
लोकतांत्रिक महत्व
- चुनाव आयोग की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की नींव है। CEC और ECs की नियुक्ति प्रक्रिया का सीधा प्रभाव आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर पड़ता है।
- स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना संवैधानिक लोकतंत्र का एक मूल सिद्धांत है, और इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का कार्यकारी हस्तक्षेप इन सिद्धांतों को कमजोर कर सकता है।
संवैधानिक महत्व
- यह मामला संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) के सिद्धांत से जुड़ा है, विशेष रूप से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के पहलू से।
- यह शक्ति पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत को भी छूता है, क्योंकि यह कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन को प्रभावित करता है।
शासन और जवाबदेही
- नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना सुशासन (Good Governance) का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
- कार्यपालिका के अत्यधिक प्रभाव से आयोग की जवाबदेही (Accountability) प्रभावित हो सकती है, जिससे उसके निर्णयों पर सवाल उठ सकते हैं।
चुनौतियाँ
1. कार्यपालिका का प्रभाव
- वर्तमान चयन समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री शामिल हैं, जिससे कार्यपालिका का बहुमत हो जाता है।
- यह चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर कर सकता है, क्योंकि नियुक्तियां सरकार की प्राथमिकताओं के अनुरूप हो सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: चुनाव आयोग
2. तटस्थ चयनकर्ता का अभाव
- अनूप बरनवाल मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने CJI को चयन समिति में शामिल करने का सुझाव दिया था ताकि तटस्थता सुनिश्चित की जा सके।
- नए कानून में CJI को बाहर करने से यह सवाल उठता है कि क्या संसद ने एक तटस्थ चयनकर्ता को हटाकर संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन किया है।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक समीक्षा और संवैधानिक व्याख्या
3. संवैधानिक वैधता पर सवाल
- याचिकाएं इस बात पर सवाल उठाती हैं कि क्या नया कानून संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है, विशेष रूप से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का।
- सर्वोच्च न्यायालय का खंडित फैसला दर्शाता है कि इस मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक व्याख्या की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: संविधान का मूल ढांचा
4. सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत
- एक न्यायाधीश ने तर्क दिया कि प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री अपने नामिती का विरोध नहीं कर सकते, क्योंकि वे सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility) के सिद्धांत से बंधे होते हैं।
- यह चयन समिति के भीतर वास्तविक बहस और स्वतंत्र निर्णय लेने की संभावना को कम करता है।
यूपीएससी लिंक: संसदीय प्रणाली और मंत्री परिषद
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| CEC/ECs की नियुक्ति प्रक्रिया | कार्यपालिका का अत्यधिक प्रभाव चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को खतरे में डाल सकता है। |
| चयन समिति में CJI का बहिष्करण | नियुक्ति प्रक्रिया में तटस्थता और निष्पक्षता की कमी पर सवाल उठाता है। |
| संवैधानिक वैधता | क्या नया कानून संविधान के मूल ढांचे, विशेषकर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। |
| सामूहिक उत्तरदायित्व | प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री का स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता पर संदेह। |
| न्यायिक व्याख्या की आवश्यकता | खंडित फैसले से पता चलता है कि संवैधानिक सिद्धांतों की स्पष्ट व्याख्या की आवश्यकता है। |
आगे की राह
- सर्वोच्च न्यायालय को एक संवैधानिक पीठ का गठन करना चाहिए ताकि कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय दिया जा सके और अनूप बरनवाल मामले के सिद्धांतों को स्पष्ट किया जा सके।
- संसद को चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए एक अधिक संतुलित और समावेशी चयन प्रक्रिया पर विचार करना चाहिए, जिसमें न्यायपालिका या अन्य तटस्थ विशेषज्ञों की भागीदारी हो सकती है।
- CEC और ECs की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए स्पष्ट मानदंड और प्रक्रियाएं स्थापित की जानी चाहिए।
- सभी हितधारकों, जिसमें राजनीतिक दल और नागरिक समाज संगठन शामिल हैं, को चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के महत्व पर आम सहमति बनानी चाहिए।
- भविष्य के कानूनों में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि चुनाव आयोग को कार्यपालिका के अनुचित प्रभाव से बचाया जाए, ताकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित हो सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मुख्य चुनाव आयुक्त · चुनाव आयुक्त · नियुक्ति प्रक्रिया · संवैधानिक वैधता · भारत का चुनाव आयोग · कार्यकारी नियंत्रण · न्यायिक समीक्षा · संविधान पीठ · अनोप बरनवाल मामला · स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव · शक्तियों का पृथक्करण · मूल संरचना
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 324’, ‘note’: ‘चुनाव आयोग का गठन और कार्य’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘कानून के समक्ष समानता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘संविधान का मूल ढांचा’, ‘note’: ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव एक हिस्सा’}
अवधारणा प्रवाह
CEC और ECs की नियुक्ति का नया कानून, 2023 → चयन समिति में कार्यपालिका का बहुमत → चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर संभावित प्रभाव → कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती → सर्वोच्च न्यायालय का खंडित फैसला → संवैधानिक पीठ द्वारा अंतिम निर्णय की आवश्यकता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान है।
2. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के तहत, चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं।
3. अनूप बरनवाल मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का प्रावधान करता है, लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया का विवरण नहीं देता है। कथन 2 गलत है। अधिनियम, 2023 के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं, न कि भारत के मुख्य न्यायाधीश। कथन 3 सही है। अनूप बरनवाल मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह अंतरिम व्यवस्था दी थी कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे।
Q2. अभिकथन (A): स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव भारत के संविधान की मूल संरचना का एक हिस्सा हैं।
कारण (R): भारत का चुनाव आयोग कार्यकारी नियंत्रण से पूरी तरह से स्वतंत्र होना चाहिए ताकि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित कर सके।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना है। कारण (R) भी सही है। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए आवश्यक है, और कार्यकारी नियंत्रण से उसकी मुक्ति इस स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण पहलू है। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या भी है, क्योंकि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को सुनिश्चित करने का एक प्रमुख साधन है, जो कि मूल संरचना का हिस्सा हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत के चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित हालिया विधायी परिवर्तनों की संवैधानिक वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय के विभाजित फैसले के निहितार्थों का आलोचनात्मक परीक्षण करें। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए चुनाव आयोग की स्वायत्तता सुनिश्चित करने हेतु क्या उपाय किए जा सकते हैं? (15 अंक)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 का संक्षिप्त परिचय और सर्वोच्च न्यायालय के हालिया विभाजित फैसले का उल्लेख।
2. **विधायी परिवर्तन:** अधिनियम, 2023 के तहत नई चयन समिति (प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री) का विवरण।
3. **सर्वोच्च न्यायालय का विभाजित फैसला और निहितार्थ:**
* **न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता का मत:** अनूप बरनवाल मामले में दिए गए सिद्धांतों (स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, कार्यकारी नियंत्रण से मुक्ति) का उल्लेख। उनका तर्क कि CJI की उपस्थिति अंतरिम थी और संसद को कानून बनाने का अधिकार है। नामित मंत्री की भूमिका पर चिंता।
* **न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा का मत:** ‘तटस्थ चयनकर्ता’ (CJI) को समिति से बाहर करने के संवैधानिक प्रश्न की महत्ता पर जोर।
* **निहितार्थ:** संवैधानिक व्याख्या के लिए संविधान पीठ की आवश्यकता, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर संभावित प्रभाव, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन पर बहस।
4. **चुनाव आयोग की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के उपाय:**
* **चयन समिति में सुधार:** CJI या किसी अन्य तटस्थ विशेषज्ञ की भागीदारी।
* **महाभियोग प्रक्रिया:** CEC के समान ECs के लिए भी महाभियोग प्रक्रिया।
* **वित्तीय स्वायत्तता:** चुनाव आयोग के व्यय को भारत की संचित निधि पर भारित करना।
* **कार्यकाल की सुरक्षा:** कार्यकाल की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
* **सेवा शर्तों में बदलाव:** कार्यकाल के दौरान सेवा शर्तों में अलाभकारी परिवर्तन न करना।
* **अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाएं:** अन्य लोकतांत्रिक देशों में अपनाई गई सफल प्रथाओं का अध्ययन।
5. **निष्कर्ष:** स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के महत्व पर जोर देते हुए, चुनाव आयोग की स्वायत्तता को बनाए रखने और मजबूत करने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देना।
स्रोत: orissapost.com
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