सुप्रीम कोर्ट ने कहा: शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संविधान द्वारा सुरक्षित, मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने पर विचार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा: शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संविधान द्वारा सुरक्षित, मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने पर विचार

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक तत्व और मौलिक कर्तव्य; सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थाएँ।  |  GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली; सरकार के मंत्रालय और विभाग; दबाव समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका।
  • Prelims: अनुच्छेद 19(1)(b), शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार, मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा, पुलिस आचरण, लोक व्यवस्था
  • Essay: लोकतंत्र में विरोध का अधिकार और उसकी सीमाएँ, शासन में जवाबदेही और नागरिक स्वतंत्रताएँ

त्वरित पुनरावृत्ति: शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत एक मौलिक अधिकार है, जिस पर सार्वजनिक व्यवस्था जैसे उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, और सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस आचरण को विनियमित करने के लिए दिशानिर्देशों पर विचार करने का संकेत दिया है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने हाल ही में देशव्यापी परीक्षा पेपर लीक को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों से संबंधित कई याचिकाओं की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की कि शांतिपूर्ण विरोध का संवैधानिक अधिकार संरक्षित होना चाहिए। न्यायालय ने पुलिस आचरण को विनियमित करने के लिए समान दिशानिर्देश तैयार करने पर विचार करने का भी संकेत दिया, विशेषकर बड़े पैमाने के प्रदर्शनों के दौरान। यह टिप्पणी जुलाई 2026 में हुए संसद मार्च और बिहार बंद के दौरान पुलिस ज्यादतियों के आरोपों के संदर्भ में आई है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में, विरोध प्रदर्शनों का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत ‘शांतिपूर्ण और निरायुध सम्मेलन’ (peaceful and without arms assembly) के मौलिक अधिकार के रूप में संरक्षित है।
  • हालांकि, इस अधिकार पर अनुच्छेद 19(3) के तहत ‘भारत की संप्रभुता और अखंडता’, ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ (public order) या ‘नैतिकता’ के हित में ‘उचित प्रतिबंध’ (reasonable restrictions) लगाए जा सकते हैं।
  • अतीत में भी, सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में विरोध प्रदर्शनों के अधिकार के महत्व को दोहराया है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि यह अधिकार असीमित नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता के साथ संतुलित होना चाहिए।
  • वर्तमान मामले में, परीक्षा पेपर लीक के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों और प्रदर्शनकारियों तथा पुलिस कर्मियों दोनों को लगी चोटों ने इस मुद्दे को फिर से केंद्र में ला दिया है।
  • न्यायालय ने नागरिकों और कानून प्रवर्तन दोनों के लिए ‘आत्म-अनुशासन’ (self-imposed discipline) के महत्व पर जोर दिया है, जिसे लोकतंत्र के कामकाज के लिए आवश्यक बताया गया है।

भारत में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार

  • शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों का एक अभिन्न अंग है, विशेष रूप से अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत।
  • यह अधिकार नागरिकों को बिना हथियारों के शांतिपूर्वक इकट्ठा होने और अपने विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
  • यह लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो नागरिकों को सरकार की नीतियों या कार्यों के प्रति अपनी असहमति व्यक्त करने का अवसर देता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न मामलों में इस अधिकार की पुष्टि की है, जैसे कि रामलीला मैदान घटना (2012) और शाहीन बाग मामले (2020) में।
  • हालांकि, यह अधिकार पूर्ण नहीं है और अनुच्छेद 19(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या भारत की संप्रभुता और अखंडता के हित में राज्य द्वारा इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
  • इन प्रतिबंधों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विरोध प्रदर्शनों से दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन न हो और सार्वजनिक जीवन बाधित न हो।
  • पुलिस को विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन उन्हें बल प्रयोग करते समय संयम बरतना होता है और केवल आवश्यक होने पर ही न्यूनतम बल का प्रयोग करना होता है।
  • न्यायालय ने पुलिस आचरण के लिए दिशानिर्देशों की आवश्यकता पर जोर दिया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बल प्रयोग मनमाना न हो और मौलिक अधिकारों का सम्मान किया जाए।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार यह लोकतंत्र का एक मूलभूत स्तंभ है, जो नागरिकों को अपनी असहमति व्यक्त करने और सरकार को जवाबदेह ठहराने में सक्षम बनाता है।
पुलिस आचरण के लिए दिशानिर्देश यह सुनिश्चित करेगा कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बल का प्रयोग संयमित और मानवाधिकारों के अनुरूप हो।
नागरिकों और कानून प्रवर्तन में आत्म-अनुशासन यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सुचारू कामकाज के लिए आवश्यक है, हिंसा और टकराव को रोकता है।
परीक्षा पेपर लीक पर राष्ट्रव्यापी विरोध यह शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को उजागर करता है, विशेषकर शिक्षा क्षेत्र में।
अनुचित साधनों की रोकथाम के लिए विधेयक यह सार्वजनिक परीक्षाओं की शुचिता बनाए रखने और छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

महत्व

लोकतांत्रिक महत्व

  • यह निर्णय शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को एक संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार के रूप में पुनः पुष्टि करता है, जो भारतीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को मजबूत करता है।
  • यह नागरिकों को अपनी शिकायतों को व्यक्त करने और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है, जिससे शासन में जवाबदेही बढ़ती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिशानिर्देशों का संभावित निर्माण विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बल के मनमाने उपयोग को रोकने में मदद करेगा, जिससे नागरिक स्वतंत्रताएं सुरक्षित रहेंगी।

सामाजिक महत्व

  • यह छात्रों और युवाओं को अपनी चिंताओं को शांतिपूर्ण ढंग से व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करता है, विशेषकर परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं के संबंध में।
  • यह समाज में न्याय और निष्पक्षता की मांग को रेखांकित करता है, विशेषकर सार्वजनिक सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में।

शासन और प्रशासन

  • यह सरकार को सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों को संभालने के लिए अधिक संवेदनशील और जवाबदेह दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।
  • यह कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश स्थापित करेगा, जिससे विरोध प्रदर्शनों के प्रबंधन में अधिक मानकीकरण और जवाबदेही आएगी।

चुनौतियाँ

1. विरोध प्रदर्शनों का प्रबंधन

  • शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।
  • पुलिस बल के उपयोग को विनियमित करने के लिए स्पष्ट और प्रभावी दिशानिर्देशों का अभाव अक्सर अत्यधिक बल प्रयोग की ओर ले जाता है।

2. परीक्षा प्रणाली में विश्वास

  • पेपर लीक और अनुचित साधनों की घटनाएं सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में छात्रों और अभिभावकों के विश्वास को कमजोर करती हैं।
  • ऐसी घटनाओं को रोकने और दोषियों को दंडित करने के लिए मौजूदा कानूनों का अपर्याप्त प्रवर्तन एक बड़ी चुनौती है।

3. पुलिस जवाबदेही

  • विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ज्यादतियों के लिए जवाबदेही तय करना और उन्हें दंडित करना अक्सर मुश्किल होता है।
  • कानून प्रवर्तन एजेंसियों के भीतर आत्म-अनुशासन और मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशीलता की कमी एक चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के बहाने अक्सर इस अधिकार का उल्लंघन किया जाता है।
पुलिस बल का अत्यधिक उपयोग विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और अन्य कठोर उपायों का उपयोग अक्सर अनुचित होता है।
जवाबदेही की कमी पुलिस ज्यादतियों के मामलों में अक्सर दोषियों को दंडित नहीं किया जाता है, जिससे विश्वास की कमी होती है।
परीक्षा पेपर लीक यह छात्रों के भविष्य को खतरे में डालता है और सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को कम करता है।
कानून का अपर्याप्त प्रवर्तन अनुचित साधनों में शामिल लोगों को दंडित करने के लिए मौजूदा कानूनों का प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं किया जाता है।

आगे की राह

  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुलिस आचरण के लिए स्पष्ट और व्यापक दिशानिर्देश तैयार किए जाएं, जिसमें बल के उपयोग पर सख्त नियम हों।
  • कानून प्रवर्तन कर्मियों के लिए मानवाधिकारों और भीड़ नियंत्रण तकनीकों पर नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
  • विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ज्यादतियों की स्वतंत्र जांच के लिए एक प्रभावी तंत्र स्थापित किया जाए।
  • सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए मजबूत उपाय किए जाएं, जिसमें पेपर लीक को रोकने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग शामिल हो।
  • सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम के लिए प्रस्तावित विधेयक को शीघ्रता से पारित किया जाए और प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
  • नागरिकों और कानून प्रवर्तन दोनों के बीच आत्म-अनुशासन और संवाद को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
  • विरोध प्रदर्शनों के दौरान संवाद और मध्यस्थता के चैनलों को मजबूत किया जाए ताकि टकराव को कम किया जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार · अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता · अनुच्छेद 19 · पुलिस कदाचार · लोकतंत्र में विरोध · न्यायिक समीक्षा · मौलिक अधिकार · कानून और व्यवस्था · नागरिकों के कर्तव्य · राज्य के कर्तव्य

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘Article 19(1)(a)’: ‘भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार।’}
  • {‘Article 19(1)(b)’: ‘शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के इकट्ठा होने का अधिकार।’}
  • {‘Article 21’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार।’}

अवधारणा प्रवाह

परीक्षा पेपर लीक की घटनाएँ  →  छात्रों और नागरिकों द्वारा राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन  →  पुलिस द्वारा विरोध प्रदर्शनों का दमन और कथित ज्यादतियाँ  →  सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की पुष्टि  →  पुलिस आचरण के लिए दिशानिर्देशों पर विचार  →  सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम के लिए विधेयक का प्रस्ताव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत के संविधान के तहत, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. यह अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक अंतर्निहित पहलू है।
2. यह एक पूर्ण अधिकार है और इस पर राज्य द्वारा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में इस अधिकार की पुष्टि की है।
उपरोक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 3 — कथन 1 सही है क्योंकि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के इकट्ठा होने के अधिकार के अंतर्गत आता है। कथन 2 गलत है क्योंकि यह एक पूर्ण अधिकार नहीं है और इस पर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या भारत की संप्रभुता और अखंडता के हित में उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। कथन 3 सही है, सर्वोच्च न्यायालय ने रामलीला मैदान मामले सहित कई निर्णयों में इस अधिकार की पुष्टि की है।

Q2. हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम से संबंधित एक विधेयक पर चर्चा की। इस संदर्भ में, ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा सही है?

  1. यह विधेयक केवल प्रश्न पत्र लीक करने वालों के लिए सजा बढ़ाने का प्रस्ताव करता है।
  2. यह विधेयक अनुचित साधनों में शामिल लोगों के लिए कारावास की अवधि को 3 से 5 वर्ष से बढ़ाकर 5 से 10 वर्ष करने का प्रस्ताव करता है।
  3. यह विधेयक अधिकतम जुर्माने को ₹10 लाख से घटाकर ₹5 लाख करने का प्रस्ताव करता है।
  4. यह विधेयक केवल राज्य सरकारों द्वारा आयोजित परीक्षाओं पर लागू होगा।

उत्तर: यह विधेयक अनुचित साधनों में शामिल लोगों के लिए कारावास की अवधि को 3 से 5 वर्ष से बढ़ाकर 5 से 10 वर्ष करने का प्रस्ताव करता है। — यह विधेयक अनुचित साधनों में शामिल लोगों, जिसमें प्रश्न पत्र लीक करना भी शामिल है, के लिए कारावास की अवधि को 3 से 5 वर्ष से बढ़ाकर 5 से 10 वर्ष करने का प्रस्ताव करता है। साथ ही, यह अधिकतम जुर्माने को ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹50 लाख करने का भी प्रस्ताव करता है। यह विधेयक सार्वजनिक परीक्षाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की संवैधानिक स्थिति का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। लोकतंत्र में इस अधिकार के महत्व पर चर्चा करते हुए, पुलिस कदाचार को रोकने और विरोध प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिशानिर्देशों की आवश्यकता का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)

रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की संवैधानिक स्थिति (अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b)) और इस पर लगाए जा सकने वाले उचित प्रतिबंधों का उल्लेख करें। दूसरे भाग में, लोकतंत्र में विरोध के महत्व को रेखांकित करें, जैसे कि सरकार को जवाबदेह ठहराना, जनता की राय व्यक्त करना और नीतिगत बदलावों को प्रभावित करना। तीसरे भाग में, पुलिस कदाचार के मुद्दों और विरोध प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौतियों पर चर्चा करें। अंत में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिशानिर्देशों की आवश्यकता पर प्रकाश डालें, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों और राज्य के कानून-व्यवस्था बनाए रखने के कर्तव्य के बीच संतुलन स्थापित कर सकें।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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