22 Sep सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल पुनर्वितरण याचिका खारिज की, जानें पूरा मामला
✎ भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का समाधान संविधान के अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित ट्रिब्यूनल तथा प्रबंधन प्राधिकरणों के माध्यम से किया जाता है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ; स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ | GS Paper II — विभिन्न घटकों के बीच शक्ति पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थाएँ
- Prelims: कावेरी जल विवाद, अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, अनुच्छेद 262, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA), कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC), सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार
- Essay: भारत में संघीय ढाँचे की चुनौतियाँ: अंतर-राज्यीय विवादों का प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधनों के बँटवारे में न्यायपालिका की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का समाधान संविधान के अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित ट्रिब्यूनल तथा प्रबंधन प्राधिकरणों के माध्यम से किया जाता है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका विशिष्ट संवैधानिक प्रश्नों तक सीमित रहती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में कावेरी नदी जल के 70 TMC के पुनर्वितरण (reallocation) से संबंधित एक याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि यह मामला तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों के बीच एक विवाद है, और वे पहले से ही इस मामले को लड़ रहे हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि राज्यों के बीच विवाद में विभिन्न समाजों की याचिकाओं पर विचार किया जाने लगा, तो इसका कोई अंत नहीं होगा। यह घटनाक्रम कावेरी जल विवाद और अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान के लिए स्थापित संवैधानिक व संस्थागत तंत्रों की प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।
पृष्ठभूमि
- कावेरी जल विवाद कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच कावेरी नदी के जल के बँटवारे से संबंधित एक दीर्घकालिक और जटिल मुद्दा है।
- इस विवाद की जड़ें ब्रिटिश काल में मैसूर रियासत और मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच हुए समझौतों में निहित हैं।
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत, संसद ने अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) अधिनियमित किया है, जो ऐसे विवादों के समाधान के लिए ट्रिब्यूनल स्थापित करने का प्रावधान करता है।
- कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल (Cauvery Water Disputes Tribunal – CWDT) का गठन 1990 में किया गया था, जिसने 2007 में अपना अंतिम निर्णय दिया।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर, केंद्र सरकार ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) का गठन किया है ताकि ट्रिब्यूनल और न्यायालय के निर्णयों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित किया जा सके।
अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का संवैधानिक और संस्थागत ढाँचा
- संविधान का अनुच्छेद 262: यह संसद को अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन (adjudication) के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
- संसद यह भी प्रावधान कर सकती है कि ऐसे किसी भी विवाद में सर्वोच्च न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय अपना क्षेत्राधिकार न रखे।
- अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956: इस अधिनियम के तहत, केंद्र सरकार को राज्यों के बीच नदी जल विवादों के समाधान के लिए एक अस्थायी ट्रिब्यूनल स्थापित करने का अधिकार है।
- ट्रिब्यूनल का निर्णय आमतौर पर अंतिम और राज्यों के लिए बाध्यकारी होता है, और इसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 (River Boards Act, 1956): यह अधिनियम केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के विनियमन तथा विकास के लिए नदी बोर्ड स्थापित करने का अधिकार देता है। हालांकि, यह अधिनियम अभी तक प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया है।
- कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA): सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर स्थापित, यह प्राधिकरण कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार कावेरी बेसिन में जल के वितरण और प्रबंधन की निगरानी करता है।
- कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC): यह CWMA की एक सहायक संस्था है, जो जल के दैनिक या साप्ताहिक प्रवाह को विनियमित करने और संबंधित राज्यों को आवश्यक निर्देश जारी करने के लिए जिम्मेदार है।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): यद्यपि अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम ट्रिब्यूनल के निर्णयों पर न्यायालयों के क्षेत्राधिकार को प्रतिबंधित करता है, सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ मामलों में अनुच्छेद 136 (विशेष अनुमति याचिका) के तहत अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया है, विशेषकर जब संवैधानिक या कानूनी प्रश्न शामिल हों।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अंतर-राज्यीय जल विवाद | भारत में संघीय ढांचे और राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे से संबंधित जटिलताओं को दर्शाता है। |
| सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका | अंतर-राज्यीय विवादों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुसार न्यायपालिका की मध्यस्थता भूमिका को स्पष्ट करता है। |
| कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) | जल विवादों के समाधान और जल बंटवारे के कार्यान्वयन के लिए एक विशेषज्ञ संस्था की आवश्यकता को रेखांकित करता है। |
| जल विनियमन समिति (CWRC) | तकनीकी सिफारिशें प्रदान करने और जल प्रवाह की निगरानी में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। |
| कृषि पर प्रभाव | जल की कमी और इसके असमान वितरण का कृषि उत्पादकता और किसानों की आजीविका पर सीधा प्रभाव पड़ता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- कावेरी बेसिन में कृषि मुख्य रूप से चावल, गन्ना और अन्य फसलों पर निर्भर करती है, जिसके लिए पर्याप्त जल की आवश्यकता होती है। जल की कमी से कृषि उत्पादन में गिरावट आती है, जिससे किसानों की आय और राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
- जल विवाद से औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों में जल आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों और बुनियादी ढांचे के विकास में बाधा आ सकती है।
सामाजिक महत्व
- जल विवाद से प्रभावित क्षेत्रों में किसानों और ग्रामीण समुदायों के बीच सामाजिक अशांति और विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं, जिससे कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है।
- जल की कमी से ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन बढ़ सकता है, जिससे शहरी बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ सकता है।
शासनिक महत्व
- यह मामला अंतर-राज्यीय विवादों के समाधान में केंद्र सरकार, सर्वोच्च न्यायालय और विशेष प्राधिकरणों (जैसे CWMA) की भूमिका को उजागर करता है।
- यह संघीय ढांचे के भीतर राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय की आवश्यकता पर बल देता है, विशेषकर साझा प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में।
पर्यावरणीय महत्व
- नदी के जल का अत्यधिक उपयोग या अपर्याप्त प्रवाह नदी पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे जैव विविधता और नदी के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पैटर्न में बदलाव से जल की उपलब्धता और भी अनिश्चित हो जाती है, जिससे भविष्य में ऐसे विवादों की संभावना बढ़ जाती है।
चुनौतियाँ
1. अंतर-राज्यीय जल विवाद
- भारत में कई प्रमुख नदियाँ विभिन्न राज्यों से होकर गुजरती हैं, जिससे जल बंटवारे को लेकर अक्सर विवाद उत्पन्न होते हैं।
- इन विवादों का समाधान राजनीतिक इच्छाशक्ति, कानूनी ढांचे और वैज्ञानिक डेटा पर निर्भर करता है, लेकिन अक्सर भावनात्मक और क्षेत्रीय मुद्दे हावी हो जाते हैं।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध
2. जलवायु परिवर्तन और जल उपलब्धता
- अनियमित मानसून और वर्षा पैटर्न में बदलाव से नदियों में जल की उपलब्धता अनिश्चित हो गई है, जिससे जल-तनाव वाले क्षेत्रों में विवाद बढ़ रहे हैं।
- सूखे और बाढ़ जैसी चरम मौसम की घटनाओं से जल प्रबंधन और बंटवारा और भी जटिल हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: जलवायु परिवर्तन, जल संसाधन
3. संस्थागत और नियामक चुनौतियाँ
- कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) जैसे निकाय जल बंटवारे के लिए स्थापित किए गए हैं, लेकिन उनके निर्णयों को लागू करने और राज्यों के बीच सहमति बनाने में चुनौतियाँ आती हैं।
- तकनीकी डेटा और वैज्ञानिक आकलन पर आधारित निर्णय अक्सर राजनीतिक दबाव और क्षेत्रीय हितों के कारण प्रभावित होते हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन, नियामक निकाय
4. न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा
- सर्वोच्च न्यायालय अंतर-राज्यीय जल विवादों में अंतिम मध्यस्थ की भूमिका निभाता है, लेकिन उसके निर्णयों को लागू करने में राज्यों की ओर से प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है।
- न्यायालय ने स्वयं स्वीकार किया है कि ऐसे विवादों में ‘सोसायटी’ की याचिकाओं को स्वीकार करने से अंतहीन मुकदमेबाजी हो सकती है, जिससे न्यायिक संसाधनों पर बोझ पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: न्यायपालिका, न्यायिक सक्रियता
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जल की कमी | बारिश की कमी वाले वर्षों में जल की उपलब्धता में गिरावट, जिससे कृषि और अन्य उपयोगों के लिए पर्याप्त जल नहीं मिल पाता। |
| राज्यों के बीच अविश्वास | राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर ऐतिहासिक अविश्वास और सहयोग की कमी, जिससे समाधान कठिन हो जाता है। |
| डेटा की व्याख्या | जल प्रवाह और उपलब्धता के डेटा की व्याख्या को लेकर राज्यों के बीच मतभेद, जिससे निष्पक्ष निर्णय लेना मुश्किल होता है। |
| निर्णयों का अनुपालन | कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का राज्यों द्वारा पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करना। |
| राजनीतिकरण | जल विवादों का राजनीतिकरण, जिससे समस्या का तर्कसंगत और वैज्ञानिक समाधान खोजना मुश्किल हो जाता है। |
आगे की राह
- अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान के लिए एक स्थायी तंत्र विकसित करना, जिसमें राज्यों के बीच सहयोग और विश्वास निर्माण पर जोर दिया जाए।
- जल प्रबंधन प्राधिकरणों (जैसे CWMA) को अधिक स्वायत्तता और प्रवर्तन शक्तियाँ प्रदान करना ताकि उनके निर्णयों का प्रभावी ढंग से पालन हो सके।
- जल के कुशल उपयोग और संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीकों (जैसे ड्रिप सिंचाई, वर्षा जल संचयन) को बढ़ावा देना।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए जल बंटवारे के समझौतों की नियमित समीक्षा और उन्हें अद्यतन करना।
- जल डेटा संग्रह और साझाकरण में पारदर्शिता और सटीकता सुनिश्चित करना, ताकि वैज्ञानिक आधार पर निर्णय लिए जा सकें।
- जन जागरूकता अभियान चलाकर जल संरक्षण के महत्व पर बल देना और समुदायों को जल प्रबंधन में शामिल करना।
- विवादों के समाधान के लिए न्यायिक प्रक्रिया के बजाय मध्यस्थता और बातचीत को प्राथमिकता देना, जिससे समय और संसाधनों की बचत हो सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
कावेरी जल विवाद · अंतर-राज्यीय जल विवाद · सर्वोच्च न्यायालय · संघवाद · अनुच्छेद 262 · अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम · कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण · कावेरी जल विनियमन समिति · न्यायिक समीक्षा · सहकारी संघवाद
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची II, प्रविष्टि 17)’, ‘note’: “राज्य सूची में ‘जल’ का विषय”}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची I, प्रविष्टि 56)’, ‘note’: ‘संसद द्वारा अंतर-राज्यीय नदियों का विनियमन’}
अवधारणा प्रवाह
कम वर्षा के कारण जल की कमी → कावेरी नदी में जल प्रवाह में कमी → तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच जल बंटवारे पर विवाद → कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) द्वारा निर्देश → राज्यों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ → सर्वोच्च न्यायालय द्वारा याचिकाओं पर सुनवाई और निर्णय
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन से संबंधित है।
2. संसद कानून द्वारा किसी भी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन के लिए प्रदान कर सकती है।
3. सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे किसी भी विवाद पर अधिकारिता का प्रयोग करने से रोका जा सकता है यदि संसद ऐसा कानून बनाती है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी विवादों से संबंधित है। कथन 2 सही है क्योंकि अनुच्छेद 262(1) संसद को इस संबंध में कानून बनाने का अधिकार देता है। कथन 3 सही है क्योंकि अनुच्छेद 262(2) संसद को यह शक्ति देता है कि वह कानून द्वारा यह प्रावधान कर सकती है कि सर्वोच्च न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय ऐसे किसी भी विवाद पर अधिकारिता का प्रयोग नहीं करेगा।
Q2. कावेरी जल विवाद के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा प्राधिकरण कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच जल के प्रवाह को विनियमित करने के लिए जिम्मेदार है?
- कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण
- कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA)
- केंद्रीय जल आयोग
- राष्ट्रीय जल बोर्ड
उत्तर: कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) — कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) का गठन कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम अधिनिर्णय को लागू करने के लिए किया गया था और यह कर्नाटक तथा तमिलनाडु के बीच जल के प्रवाह को विनियमित करने के लिए जिम्मेदार है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। कावेरी जल विवाद के संदर्भ में, इन विवादों के स्थायी समाधान के लिए सहकारी संघवाद के महत्व पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका का संक्षिप्त परिचय।
2. **सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका:**
* अनुच्छेद 262 के तहत संसद की शक्ति और न्यायाधिकरणों के गठन का उल्लेख।
* न्यायाधिकरण के अधिनिर्णय के खिलाफ अपील पर सर्वोच्च न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता।
* न्यायाधिकरण के अधिनिर्णय को लागू करने और अंतरिम आदेश जारी करने में भूमिका (जैसे कावेरी मामले में)।
* न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ और तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता।
* न्यायिक सक्रियता बनाम विधायी/कार्यकारी समाधान की आवश्यकता पर बहस।
3. **कावेरी जल विवाद का संदर्भ:**
* विवाद की पृष्ठभूमि और इसमें शामिल राज्य (कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी)।
* कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन और उसका अंतिम अधिनिर्णय।
* सर्वोच्च न्यायालय द्वारा CWDT के अधिनिर्णय में संशोधन और उसे अंतिम रूप देना।
* कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) की स्थापना।
* हालिया घटनाक्रम: जल आवंटन पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख और राज्यों के बीच चल रहे विवाद।
4. **सहकारी संघवाद का महत्व:**
* अंतर-राज्यीय विवादों के समाधान में राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय की आवश्यकता।
* न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को रेखांकित करना और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भूमिका।
* संवाद, बातचीत और आम सहमति के माध्यम से समाधान की संभावनाएँ।
* केंद्र सरकार की भूमिका एक मध्यस्थ के रूप में।
* अंतर-राज्यीय परिषदों और क्षेत्रीय परिषदों जैसे मंचों का प्रभावी उपयोग।
5. **निष्कर्ष:** अंतर-राज्यीय जल विवादों के स्थायी समाधान के लिए न्यायिक निर्णयों के साथ-साथ सहकारी संघवाद के सिद्धांतों को अपनाने की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: orissapost.com
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