हिमाचल में मानसून: 110 सड़कें बंद, 91 ट्रांसफार्मर ठप, 217 पेयजल योजनाएं प्रभावित

Himachal Monsoon : हिमाचल में बारिश से 110 सड़कें बंद, 91 बिजली ट्रांसफार्मर ठप; 217 पेयजल योजनाएं प्रभावित — diagram

हिमाचल में मानसून: 110 सड़कें बंद, 91 ट्रांसफार्मर ठप, 217 पेयजल योजनाएं प्रभावित

Map of Himachal Pradesh highlighted on the map of India — हिमाचल मानसून प्रभावित सड़कें ट्रांसफार्मर पेयजल योजनाएं
मानचित्र व माइंड-मैप: हिमाचल में बारिश से प्रभावित क्षेत्र

✎ आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 भारत में आपदाओं के प्रभावी प्रबंधन के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है, जिसमें राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर प्राधिकरणों की स्थापना की गई है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (भारत का भूगोल, प्राकृतिक आपदाएँ)  |  GS Paper III — आपदा प्रबंधन
  • Prelims: आपदा प्रबंधन अधिनियम, राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल, भूस्खलन, अतिवृष्टि, हिमाचल प्रदेश
  • Essay: जलवायु परिवर्तन और भारत में प्राकृतिक आपदाओं का बढ़ता प्रभाव, आपदा प्रबंधन में प्रौद्योगिकी की भूमिका और चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 भारत में आपदाओं के प्रभावी प्रबंधन के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है, जिसमें राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर प्राधिकरणों की स्थापना की गई है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, हिमाचल प्रदेश में मानसूनी वर्षा के कारण व्यापक जनजीवन प्रभावित हुआ है। राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र (SEOC) की रिपोर्ट के अनुसार, 110 सड़कें बंद हो गईं, 91 बिजली ट्रांसफार्मर बाधित हुए और 217 पेयजल योजनाएँ प्रभावित हुईं। इस मानसून सीज़न में अब तक 973 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान दर्ज किया गया है, जो राज्य में आपदा प्रबंधन की चुनौतियों को उजागर करता है।

पृष्ठभूमि

  • हिमाचल प्रदेश एक पहाड़ी राज्य है जो अपनी जटिल भौगोलिक संरचना के कारण भूस्खलन (Landslides), अचानक बाढ़ (Flash Floods) और बादल फटने (Cloudbursts) जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
  • मानसून का मौसम (जून से सितंबर) राज्य में भारी वर्षा लाता है, जिससे अक्सर नदियों का जलस्तर बढ़ जाता है और पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी का कटाव होता है।
  • राज्य में बुनियादी ढाँचा, विशेषकर सड़कें, बिजली और पेयजल आपूर्ति प्रणालियाँ, ऐसी चरम मौसमी घटनाओं से आसानी से प्रभावित हो जाती हैं।
  • राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए विभिन्न आपदा प्रबंधन योजनाओं और प्रतिक्रिया तंत्रों को लागू करते हैं।
  • आपदा प्रबंधन अधिनियम (Disaster Management Act), 2005 भारत में आपदा प्रबंधन के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है, जिसमें राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों की स्थापना शामिल है।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण मौसमी पैटर्न में बदलाव आ रहा है, जिससे हिमाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ अधिक बार और तीव्र हो रही हैं।
  • राज्य में पर्यटन और कृषि अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, और प्राकृतिक आपदाएँ इन क्षेत्रों पर गंभीर आर्थिक प्रभाव डालती हैं।

भारत में आपदा प्रबंधन

  • आपदा प्रबंधन (Disaster Management) से तात्पर्य आपदाओं के प्रभावों को कम करने, उनसे निपटने और उनके बाद पुनर्निर्माण के लिए किए गए उपायों से है। इसमें आपदा से पहले, दौरान और बाद की गतिविधियाँ शामिल होती हैं।
  • भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत एक त्रि-स्तरीय संस्थागत ढाँचा स्थापित किया गया है: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA)।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) एक विशेष बल है जिसे आपदा प्रतिक्रिया और खोज एवं बचाव कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
  • राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) आपदाओं से प्रभावित लोगों को तत्काल राहत प्रदान करने और बुनियादी ढाँचे की मरम्मत के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं।
  • आपदा न्यूनीकरण (Disaster Mitigation) में ऐसी संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक रणनीतियाँ शामिल हैं जो आपदाओं के जोखिम और प्रभावों को कम करती हैं, जैसे कि बेहतर भवन संहिताएँ, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ और भूमि उपयोग योजना।
  • आपदा तैयारी (Disaster Preparedness) में आपातकालीन योजनाएँ बनाना, मॉक ड्रिल आयोजित करना और समुदाय को आपदाओं से निपटने के लिए शिक्षित करना शामिल है।
  • भारत में आपदा प्रबंधन का दृष्टिकोण अब प्रतिक्रिया-केंद्रित से हटकर जोखिम-न्यूनीकरण-केंद्रित हो गया है, जिसमें आपदाओं के मूल कारणों को संबोधित करने पर जोर दिया जाता है।
  • पहाड़ी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन में भूस्खलन निगरानी प्रणाली, जल निकासी प्रबंधन और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर प्रतिबंध जैसे विशिष्ट उपाय शामिल होते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
सड़कें बंद आवागमन बाधित, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा
बिजली ट्रांसफार्मर ठप बिजली आपूर्ति में व्यवधान, दैनिक जीवन और आर्थिक गतिविधियों पर असर
पेयजल योजनाएं प्रभावित स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता में कमी, स्वास्थ्य संबंधी जोखिम
जिलेवार प्रभाव मंडी और कुल्लू जैसे जिलों में सर्वाधिक क्षति, ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक समस्या
आर्थिक नुकसान बुनियादी ढांचे की क्षति से राज्य की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव

महत्व

सामाजिक महत्व

  • मानसून की भारी बारिश से हिमाचल प्रदेश में जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जिससे आम नागरिकों को दैनिक गतिविधियों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
  • सड़कें बंद होने से दूरदराज के इलाकों में लोगों का आवागमन बाधित हुआ है, जिससे आपातकालीन सेवाओं तक पहुंच भी प्रभावित हो सकती है।
  • पेयजल योजनाओं के प्रभावित होने से स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन गई है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं।

आर्थिक महत्व

  • बुनियादी ढांचे, विशेषकर सड़कों और बिजली आपूर्ति नेटवर्क को हुए नुकसान से राज्य की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • कृषि और पर्यटन, जो हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभ हैं, ऐसे मौसम संबंधी व्यवधानों से सीधे प्रभावित होते हैं, जिससे स्थानीय आय और रोजगार पर असर पड़ता है।
  • मरम्मत और पुनर्निर्माण कार्यों पर भारी व्यय की आवश्यकता होगी, जिससे राज्य के राजकोषीय संसाधनों पर दबाव पड़ेगा।

पर्यावरणीय महत्व

  • अत्यधिक वर्षा भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का कारण बनती है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता है और पर्यावरण को दीर्घकालिक क्षति पहुँचती है।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हो सकती है, जिससे पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता और बढ़ जाती है।

चुनौतियाँ

1. आपदा प्रबंधन और प्रतिक्रिया

  • पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और बाढ़ के कारण क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे की मरम्मत और बहाली एक बड़ी चुनौती है।
  • दूरदराज के क्षेत्रों तक राहत सामग्री और आपातकालीन सेवाओं को पहुंचाना दुर्गम भूभाग के कारण कठिन हो जाता है।

2. बुनियादी ढाँचे का लचीलापन

  • सड़कें, बिजली ट्रांसफार्मर और पेयजल योजनाएं जैसी महत्वपूर्ण अवसंरचनाएं अत्यधिक मौसम की घटनाओं के प्रति संवेदनशील हैं।
  • भविष्य में ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए अधिक लचीले और आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के निर्माण की आवश्यकता है।

3. पेयजल और स्वच्छता

  • पेयजल योजनाओं के बाधित होने से स्वच्छ पानी की कमी हो जाती है, जिससे जल जनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
  • आपदा के बाद स्वच्छता बनाए रखना और दूषित जल स्रोतों से बचाव सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।

4. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

  • मानसून की तीव्रता में वृद्धि और अप्रत्याशित वर्षा पैटर्न जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को दर्शाते हैं।
  • पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं, जिससे प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम बढ़ता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
सड़क संपर्क का टूटना आपातकालीन सेवाओं, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति और लोगों की आवाजाही में बाधा
बिजली आपूर्ति में व्यवधान दैनिक जीवन, संचार और आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव
पेयजल योजनाओं का प्रभावित होना स्वच्छ पेयजल की कमी, स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों में वृद्धि
आर्थिक नुकसान कृषि, पर्यटन और बुनियादी ढांचे को क्षति से राज्य की अर्थव्यवस्था पर दबाव
पुनर्निर्माण और बहाली क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे की मरम्मत और बहाली में लगने वाला समय और संसाधन

आगे की राह

  • आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे का निर्माण: सड़कों, पुलों, बिजली लाइनों और पेयजल प्रणालियों को इस तरह से डिजाइन और निर्मित किया जाना चाहिए जो अत्यधिक मौसमी घटनाओं का सामना कर सकें।
  • प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली: भूस्खलन और बाढ़ के लिए उन्नत पूर्व चेतावनी प्रणालियों को स्थापित करना और उनका नियमित रखरखाव करना, ताकि समय पर निकासी और तैयारी की जा सके।
  • सामुदायिक स्तर पर तैयारी: स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित करना और उन्हें आवश्यक उपकरण व संसाधन उपलब्ध कराना।
  • वन और जल संरक्षण: वनीकरण, ढलानों का स्थिरीकरण और जल संचयन संरचनाओं के माध्यम से मिट्टी के कटाव को कम करना और जल संसाधनों का प्रबंधन करना।
  • जलवायु परिवर्तन अनुकूलन रणनीतियाँ: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और पर्वतीय क्षेत्रों को अनुकूल बनाने के लिए दीर्घकालिक रणनीतियाँ विकसित करना।
  • अंतर-एजेंसी समन्वय: राज्य और केंद्र सरकार की विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना ताकि आपदा प्रतिक्रिया और राहत कार्यों को सुचारू रूप से चलाया जा सके।
  • नियमित रखरखाव और उन्नयन: मौजूदा बुनियादी ढांचे का नियमित रखरखाव और उन्नयन सुनिश्चित करना ताकि उसकी कार्यक्षमता बनी रहे और वह आपदाओं के प्रति कम संवेदनशील हो।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

प्राकृतिक आपदाएँ · आपदा प्रबंधन · हिमाचल प्रदेश · मानसून · बुनियादी ढाँचा · जलवायु परिवर्तन · राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष · राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण · पहाड़ी क्षेत्र · सतत विकास

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 243W’, ‘note’: ‘शहरी स्थानीय निकायों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 243G’, ‘note’: ‘पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
  • {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: “राज्य सूची में ‘जल आपूर्ति’ और ‘सड़कें'”}

अवधारणा प्रवाह

भारी मानसूनी वर्षा  →  भूस्खलन और बाढ़  →  बुनियादी ढांचे (सड़क, बिजली, पेयजल) को क्षति  →  आवागमन, बिजली और पेयजल आपूर्ति बाधित  →  जनजीवन और आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का गठन किया गया था।
2. राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) प्राथमिक रूप से केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित होता है।
3. भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ पहाड़ी क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे को अधिक प्रभावित करती हैं।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority – NDMA) का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत किया गया था। कथन 2 गलत है। राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (State Disaster Response Fund – SDRF) का वित्तपोषण केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा एक निश्चित अनुपात में किया जाता है, जिसमें केंद्र का योगदान अधिक होता है, लेकिन यह प्राथमिक रूप से केवल केंद्र द्वारा वित्त पोषित नहीं होता है। कथन 3 सही है। पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाएँ सड़क, बिजली और पेयजल जैसी बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं।

Q2. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?

  1. यह अधिनियम भारत में आपदा प्रबंधन के लिए एक समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण प्रदान करता है।
  2. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का अध्यक्ष भारत का प्रधानमंत्री होता है।
  3. राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) का अध्यक्ष संबंधित राज्य का मुख्यमंत्री होता है।
  4. यह अधिनियम केवल प्राकृतिक आपदाओं को कवर करता है, मानव निर्मित आपदाओं को नहीं।

उत्तर: यह अधिनियम केवल प्राकृतिक आपदाओं को कवर करता है, मानव निर्मित आपदाओं को नहीं। — आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों प्रकार की आपदाओं को कवर करता है। यह आपदा प्रबंधन के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है। अन्य सभी कथन सही हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ पहाड़ी क्षेत्रों में मानसून से संबंधित आपदाओं के बढ़ते प्रभाव के कारणों का विश्लेषण करें। ऐसी आपदाओं के प्रभावों को कम करने के लिए सरकार द्वारा उठाए जा सकने वाले कदमों पर भी चर्चा करें। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: पहाड़ी क्षेत्रों में मानसून से संबंधित आपदाओं (जैसे भूस्खलन, बाढ़, बादल फटना) की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता का संक्षिप्त उल्लेख करें, जैसा कि हिमाचल प्रदेश की हालिया घटनाओं में देखा गया है।
2. बढ़ते प्रभाव के कारण (विश्लेषण):
a. भौगोलिक संवेदनशीलता: अस्थिर भूविज्ञान, खड़ी ढलानें, भूकंपीय क्षेत्र।
b. जलवायु परिवर्तन: वर्षा के पैटर्न में बदलाव, अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि।
c. अनियोजित शहरीकरण और बुनियादी ढाँचा विकास: सड़कों, जलविद्युत परियोजनाओं, इमारतों का निर्माण जो मिट्टी की स्थिरता को प्रभावित करता है।
d. वनों की कटाई और भूमि उपयोग में परिवर्तन: मिट्टी के कटाव में वृद्धि, जल अवशोषण क्षमता में कमी।
e. अपर्याप्त ड्रेनेज सिस्टम: जल निकासी की खराब व्यवस्था, जिससे जलभराव और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
f. जागरूकता और तैयारी की कमी: स्थानीय समुदायों और प्रशासन में आपदा जोखिम के प्रति अपर्याप्त समझ।
3. प्रभावों को कम करने के लिए उठाए जा सकने वाले कदम (चर्चा):
a. पूर्व चेतावनी प्रणाली: आधुनिक मौसम विज्ञान उपकरण और संचार नेटवर्क का उपयोग।
b. आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचा: भूस्खलन-रोधी तकनीकों, बेहतर सड़क निर्माण मानकों और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए सख्त पर्यावरणीय आकलन का उपयोग।
c. वैज्ञानिक भूमि उपयोग योजना: संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर प्रतिबंध, वनीकरण और पुनर्वनीकरण कार्यक्रम।
d. सामुदायिक तैयारी और क्षमता निर्माण: स्थानीय स्तर पर आपदा प्रतिक्रिया टीमों का प्रशिक्षण, मॉक ड्रिल।
e. नीतिगत और नियामक सुधार: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का प्रभावी कार्यान्वयन।
f. राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) का प्रभावी उपयोग।
g. जलवायु परिवर्तन अनुकूलन रणनीतियाँ: दीर्घकालिक योजनाएँ और अनुसंधान।
4. निष्कर्ष: एक समग्र और बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें जिसमें तकनीकी समाधान, नीतिगत हस्तक्षेप और सामुदायिक भागीदारी शामिल हो ताकि पहाड़ी क्षेत्रों को मानसून आपदाओं के प्रति अधिक लचीला बनाया जा सके।

स्रोत: amarujala.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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